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कविता

जीत गए हैं बच्चे
प्रताप सोमवंशी


 
पलक झपकते ही बड़े हो गए हैं ये बच्चे
कुछ देर पहले तक जो बालू में खेल रहे थे
इस समय उन्हीं बच्चों की टोली
नदी के भीतर लहरों से जूझ रही है
एक डूबते हुए आदमी को बचाने की जद्दोजेहद जारी है
बच्चे बड़ों से भी कई गुना बड़े नजर आ रहे हैं
लहरें एक बार फिर हार गईं है
जीत गए हैं बच्चे
यमराज के हाथ से छीन लाए हैं एक जिंदगी
मैले-कुचैले कपड़ों और पानी से चिपके बालों वाले
ये बच्चे गंदगी की पहचान नहीं
सभ्यता के वाहक नजर आ रहे हैं
जो अपने सामने किसी को मरता हुआ नहीं देख सकते
इन अनपढ़ बच्चों को समझ नहीं आती शुक्रिया की भाषा
अपने किए के एवज में नहीं माँगते वीरता के पदक
न ही जिसे बचाया है उससे विजिटंग कार्ड और पता
कि कभी हारे-गाढ़े अपने पुण्य के एवज में कुछ पाने को सोचें
बेहोश आदमी की बोली लौटने पर हँस पड़ते हैं सब एक साथ
एक सुख सबके हिस्से में बराबर-बराबर बँट जाता है
हाँ, ये पढ़ लेते हैं सामने वाले की आँख में कृतजता का भाव
इसमें पीढ़ियों का अनुभव काम आता है
मरने वाले रोज चेहरे बदल-बदल कर आते हैं इन घाटों पर
बचाने वालों का कुछ नहीं बदला, न वे न उनके हालात
उम्र के साथ बदलती हैं सिर्फ उनकी पीढ़ियाँ
कल इनके पिता थे यहाँ इन घाटों पर
आज ये विरासत सँभाल रहे हैं
कल आएँगे इनके बच्चे फिर बच्चों के बच्चे
सबके हिस्से होंगे पचास-सौ किस्से
लहरों को परास्त करते और मौत को मुँह चिढ़ाते हुए।

 


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