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कविता

जानती हैं औरतें
कमलेश


एक दिन सारा जाना-पहचाना
बर्फ-सा थिर होगा
याद में।

बर्फ-सी थिर होगी
रहस्य घिरी आकृति
आँखें भर आएँगी
अवसाद में।

आएँगे, मँडराते प्रेत सब
माँगेंगे
अस्थि, रक्त, मांस
सब दान में।

जानती हैं औरतें
बारी यह आयु की
अपनी।

 


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