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कविता

तैयारी
सर्वेंद्र विक्रम


मानकों पर खरे नहीं थे उनके शरीर
पारंपरिक सी बनावट, चेहरे
बहुत पास से भी साफ समझ में नहीं आते थे
शायद धुंध थी, भ्रम हो जाता कि वे वहाँ हैं भी या नहीं

खाने में ही नहीं, जो कुछ भी दिया जाता भीतर रख लेतीं
उन्हें लेकर खेला जा रहा था खेल
वे चाहें न चाहें, इससे अंतर नहीं पड़ता था
और फिर धीरे-धीरे रिवाज सा बनता गया

कौन से बीज थे स्याह तंतुओं ने निकल कर उन्हें घेर लिया
जितना बाहर घटित हुआ उससे हजार गुना भीतर
कई चीजें जिनके बारे में चाह कर भी बताना मुश्किल
सो ढकने छिपाने पर्दा डालने में बीतने लगीं वे

उनकी दिलचस्पी खत्म हो गई चिट्ठियों में
नदी और पतीलों की खुदबुद में
झंडों प्रार्थनाओं अमरता और आनंद की अवधारणाओं में
बोलते हुए अपने आपको सुनने में

भयावह सूखी आँखों से ब्यौरों को ताकती
उन्हें देख मुश्किल से ही यह विश्वास होगा
उन्हीं की सोहबत में बच्चों ने सीखा होगा बोलना
कि कभी उन्होंने सुनाई थी एक दूसरे को अपनी कहानियाँ

एक सी आवाजें घन की तरह गिरतीं हैं
वे उसी अँधेरे में जहाँ खो जाता है नैतिक अधिकार
शरीर पर निर्णयों पर पूर्वजों पर
मृतकों का मुँह अंतिम बार देखने पर

एक दूसरे का हाथ पकड़ना भूली नहीं
किसी अदृश्य धागे से जुड़ी हुई थी उनकी यातना

उनके दुख की वजहें ये नहीं थीं कि
उन्हें मिले नहीं चिड़ियों से पंख
सपनों में आती है अक्सर कँटीली बाड़
रास्तों पर नहीं हैं मार्ग संकेत
जीवन में नहीं कोई फंतासी

उनके भारी पैर धीरे-धीरे छोटे और छोटे होते जाते
तारों के नीचे वे उसे घेर कर बैठी हुईं
जिसके दिन पूरे चढ़े हुए थे
उन्हें समय का ध्यान रहा कि बहुत देर न हो जाए
उन्हीं में से पता नहीं कहाँ से किसी ने उठाया
और काँपती सी आवाज में धीरे-धीरे जुड़ने लगीं
रोने और गाने के बीच की सी आवाजें
आरोह में झनझनातीं

वे समझ रहीं थीं
बहुत देर तक चलते रहने वाला नहीं था उठान
वे गा रहीं थीं लज्जाहीन,
जगा रहीं थीं आग तपने लगे वे चेहरे

सहेज कर रखे गए शब्द
निकल कर जमा हो रहे थे काँसे जैसे होंठों पर
वे सौंपने की तैयारी में थीं


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