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कविता

कविताएँ
मुईन अहसन जज़्बी


  1. हम दहर के इस वीराने में
  2. मरने की दुआएं क्यूं मांगूं
  3. मिले ग़म से अपने फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़साना
  4. मौत

हम दहर के इस वीराने में

हम दहर के इस वीराने में जो कुछ भी नज़ारा करते हैं
अश्कों की ज़बां में कहते हैं आहों से इशारा करते हैं

ऐ मौज-ए-बला, उनको भी ज़रा दो-चार थपेड़े हल्के से
कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफ़ां का नज़ारा करते हैं

क्या जानिये कब ये पाप कटे क्या जानिये वो दिन कब आये
जिस दिन के लिये इस दुनिया में क्या कुछ न गवारा करते हैं

क्या तुझको पता क्या तुझको ख़बर दिन रात ख़यालों में अपने
ऐ काकुल-ए-गेती हम तुझको दिन-रात सँवारा करते हैं

(शीर्ष पर वापस)

मरने की दुआएं क्यूं मांगूं

मरने की दुआएँ क्यूँ मांगूँ , जीने की तमन्ना कौन करे
यह दुनिया हो या वह दुनिया अब ख्वाहिश-ए-दुनिया कौन करे
जब कश्ती साबित-ओ-सालिम थी साहिल की तमन्ना किसको थी
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर साहिल की तमन्ना कौन करे
जो आग लगाई थी तुमने उसको तो बुझाया अश्कों से
जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे
दुनिया ने हमें छोड़ा 'जज़्बी' हम छोड़ न दें क्यूं दुनिया को
दुनिया को समझ कर बैठे हैं अब दुनिया दुनिया कौन करे

(शीर्ष पर वापस)

मिले ग़म से अपने फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़साना

मिले ग़म से अपने फ़ुर्सत तो सुनाऊँ वो फ़साना
कि टपक पड़े नज़र से मय-ए-इश्रत-ए-शबाना

यही ज़िन्दगी मुसीबत यही ज़िन्दगी मुसर्रत
यही ज़िन्दगी हक़ीक़त यही ज़िन्दगी फ़साना

कभी दर्द की तमन्ना कभी कोशिश-ए-मदावा
कभी बिजलियों की ख़्वाहिश कभी फ़िक़्र-ए-आशियाना

मेरे कहकहों के ज़द पर कभी गर्दिशें जहाँ की
मेरे आँसूओं की रौ में कभी तल्ख़ी-ए-ज़माना

कभी मैं हूँ तुझसे नाला कभी मुझसे तू परेशाँ
कभी मैं तेरा हदफ़ हूँ कभी तू मेरा निशाना

जिसे पा सका न ज़ाहिद जिसे छू सका न सूफ़ी
वही तार छेड़ता है मेरा सोज़-ए-शायराना

(शीर्ष पर वापस)

मौत

अपनी सोई हुई दुनिया को जगा लूं तो चलूं
अपने ग़मख़ाने में एक धूम मचा लूं तो चलूं
और एक जाम-ए-मए तल्ख़ चढ़ा लूं तो चलूं
अभी चलता हूं ज़रा ख़ुद को संभालूं तो चलूं

जाने कब पी थी अभी तक है मए-ग़म का ख़ुमार
धुंधला धुंधला सा नज़र आता है जहाने बेदार
आंधियां चलती हैं दुनिया हुई जाती है ग़ुबार
आंख तो मल लूं, ज़रा होश में आ लूं तो चलूं

वो मेरा सहर वो एजाज़ कहां है लाना
मेरी खोई हुई आवाज़ कहां है लाना
मेरा टूटा हुआ साज़ कहां है लाना
एक ज़रा गीत भी इस साज़ पे गा लूं तो चलूं

मैं थका हारा था इतने में जो आए बादल
किसी मतवाले ने चुपके से बढ़ा दी बोतल
उफ़ वह रंगीं पुर-असरार ख़यालों के महल
ऐसे दो चार महल और बना लूं तो चलूं

मेरी आंखों में अभी तक है मोहब्बत का ग़ुरूर
मेरे होंटों को अभी तक है सदाक़त का ग़ुरूर
मेरे माथे पे अभी तक है शराफ़त का ग़ुरूर
ऐसे वहमों से ख़ुद को निकालूं तो चलूं

(शीर्ष पर वापस)

 


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