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आलोचना

प्रेम और शौर्य का लोकप्रिय पाठ
प्रियम अंकित


एक पुरानी कहावत है - ' प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज है।' इस कहावत में 'जायज' शब्द की जो भी अर्थ-छवियाँ उभरती हैं, उनमें आक्रामकता और अमानवीयता का संकेत ज्यादा होता है। उसने कहा था कहानी का अब तक प्रचलित लोकप्रिय पाठ, इस आक्रामकता और अमानवीयता के ऊपर मानवीय संवरणशीलता के पक्ष को शिद्दत से प्रतिष्ठित करता है। मगर इस लोकप्रिय पाठ में निहित भावुकता कहानी के कुछ सूराखों को ढँक देती है।

इस कहानी में युद्ध है, और इस युद्ध की निरर्थकता को तीव्र करने वाला द्वंद्व भी है। यह युद्ध, एक वृहत्तर युद्ध का हिस्सा हो सकता है, जिसे इतिहास में प्रथम विश्व-युद्ध के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध उपनिवेशों की बंदरबांट के लिए लड़ा गया युद्ध था, जिसमें साम्राज्यवादी ताकतें बड़ी बेशर्मी से शरीक हुई थीं। इस युद्ध में अमानवीयता की हदें पार की गई थीं। कहानी में भारतीय सैनिकों का जत्था है, जिसे विदेशी जमीन पर अपने विदेशी आकाओं के हितों की रक्षा के लिए युद्ध में झोंका गया है। यहाँ भारतीय सैनिकों का शौर्य और बलिदान का जो तेवर है, और इस तेवर के भीतर जो भी 'नोस्टाल्जिया' है, उसे भारत की निजी राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने वाली कोई कड़ी कहानी में नहीं मिलती। उदाहरण के लिए इस 'नोस्टाल्जिक' वाक्य को देखें - "मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूँगा। भाई कीरत सिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ लगाए हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी।" यहाँ 'बुलेल की खड्ड' और 'आम का पेड़' निज धरती के, और प्रकारांतर से निज राष्ट्र के बिंब हो सकते हैं। मगर कहानी के निजी संदर्भों में राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से ये बिंब अत्यंत क्षीण है, क्योंकि भारतीय सैनिक यह युद्ध अंग्रेजों के पक्ष में जरमनों के खिलाफ लड़ रहे हैं। ये बिंब इसकी जरा भी गुंजाइश नहीं रखते कि हमें कहानी में साम्राज्यवाद-विरोधी तेवर का कोई दूरस्थ स्वर भी सुनाई दे सके। 'नोस्टाल्जिक' चेतना और राष्ट्रीय चेतना हमेशा एक नहीं होती। विदेश में दुर्गम स्थितियों को झेलते हुए अपने देश के गली-मोहल्लों को याद करने मात्र से कोई राष्ट्रवादी नहीं हो जाता। इन बिंबों को तत्कालीन दौर की भारतीय राजनीति के राष्ट्रवादी संघर्ष और सरोकारों से जोड़ना बेमानी होगा। यह याद रखने की जरूरत है कि इस कहानी में भारतीय सैनिक कहीं भी अँग्रेजी हुकूमत की आलोचना नहीं करते, बल्कि उसके पक्ष में जरमनों की हत्या करते हैं। फिर भी कहानी में ये बिंब सार्थक हैं, क्योंकि पराई धरती पर भारतीय सैनिकों द्वारा लड़े जा रहे युद्ध की निरर्थकता, और उसकी त्रासदी को बड़ी शिद्दत से उद्घाटित करते हैं -

"राम-राम यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खंदक में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना ज्यादा जाड़ा और मेह और बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं। जमीन कहीं दिखती नहीं - घंटे-दो-घंटे में कान के पर्दे फाड़ते धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछाल पड़ती है।

इस गईबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का जलजला सुना था, यहाँ दिन में पचीस जलजले होते हैं। जो कहीं खंदक से बाहर साफा या कुहनी निकाल गई, तो चटाक से गोली लगती है।"

या फिर - "पर करें क्या? हड्डियों में तो जाड़ा धँस गया है। सूर्य निकलता नहीं, और खाई के दोनों तरफ से चंबे की बावलियों के से सोते झर रहे हैं।"

एक तरफ विदेशी धरती की हड्डियाँ अकड़ कर रख देने वाली खंदकें हैं, कीचड़ है, दस गुना जाड़ा है, तो दूसरी तरफ 'लुधियाना' और 'नगरकोट' की चिर-परिचित स्थानीय छवियाँ हैं। एक तरफ अजनबी धरती का ठंडापन तो दूसरी तरफ परिचित धरती से उत्सर्जित होने वाली ऊष्मा के स्थानीय बिंब। कहानी का आरंभिक अंश स्थानिकता की इस परिचित ऊष्मा का गवाह बनता है :

"बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़िवालों की जवान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगाएँ। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-संबंध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अँगुलियों के पोरे को चींघकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्ढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर 'बचो खालसाजी।' 'हटो भाई जी।' 'ठहरना भाई जी।' 'आने दो लाला जी।' 'हटो बाछा।' ...कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्नें और खोमचे और भारेवालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि 'जी' और 'साहब' बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं, पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं - 'हट जा जीणे जोगिये'; 'हट जा करमा वालिये'; 'हट जा पुतां प्यारिए'; 'बच जा लंबी वालिये।' समष्टि में इनके अर्थ हैं कि तू जीणे योग्य है, तू भाग्यों वाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उम्र तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है? बच जा।"

देशज स्थानीकता के इन ऊष्ण 'नोस्टाल्जिक' बिंबों के परिप्रेक्ष्य में विदेश का ठंडापन सबसे अधिक त्रासद रूप में उभर कर सामने आता है, भले ही स्वतंत्रता के देशज संघर्ष से इनका कोई दूर का नाता भी न हो।

कहानी का लोकप्रिय पाठ लहना सिंह और उसके साथी सैनिकों की इस त्रासदी को, युद्ध की निरर्थकता को अनदेखा करता है। इसके उलट यह पाठ इस युद्ध को एक प्रेमी के रूप में लहना सिंह के शौर्य, पराक्रम और बलिदान के संदर्भ में सार्थक मानता है।

'उसने कहा था' शौर्य का वृत्तांत है। लहना सिंह और उसके साथी पराक्रमी हैं - "बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जरमनों को अकेला मार कर न लौटूँ, तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड-संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेकते हैं। उस दिन धावा किया था - चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था। पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, नहीं तो...।" चाहत यह है कि 'एक धावा हो जाए, तो गर्मी आ जाए।' लेकिन कहानी के भीतर से एक सवाल बड़े शांत लहजे में उभरता है - यह सारा शौर्य और पराक्रम किसके लिए? यहाँ शौर्य और पराक्रम जैसे मूल्यों का कोई सार्थक छोर है, अथवा ये एक निरर्थक युद्ध की चीथड़ी होती नैतिकता के अनायास तेवर मात्र हैं? इन सौ वर्षों में कहानी के जिस निहायत भावुक किस्म के पाठ को लोकप्रियता मिली है, वह कहानी के 'भिन्न' या 'अन्य' स्वरों को अनसुना कर देता है। यह पाठ 'मैदान में घावों से मारा - न. 77 सिख राईफल्स जमादार लहना सिंह' को एक किस्म की मिथकीय आभा से घेर देता है - अपने प्यार के लिए शहीद होने वाले प्रेमी के रूप में। लेकिन कुछ सवालों की नई शृंखला यहीं से शुरू होती है।

अमृतसर में एक लड़का और एक लड़की मिलते हैं, अनायास। लड़का, लड़की से एक सवाल पूछता है, जो अनायास नहीं है - 'तेरी कुड़माई हो गई?' हर बार लड़की 'धत' कहकर भाग जाती है। एक दिन लड़के को अनायास उत्तर मिलता है -

"हाँ, हो गई।"

"कब?"

"कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।"

अनायास अनुभव होश फाख्ता भी करते हैं, विशेषकर जब वह किशोर मन के हों। लड़के के साथ भी यही हुआ - "लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक धोबीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहा कर आती हुई वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।" यह पहली नजर वाले कैशोर्य प्रेम के निष्फल होने के बाद की मनःस्थिति है।

यह कैसी विडंबना है कि पच्चीस वर्ष बीतने के बाद लड़के को कहानी एक नाम देती है - लहना सिंह। लेकिन लड़की अब भी बेनाम है। वह सूबेदारनी है, क्योंकि उसका पति सूबेदार है। सवाल यह है की सूबेदारनी को कहानी कोई नाम देने में अक्षम क्यों रहती है? यह किस किस्म की सामाजिक व्यवस्था का संकेत है, जो स्त्री को बेनाम और पति की निर्निमेष छाया बनाए रखना चाहती है? उसने कहा था में स्मृति की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन इस कहानी का लोकप्रिय पाठ वहाँ-वहाँ पाठकों की स्मृति पर पर्दा डालता है, जहाँ-जहाँ स्मृतियों को जगाने की जरूरत है। अगर पाठक अपनी स्मृति को जगाकर कहानी के उस स्थल पर पहुँचे जहाँ पहली बार लड़का लड़की से प्रश्न करता है कि 'तेरी कुड़माई हो गई?', तो यह प्रश्न उतना मासूम नहीं लगेगा। इस प्रश्न में पितृसत्ता की वह क्रूर, शातिर और घाघ संस्कृति समाहित है, जो महज आठ वर्ष की बच्ची के जीवन को 'कुड़माई' के इर्द-गिर्द निर्धारित कर देने पर आमादा है, और बारह साल के बालक को यह परिवार से घुट्टी में मिली है।

पच्चीस बरस बाद लड़का यानि लहना सिंह इस लड़की से, जो अब बेनाम सूबेदारनी है, दुबारा मिलता है, अनायास। हर अनायास घटना से होश फाख्ता हों, यह कतई जरूरी नहीं है - "भावों की टकराहट से मूर्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकाला।"

'पसली का घाव' तब भी बहा होगा, जब लहना सिंह पहली बार सूबेदारनी से मिला, क्योंकि उसे आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा था - 'न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं।' लेकिन सूबेदारनी को बारह साल के लड़के का ध्यान बराबर था -

"मुझे पहचाना?"

"नहीं"

"तेरी कुड़माई हो गई - धत - कल हो गई - देखते नहीं, रेशमी बूटों वाला सालू - अमृतसर में..."

लहना सिंह भूल जाता है, लेकिन सूबेदारनी से मिलने पर कैशौर्य प्रेम की विगत स्मृतियाँ जग उठती हैं, प्रेम का सुषुप्त आवेग पुनः सक्रिय हो उठता है, कहानी खत्म होने से ठीक पहले इसका ठोस संकेत करती है। सूबेदारनी याद रखती है, क्योंकि लहना सिंह ने उसके प्राण बचाए थे। यह महज एक कयास है कि सूबेदारनी ने बचपन की स्मृतियों को सँजोते हुए कैशौर्य प्रेम के विगत आवेग को ज्यों का त्यों सहेज कर रखा है। कहानी में कहीं भी इस कयास को सही साबित करने के ठोस संकेत नहीं मिलते। सूबेदारनी अपने पति और पुत्र से गहरा लगाव रखती है, इसके स्पष्ट संकेत कहानी में अलबत्ता हैं। सूबेदारनी कहती है - "मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है¸ लायलपुर में जमीन दी है¸ आज नमक-हलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पल्टन क्यों न बना दी¸ जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए¸ पर एक भी नहीं जीया।" सूबेदारनी रोने लगी। 'अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टाँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे¸ आप घोड़े की लातों में चले गए थे¸ और मुझे उठा-कर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आँचल पसारती हूँ।"

कहानी का लोकप्रिय पाठ यहाँ सूबेदारनी के अपने पति और पुत्र से गहरे लगाव को देखता है। मगर वह इस अंश के असुविधाजनक स्वरों को सुनने से इनकार करता है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में वैधव्य स्त्री के लिए कलंक है। सूबेदारनी ने यों ही नहीं कहा कि "सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पल्टन क्यों न बना दी¸ जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती?" जिसके पाँच पुत्रों में से एक ही जवान हुआ हो, चार जी न पाए हों, और उस एक पर भी मृत्यु का खतरा मँडरा रहा हो, उस स्त्री को पति और पुत्र को खो देने के बाद इस क्रूर समाजव्यवस्था के दंश को ताउम्र अकेले सहने का भय क्या नहीं सताएगा? इस व्यवस्था में स्त्री अगर अपने पति और पुत्र से गहरा लगाव रखती है, तो भी वह इस भय से मुक्त नहीं हो सकती कि पति और पुत्र की असामयिक मृत्यु के उपरांत उसे कलंकिनी और समाज के लिए अपशकुनी ही माना जाएगा। पितृसत्ता की लौह संरचना में जकड़ी सूबेदारनी अगर लहना सिंह से अपने पति और बेटे को बचाने की गुहार लगाती है, तो उसके मूल में पति और पुत्र से गहरा लगाव हो सकता है, इससे इनकार नहीं है, लेकिन इस भय की सत्ता को भी नकारा नहीं जा सकता। वह लहना सिंह पर भरोसा करती है, क्योंकि जानती है कि उसे अपनी जान जोखिम में डालकर बचाने का 'कौशल' आता है।

कहानी का भावुक पाठ इसको तो अनदेखा करता ही है कि लहना सिंह, सूबेदारनी के पति और पुत्र जैसे कितने ही भारतीय जवानों को एक निरर्थक युद्ध में झोंक दिया गया है। साथ ही यह पाठ इस युद्ध में लहना सिंह की मृत्यु को एक सार्थक उद्देश्य प्रदान करता है - अपने एकतरफा और असफल प्रेम की गरिमा को सिद्ध करती मृत्यु के रूप में। लहना सिंह प्रेम के पथ का शूरवीर बलिदानी बनता है, प्रेम की संवरणशीलता और मनुष्यता का प्रतीक भी बनता है।

अगर इस कहानी के लोकप्रिय पाठ से बाहर आया जाए तो कई सूराख इस कहानी में ऐसे मिलेंगे जो इस पाठ की सर्वमान्य वैधता को प्रश्नांकित करते हैं। यह सूराख वह झरोखे बन जाएँगे जिनसे यह दिखने लगेगा कि 'उसने कहा था' कहानी स्वयं प्रेम और शौर्य के उस लोकप्रिय रूमान को पुष्ट करती है, जिसका ताना-बाना भारतीय नवजागरण द्वारा प्रसूत आधुनिकता के भीतर सक्रिय सनातनी परंपराओं की वर्चस्वशाली सरणियों द्वारा बुना गया था, जो पहली नजर वाले प्रेम की गुदगुदाती संवेदनाओं को बाल-सुलभ चपलता मानते हुए कुछ हद तक बर्दाश्त कर सकती थीं, लेकिन जो स्वभाव से दलित और स्त्री विरोधी थीं। कला एवं साहित्य के भीतर ये सरणियाँ उत्तरोत्तर लोकप्रिय होती गईं और कलाओं में लोकप्रियता और लोकतांत्रिकता के बीच की दूरी लगातार बढ़ती गई। समस्या यही है कि इस व्यवस्था में कला, साहित्य और संगीत के लोकप्रिय आस्वादों का निर्माण परंपरा और सत्ता की प्रभुत्वशाली ताकतों ने किया है, जो अपने मूल स्वरूप में पितृसत्तात्मक हैं।

'उसने कहा था' बारह साल के लड़के के शहीद लहना सिंह बनने की वीरगाथा तो है, लेकिन अगर उस आठ बरस की बच्ची के बेनाम सूबेदारनी बनने की घुटनभरी त्रासदी, छटपटाहट और एक अदद नाम पाने के उसके संघर्ष की दास्तान सुननी हो तो दूसरी कहानियाँ पढ़नी होंगी, जो शायद लोकप्रिय कम हों, मगर लोकतांत्रिक ज्यादा होंगी।


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