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आलोचना

राजेंद्र प्रसाद सिंह : नवगीत से जनगीत तक
रवि रंजन


हिंदी गीतकाव्य के इतिहास में मुजफ्फरपुर, बिहार के निवासी राजेंद्र प्रसाद सिंह (12 जुलाई, 1930 - 8 नवंबर, 2007) नवगीत के प्रवर्तक तथा एक बड़े कवि के रूप में जाने जाते हैं। जमींदार परिवार में जन्म लेने (जिनमें से ज्यादातर जमीन-जायदाद उनके जन्म के पहले से तरह-तरह की मुकदमेबाजी में फँसी थी) और मुजफ्फरपुर जैसे एक छोटे-से शहर में आजीवन रहने के चलते वे हिंदी जगत की उपेक्षा एवं कई बार येन-केन-प्रकारेण हरदम छोटा-बड़ा पुरस्कार पाने के लिए जुगाड़ भिड़ाने और पैसा बनाने की फिराक में लगे तथाकथित साहित्यिकों के द्वारा उपहास के शिकार भी हुए। नामवर सिंह ने एक भिन्न संदर्भ में एंगल्स के हवाले से लेखकों की इस प्रवृत्ति को 'टुटपुंजिया मध्यवर्गीय जलन' कहा है। गौरतलब है कि सामंत या दरिद्र परिवार में पैदा होना न तो किसी व्यक्ति का अपना चुनाव होता है न ही इसकी वजह से वह अनिवार्यतः सामंती प्रवृत्तियों या सर्वहारा चेतना का वाहक होता है। हिंदी के विद्वान प्रगतिशील-जनवादी आलोचकों को शायद याद दिलाना जरूरी हो कि जहाँ खुद कार्ल मार्क्स ने 'दुराग्रह से मुक्ति को सच्ची आलोचना की पहली शर्त' माना है वहीं रेमंड विलियम्स जैसे मार्क्सवादी आलोचक ने भी साहित्यिक कृतियों के रचनात्मक अभिप्राय एवं प्रभाव की मीमांसा के क्रम में रचनाकार की सामाजिक स्थिति और उसकी रचनाओं को सीधे-सीधे जोड़कर देखने से पैदा होने वाले सरलीकरण के खतरे को रेखांकित किया है।

बिहार के जमींदारों व सामंतों के बीच कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह की छवि एक सामंत-विरोधी वामपंथी बुद्धिजीवी और साहित्यकार की थी, जबकि हिंदी के कुछ तथाकथिक प्रगतिशील एवं जनवादी विद्वान पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता को संदेह की नजर से देखते थे। ऐसे में कवि इकबाल की याद न आए, यह मुमकिन नहीं :

जाहिदे-तंग-नजर ने मुझे काफिर जाना
काफिर ये समझता है मुसलमां हूँ मैं।

मुजफ्फरपुर के 'बनारस बैंक चौक' पर बैजू बाबू की चाय की दुकान पर गर्मागर्म चाय की तपिश को महसूसते हुए कम बोलने और आँखों से ज्यादा कहने का भाव लिए शहर के नए-पुराने हिंदी व उर्दू कवियों के बीच बैठे सुदर्शन एवं सौम्य व्यक्तित्व के धनी राजेंद्र प्रसाद सिंह से पहली बार मिलने के पहले मुझे इल्म नहीं था कि आने वाले समय में मेरी साहित्यिक रुचि और समझ को उनका व्यक्तित्व अपनी विलक्षण मेधा तथा गहरे स्नेह से परिष्कृत और सुसंस्कृत करेगा। जहाँ तक याद है, सहपाठी कवि मित्र मनोज मेहता मुझे वहाँ ले गए थे। धीरे-धीरे हर शाम ढले एम.ए. की कक्षा के बाहर अनौपचारिक बातचीत के दरमियान कुछ नया सीखने की ललक लिए मेरी साइकिल के हैंडल बैजू बाबू की दुकान की ओर मुड़ने लगे। इसके पहले प्रायः गुरुवर प्रमोद जी और यदा-कदा आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के घर आना-जाना होता था, जो अंत तक बना रहा। प्रमोद जी के घर तो जो कोई भी आता था, वह कुछ् नया सीखने के साथ-साथ बगैर चाय-पानी के कभी नहीं लौटता। पर शास्त्री जी और प्रमोद जी के यहाँ अगाध पांडित्य और स्नेह-वत्सल वातावरण के बावजूद अनुशासन का एक अनजाना दबाव था।

राजेंद्र जी न तो हमारे परिवार से सीधे जुड़े थे और न ही वे हमारे शिक्षक थे। इसलिए उनसे खुलकर बातें होने लगीं और मेरे जैसे कई छात्रों की बुभुक्षित बौद्धिक चेतना प्रायः उनके साथ बीती संध्या-बैठकों में देशी-विदेशी साहित्य पर होने वाले विमर्श से तृप्त-परितृप्त होने लगी। संभवतः 1985-86 में पटना साइंस कॉलेज के सभागार में 'जनसंस्कृति मंच' के एक कार्यक्रम में पहली बार मैंने उन्हें 'भैया, कूदे उछल कुदाल हँसिया बल खाए' जनगीत गाते सुना, जिसका सभागार में जादुई असर हुआ और हाल तालियों की गड़गड़ाहट भर गया। उस दिन मंच पर गोरख पांडे भी मौजूद थे, जिन्होंने 'सुतल रहलीं सपन एक देखलीं' जनगीत गाया था। वर्ड्सवर्थ ने सही लिखा है कि जनसाधारण की भाषा में रचित कविता ही आम जनता के भावों का वहन कर सकती है। इसलिए ऐसे जनगीतों को 'लोकगीतों की पैरोडी' बताने वाले आलोचकों को अपने तमाम पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इनके महत्व पर पुनर्विचार करना चाहिए।

साहित्यिक हलकों में बारहा प्रचलित व्यक्तिगत निंदा-शिकायत पर मौन साध लेने वाले कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह मुजफ्फरपुर में बाहर से आनेवाले साहित्यकारों के आतिथ्य, स्थानीय साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों एवं शब्दकर्मियों पर जिस तरह दिल खोल कर खर्च करते थे उसके मद्देनजर उन्हें मुजफ्फरपुर का भारतेंदु हरिश्चंद्र कहना सही होगा। कहने की जरूरत नहीं कि उनके इस अतिरिक्त साहित्यप्रेम से परिवार के लोग बहुत खुश नहीं रहते थे।

राजेंद्र जी ने 'नई कविता' के समानांतर रचे जा रहे गीतों की भिन्न प्रकृति एवं रचना विधान को रेखांकित करने वाले नए गीतों के प्रथम संकलन 'गीतांगिनी' (1958) का संपादन किया और उसकी भूमिका में 'नवगीत' के रूप में नए गीतों का नामकरण एवं लक्षण निरूपित किया। कालांतर में अनेक कविता संग्रहों (भूमिका, मादिनी, दिग्वधू, संजीवन कहाँ, डायरी के जन्मदिन, शब्दयात्रा, प्रस्थानबिंदु इत्यादि) के साथ-साथ उनके कई स्वतंत्र नवगीत संग्रह ('आओ खुली बयार', 'रात आँख मूँद कर जगी', 'भरी सड़क पर' आदि) भी प्रकाशित हुए और जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने अनेक जनगीतों की भी रचना की जो 'गजर आधी रात का' एवं 'लाल नील धारा' के नाम से प्रकाशित हैं। बावजूद इसके पारंपरिक ही नहीं, बल्कि प्रगतिशील-जनवादी विचारधारा की दुंदुभि बजानेवाले आलोचकों के ने भी इन कृतियों की कोई ख़ास नोटिस नहीं ली। पुनः याद आते हैं नामवर जी, जिन्होंने लिखा है कि 'नए जनवादी लेखन में आलोचना-बुद्धि का अभाव नहीं, बल्कि अतिरेक है। यह अतिरेक कभी-कभी शत्रुओं से अधिक मित्रों को - यहाँ तक कि अपने आपको भी काट बैठता है।'

कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह हिंदी के अलावा अंग्रेजी, बांग्ला एवं संस्कृत आदि भाषाओं के जानकार और इन भाषाओं में रचित साहित्य के गहरे पारखी विद्वान तथा गीत, नवगीत के सुमधुर ही नहीं बल्कि जनगीतों के ओजस्वी गायक भी थे। जिन लोगों ने उन्हें विभिन्न साहित्यिक मंचों से गीत-नवगीत-जनगीत गाते, काव्यपाठ करते या साहित्यिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर व्याख्यान देते हुए सुना है, उनके लिए राजेंद्र जी को सुनना एक अनुभव रहा है। कला-पारखी कवि यतींद्र मिश्र ने सही लिखा है कि "एक गाया जाने वाला पद अथवा गाया जा चुका गीत असीमित संदर्भ प्रक्षेपित करता है। उस घट चुके समय में गुंजरित शब्द, शब्द मात्र नहीं रह जाता। शब्द से थोड़ा ऊपर उठकर कुछ संभावनाओं के द्वार खोलता है।" (गिरिजा, पृ.24)। राजेंद्र जी एक अच्छे अनुवादक भी थे जिसका प्रमाण है उनकी Beach Grove Books,Inc, Canada से प्रकाशित उनकी स्वानूदित पुस्तक 'SO HERE I STAND' (A selection of anti-slogan poems translated from Hindi original by the poet).

यदि हममें से किसी के पास उनके गायन/व्याख्यान के कैसेट/ रिकार्ड/ प्रकाशित- अप्रकाशित रचनाएँ आदि हैं, तो उसे हमें हिंदी जगत के सामने लाने का कष्ट उठाना चाहिए। साथ ही हम सब को यथाशीघ्र कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह रचनावली / ग्रंथावली के प्रकाशन के लिए भी प्रयास करना चाहिए।

हिंदी नवगीत के रचना-वैविध्य एवं स्वीकृति-संघर्ष में राजेंद्र प्रसाद सिंह की भूमिका अविस्मरणीय है। उपर्युक्त विषय पर विचार करते हुए सर्वप्रथम हमारा ध्यान कवि की पहली काव्यकृति 'भूमिका'(1950) की ओर आकृष्ट होता है जिसके दोनों फ्लैप पर 'निराला' एवं सुमित्रानंदन पंत की लंबी, महत्वपूर्ण सम्मतियाँ छपी हैं।

'भूमिका' में आदि से मध्य तक राष्ट्रीय भाव-धारा की, प्रगतिशील और यथार्थवादी वैचारिक कविताएँ हैं, जिनमें भी 'आवरण' 'प्रकाश-पुंज' है। और 'प्रगति-गीत' नए गीत-प्रयोग हैं और कृति के उत्तरार्द्ध में युवा प्रेमी के मनःसंघर्ष, अंतर्द्वंद और प्रेम की आकांक्षा से महत्वाकांक्षा तक को समाहित किए लगभग पचास गीत हैं। 1950 ई. में प्रकाशित राजेंद्र प्रसाद सिंह की इस पहली काव्यकृति की समीक्षा करते हुए डॉ. धर्मवीर भारती ने लिखा था - "मुझे स्मरण नहीं पड़ता कि किसी भी तरुण कवि की प्रथम काव्य कृति में इतनी हुंकार सबलता और प्रौढ़ता रही हो।"

डॉ. भारती ने कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह की रचनाओं में मुख्य रूप से दो-तीन बातों को रेखांकित किया है - "सबसे पहली बात यह है कि उनकी भाषा और उनके विचारों में सस्ती भावुकता और चटपटा आवेश न होकर सशक्त हुंकार और प्रौढ़ बल है। 'सिंहावलोकन' में एक अजब-सा उन्मेष है, एक विद्रोह-भरी चुनौती है और विजय के विश्वास का अनोखा दर्प है -

"जागा किशोर आलोक सिंह गिरि गुहा फोड़,
निकला बनकर यौवन, पाषाण-कपाट तोड़,
तम के नभचुंबी अद्रि-भाल पर गरज उठा,
दिशि-दिशि की काली जीर्ण मेखलाएँ मरोड़।"

- दूसरी बात यह है कि उनमें आत्मदृष्टि नहीं, युगदृष्टि का प्राधान्य है। जिस संक्रांति के युग में उन्होंने अपनी कलम उठाई है उसके संकट, उसकी जर्जरता, उसकी उलझनों से वे परिचित हैं और उनकी विकृतियों से लड़ने के लिए कटिबद्ध हैं' ...इन्हीं गीतों की भूमिका में आगामी मानवता अवतरित हो, इसके लिए वह सचेष्ट हैं। मानवता के प्रति उसमें अदम्य विश्वास है। उनके गीतों में इतिहास के कारवाँ गुजरते नजर आते हैं और दिग्विजय, अकाल, रक्तपात, युद्ध, अंधकार और इन सबों को चीर कर भी जिंदा रहने वाली और अपना सतत विश्वास करने वाली मानवता की विजय का वह उल्लास भरा गायक है।"

राजेंद्र प्रसाद सिंह की रचनाओं में भौतिकवाद व आदर्शवाद के समुचित समतोल को रेखांकित करते हुए डॉ. भारती ने आगे लिखा है - "मार्क्सवाद ने हमें इतिहासों में विकसित होती हुई मानवता का परिज्ञान कराया है, हमारी परंपरागत संस्कृति ने हमें मानवता के मनोगत मूल्यों का महत्व सिखाया है और आज का युग हमें दोनों के जिस पर स्वस्थ समन्वय की ओर प्रेरित कर रहा है, राजेंद्र जी की कविता उस दिशा में दूर तक जा चुकी है।"

'भूमिका' की रचनाओं पर गंभीरता से विचारने पर स्पष्ट हो जाता है कि इस संग्रह के अनेक गीत अवश्य ही 'नवगीत' के आरंभिक स्वरूप को पता देने में सक्षम हैं। मनोवस्था के तापमान से जीवंत इन गीतों में उल्लेखनीय हैं - "गा मंगल के गीत सुहागिन, चौमुख दीयरा बाल के", और "शरद की स्वर्ण-किरण बिखरी"। बाद में ये दोनों गीत 'अज्ञेय' द्वारा संपादित 'प्रतीक' द्वैमासिक में 1949 के 'शरद' अंक में छपे और प्रकृति-काव्य-संकलन 'रूपांबरा' (संपा. अज्ञेय) में भी संकलित किए गए। इनके अतिरिक्त - 'सब सपने टूटे संगिनी, बिजली कड़क उठी', 'मेरे स्वर के ये बाल-विहग जा रहे उड़े किस और', 'सखि, मधु ऋतु भी अब आई', 'मधु मंजरियाँ, नव फुलझरियाँ', 'यह दीवार कड़ी कितनी है'- आदि गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिनमें नवगीत को अंकुरित करने की तैयारी है।

1995 में प्रकाशित, राजेंद्र प्रसाद सिंह की काव्य कृति 'मादिनी' में गीतों की प्रचुरता है उनमें अधिकांश को 1958 के बाद 'नवगीत' के रूप में स्वीकृति मिली। मेरी समझ से प्रक्रिया और रचना-प्रक्रिया पर हिंदी में सर्वप्रथम राजेंद्र प्रसाद सिंह ने ही 'मादिनी' की भूमिका में विचार किया था। ज्ञातव्य है कि 1954 तक मुक्तिबोध ने भी इस विषय पर कुछ भी लिखा या प्रकाशित नहीं करवाया था। गीत की रचना-प्रक्रिया समझने में उक्त भूमिका की विचार-शृंखला का अपना महत्व है। 'मादिनी' के उन गीतों में, जो '50' से '54' तक रचे गए और वस्तुतः बाद में 'नवगीत' के ही अघोषित नमूने माने गए, कुछ हैं - 'तनिक उठा ले यह घूँघट-पट / ओ मधुमुखी सयानी', 'मेरे रास्ते पर / चल रहे सपने अधूरे / टूट जाने के लिए' और लोकतत्व से भरे गीतों में कई हैं, जैसे 'मूक पहेली', 'पावसी', 'सजला', 'तुमने किसकी ओर उठाई/ अँखियाँ काजलवाली री" (कजली) इत्यादि। राजेंद्र प्रसाद सिंह के छह ऋतुओं के गीतों की कई-कई शृंखलाओं के लिए 'मादिनी' के नवगीत-बीजों को महत्व दिया जाना चाहिए। उनकी तीसरी कृति है 'दिग्वधू (1956) जो मुख्य रूप से कविता-संग्रह है, पर उसमें भी कुछ ऐसे गीत हैं जिन्हें कवि की प्रथम घोषित नवगीत कृति 'आओ खुली बयार' के नए प्रार्थना-गीतों की शृंखला से जोड़ा जा सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि बहुत पहले ही प्रथम नवगीत-संकलन के रूप में 'गीतांगिनी' की योजना प्रसारित करने और 1958 में उसे संपादित-प्रकाशित करने के पूर्व भी राजेंद्र प्रसाद सिंह के प्रायः सौ गीत अपनी नई शैली के साथ प्रशस्त और प्रस्तुत हो चुके थे; जिनमें हर तरह से नवगीत की सही और चमत्कारपूर्ण समझ मूर्त हो चुकी थी। इसका उदाहरण चंद्रदेव सिंह द्वारा संपादित 'कविताएँ-1956' में संकलित उनका गीत 'विरजपथ' द्रष्टव्य है :-

"इस पथ पर उड़ती धूल नहीं।
खिलते-मुरझाते किंतु कभी
तोड़े जाते ये फूल नहीं।

खुलकर भी चुप रह जाते हैं ये अधर जहाँ,
अधखुले नयन भी बोल-बोल उठते जैसे;
इस हरियाली की सघन छाँह में मन खोया,
अब लाख-लाख पल्लव के प्राण छुऊँ कैसे ?
अपनी बरौनियाँ चुभ जाएँ,
पर चुभता कोई शूल नहीं।

निस्पंद झील के तीर रुकी-सी डोंगी पर
है ध्यान लगाए बैठी बगुले की जोड़ी;
घर्घर-पुकार उस पार रेल की गूँज रही,
इस पार जगी है उत्सुकता थोड़ी-थोड़ी।
सुषमा में कोलाहल भर कर
हँसता-रोता यह कूल नहीं।

इस नए गाछ के तुनुक तने से पीठ सटा
अपने बाजू पर अपनी गर्दन मोड़ो तो,
मुट्ठी में थामें हो जिस दिल की चिड़िया को
उसको छन-भर इस खुली हवा में छोड़ो तो।
फिर देखो, कैसे बन जाती है
कौन दिशा अनुकूल नहीं?
इस पथ पर उड़ती धूल नहीं।"

1956 में रची, 'नवयुग' (साप्ताहिक) में छपी और 1957 में संकलित इस गीत रचना में नवगीत के कौन से प्रारंभिक तत्व नहीं है? प्रतीकात्मक अर्थसंकेतों में जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व और परिसंचय, सभी की मनोज्ञतापूर्ण झलक इसमें मिल जाती है।

सन् 1947 के आसपास हिंदी गीतकाव्य में नवीन प्रवृतियों का आविर्भाव और गीत-रचना के पूर्वागत प्रकारों से भिन्न प्रयास प्रारंभ हो चुका था जिसे उस समय की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका 'प्रतीक' (द्वैमासिक) के 'शरद अंक' (1948) में प्रकाशित कुछ गीतों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा लक्षित किया जा सकता है। 'प्रतीक' के उस अंक में बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' द्वारा रचित प्रकृति चित्रण से संबंधित छायावादी-रहस्यवादी निकाय का एक दार्शनिक गीत प्रकाशित है, जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं -

"सरस तुम्हारे वन-उपवन में फूले किंशुक फूल
उनके रंग में रंग लेने दो हमें आज अंग-अंग
प्राण यह होली का रस रंग।
कंपित पवन, विकंपित दस दिशि, गगनांगन गतिलीन
उन्मन मन तन चरण स्मरणगत नेह-विदेह अनंग
प्राण यह होली का रस रंग।"

'प्रतीक' के इसी अंक में राजेंद्र प्रसाद सिंह का भी एक 'शरदगीत' प्रकाशित है, जिसे कालांतर में अज्ञेय ने 'रूपांबरा' में भी संकलित किया। कुछ पंक्तियाँ देखिए -

"मोह-घटा फट गई प्रकृति की, अंतर्व्योम विमल है,
अंध स्वप्न की व्यर्थ बाढ़ का घटता जाता जल है।
अमलिन-सलिला हुई सरी, शुभ-स्निग्ध कामनाओं की,
छू जीवन का सत्य, वायु बह रही स्वच्छ साँसों की।
अनुभवमयी मानवी-सी यह लगती प्रकृति-परी।
शरद की स्वर्ण किरण बिखरी।"      (रूपांबरा : सं अज्ञेय)

राजेंद्र प्रसाद सिंह का यह 'शरद गीत' वस्तुतः जीवनदर्शन-परक प्रकृति के रूपांकन और गुणात्मक मानवीय परिवर्तन की वस्तुवादी समझ का प्रमाण है। प्रकृति को साभिप्राय जीवनानुभव में उरेहने का यह गुणांतरित स्वाद ही नया था, फलतः 'अज्ञेय' ने इसे बाद में अपने संपादित प्रकृति-काव्य-संकलन 'रूपांबरा' में भी सम्मिलित किया और कलकत्ता की 'भारतीय संस्कृति-परिषद' ने भी 'सिंधुभैरव' राग में संगीत कर्मियों के द्वारा मंच पर प्रस्तुत किया। 'प्रतीक' के उस अंक में ही छपे दो दीप-गीतों की कुछ पंक्तियों पर गौर करें -

किसने हमें सँजोया;
जिन दीपों की सिहरन लख-लख, लाख-लाख हिय सिहरें,
वे दीपक हम नहीं कि जिन पे मृदुल अँगुलियाँ विहरें
हम वह ज्योतिर्मुक्ता जिसको जग ने नहीं पिरोया।"
             - बालकृष्ण शर्मा "नवीन"
2. सम्मुख इच्छा बुला रही / पीछे संयम-स्वर रोकते,
धर्म-कर्म भी दाएँ-बाएँ / रुकी देखकर टोकते,
अग-जग की ये चार दिशाएँ / तम से धुँधली दिखती,
चतुर्मुखी आलोक जला ले / स्नेह सत्य का ढाल के।
गा मंगल के गीत, सुहागिन / चौमुख दियरा बाल के।"
                - राजेंद्र प्रसाद सिंह

उपर्युक्त दोनों गीतों की तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत करते हुए हिंदी नवगीत के अग्रगामी रचनाकार एवं समीक्षक श्री रामनरेश पाठक ने लिखा है :-

"बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की इन पंक्तियों में जहाँ उपेक्षित जीवन की निराशा को आध्यात्मिक गौरव से मंडित करते करते हुए भी बिसुरा गया है, वहीं राजेंद्र प्रसाद सिंह के दीप-गीत में नई पीढ़ी की आशा-आकांक्षा का हौसला-भरा मंगल नर्तन है।" 'दीपावली' शीर्षक से प्रकाशित राजेंद्र प्रसाद सिंह के इस गीत को 'प्रथम नवगीत-बीज' मानते हुए उन्होंने आगे लिखा है - "जिसके मन में नवीन जी की पीढ़ी के नरेंद्र शर्मा का गीत गूँजता हो -

"चौमुख दियना बाल धरूँगी चौबारे पर आज,
जाने कौन दिशा से आवें
मेरे राजकुमार?"

- उन्हें समझना होगा कि अपने ही शब्दों में 'क्षयिष्णु रोमान' के कवि नरेंद्र शर्मा ने 'प्रवासी के गीत' की इस रचना में लोक-प्रचलित बिंब 'चौमुख दियना' को तो ले लिया है मगर काम उससे भावुकता का ही लिया है। नरेंद्र शर्मा की सीमा को पीछे छोड़कर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने उस दीपक के चारों दिशा-मुखों से जुड़े लोकधर्मी प्रतीकार्थों को उजागर करने का काम किया है और उस बिंब को जीवनदर्शन-परक युक्तिसंगति देकर, तब की युवा मानसिकता का बहुकोणी आवेग यों व्यक्त किया है"-

"दीप-दीप भावों के झिलमिल / और शिखाएँ प्रीति की,
गति-मति के पथ पर चलना है / ज्योति लिए नवरीति की,
यह प्रकाश का पर्व अमर हो / तम के दुर्गम देश में
चमकी मिट्टी की उजियाली / नभ का कुहरा टाल के।"

'गीतांगिनी' (1958) के प्रकाशन से पूर्व रचित राजेंद्र प्रसाद सिंह के जिन गीतों में गीत-रचना के पूर्वागत प्रकारों से भिन्न प्रयास परिलक्षित होता है, उनमें कुछ तो 'मादिनी' (55) में संकलित हैं तथा कुछ 'दिग्वधु' (56) में। 'मादिनी' में संकलित 'मधुमुखी' शीर्षक गीत की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं जिसे कई आलोचकों ने 'औद्योगिक वातावरण में नई मानवीयता की संवेदना' उरेहने के लिए रेखांकित किया है -

"उसी विभा में धुलने को / सिंदूर क्षीर बन जाता,
कच्चा लोहा पिघल-पिघल कर / तरल आग बन आता।
× × ×
बिंबित करने को / उस छवि का हास ही
सागर बन लहराता / है इतिहास ही।"

इसी प्रकार सन 1956 में प्रकाशित कवि की तीसरी काव्य कृति "दिग्वधु" की निम्नलिखित पंक्तियाँ भी तत्कालीन गीत की रचनाधर्मिता में परिवर्तन की सूचना देती हैं -

"फिर मैं मोल चुका दूँ ग्रह-तारों के,
नद-निर्झर के, - पर्वत, सागर, वन के।

सन् 1962 में प्रकाशित राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रथम घोषित स्वतंत्र नवगीत कृति 'आओ खुली बयार' में इसी शीर्षक से संकलित जो मुख्य रचना है, वह भी जनवरी, 1956 में ही कवि के वक्तव्य के साथ 'अलका' मासिक में प्रकाशित हो चुकी थी; जिसे रामनरेश पाठक ने गीत-तत्व के सांगोपांग और सप्राण परिवर्तन के प्रमाण के रूप में रेखांकित किया है। चंद्रदेव सिंह द्वारा संपादित 'कविताएँ - 57' में संकलित राजेंद्र प्रसाद सिंह के गीत 'विरजपथ' से जाहिर होता है कि "नवगीत जिस पीढ़ी के हाथों निर्मित होने के उपक्रम में था, वह थी आजादी के बाद की पहली नौजवान पीढ़ी, जो गाँव के नैसर्गिक और अर्जित संस्कारों से हिम्मत और हौसला ही नहीं, मानवीयता की अटूट पहचान लेकर छोटे-बड़े शहरों में आई और आजाद देश की नई संभावनाओं से अपनी परिवर्तनकारी महत्वाकांक्षाओं को जोड़कर संघर्ष की धूप-धूल से लड़ती हुई जीने लगी। स्वभावतः और रहन-सहन के बदलाव की अनवरत लड़ाई में, कभी उस पीढ़ी का सदस्य शहरी एकांत में ग्रामीण नागर मानस का साक्षात्कार करता रहा -"

"इस पथ पर उड़ती धूल नहीं
खिलते मुरझाते किंतु कभी
तोड़े जाते ये फूल नहीं।"

इस गीत की अगली पंक्तियाँ में उन छद्म परिवर्तनकामियों की खबर ली गई है जो एक ओर तो परिवर्तन हेतु पहलकदमी का नाटक करते हैं पर दूसरी ओर अपने वर्गहित में स्वार्थ-साधन जुटाने से बाज नहीं आते -

"निस्पंद झील के तीर रुकी-सी डोंगी पर
है ध्यान लगाए बैठी बगुले की जोड़ी...।"

इसके साथ ही इस गीत में आत्मविश्वास से पूर्ण और अटूट हौसले से भरी पूरी पीढ़ी की ओर से सोच और सूझ की ताकत भी व्यक्त हुई है -

"इस नए गाछ के तुनुक तने से पीठ सटा
अपने बाजू पर अपनी गर्दन मोड़ो तो;
मुट्ठी में बाँधे हो जिस दिल की चिड़िया को,
उसको छन भर इस खुली हवा में छोड़ो तो,
फिर देखो, कैसे बन जाती है
कौन दिशा अनुकूल नहीं।"

सन् 1947 से 1957 के बीच रचित गीतों की रचनाधर्मिता पर विचारने से स्पष्ट होता है कि इस अघोषित नवगीत दशक में राजेंद्र प्रसाद सिंह के साथ ही जिन महत्वपूर्ण रचनाकारों ने अपने गीतों में रचना की प्रचलित परंपरा से हटकर गीत रचने का प्रयास किया उनमें वीरेंद्र मिश्र, रामदरश मिश्र रामनरेश पाठक, रवींद्र भ्रमर आदि उल्लेखनीय हैं।

वस्तुतः गीत रचना के नवीकरण का दशक-व्यापी उपक्रम जो 1947-48 से प्रारंभ होकर छठे दशक के अंत तक चलता रहा, वह गीत रचना की नई प्रक्रिया की कुक्षि में नवगीत के आकार लेने का ही दीर्घ उपक्रम था। अतः यही कहना जायज है कि 'नई कविता' के स्वरूप ग्रहण करने की तैयारी के बहुत पहले ही तथा 'तार सप्तक' (1943) की समीक्षाएँ आने के कुछ ही बाद, नवगीत की तैयारी के आरंभिक नमूने रचित और प्रकाशित किए जाने लगे। इस क्रम में विभिन्न रचनाकारों की स्वतंत्र गीत-कृतियों के अतिरिक्त जिन संकलनों एवं पत्रिकाओं में नवगीत की तैयारी के गीत संकलित हुए उनमें - 'कविताएँ-54, -55 एवं-57", रूपांबरा (सं. अज्ञेय) तथा 'लहर', 'नई धारा', एवं 'प्रतीक' आदि के कवितांकों का अपना महत्व है।

'गीतांगिनी' का संपादकीय : नवगीत का घोषणा पत्र

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी गीतकाव्य की एक धारा यदि उन विवेकशील रचनाकारों द्वारा निर्मित हुई जिन्होंने युगबोध-संपन्न मानस से परिवर्तन रूप-शैली में काव्य-रचना करते हुए रचना के शिल्प को उसकी वस्तु के आंतरिक आग्रह के अनुकूल ही ग्रहण किया तो दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करने वाले गीतकार मुख्यतः परंपरित एवं मात्र छंदोबद्ध रचना में ही संलग्न थे। चूँकि दूसरी धारा के रचनाकारों का अधिकांश सृजन छंदोबद्ध था इसलिए गीतकवि के रूप में जितनी मान्यता उन्हें मिली, उतनी पहले वर्ग के रचनाकारों को नहीं मिल सकी।

पाँचवें एवं छठे दशक में इन दोनों प्रकार की रचनात्मकता के बीच कतिपय कारणों से एक प्रकार के प्रवृत्तिगत तनाव की स्थिति पैदा हो गई। लेकिन एक ओर न तो ये गीत-कवि खुद को मंचीय प्रलोभनों से मुक्त कर पाए और न ही इनके द्वारा 'नई कविता' के समानांतर गीत-रचना का सिद्धांत-विवेचन पक्ष अपेक्षित तौर पर प्रस्तुत किया जा सका। फलतः जहाँ 'नई कविता' अपनी रचनात्मकता, सैद्धांतिक स्थापनाओं तथा आलोचकीय सहयोग एवं स्वीकृति के द्वारा पाँचवें छठे दशक में हिंदी कविता के क्षेत्र में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो गई वहीं गीत उपेक्षित हो गया। यह वही समय था जब एक ओर 'अज्ञेय' द्वारा गीत को 'गौण विधा' कहकर अपमानित किया जा रहा था तो दूसरी ओर प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में गीत का प्रकाशन लगभग बंद हो चुका था।

ऐसी स्थिति में वही हुआ जो ऐतिहासिक क्रम में अनिवार्य तथा युग-स्थितियों के दबाव का अपरिहार्य विस्फोट होता है। छठे दशक के अंत में गीत की अक्षय शक्तिमत्ता के प्रति आस्थावान कुछ युगबोध-संपन्न रचनाकारों ने पुनः एक बार इस उपेक्षित, निराश्रित एवं परिस्थितियों से प्रताड़ित विधा को प्रस्तुत और प्रस्थापित करने का प्रयत्न किया। ओम प्रभाकर के शब्दों में "इन्हीं निःस्वार्थ प्रयत्नों में एक, 1958 में, कविवर राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा प्रस्तुत 'गीतांगिनी' है - जिसकी भूमिका में उन्होंने गीत की नवगीत में संभाव्य परिणति देखी।" (ओम प्रभाकर : नया आलोचक - पृ.सं. 6)

हिंदी कविता के इतिहास में 'छायावाद का मेनिफेस्टो' के रूप में जो महत्व 'पल्लव' की भूमिका का है, हिंदी नवगीत संदर्भ में 'गीतांगिनी' की भूमिका का भी वही महत्व है, जिसमें बतौर संपादक राजेंद्र प्रसाद सिंह ने पहली बार यह उद्घोषित किया था - "नई कविता के कृतित्व से युक्त या वियुक्त भी ऐसे धातव्य कवियों का अभाव नहीं है, जो मानव जीवन के ऊँचे और गहरे, किंतु सहज नवीन अनुभव की अनेकता, रमणीयता, मार्मिकता, विच्छित्ति और माँगलिकता को अपने विकसित गीतों में सहेज सँवार कर नई 'टेकनीक' से, हार्दिक परिवेश की नई विशेषताओं का प्रकाशन कर रहे हैं। प्रगति और विकास की दृष्टि से उन रचनाओं का बहुत मूल्य है, जिनमें नई कविता की प्रगति का पूरक बनकर 'नवगीत' का निकाय जन्म ले रहा है। नवगीत नई अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा।"

इस उद्घोषणा से गुजरने पर किसी भी विवेकशील साहित्यिक को यह सहज अनुभव होगा कि इसमें किसी प्रवर्तक का पैंतरा नहीं, बल्कि उद्घोषक का उल्लास है। 'गीतांगिनी' के संपादकीय में दी गई स्थापनाओं की मूल्यवत्ता को स्वीकार करते हुए डॉ. रवींद्र भ्रमर ने लिखा है - "गीतांगिनी संपादक की यह उक्ति आज पूर्ण रूप से चरितार्थ हो रही है। आज तो गीत की परिभाषा ही बदल गई है। ऐसी कोई भी रचना जिसमें एक अर्थगत आलाप और भावगत संगीत हो - गीत की संज्ञा की अधिकारिणी बन बैठी है।"

'गीतांगिनी' के संपादकीय के रूप में वस्तुतः नवगीत का घोषणा-पत्र प्रस्तुत करते हुए राजेंद्र प्रसाद सिंह ने नवगीत के जिन पाँच विकासशील तत्वों को निरूपित किया है, वे हैं - जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व-बोध, प्रीति-तत्व, और परिसंचय। यदि हम हिंदी गीत-काव्य के इतिहास पर वस्तुनिष्ठ होकर विचार करें तो स्पष्ट होगा कि 'नवगीत' के पूर्व गीतों में दर्शन की प्रचुरता थी - जीवन दर्शन की नहीं; धर्म, नैतिकता और रहस्य की निष्ठा का स्रोत था - व्यावहारिक आत्मनिष्ठा का नहीं; व्यक्तिवादिता थी - व्यक्तित्व-बोध नहीं, प्रणय-शृंगार था, - जीवनानुभव से अविभाज्य प्रीति-तत्व नहीं, तथा सौंदर्य एवं मार्मिकता के प्रदत्त प्रतिमान थे, - प्रेरणा की विविध विषय-वस्तुओं के परिसंचय का सिलसिला नहीं। 'गीतांगिनी' में संकलित नवगीतों पर विचारने से हम पाते हैं कि इसके संपादकीय में निरूपित पाँचों तत्व गीत के स्वभावगत परिवर्तन को रेखांकित कर स्वयंसिद्ध हुए हैं। ये विशेष तत्व, वस्तुतः नई पीढ़ी के स्वभाव में भी बदलाव ला रहे थे, जो उस पीढ़ी के गीतकारों में उजागर हुए। कालांतर में 'गीतांगिनी' को हिंदी नवगीत का नाम-लक्षण-निरूपक प्रथम ऐतिहासिक संकलन तथा इसके संपादक को नवगीत के नामकर्ता, तत्व-निरूपक एवं तत्पर व्याख्याता और निःस्वार्थ प्रवर्तक के रुप में स्वीकार किया गया।

' नई कविता ' और ' नवगीत ' का अंतःसंबंध

'नई कविता' और 'नवगीत' के परस्पर संबध को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद रहा है। विद्वानों का एक वर्ग यदि नवगीत को नई कविता के अंतर्गत शुमार करता है तो दूसरा इसे नई कविता के समानांतर काव्य प्रवाह के रूप में घोषित करता है। इसी प्रकार कुछ महानुभावों को नवगीत यदि बौद्धिक काव्य के 'पैटर्न' की प्रतिक्रिया में फिर छायावादी पैटर्न का पुनरुद्धारक प्रतीत होता रहा है तो कई कवि-आलोचकों ने नई कविता और नवगीत के मध्य परस्पर संपूरकता स्थापित करने की चेष्टा की है।

नवगीत की रचना एवं आंदोलन-चेष्टा को प्रतिक्रिया स्वरूप मानने वाले आलोचक भ्रम में हैं। जिन्होंने नवगीत को बौद्धिक काव्य के पैटर्न की प्रतिक्रिया में फिर छायावादी पैटर्न का पुनरुद्धारक माना है या जिन्हें यह 'नई कविता' की प्रतिक्रिया में 'निनकेंपुप' कवियों द्वारा छोड़ा गया एक 'लंगड़ा ऊँट' दिखता रहा है उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि नवगीत पूरकता के अत्यंत विशिष्ट संबंध में नई कविता से संपृक्त है। यह पूरकता परिमाण-मूलक न होकर गुणात्मक पूरकता है जो आमंत्रित या आरोपित नहीं हो सकती। इसी आशय से, कविता-मात्र को अविभाज्य संदर्भ में रखकर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने 'गीतांगिनी' में स्वीकारा था -

"नई कविता के सात मौलिक तत्व हैं - ऐतिहासिकता, सामाजिकता, व्यक्तित्व, समाहार, समग्रता, शोभा, और विराम, तो पूरक के रूप में 'नवगीत' के पाँच विकासशील तत्व हैं - जीवनदर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्वबोध, प्रीति तत्व और परिसंचय।"

वस्तुतः नवगीत को नई कविता का दूसरे अर्थों में पूरक मनाने वाले लोग दोनों की रचना-प्रक्रिया की जगह दोनों आंदोलनों को ही परस्पर पूरक मान बैठे हैं। जबकि असलियत उलटी है। वस्तुतः दोनों के बीच पूरक संबंध, दोनों की रचना-प्रक्रियाओं के भिन्न पहलुओं का मनोनीत संबंध है, जिसके अभाव में शायद कविता मात्र की रचना-प्रक्रिया संपूर्णता प्राप्त नहीं करती। इसकी युक्ति-संगति को अपनी साक्षात्कार-वार्ता में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने स्पष्ट किया है :

"जहाँ तक सौन्दर्य-बोध का प्रश्न है, नई कविता में यदि यह परिवेशगत चुनौती के फलस्वरूप वस्तुनिष्ठता या आत्मनिष्ठता के ध्रुवांतों पर सक्रिय है; तो नवगीत में सौंदर्यबोध, परिवेश की सहजता के फलस्वरूप आत्मीयता के समतोल में संचरित है। इसलिए नई कविता का सौंदर्यबोध, जहाँ अभिव्यक्ति में अनुभव और उसकी प्रतिक्रिया का प्रक्षेपण करता है; वहाँ नवगीत के सौंदर्यबोध में अनुभव और उसके प्रति आसक्ति का प्रक्षेपण होता है। जिसके फलस्वरूप नई कविता की अभिव्यक्ति नवगीत की तरह संलयात्मक न होकर मुख्यतः चित्रात्मक हो जाती है।"

नई कविता से नवगीत के अंतसंबंध के प्रसंग में सुप्रसिद्ध नवगीतकार श्री रामनरेश पाठक के विचार ध्यातव्य है :-

1. नई कविता जटिलता के प्रति विवश और नकारात्मक है। नवगीत सहजता के प्रति उन्मुख और सकारात्मक है। यह सहजता नए जीवन परिवेश की है, जिसे नई कविता जटिल कहती है।

2. (इसीलिए) नई कविता दुश्चिंता का काव्य है : नवगीत शोभात्मक अथच शुभात्मक बोध का काव्य है।

3. नई कविता कथ्य को विश्लिष्ट करके देखती है : नवगीत उसे संश्लिष्ट करके उपस्थित करता है।

4. नई कविता कथ्य-प्रधान है, नवगीत मनःस्थिति-प्रधान है। कथ्य के पूर्व की मनःस्थिति का तनाव नवगीत का आंतरिक वातावरण है और कथ्य-विरेचन की क्षमता नई कविता का।

5. शिल्प की दृष्टि से नई कविता चित्र-प्रधान है : नवगीत ध्वनि-प्रधान।

6. नई कविता के बिंब कथ्य का विस्तार करते हैं : नवगीत के बिंब कथ्य का संकोचन करते हैं।

7. नई कविता के प्रतीकार्थ स्वतंत्र महत्व रखते हैं : नवगीत में इनका पारस्परिक अर्थ-संबंध महत्व रखता है।

8. नई कविता में मुक्त आसंग (फ्री एसोसिएशन) प्रतिक्रियाओं के द्वारा सुलभ है, नवगीत में अनुस्मरण (रिकौल) के द्वारा।

9. नई कविता 'ताल' अथवा 'विराम' की कविता है; नवगीत 'लय' और 'गति' से जुड़ा है।

10. नई कविता में अनुभवशील व्यक्ति 'सामाजिक' है; नवगीत में 'तात्विक'।

इन्हीं आधार-बिंदुओं पर रामनरेश पाठक ने 'नई कविता' एवं 'नवगीत' को परस्पर पूरक माना है। निश्चित रूप से इस ताल-लय-बद्ध पूरकता की परिकल्पना के पीछे कवितामात्र की संपूर्णता का भाव था, जिसे गलती से अज्ञेय ने नवगीत के विरोध में एक तर्क बना लिया था। एक स्वतंत्र विधा के रूप में नवगीत की विशिष्टता पर विचार करने के क्रम में हमें सर्वप्रथम नवगीत में रचनाकार, प्रतिपाद्य और आस्वादक की हैसियतों से समीकृत मनुष्य की उस अनुभवशील स्थिति पर विचार करना होगा जिसे रामनरेश पाठक ने तात्विक कहा है। नई कविता में अनुभवशील व्यक्ति यदि सामाजिक और नवगीत में तात्विक, तो इसकी अभिव्यक्ति नवगीत में कैसे और कहाँ तक हुई है - इसे निष्पक्ष होकर विचारना अपेक्षित है, क्योंकि इस सिलसिले में नवगीत का मार्ग नई कविता के मार्ग से नितांत भिन्न रहा है। नई कविता के द्वारा इस दिशा में प्रचारित 'लघुमानव' और तथाकथित 'वैज्ञानिक मानवतावाद', 'व्यक्तित्व की खोज' और 'पहचान की तलाश', प्रतिबद्धता और स्वच्छंदता, वैयक्तिक स्वातंत्र्य और मूल्य-मर्यादा, वैचारिक मौलिकता और पारिवेशिक दयित्व आदि विवादास्पद प्रसंगों और नारों का प्रभाव नवगीत की रचनाधर्मिता पर न के बराबर पड़ा है। ये तमाम प्रसंग और नारे साहित्यिक आंदोलनों में नेतृत्व की दलीयता की देन थे मगर इनमें छिपी समस्याओं का सामधान नवगीत में आम आदमी की दृष्टि से मिला है -

मानव जहाँ बैल घोड़ा है,
कैसा तन-मन का जोड़ा है।
किस साधन का स्वाँग रचा यह,
किस बाधा की बनी त्वचा यह।
देख रहा है विज्ञ आधुनिक,
वन्य भाव का यह कोड़ा है।
इस पर से विश्वास उठ गया,
विद्या से जब मैल छुट गया
पक-पक कर ऐसा फूटा है,
जैसे सावन का फोड़ा है।
         - 'निराला' : (गीतांगिनी, पृ. 6)

नई कविता के सर्वाधिक द्वंद्वग्रस्त नारों - 'व्यक्तित्व की खोज' (Quest of personality) और 'पहचान की तलाश' (Search for Identity) का संबंध उस एकांतवादी एवं व्यक्तिनिष्ठ पहलू से रहा है, जिसमें व्यक्ति अपने पूरे अस्तित्व का सामूहिक नियति से विलगाव (Alienation) अनुभव करने लगता है; पर समूह से जुड़ा रहने के लिए स्वयं को विवश महसूस करता है और इस प्रकार वह अपनी नगण्यता से फलीभूत आत्महीनता की चुनौती स्वीकार करता है। इस आंतरिक क्षोभ के फलस्वरूप वह समूह में भी भिन्न और आत्मिक रूप से स्वतंत्र रहने के लिए अपनी पहचान की तलाश करता है। विदेशों में "एंग्री-हिप्पी-बीट जेनेरेशंस" की अनुभव एवं अभिव्यक्ति की पद्धतियों में सक्रिय रह चुके इन दोनों गड्डमड्ड नारों ने भारत में अनेक भाषाओं की साठोत्तर रचनाशीलता में प्रतिवादी नाटकीयता को उत्प्रेरित किया। इन नारों के खोखलेपन को वैचारिक कविता के कवियों ने 1965 के बाद समझा मगर नवगीतकारों ने सन 1960 के आसपास ही पहचान लिया था कि व्यक्ति और समाज के सहज संबंध को नकारना एक तरह से वैज्ञानिक सूझ-बूझ से ही मुँह मोड़ना होगा। राजेंद्र प्रसाद सिंह के 'मैं का गीत' से पता चलता है कि वस्तुतः वैयक्तिकता के रचनात्मक विकास से ऐसे दायभागी व्यक्तित्व का गठन होना चाहिए जिसकी पहचान पूरे दायित्व के निर्वाह में हो। यहीं ध्यातव्य है कि पुराने गीतकारों ने भी नवगीत के दौर में व्यक्ति को आम आदमी से जोड़ कर देखा है -

"आज तू ही बोल मेरे भी गले से।"
         बच्चन (गीतांगिनी, पृ. 32)

किंतु राजेंद्र प्रसाद सिंह की पंक्तियाँ 'मैं का गीत' में घोषित करती हैं :

"तुम हो तो अपने दृष्टिकोण की सीमा हो,
वे हैं तो एक परिस्थिति में कट रहते हैं,
मैं भी हूँ, यह अभिमान नहीं, अपराध नहीं,
मैं तो प्रतीक सबका है, जो - 'मैं' कहते हैं।"      (गीतांगिनी)

यहाँ नवगीतकार अपने व्यक्तित्व के बहुमुखी अंतःसंगीत में दूसरे का साझी है जिससे आम आदमी के समूह में सलयात्मक आंतरिकता पैदा हो सकती है। अतः कहना अनुचित न होगा कि नवगीत के मूल स्वर "व्यक्तित्व-बोध" का अभिप्राय सामूहिक सापेक्षता में आम आदमी का ही बोध है, जिसके अनुभव को सूक्ष्म स्तर पर "व्यक्तित्व के बहुमुखी अंतःसंगीत" का बोध भी मान सकते हैं। राजेंद्र प्रसाद सिंह की उपर्युक्त मान्यताओं को इसी व्याख्या से रेखांकित करना योग्य है।

'गीतांगिनी' में नवगीत-घोषणा के साथ ऐसे गीतों का संपादन कर, 'निराला' से रौबिन शा 'पुष्प' तक, पाँच पीढ़ियों के नवगीतकारों के प्रायः नब्बे नवगीतों को संकलित कर, प्रस्तुत गीतों को पहली बार 'नवगीत' के नाम से अभिहित कर और संपादकीय आलेख में नवगीत के आरंभिक लक्षणों एवं तत्वों का निरूपण कर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने वस्तुतः ऐतिहासिक कार्य संपन्न किया। इसे उनके समर्थकों और विरोधियों के द्वारा भी और आधुनिक हिंदी काव्य एवं गीतकाव्य के भ्रम-मुक्त साहित्येतिहासकारों द्वारा सर्वथा स्वीकार कर लिया गया है; जिसके विरुद्ध कोई भी और किसी की दलील थोथी समझी जाएगी - यह अकाट्य है। यह अकाट्य इस लिए भी है कि 'गीतांगिनी' में ही पहली बार नवगीतकार की हैसियत से शंभुनाथ सिंह, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. चंद्रदेव सिंह आदि रचनाकार अपनी रचनाओं के साथ सम्मिलित हुए, जिन्हें कालांतर में अपने आगे राजेंद्र प्रसाद सिंह का 'नवगीत-प्रवर्तक' पद स्वीकार्य नहीं हुआ। उनमें अग्रधावी डॉ. शंभुनाथ सिंह हैं, जिनके द्वारा स्वीकृत तथाकथित नवगीत के दो ही मूलतत्व हैं - आधुनिकता बोध और लोक तत्व। ज्ञातव्य है कि गीतांगिनी में राजेंद्र प्रसाद सिंह के दो ही नवगीत हैं और दोनों क्रमशः उन्ही मूल तत्वों को मूर्तित करते हैं - पूरी मौलिकता और गंभीरता से। आधुनिकता-बोध की रचना 'जीवन-दर्शन' खंड के अंतर्गत है : 'मैं का गीत'। चुनौती का स्वीकार पहली पंक्ति में ही है :

"मैं अरुण-नील अंबर की सुधा अगर पी लूँ,
तो गरल हवा का, लपट धरा की कौन पिए ?"

आगे की पंक्तियों में पाश्चात्य आधुनिकता की संक्रामक लहर का खुलासा करता हुआ कवि कहता है :-

जो नागिन डँसकर मुझे, तुम्हें, उन लोगों को,
बन गई रूप से चित्र और निवसी मन में,
वह और न कोई सिर्फ आधुनिक छलना है,
वह ज्वालाओं की सेज बिछाती जीवन में।

निम्नलिखित पंक्तियों में फैसला लेने की मुद्रा में कवि दृष्टिगत है -

"मैं भी लूँ मुखड़ा ढाँक घुटन की चादर से
तो तार-तार आँचल जनता का कौन सिए?" (गीतांगिनी, पृ.18)

'गीतांगिनी' में ही राजेंद्र प्रसाद सिंह का लोकतत्वमूलक दूसरा नवगीत "नूरानी परस" संकलित है जो "झूमर" के एक लोक-छंद में विन्यस्त है :-

"वह नूरानी परस तुम्हारा तन में मन की याद है;
झूल रहा अंखियन डोरों में दिल सिंदूरी चाँद है।"

उपर्युक्त पंक्तियाँ अपना पता देने में स्वयं सक्षम हैं। साथ ही इनसे यह भी जाहिर होता है कि 'नवगीत' उस युग में किस प्रकार काव्य-भाषा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण और दूरगामी अभियान था।

राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रथम स्वतंत्र नवगीत कृति : ' आओ खुली बयार '

"आओ खुली बयार" (1962) राजेंद्र प्रसाद सिंह के रचित पचास सुरुचिपूर्ण नवगीतों का संग्रह है। इस कृति के प्रारंभ में कवि ने "विधि" शीर्षक से नवगीत पर 12 पृष्ठों का महत्वपूर्ण प्राक्कथन लिखा है जो नवगीतों के विश्लेषण के साथ-साथ प्रस्तुत संकलन की रचनाओं के विश्लेषण पर भी अच्छा प्रकाश डालता है। इससे भली-भाँति ज्ञात है कि इस कृति की रचनाएँ आनुषंगिक नहीं प्रत्युत नवगीतों के पथ-अनुसरण और प्रदर्शन की प्रायोगिक सफल अभिव्यक्तियाँ हैं। 'गीतांगिनी' (1958) के संपादकीय के रूप में कदाचित् नवगीत का घोषणा-पत्र प्रस्तुत करते हुए, बतौर संपादक, राजेंद्र प्रसाद सिंह ने लिखा था "नवगीत-नई अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार होगा, जिसमें अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा।" आलोचनात्मक दृष्टि से विचारने पर स्पष्ट होता है कि 'आओ खुली बयार' के नवगीत उक्त उद्घोषणा को भली-भाँति चरितार्थ करते हैं।

इस कृति के अनेक नवगीतों में रचनाकार द्वारा उन्मुक्त छंद-प्रयोग और मिश्रित छंद-समाहार अत्यंत कुशलता से किया गया है जो सिर्फ लय-संधि और ताल-क्षेप के बार-बार बदलाव से नृत्यगीत, संवादगीत, चित्रगीत, बिंबगीत और ध्वनिबंध के गीत की भूमिका उत्पन्न करने में सक्षम हैं। साथ ही इस कृति की अनेक रचनाओं में 1962 के पूर्व से ही नवगीत के प्रस्तुत्य कला में भी विकास के बीज दृष्टिगत होते हैं।

पाश्चात्य आधुनिकता का भारतीय विन्यास - "रॉक-एन-रॉल" के लयावर्त्त पर आधारित नवगीत - "एक रूप, एक नगर और है" - की कुछ पंक्तियों से भी इस तथ्य की पड़ताल की जा सकती है -

एक रूप जिसमें आयाम नहीं,
केवल आसंगी, कुछ नाम नहीं,
एक नगर जिसमें दीवार नहीं,
धरती पर अंबर हो, द्वार नहीं,
एक कूल, जो जल में डूबा हो,
लीन रहे पर न कभी ऊबा हो,
एक लहर, ज्वार बने, जम जाए,
चंचल क्षण देख जिसे थम जाए,
एक धूल, उड़े दृष्टि रंगों से,
सुरधनु उग आए आसंगों से,
एक डगर, जिसके हों छोर नहीं,
एक डगर, मुड़े किसी ओर नहीं।
यह हवा, ...साँस यह ?
यह नदी, ...प्यास यह ?
यह विभा, ...आस यह ?
नहीं ...नहीं, एक और है ?"     (आओ खुली बयार, पृ. सं. 27)

राजेंद्र प्रसाद सिंह प्रारंभ से ही आधुनिकता-बोध के हिमायती रहे हैं, आधुनिकता के नहीं। इसीलिए पश्चिमी संगीत की विभिन्न धुनों पर आधारित उनकी रचनाएँ भी अपनी विशिष्ट जातीय पहचान से युक्त हैं। दूसरे शब्दों में कवि ने पाश्चात्य आधुनिकता को ज्यों का त्यों न अपनाकर अपनी रचनाओं द्वारा एक जवाबी भारतीय आधुनिकता के संवेदना-संसार का सृजन किया है। इस सृजन का चरमोत्कर्ष जहाँ अपने शीर्ष पर है, वह मुकाम 'आरोही का गीत' शीर्षक रचना के अंत में आया है...

"लालसा पहाड़ की फसल,
ढाल-ढाल झूमती हुई,
बाढ़ से बची रहे मगर,
मेघों को चूमती हुई।
जिंदगी खुदी नहीं,
रेत की नदी नहीं,
प्यार धार बाँध कर झरे,
तुम भरी-भरी लगी मुझे,
आँधियाँ लिए संभल पड़ीं।
× × ×
तुम नई नई लगी मुझे,
धुंध से अभी निकल पड़ी।"      (आओ खुली बयार, पृ.सं॰ 35)

झरनों की तरह कुलांचती युवा मानसिकता के ऐसे नवगीत यदि एक ओर इस कृति में बड़ी संख्या में बज रहे हैं तो दूसरी ओर लोकतत्व को मुखर और उजागर करती रचनाएँ भी यहाँ कम नहीं हैं। विकसित क्षमता से उकेरी गई एक लोक-झाँकी द्रष्टव्य है-

"पूनम को मैंने ना दियना जलाए,
इस मावस के इंतजार में।
साँझ के अपूरे ही चौक रहे/मेरे आँगन,
रात के अधूरे ही बोल रहे/चुप मेरे मन,
हाय! उधर जाएँ ना हिय के सब धागे;
बस रह गई इसी विचार में !
चंदन की रात कभी बीत गई/ किसी तरह यों,
काजल की रात भी कटेगी यह/उसी तरह क्यों ?
ऐसे आए कि पिया हो गए पराए,
मुरझा गए दिए कतार में !
...इसी मावस के इंतजार में !"     (पृ.सं. 39)

राजेंद्र प्रसाद सिंह ने अपने नवगीत-विश्लेषण-क्रम में हमेशा 'शब्द की लय' या 'अर्थ की लय' की अपेक्षा 'मनोलय' को अधिक महत्वपूर्ण माना है। उनके ही शब्दों में "नवगीत की बेधकता इसी में है कि उस समग्र मनःस्थिति की लय को, भाषा के विन्यास में, कथ्य की काट-छाँट और अर्थ की लय के हावी होने से बचाकर पूरे अनुभव के ही केंद्रण के द्वारा, अधिकाधिक संक्रमणशील बनाया जाए।" इसके साथ ही उन्हे आशा है कि आज-न-कल नवगीत के स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिमान अवश्य निर्मित होंगे जिनके द्वारा उसके शैली वैशिष्टय का विवेचन संभव हो सकेगा। इस दृष्टि से विचारणीय उनकी एक रचना के कुछ अंश द्रष्टव्य हैं जिनमें नवगीत के अपने सौंदर्य शास्त्रीय के लिए धातव्य मनोलय के दृश्याधार (visuals) देखे जा सकते हैं -

लहरों में आग रुपहली,
ओ S S पुरवाई !
एक मौन की धुन से
हार गई शहनाई।

प्रथम पंक्ति में चित्रित 'रुपहली आग' और कुछ नहीं, पुरवा हवा के झोंके से आलोड़ित किसी याद आती नदी में लहरती तटवर्ती प्रकाश-पंक्तियाँ हैं। इसी प्रकार 'शहनाई की धुन' का 'मौन की धुन' से हार जाना भी टूटे हुए दांपत्य-सूत्र का संकेतक ध्वनि-बिंब है। रचना की अगली पंक्तियों में नववधू के चित्रांतर, आसंग (association) तथा उसके अंतर्द्वंद को अभिव्यक्ति दी गई है।

जामुनी अँधेरे की,
गजरीली बाहों में,
एक नदी कैद है निगाहों में।
रूठ नहीं पाती -
इन साँसों पर झुकी हुई परछाई।

यहाँ अंधकार की गहनता को व्यक्त करने के लिए दिया गया 'जामुनी' विशेषण यदि खुद में एक अछूता प्रयोग है तो 'गजरीली बाहों' की मादकता तथा 'साँसों पर झुकी परछाई' की भोग-व्यंजना व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखती। इसमें महत्वपूर्ण है दोनों चित्रों के बीच व्यक्त नायिका का वह अंतर्द्वंद , जो रचना के इस अंश को नववधू के चित्रित आसंग के रूप में द्योतित करता है। अंतिम अंश में टूटे हुए दांपत्य का मनोबिंब एवं संघर्षी जिजीविषा का चरम चित्र दर्शनीय है-

चाँद बिना आसमान
डूब गया धारा में,
लहक भी न उठती
तो हाय ! क्यों न बुझती
अब इन ठंडे शोलों की अंगड़ाई।     (आओ खुली बयार, पृ. 54)

राजेंद्र प्रसाद सिंह उन गिने-चुने रचनाकारों में एक है, जिनमें रचना में अंकुरित होते कथ्य को अनेक भंगिमाओं से व्यक्त करने की प्रवीणता है। यह गुण उसी कवि में पाया जाता है, जो अनुभव और अभिव्यक्ति के बीच संतुलन कायम रख पाने में सक्षम होता है। अन्यथा, अनुभव के प्रति अधिक मोह रखने वाले रचनाकार प्रायः अभिव्यक्ति को दोयम दर्जे का कर देते हैं अथवा अभिव्यक्ति पक्ष पर अतिरिक्त मोह होने से चमत्कार तो उत्पन्न हो जाता है पर उसके द्वारा घनीभूत अनुभव सही-सही अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। नवगीत कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह अनुभव की गहराई में प्रवेश करते समय यह नहीं भूलते कि उसकी सफल अभिव्यक्ति के लिए काव्यभाषा कैसी होनी चाहिए। इस क्रम में उनहोंने अभिव्यक्ति के कुछ ऐसे पहलुओं का अन्वेषण किया है जिससे भाषा की शक्ति बढ़ी है। इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है -

ढँक लो और मुझे तुम,
अपनी फूलों सी पलकों से, ढँक लो।
अनदिख आँसू में दर्पण का,
रंगों की परिभाषा,
मोह अकिंचन मणि-स्वप्नों का
मैं गंधों की भाषा,
ढँक लो और मुझे तुम
अपने अंकुरवत अधरों से ढँक लो।
रख लो और मुझे तुम,
अपने सीपी-से अंतर में रख लो।
अनबुझ प्यास अथिर पारद की,
मैं ही मृगजल लोभन,
कदली-वन; कपूर का पहरू
मेघों का मधु शोभन।
रख लो और मुझे तुम
अपने अनफूटे निर्झर में, रख लो।

सुप्रसिद्ध साम्यवादी मनोवैज्ञानिक एरिक फ्राम ने अपनी पुस्तक "आर्ट ऑफ लव" में प्रेम के संदर्भ में विचार करते हुए जिस कोमलता (टेंडरनेस) एवं प्रेमी युगल द्वारा परस्पर सुरक्षा देने की भावना को महत्वपूर्ण माना है वही - जैसे इस प्रतिनिधि प्रेम-परक नवगीत का थीम है। गीत की प्रथम पंक्ति से ही स्पष्ट है कि अनुभव की किस गहराई तथा कोमलता से यह रचना उदभूत हुई है। उपर्युक्त अंश पर ध्यान देने से स्पष्ट होता है कि पहले बंद में यदि अकथ्य का कथन व्यक्त हुआ है तो दूसरे में विपरीत की एकता को अभिव्यक्ति दी गई है। दूसरे बंद की अंतिम पंक्ति में कवि द्वारा प्रयुक्त 'मेघों का मधु' स्वाति जल के लिए दूसरा नाम है जो उसकी निजी भाषागत सुरुचि का परिचायक है। अंतिम बंद में ज्ञात उपकरणों के माध्यम से नए अज्ञात संबंधों की सृष्टि कर नवार्थों का स्फुरण (nuances) द्रष्टव्य है -

"सह लो और मुझे तुम,
अपने पावक-से प्राणों पर सह लो।"

यहाँ पावक-से प्राणों पर सहने की बात इसलिए की जा रही है, क्योंकि आगे का 'मैं' 'रुई का सागर' है :

"मैं हो गया रुई का सागर,
कड़वा धुआँ रसों का,
कुहरे का मक्खन अनजाना,
गीत अचेत नसों का,
सह लो और मुझे तुम,
अपने मंगल वरदानों पर सह लो।"     (आओ खुली बयार पृ.सं. 55)

इस गीत की विभिन्न अंतराओं में एक क्रम है और ऐसा लगता है जैसे कोई अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व की भीतरी रचना को संवेदना की कई सतहों पर क्रमशः खोल रहा हो। रचना की अंतिम पंक्ति है... 'मंगल वरदानों पर सह लो' ...वस्तुतः यह सृजन का उन्मेष है। साथ ही इससे यह भी साफ पता चलता है कि यह किसी भारतीय कवि की रचना है

'आओ खुली बयार' में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने नवगीत के निकाय में जो नए 'प्रार्थना गीत' प्रस्तुत किए हैं उन्हे 'निराला' के स्वप्न-गीतों की शृंखला से वैसे ही नहीं जोड़ा जा सकता है, जैसे तुलसी की 'विनयपत्रिका' के गीतों से 'निराला' की तद्विषयक रचनाओं को। क्योंकि युग-बोध और जन-पक्ष की संधि पर प्रश्न-मुद्रा में उपस्थित ये नए प्रार्थना-गीत भी आधुनिकतालोचन से आगे बढ़कर सभ्यतालोचन की दिशा में सक्रिय हैं। एक उदाहरण द्रष्टव्य है -

"आज संस्कारों का अर्पण लो !
गुहा-मनुज मुझ में चुप/प्रस्तर-युग मौन,
धातु-छंद से मुखरित/करतल-ध्वनि कौन ?
मध्ययुगी रक्त-स्नात यौवन का दर्पण लो !
आधुनिक मनुज मेरे/नख शिख में लीन,
विद्युन्मुर्च्छिता/धरा में यंत्रासीन,
'इहगच्छ, इहतिष्ठ'- अजिर का समर्पण लो।
लो, अब स्वीकारो यह व्यापक संदेह,
अपने प्रति शंका का उद्वेलित गेह,
विगत के कुशासन पर आगत का तर्पण लो
आज संस्कारों का अर्पण लो।"     (आओ खुली बयार, पृ.सं. 98)

समग्रतः कहा जा सकता है कि 'नई कविता' के प्रक्रियात्मक (processive) दृष्टिकोण के कवि राजेंद्र प्रसाद सिंह की कृतियाँ कदाचित उनके सीमांतक (marginal) संस्कारों की देन हैं। पूरे संग्रह में नव्य कल्पना के जाल यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। इसकी सुंदर भावाभिव्यक्तियाँ ओज और प्रसादपूर्ण भाषा के वहन से सहज ही पाठक को अपनी ओर उन्मुख करने में सक्षम हैं। आचार्य श्री शिवपूजन सहाय की भविष्यवाणी, जो कभी 'भूमिका' पढ़कर मुखर हुई थी - "कल्पना का चमत्कार, अभिव्यंजना का सौंदर्य, भाव की गहनता और भाषा की प्रौढ़ता देखकर यही कहना पड़ता है कि कवि ईश्वरदत्त प्रतिभा का प्रसाद पाकर हिंदी को कुछ अपूर्व चीजें देने आया है" - ऐसी रचनाओं में चरितार्थ होती है।

'आओ खुली बयार' (1962) की विभिन्न रचनाओं में मिले एक ओर उन्मुख युवा मानसिकता की सर्वव्यापिनी ऊर्जा के सक्रिय चित्र - जितना अर्थ संकेतित करते हैं, उतना ही वे गेयता की नई यात्रा में लय-ताल-बद्ध भी हैं। पाश्चात्य आधुनिकता को तल तक समझकर, एक जवाबी भारतीय आधुनिकता का संवेदना-संसार सिरजते हुए, राजेंद्र प्रसाद सिंह का रचनात्मक प्रकर्ष 'आओ खुली बयार' की जिन रचनाओं में देखा जा सकता है, वे है 'अपरिचय की शपथ', 'ओ अतिथि, मेरे द्वार के', 'एक नगर, एक रूप और है', 'शिशिर गंध, उन्मुक्ति का सहगीत', 'आरोही का गीत', 'टेलीपैथी के गीत', खंड की सब रचनाएँ, 'प्रार्थना गीत-7', इत्यादि। इन गीतों के अलावा लोकतत्व के गीतों में 'आओ खुली बयार', 'पीछे, आगे, साथ', 'जरा दम तो लें' (युगल गान), 'मावस के इंतजार में', 'कपूरी दीये', 'ओ पुरवाई','एक युग का बारहमासा' आदि भी उल्लेखनीय हैं।

'भरी सड़क पर' (1980) राजेंद्र प्रसाद सिंह की दूसरी नवगीत कृति है जिसमें नगरीय एवं ग्रामीण निम्न मध्यवर्ग की संवेदनात्मक मनःस्थितियों का सार्थक मूर्तन हुआ है। इसके नवगीतों के द्वारा रचनाकार ने नवगीत की विधागत प्रौढ़ता को जनबोधी नवगीत के रूप में एक नया आयाम देने की पेशकश की है।

'गीतांगिनी' (1958) के संपादकीय में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने नवगीत को नई कविता का पूरक माना था। किंतु, 'भरी सड़क पर' की भूमिका में जब उन्होंने लिखा कि "अब तो नवगीत नई कविता का पूरक नहीं, स्वायत्त विधा है।" उन्हीं की कलम से नवगीत की समानांतर स्वायत्तता की घोषणा अत्यंत ही महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। इस घोषणा की पृष्ठभूमि में सन् 1958 से 1980 तक नवगीत के रचनाभियान एवं स्वीकृति-संघर्ष के वे मोड़ हैं, जिनको पार करती हुई यह विधा कविता और 'किस्म-किस्म की कविता' के बिखराव से खुद को बचाकर आधुनिकता-बोध और युगबोध विकसित करती रही तथा आठवें दशक में जनबोधी स्वरूप को ग्रहण कर जनसंघर्षों से जुड़ने लगी। आठवें दशक में नवगीत की स्वायत्तता को सहर्ष उद्घोषित करते हुए राजेंद्र प्रसाद सिंह ने लिखा - "अब नवगीतकार आंचलिक राग-लय का चितेरा, यंत्रीयता और नगरबोध का सहगाता या चेतन सामूहिकता तक, किसी भी अनुभव के मनःसंश्लेष की अपूर्व, अद्वितीय और संलयात्मक अभिव्यक्ति का नियन्ता है।" 'भरी सड़क पर' के नवगीत, रचनाकार के शब्दों में 'मध्यवर्गीय जीवनानुभव और जिजीविषा के अभिव्यंजक' वैसे नवगीतों की श्रेणी में हैं - "जिसमें मानवीयता की सहसंघर्षी अनुभव-दृष्टि है।" (भूमिका) जाहिर है कि यही अनुभव दृष्टि पूरे मध्यवर्गीय जनबोध की धुरी है।

इस संग्रह का पहला नवगीत ही मध्यवर्गीय जीवन की विडंबना को प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करता है -

"भरी सड़क पर
कुमकुमे जले हैं
कोई सुई हम
ढूँढ़ने चले हैं।"(भरी सड़क पर - पृ. 1)

इस वर्ग की बड़ी विडंबना यह है कि अपनी चाहत और दूसरों से उम्मीद के रिश्ते की फटी हुई चादर को सिलने वाली सुई अपने ही घर में खो देने वाला इसका प्रतिनिधि, उसे भरी सड़क पर ढूँढ़ रहा है।

इस कृति की दूसरी रचना में 'सुबह : दोपहर : शाम' के अंतर्बंधों में श्रमजीवी एवं कार्यालय-कर्मी समुदायों की यंत्रणामयी दिनचर्या अपनी पूरी मार्मिकता एवं स्वाभाविकता के साथ चित्रित हुई है। वस्तुतः मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था ने आज के आदमी को यांत्रिक जीवन जीने के लिए बाध्य कर दिया है जिसमें उसके जीवन की सुबह, दोपहर और शाम ने अपनी स्वाभाविक पहचान खो दी है। यंत्र-सदृश जीवन जीने को अभिशप्त आधुनिक मनुष्य की मानवीय पहचान से रहित शाम का चित्र द्रष्टव्य है -

"शाम गीत की ढली
चले कुचले से हम राहों पर!
छुट्टी पाते ही घिर आई
घटा नशीली, जोत रँगीली
बिन बरसे गहराई!
बँध चले सभी आटोप से,
दर्पण को लेते चूम
निरे आरोप से।"     (भरी सड़क पर, पृ.सं. 4)

महानगरीय जीवन की विसंगतियों को उजागर करने वाली इस कृति की तीसरी रचना 'महानगरी : तारा' का मुख्य सरोकार आलोचनात्मक यथार्थवाद हैं। महानगरीय बोध को लेकर रचित इस नवगीत में एक रचनाशील व्यक्तित्व की घुटन एवं पराजय को अभिव्यक्ति मिली है :

"महानगरी के गगन का/एक तारा!
धूमिल गगन में वास/धूसर हवा में साँस,
चुपचाप जलता फूल/बिंबित दहकती प्यास,
घुटन के तम में जला है/दीप धीरज का;
यातनाओं में पला वह/शौर्य हारा !"

इस रचना की अंतिम पंक्तियाँ महानगरीय जीवन की उस विद्रूपता को बिल्कुल नंगा कर देती हैं जिसकी परिणति है महानगरीय आसमान में एक टिमटिमाते हुए तारे की तरह तुच्छ जीवन जीता किसी रचनाशील व्यक्तित्व का अनुकूलन -

"दंड पा अपराध सीखे
- जंतु न्यारा!
- एक तारा!"    (भरी सड़क पर, पृ.सं. 5)

निश्चित रूप से यह पूँजीवादी आधुनिकीकरण ही है जिसके अनुकूलन चलते मनुष्य अपनी सहज-स्वाभाविक प्रवृत्तियों से विलग पशु बन कर निर्वासन का शिकार हो जाने के लिए अभिशप्त है और कहने कि जरूरत नहीं कि निर्वासित व्यक्ति के लिए पाशव ही मानवीय और मानवीय पाशव हो जाता है।

राजेंद्र प्रसाद सिंह ने लिखा है कि "नवगीत में नगरबोध मौजूदा मनोदशा की असलियत और पूँजीवादी आधुनिकीकरण की नीयतों के अंतर्विरोधी अनुभव के स्तर पर स्वीकृत हुआ है।" अतः वहाँ औद्योगीकरण के कारण मिल मालिक और मजदूरों के संघर्ष तथा जीवन की भागदौड़ आदि के अनेक चित्र देखे जा सकते हैं। 'भरी सड़क पर' की पाँचवीं रचना 'ना साधू-ना चोर' में झुग्गी-झोपड़ी में अपनी जिंदगी गुजार देने को मजबूर मिल-मजदूरों की जीवनस्थिति का जायजा इन पंक्तियों में लिया गया है -

"ओ भैया, ना साधू ना चोर
हम मुँहजोर झुग्गी वाले!
चटकल की चिमनी ने आज तरेरी आँखें,
मिल की भट्ठी आग-लहू का भेद मिटाती!
करखनिया मजदूर/इकट्ठे हिम्मत से भरपूर
नशे में चूर,-कबीरा गाते..."

इस रचना के माध्यम से कवि ने धर्म की अफीम खिलाकर सर्वहारा को अनुभूति-शून्य बना देने वाली प्रतिगामी शक्तियों तथा मेहनतकश कामगारों के पसीने की कमाई से पैदा हुई पूँजी का जुआ खेलने वाले पूँजीपतियों के आपसी गठजोड़ का पर्दाफाश भी किया है -

"नाम धरम के पेट पालते भीख माँग जो,
या जो खेलें जुआ, पसीने से, पूँजी का,
दोनों धोखेबाज,/लड़ाकर हमें भोगते राज,
खुला यह राज, सामने सबके।"

जन-कविता-जैसी सरल-सहज मगर मर्म को छूकर जगा देने वाली भाषा में रचित जनबोधी नवगीत की इस प्रतिनिधि रचना में मेहनतकश वर्ग के लोग अपना बयान निम्नमध्यवर्गीय लोगों के सामने ही देते दीख रहे हैं क्योंकि वे उनके निकटतम वर्गीय साथी हैं -

"दलदल में धँस, नदी समंदर में भी डूबे,
दबे नींव में, दीवारों में चुने गए हम;
छत से फिसले, गिरे,/पहाड़ों-खानों में फँस मरे,
कैद में सड़े-नाम पर श्रम के।    (भरी सड़क पर, पृ.सं. 7)

राजेंद्र प्रसाद सिंह उन गिने-चुने हिंदी कवियों में एक हैं जो मार्क्सवाद के साथ-साथ भारतीय इतिहास एवं संस्कृति के आदि स्रोतों से भी पूरी तरह परिचित हैं। राजनैतिक चेतना के साथ ही कवि की गहरी ऐतिहासिक समझ का प्रमाण कृति की जिन रचनाओं में देखा जा सकता है उनमें सामाजिक अंतर्वस्तु में ही नारी और नारी की भूमिका को विषयवस्तु बनाकर रचित एवं पाँच रचनाओं का एक नवगीतबंध - 'इतिहास मुद्रा में नारी' विशेष रूप से ध्यातव्य है। इस नवगीत बंध के मात्र पंद्रह पंक्तियों के प्रथम गीत में आदिम युग से आश्रम-काल तक की नारी की सामाजिक पहचान तथा दूसरे गीत की केवल सोलह पंक्तियों में राजतंत्र के आरंभ से मध्ययुग तक के नारीत्व का ऐतिहासिक मूल्यांकन आधुनिक हिंदी गीतकाव्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

आदिम युग में जबकि मानव-सभ्यता द्वारा प्राकृतिक उपादानों का नामकरण तक नहीं हुआ था तथा मनुष्य अपने भावों को भाषा की जगह भंगिमा के माध्यम से व्यक्त कर रहा था तब भी नारी गुणमयी थी और पुरुष तेज एवं मेधा की साक्षात प्रतिमूर्ति था -

"पेड़ और पर्वत के नाम न थे,
सिंधु और अंबर के नाम न थे,
नाम न थे फूल और रंगों के,
- तब भी मैं गंधवती थी,
- तब भी तुम तेजोमय थे।
भाषा भंगिमा में अंकुरती थी,
निकटता परस से ही जुड़ती थी,
संगति तो संग-संग मुड़ती थी,
- तब भी मैं स्वप्नवती थी
- तब भी तुम मेधावी थे।

मध्यकाल तक आते आते क्रमशः विकसित सामंती समाज-व्यवस्था ने इस स्वप्नवती नारी को अपनी गिरफ्त में लगभग कैद कर, महज भोग का साधन बना दिया -

तुम राज-काज में लगे रहे,
मैं भोग-राग में पगी रही;
यों युग बीते!
मणिकुट्टम से रच गए महल
झोपड़ियाँ तकती रहीं,
अश्वारोही तुम चले निकल,
मैं कैद तरसती रही;
तुम जीत-हार में लगे रहे,
मैं मिलन-बिरह में ठगी रही;
यों युग बीते।"    (भरी सड़क पर, पृ.सं. 10)

तीसरे गीत में आधुनिकता की नई सभ्यतामूलक त्रासदी मुखरित है -

"मैं नई सभ्यता की देही
तुम क्या हो?
X X X
फैशन के नए कलेवर में जो बढ़ती रही दुराशा,
मैं पलती रही उसी में,
अधिकारों के हर तेवर का जो चलता रहा तमाशा,
मैं ढलती रही उसी में,
अब मैं तनाव की छवि नेही,
तुम क्या हो?" (भरी सड़क पर, पृ.सं. 11)

चौथी रचना में नगरों-महानगरों में बसी मध्यवर्गीय नारी के आत्मानुशासन का अंतर्विरोध पूरी मार्मिकता के साथ मुखरित हुआ है।

लेलो जी, अपना भाग,
कल ये हाथ पराए होंगे।
आँगन की मिट्टी का मँह-मँह
चंदन चुक जाएगा,
पिंजड़े में बैठ सुआपंखी
सरगम रुक जाएगा,
गोरैया दर्पण-द्वार न खटकाएगी;
ले लो जी संचित राग,
कल ये चषक जुठाए होंगे!

यही वह अंतर्विरोध है जिस कारण भारत के नब्बे प्रतिशत दंपति असंतुष्ट जीवन जीने को बाध्य हैं। इसके मूल में वह आवर्जना है जिसके कारण अधिकांश प्रेमिका अपने प्रेमी की पत्नी नहीं बन पाती। इस बंध की पाँचवीं रचना गाँव से शहर में ब्याही गई एक ऐसी नववधू का आसंग-गीत है, जिसका मन गाँव के बाल-सखा से जुड़ा है और शरीर शहर के अपने नए परिवार से।

उम्र बीतने के साथ, अपनी-अपनी, आजीविका की लड़ाई लड़ता मध्यवर्ग का हर श्रमजीवी व्यक्ति अपने पारिवारिक जीवन में प्रेम, सौंदर्य, आत्मिक लगाव और मानवोचित संबंधों में दरार अनुभव करने लग जाता है। इस टूटन के लिए रोज-रोज की उसकी यांत्रिक दिनचर्या जिम्मेदार है। अंततः वह अपने बचाव की चेष्टा और विवशता के दुख पर विजय की इच्छा प्रकट कर रह जाता है -

"नीली पड़ गई नदी तेरी/मेरा भी कत्थई वसंत,
धार हलद, सूरज सिंदूरी/उभरेगा जीवन-पर्यंत
यों पहाड़ ढो लें हम/गोद वृक्ष को लें हम,
गुँथे हुए, नए हुए, मथे हुए लोग;
हम लोग... हम लोग... हम लोग।"    (भरी सड़क पर, पृ.सं. 19)

शून्य हो चली अपनी विचारशीलता और घनीभूत होती पारिवारिक सामाजिक अपेक्षाओं को ढोते हुए; तूफानी इरादों को एक जंगल में भटका कर, ऊबे-अजूबे लोगों में शामिल होकर आखिर बौद्धिक, आत्मिक और हार्दिक तौर पर तथाकथित समुन्नत मध्यवर्गीय व्यक्ति भी उपलब्धि के नाम पर क्या पाता है, - बिंब छवियों में द्रष्टव्य है -

"जल-गुफा का द्वार आखिर/ढह गया,
आईना-घर चूर होकर/बह गया,
पत्थरों से ही निबटता/थक गया झरना।"    (भरी सड़क पर, पृ. 21)

इस जनबोधी नवगीत-कृति की महत्वपूर्ण विशेषता इसके अंत में संकलित 'बिजली की वायलिन' शीर्षक 'नवगीत-संगीतिका' है; जिसके द्वारा हिंदी गीतकाव्य में कदाचित पहली बार जनवादी चेतना से पूर्ण कथ्य को संगीतिका के शिल्प में ढाल-कर शोषण की नींव पर खड़ी मौजूद पूँजीवादी व्यवस्था की मानव-विरोधी कारगुजारियों का पर्दाफाश किया गया है। इसके साथ ही आजीविका की शर्तों से जूझता मध्यवर्गीय युवावर्ग जिस व्यावसायिक व्यवस्था से अनुकूलित और यांत्रिक हो जाता है, उसका खुलासा भी इस रचना में देखा जा सकता है। किंतु, यह कहना अनुचित नहीं होगा कि हिंदी गीत-काव्य के क्षेत्र में किए गए इस नवीन प्रयोग के मंचन की सफलता और भविष्य के गर्भ में ही छिपी है।

'रात आँख मूँद कर जगी' राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा सातवें दशक के आरंभ से आठवें दशक के अंत तक रचित, व्यापक और सूक्ष्म अर्थों में अनुभवगम्य अमानवीयता के विरुद्ध, साधार टिके हुए प्रेम-परक नवगीतों का संग्रह है; जिसकी रचनाएँ मुख्यतः संघर्ष और कलात्मक राग-वृत्ति के रूप में आधुनिक शिल्प के कई स्तरों पर उद्भासित हैं।

किसी समय प्रेम-संबंध में यदि शाश्वत मूल्य के अनुभव की बात की जाती थी तो बीच में एक ऐसा समय भी आया जबकि प्रेम के शुद्ध देहवादी रूप को ही वास्तविक माना गया। किंतु आगे चलकर विचारकों ने इन दोनों प्रकार की अवधारणाओं को अस्वीकार करते हुए प्रेम को मानवीय संबंधों के बीच ऐसे हार्दिक सूत्र के रूप में रेखांकित किया जिसका स्वरूप-निर्धारण बहुत हद तक समाज की आर्थिक संरचना पर निर्भर है और इस संरचना का सीधा नहीं तो गुणात्मक संबंध उत्पादन-वितरण की व्यवस्था से है। द्वंद्वात्मक भौतिकवादी विचारक प्रेम में संलग्न दो व्यक्तियों के संबंधों की सफलता-असफलता को बहुत हद तक उनकी वर्गीय एवं सामाजिक स्थिति पर निर्भर मानते हैं। इसीलिए उनका स्पष्ट मत है कि समाज की आर्थिक संरचना में बदलाव एवं जटिलता के फलस्वरूप प्रेम-प्रक्रिया में भी परिवर्तन एवं जटिलता का समावेश होने लगता है। प्रेम के संदर्भ में अर्थ के साथ ही 'यौन-पक्ष' की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। किंतु, इस यौन अथवा दैहिक प्रेम को भी कॉडवेल जैसे विचारक आर्थिक संबंधों का परिवर्तित रूप ही मानते हैं। अतः स्पष्ट है कि प्रेम कदापि मात्र वैयक्तिक रुचि या चयन का परिणाम नहीं हो सकता, क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना से किसी न किसी रूप में प्रभावित होना उसकी नियति है। इससे भी आगे बढ़कर यह कहा जा सकता है कि किसी युग विशेष की समाजार्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों के दबाव से उस युग के मनुष्य की प्रेम-प्रक्रिया भी अनुकूलित होती है। मसलन यदि ग्रामीण संस्कृति को प्लेटोनिक या शुद्धतावादी प्रेम-भावना के सर्वथा अनुकूल माना गया है तो प्रेम का रोमांटिक एवं शौर्यपूर्ण स्वरूप मध्ययुगीन सामंती समाज व्यवस्था की देन सिद्ध हुआ है। मौजूदा पूँजीवादी समाजार्थिक संरचना ने प्रेम को खरीद-फरोख्त, आवश्यकता, भोगवादी उपयोगिता आदि का विषय बनाकर उसे भाव-शून्य यांत्रिक प्रेम में तब्दील कर दिया और आज का आदमी व्यापक रूप में प्रेम की इसी अघोषित यांत्रिकता का शिकार है।

वस्तुतः बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते विश्व के अधिकांश देशों में तीव्र औद्योगीकरण के फलस्वरूप उत्पादन-वितरण संबंधी जटिलताओं एवं महानगरों के विस्तार आदि की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी। इन सबके कारण एक ऐसा परिवेश निर्मित हुआ जिसने मानवीय संबंधों में अलगाव (Alienation) तथा अमानवीकरण (De-humanisation) की प्रवृत्ति को जन्म दिया। अर्नेस्ट फिशर ने लिखा है कि 'आधुनिक विज्ञान' की उपलब्धियों और सामाजिक पिछड़ेपन के विरोधाभास के कारण भी (सामाजिकों में) अलगाव की भावना पैदा होती है।" फिशर का यह कथन भारत जैसे सामाजिक रूप से पिछड़े अर्द्धसामंती एवं अर्द्ध-पूँजीवादी संरचना वाले देश के लिए पूरी तरह सच है। भारतीय पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में इसी अलगाव की भावना के कारण प्रेम संबंधों में एक ओर यदि आवेश-उत्साह के दर्शन होते हैं, तो दूसरी ओर उन्हीं संबंधों के प्रति तटस्थता, उपेक्षा आदि प्रवृत्तियां भी दृष्टिगत होती हैं। वस्तुतः व्यक्ति जब 'स्व' (सेल्फ) से अलगाव का अनुभव करने लगता है तो एक सीमा के बाद वह अपनी मानवीय पहचान खोकर यांत्रिकता से ग्रस्त हो जाता है और जीवन के प्रति एक प्रकार की ऊब महसूस करने लगता है। मार्क्सवादी विचारकों के अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था अपनी ही विसंगतियों के कारण आधुनिक मनुष्य के भीतर उत्पन्न रुग्ण एकांतिकता, ऊब और तनाव आदि को भरने के लिए उसे जो मनोरंजन के कृत्रिम साधन (नाईट क्लब, ब्लू फिल्में, इंटरनेट आदि) उपलब्ध कराती है; उनसे उसकी संवेदना और अधिक विकृत व शून्य बनती चली जाती है।

ऐसे जटिल एवं यांत्रिक परिवेश में गेय कविता की भूमिका पर विचार करते हुए राजेंद्र प्रसाद सिंह ने उसे अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है - "यांत्रिकतावादी जीवन को भी भावना और संवेदना से वही तत्व जोड़ सकता है, - जो मानसिक और दैहिक श्रम से, -रचना और उत्पादन और निर्मितियों का वहन करने वाले जीवन को भावना-संवेदना से युक्त करता है और वह तत्व मानवीयता के सहज हार्दिक अनुभव के अलावा कुछ नहीं है। सांस्कृतिक प्रभाव का संस्पर्श उसे ही जगाता और पूरे मनोदैहिक अस्तित्व और व्यक्तित्व को उसके योग्य बनाता और बदलता है। जाहिर है कि सांस्कृतिक प्रभाव सर्वाधिक कला में ही सक्रिय होता है, उसके अंतर्गत भी सर्वाधिक व्यापक कविता में और उसमें भी तीव्रतम ढंग से वह गीत में रहता है। यांत्रिकता के सामूहिक प्रतिवाद में वैचारिक कविता की वकत कुछ हो-न-हो, गीत, नवगीत और उसके अद्यतन विकास 'जनबोधी नवगीत' की भूमिका तो शामिल है ही।"

हिंदी नवगीत के नाम-लक्षण-निरूपक प्रथम ऐतिहासिक संकलन 'गीतांगिनी' (58) के संपादकीय में 'नवगीत' के जिन पाँच विकासशील तत्वों की चर्चा की गई है उनमें 'प्रीति तत्व' भी एक है, जिसे निरूपित करते हुए बतौर संपादक राजेंद्र प्रसाद सिंह ने लिखा था कि "प्रीति तत्व की दिशा में व्यक्ति क्रमशः आकर्षण, कामना, पूरकता, अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मूल्यांकन और व्याप्ति, -सात सोपानों से गुजरता चलता है और अपनी अवांतर अुनभूतियों के सातत्य और व्यक्तित्व की उपलब्धि करता है। गीत-रचना का यह तत्व सर्वाधिक गीतकारों के अनुकूल है और लोकप्रिय भी अतः अधिक विकसित प्रयासों की आवश्यकता भी इसी तत्व के संबंध में है।" 'गीतांगिनी' के संपादकीय में निरूपित इस तत्व की स्पष्ट व्याख्या राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रथम नवगीत कृति 'आओ खुली बयार' की भूमिका की इन पंक्तियों में द्रष्टव्य है - "व्यक्तित्व के सभी तत्वों का संघटन प्रीति भावना के उदय से ही आरंभ हो जाता है। स्वभाव की प्रौढ़ता और अनुभव की प्रांजलता भी प्रीति के उन्हीं सोपानों के समानांतर बढ़ती जाती है, जिनकी क्रमिक भावाभिव्यक्ति आकर्षण, कामना, पूरकता, अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मूल्यांकन और व्याप्ति इस तत्त्व से ओतप्रोत गीतों में होती है।"

स्पष्ट है कि 'प्रीति' आरंभ से ही नवगीत की एक प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में अनेकानेक रचनाओं के मूल में सक्रिय रही है। किंतु कालांतर में नवगीत के रचनागत संदर्भ में इसकी भूमिका बदलती रही है। यदि छठे दशक के नवगीतों में इसे मानवीयता की एक मूलभूत प्रवृत्ति के रूप में स्वीकारते हुए भी वैयक्तिक की जगह - 'मनोदैहिक' (Psycho-Sometic) तथा अभिव्यक्ति की जगह प्रदर्शन (Exhibition) का विषय बना लिया गया; तो सातवें-आठवें दशक के नवगीतों में उसका वस्तुस्थितिक एवं संरचनात्मक स्वरूप उभरकर सामने आया।

सातवें-आठवें दशक में हिंदी नवगीत की संरचनात्मक नवीनता को उदाहृत करने वाली राजेंद्र प्रसाद सिंह की रचना का अंश द्रष्टव्य है जिसकी नई प्रस्तुत्य कलात्मकता और अनुभव-प्रवणता चुनौतियों से भरी है -

रात आँख मूँदकर जगी है,
एक अनकही लगन लगी है,
मैं नयन बनूँ,
पवन बनूँ,
गगन बनूँ,
...कि क्या करूँ?      (पृ.सं. 5)

विवेच्य कृति के प्रेम-परक नवगीतों में न तो प्रेमी-प्रेमिका द्वारा परस्पर किए गए आत्मनिवेदन का फेनिल उच्छ्वास है और न ही किसी अज्ञात सत्ता के प्रति व्यक्त रहस्यात्मक प्रेम-भावना व्यंजित है। इन सबकी जगह यहाँ आज के मशीनी युग में मानवीय जीवन की कृत्रिमता और प्रीति-बंधन की अलभ्यता को रचना का विषय बनाया गया है -

"दूधिया शीशे की दीवार चारों ओर हैं।
कैसे जाएगा उस पार 'फोकस' अंदर से?
कैद सन्नाटे का आकार, बाहर शोर है।
X X X
अजब वातायन जालीदार, ध्वनि का चोर है।
(रात आँख मूँदकर जगी, पृ.सं. 43)

चेग्वेरा ने ठीक ही लिखा है "भले ही यह तथ्य अजीब लगे लेकिन यह सही है कि प्रत्येक क्रांतिकारी कुछ भी होने से पहले प्रेमी होता है।" तभी तो मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' में व्यापक प्रेम को ही क्रांति की छटपटाहट के रूप में अनुभव करते हुए प्रेमिका और क्रांति को एकमेक कहा गया है। 'रात आँख मूँद कर जगी' से गुजरते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि इस कृति के अनेक प्रेम-परक नवगीत अपने मूल रूप में क्रांतिकारी चेतना के नवगीत हैं - तभी उनमें जगह-जगह सामाजिक आलोचना के व्यंग्य ने भी अपनी जगह बना ली है -

"बहसें हर ठौर जारी/सब पर धमाके भारी,
जाती-'सुनहरे कल' तक - लॉटरीवाली गाड़ी!
झूठ नारों के सदके/लूट-मारों के सदके!
पूरा आशियां चुप है !
           (रात आँख मूँद कर जगी, पृ.सं. 44)

वस्तुतः कवि के प्रेमी मन और उसकी समाजार्थिक एवं राजनैतिक चेतना के बीच निरंतर एक प्रकार के अंतःसंघर्ष की स्थिति जारी है जिसके चलते वह अंतरंगता के क्षणों में भी परिस्थितियों की भयंकरता के प्रति वह सजग रहता है। ऐसी सजगता अंतःसंघर्ष को कलात्मक मार्मिकता से खचित करती है:

"रंग-गाँठ कसी रही शोणित की लय में,
गंध-गंध खुल आई पूरक विनियम में!
फल गई सचाई अभिनय में!
लाख जतन जान कर किए;
पत्थर कह झुठलाएँ कैसे - रतनों के मोल जो लिए!
पांवों के रूख पलटें कैसे - इतने दिन साथ हम जिए!
(रात आँख मूँद कर जगी, पृ.सं. 36)

किंतु, रचनाकार परिस्थितियों की भयंकरता से आक्रांत होकर उनके सामने घुटने टेक देने के बजाय डटकर मुकाबला करने में यकीन रखता है -

"खोलो जी, सुबक नयन खोलो!
X X X
यह उजड़ा सा नीड़ तुम्हारा
बस, टूटा सा पेड़ सहारा
सौ तूफानों से लड़कर भी
जो न कभी भीतर से हारा!
डालें कहतीं सुधापन को
विष से होंठ भिंगो लो!
(रात आँख मूँद कर जगी, पृ.सं. 17)

राजेंद्र प्रसाद सिंह के प्रेम-परक नवगीतों की एक महत्वपूर्ण विषयवस्तु है - प्रकृति और कवि का प्रकृति-प्रेम भी उनके मानव-प्रेम का ही एक रूप या उसका विस्तार है पर यह छायावादी प्रेम से भिन्न है। अज्ञेय द्वारा संपादित प्रकृति-काव्य संकलन 'रूपांबरा' में संकलित राजेंद्र जी की रचना 'शरद की स्वर्णकिरण बिखरी' इसका बेहतर उदाहरण है। डॉ. रामविलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि "क्या भारत और क्या यूरोप, कहीं भी अब तक कोई बड़ा मानव-प्रेमी कवि नहीं हुआ है, जो प्रकृति का भी प्रेमी न रहा हो।" इसके साथ ही यदि प्रकृति से जुड़ना यांत्रिक जीवन-पद्धति का निषेध करना है तो राजेंद्र प्रसाद सिंह के प्रकृति-प्रेम विषयक नवगीत भी निश्चित रूप से मौजूदा पूँजीवादी आधुनिकीकरण एवं यांत्रिकतावादी सभ्यता के कारण उत्पन्न अमानवीकरण के प्रतिवाद-स्वरूप ही रचे गए हैं। वस्तुतः प्रकृति जीवन का अजस्र स्रोत है इसलिए सांस्कृतिक प्रदूषण के इस युग में स्वस्थ वृत्तियों को जगाने के लिए उसकी ओर मुखातिब होना स्वाभाविक ही है -

"पूर्णिमा की रात में यह मधुर आमंत्रण!
शरद के आकाश में धूमिल, सजल घन खो गए,
चाँदनी के पलक-तल थककर नशे में सो गए!
उतर आए दूत पेड़ों के चँवर झलते;
खिल उठे संदेश पाकर आगमिष्यत् क्षण !
X X X
हो उठे सहसा सिंदूरी चाँद के लोचन!
(रात आँख मूँद कर जगी, पृ.सं. 12)

'उजली कसौटी' (1969) में संग्रहीत उषा-स्वस्ति कविता भी हिंदी में प्रकृति-काव्य का एक बेहतर नमूना है, जिसमें वैदिक उषा-स्तुति से संबंधित ऋचाओं की सादगी भरे शिल्प में आधुनिक मनुष्य की संवेदना को व्यक्त किया गया है -

प्यार की
दूरागता पहली पुजारिन-सी
आ रही नभ में उषा !
मौन संशय की अँधेरी छाँह
घिर पड़ी धुँधले क्षितिज पर,
- दूर नावों पर;
अब उसे सस्मित समेटे जा रही
कल्पना की दिशा !
यही सुधिमय समर्पण की घड़ी,
छाया-जगत् को
यों चूमती अरुणिमा,
जैसे बरसती हो
उच्छ्वसित आसंग की माधुरी l
हाँ, चिरंतन प्रीति की प्रतिबिंब गाथा-सी
तरंगित रंगिनी गंगा;
एक डुबकी ले सहज अभिषेक को
आ गई जल में उषा !
ओ उषा !
ओ चेतना की माँ !
(ऐसी सन्निकटता के लिए करना क्षमा),
रह रहा कैसे तुम्हारा रहस और अखंड यौवन,
दिप रहा सद्यस्क अंगों में भला कैसे -
आनंद यह निस्संग ?
दे रही क्यों
जरठता को दान शैशव का ?
मैं मुसाफिर वंचना की रात का,
विश्वास भी अपमान!
लो, तभी यों हो गई ओझल
स्वयं उजला अँधेरा ओढ़कर
यह मुँहजली मेरी तृषा !
ओ डूबती जल में उषा !     (पृ.49-50)

'रात आँख मूँदकर जगी' प्रायः तीन दशकों में बदलती वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक और रचनात्मक मानसिकता के विभिन्न तापमानों में ढली नवगीत कृति है। 1963 से 1981 के बीच रचित प्रेम-परक नवगीतों के इस संग्रह में सिर्फ प्रेम का ही मूल्यन, अवमूल्यन एवं पुनर्मूल्यन आदि हो, ऐसा नहीं। यहाँ उससे जुड़े परिप्रेक्ष्य, दृष्टिकोण, संदर्भ, प्रसंग और इकाई, कुटुंब, समूह, समुदाय, व्यवस्था, जीवनस्थिति और मूल्यबोध के भी पीढ़ी-पर-पीढ़ी जो फर्क हैं, ध्वनित या व्यंजित हुए हैं। फिर भी सहज रूप से यह मध्यवर्गीय युवा, प्रौढ़ एवं प्रौढ़तर हार्दिकता की ऐसी नवगीत-कृति है, जिसकी नई प्रस्तुत्य कलात्मकता और अनुभव-प्रवणता चुनौतियों-भरी है। इस कृति की पहली ही रचना 'रात आँख मूँद कर जगी' की अंतिम पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं, जिनकी संरचना में धुन, भाव, छंद, लय, ताल और प्रस्तुत्य गेयता का अभूतपूर्व संयोजन हुआ है-

मुँदी हुई पलकों में बेरुखी अजीब
या बहाना है ?
जागती पुतलियों में चिंता की बात
या कि ताना है ?
...जो अधीन हो रहे, ... विटप बनकर,
...त्रासदी - अशुभ पंछी बन जाए,
...ले जाए बहा, वह अँधेरा हो !
शायद मनुहार दिल्लगी है,
रात तो अभाव की सगी है,
मैं क्षुधा बनूँ,
- विधा बनूँ
- सुधा बनूँ,
कि क्या करूँ ?

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि 'रात आँख मूँदकर जगी' के प्रीति-परक नवगीतों में प्रीति एक गत्वर मानवीय प्रवृत्ति के रूप में अपनी सहजता और स्वाभाविकता के साथ अभिव्यक्त हुई है। नव्य-रोमानी कथ्य एवं नवीन शिल्पगत उपकरणों से रचित आधुनिक भावबोध-संपन्न इन रचनाओं का आस्वादन लीक से हटकर ही किया जा सकता है।

नवें दशक में नवगीत की जनप्रतिबद्ध धारा और राजेंद्र प्रसाद सिंह

राजेंद्र प्रसाद सिंह की रचनाएँ सन् 1944 से ही प्रगतिशीलता एवं नव्यान्वेषण की संधि पर वैचारिक कविताओं के रूप में यदि एक ओर 'नई कविता' के आरंभ के पूर्व 'विश्वमित्र' (मासिक) से 'प्रतीक' (द्वैमासिक) में तो दूसरी ओर गीत-रूप में 'नवगीत' की घोषणा के पूर्व 'हिमालय' (मासिक) से 'नया पथ' तक में लगातार प्रकाशित होती रहीं। इसी बीच 'निराला' एवं 'पंत' के ठोस अभिमतों से अभिषिक्त उनकी पहली काव्यकृति 'भूमिका' (1950) का प्रकाशन 'भारती भंडार' इलाहाबाद से हुआ। 'नई कविता' (स. जगदीश गुप्त) संकलन के प्रथम अंक में 'मुक्ति-क्षण' के बाद 'निकष' के संयुक्तांक-3/4 (सं. धर्मवीर भारती) में राजेंद्र प्रसाद सिंह की एक बहुचर्चित रचना प्रकाशित हुई - 'आदमी धुएँ के हैं' - जिसके संबंध में आलोचकों में मतभेद रहे -

"तांबे का आसमान / टिन के सितारे,
गैसीला अंधकार / उड़ते हैं कसकुट के पंछी बेचारे।
लोहे की धरती पर / चाँदी की धारा,
पीतल का सूरज है / रांगे का भोला-सा चाँद बड़ा प्यारा।
सोने के सपनों की नौका है / गंधक का झोंका है,
आदमी धुएँ के हैं / छाया ने रोका है,
हीरे की चाहत ने / कभी-कभी टोका है,
शीशे ने समझा कि रेडियम का मौका है,
धूल अनकल्चर्ड है / इसीलिए बकती है,
'जिंदगी नहीं है यह / धोखा है, धोखा है।"        (उजली कसौटी, पृ.11)

इस कविता का राजेंद्र जी द्वारा मूल हिंदी से अंग्रेजी में अनूदित पाठ भी द्रष्टव्य है, जो 'SO HERE I STAND' (A selection of anti-slogan poems translated from Hindi original by the poet) शीर्षक से पुस्तक के रूप में 'बीच ग्रोव बुक्स',कनाडा से प्रकाशित है -

MEN FORMED IN SMOKE
The sky carved in copper/The stars cut out of tin,
Gaseous darkness growing / Poor birds, cast in alloy, are flying.
Silver streams flow on steel surface/ The Sun is built of brass,
The Moon moulded in zinc/ Looks so innocent and lovely.
The boat of golden dreams is floating/The gusts of sufuric winds repel,
Men formed in smoke/By their own shadows restrained,
Are rudely awakened / By fitful reminders of interest in diamond.
While glass seizes a chance/ To pass for radium,
The dust, uncultured, prattles:
Deception . . . Deception . . . Deception …
             (So Here I Stand, p.16)

'निकष' के संयुक्तांक में 'आदमी धुएँ के हैं' कविता प्रकाशित होने पर संपादक डॉ. धर्मवीर भारती ने इस कविता से पत्रिका का एक विशिष्ट खंड ही शुरु किया था - 'यंत्र-युग और मूल्यों का विघटन'। इस कविता के प्रतिपाद्य का संकेत मिल चुका था; फिर भी लक्ष्मीकांत वर्मा ने 'लहर' में यदि इसे 'निरर्थक और टूटे हुए बिंबों का ढेर' घोषित किया तो कैलाश वाजपेयी ने उत्प्रेक्षा का चमत्कार - "नवीनता के नाम पर इस युग के कवि विचित्र उत्प्रेक्षाएँ करते हैं, उन्हें आसमान तांबे का और सितारे टिन के बने दिखाई देते हैं।" (आधुनिक हिंदी कविता में शिल्प, पृ. 308) इस अप्रत्याशित फतवे के बाद मुद्राराक्षस ने इसका समुचित मूल्यांकन करते हुए लिखा - "कहना न होगा कि डिस्टोर्शन या बेतरतीबी की प्रकृति भी प्रयोग की ही एक संभावना है। नया कवि जब भाषा में कुछ सर्वथा नया कहना चाहता है या अर्थ को कोई नया आयाम देना चाहता है तो वह कृति के तत्वों को बेतरतीब करता है। यह बेतरतीबी कविता के तत्वों को सामान्य से कुछ विशेष बना देती है। इस रचना की बेतरतीबी या डिस्टोर्शन को मैं प्रतीक या 'बिंबदेशीय' की संज्ञा देना चाहूँगा। टिन के सितारे फिल्मों के सेट पर प्रायः देखे जा सकते हैं। फिल्मी सेट असली दिखने के लिए तैयार किए गए नकली जीवन-चित्र होते हैं। इन सेटों पर फूल-पत्तियों, पक्षियों के ही नहीं, आदमियों के भी डमी इस्तेमाल किए जाते हैं। पक्षी को अगर जिंदगी की उड़ान का प्रतीक मानें और फिर उसी पक्षी को कसकुट का देखें, तो सिर्फ एक अर्थ प्रतिपाद्य लगता है - जिंदगी की संभावनाएँ, ऊँची उड़ानें मात्र डमी रह गई हैं। स्वाभाविकता या वास्तविकता से विच्छिन्न होने का यह उदाहरण सिद्ध करता है कि सामान्य प्रतीक एक विशिष्ट जीवन का संकेत देना चाहते हैं - जीवन जो झूठा है, बनावटी है, दिखावटी है। शाब्दिक अर्थ की अपेक्षा यह लय-विच्छिन्नता, संभावनाओं से विच्छिन्न जिस जीवन को संकेतित कर रही है, वही रचना का मुख्य प्रतिपाद्य है।" वस्तुतः यह रचना अमानवीकरण के संदर्भ में है, जिसे आगे चलकर साठोत्तर काव्यांदोलनों ने अपना कथ्य बनाया।

इसी प्रकार राजेंद्र प्रसाद सिंह के कविता संग्रह 'उजली कसौटी' (1969,नेशनल पब्लिशिंग हाउस,दिल्ली) की 'सच बोलना!' कविता भी उल्लेखनीय है, जिसमें कवि ने अमूर्तन से काम लेते हुए अपने समय-समाज के कड़वे यथार्थ को अभिव्यक्त किया है :

'ओ चंदन-वन के मलयानिल !
सच बोलना,-
सोए थे
नाग सभी,
सहसा तुम
चले तभी,
वरना क्या
शाखों के साथ अभी
तुम्हें भी पड़ता
किरणों में विष घोलना ?
- सच-सच बोलना !        ('उजली कसौटी',पृ.25)

राजेंद्र प्रसाद सिंह 'नई कविता' एवं 'निकष' के प्रकाशन काल तक हिंदी जगत में एक अग्रगामी कवि एवं गीतकार के रूप में पूर्णतः प्रतिष्ठित हो चुके थे। किंतु, आगे चलकर उन पत्रिकाओं एवं संकलनों में उनकी किसी रचना को सम्मिलित करने से परहेज किया गया। कारण यह है कि साहित्यिक विवेक में नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, मुक्तिबोध एवं शील जैसे जुझारू कवि-लेखकों को अपना अग्रगामी मानने वाला यह कवि राष्ट्रीयता, प्रगतिशीलता के वाद-निकायों से टूटकर तथा यथार्थवाद की आलोचनात्मक एवं समाजवादी सरणियों से छूटकर 'परिमल-प्रकोष्ठ' का सदस्य बनने को तैयार नहीं था।

इसके बाद राजेंद्र प्रसाद सिंह ने अपनी रचनाशीलता के दो बिंदु चुने - लोकाश्रित गीत का नवोत्थान और वर्गाश्रित रचना-प्रक्रिया का स्थिरीकरण। सन् 1958 में उनके द्वारा 'गीतांगिनी' का संपादन-प्रकाशन इसी की एक परिणति थी जिसमें उन्होंने 'निराला' से 'जगदीश सलिल' तक पाँच पीढ़ियों के नब्बे गीतकारों के ताजा गीतों को संकलित कर संपादकीय आलेख में लोकाश्रयी गीतों का नामकरण 'नवगीत' किया। 'गीतांगिनी' (1958) के प्रकाशनोपरांत भी राजेंद्र प्रसाद सिंह हमेशा नवगीत के स्वीकृति-संघर्ष, विवादों में उसकी पक्षधर आलोचना और समायोजन-सक्रियता में अग्रगामी भूमिका निभाते रहे। इस बीच नवगीत के रचना-निक्षेप की संभावित नवीनताएँ और सोद्देश्य सार्थकता उरेहते उनके तीन स्वतंत्र नवगीत-संग्रह भी छपे। इतना ही नहीं, जब जनपक्षधर वैचारिक कविता के पुनरोदय के साथ नवगीत को जनबोध से लैस और कारगर परिणति की ओर अग्रसर होते हुए देखा-पहचाना और उसे 'जनबोधी नवगीत' के रूप में उद्घोषित किया और 'इंडियन पीपुल्स फ्रंट' के स्थापना सम्मेलन (1982, दिल्ली) में अपने जनबोधी-जनवादी नवगीतों का एक संग्रह - 'गजर आधी रात का' स्वयं प्रकाशित कर वितरित किया तब फ्रंट के घटक संगठनों में क्रांतिधर्मी संस्कृतिकर्मियों के बीच जनबोधी-नवगीतों का भी प्रस्तुत्य-श्रव्य सामग्री की शैली में सामूहिक उपयोग होने लगा।

वस्तुतः 'जनबोधी नवगीत' नवें दशक के आरंभिक वर्षों में ही नवगीत की लोकाश्रित प्राणवत्ता की सक्रिय-सोद्देश्य परिणति की हैसियत से कार्य-क्रमबद्ध नई भूमिका पा चुका था और तभी से प्रगतिशील लेखकसंघ, जनवादी लेखकसंघ, जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, आई. पी.एफ, जनसंस्कृति मंच, लोकसंस्कृति मंच, नवजनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, 'रिव्योलूशनरी राइटर्स एसोसिएशन', 'निशांत', 'दस्ता', 'आवाहन', 'सिलसिला' आदि संगठनों के कार्यक्रमों में ऐसे जनबोधी नवगीत न केवल संस्कृतिकर्मियों द्वारा गाए जा रहे हैं अपितु विभिन्न संगठन-पुस्तिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं।

नवें दशक में राजेंद्र प्रसाद सिंह की जनबोधी नवगीतकृति : ' गजर आधी रात का '

'आइना' - 6 (नव वर्षांक 1975) में प्रकाशित अपने एक आलेख 'नवगीत : बहैसियत जनबोधी नवगीत' में राजेंद्र प्रसाद सिंह ने दो बातों को स्पष्टतः स्वीकार किया था। इनमें एक बात नवगीत के बदलते हुए तेवर के पक्ष में, सैद्धांतिक महत्व की थी... "निर्वैयक्तिकता गीत-रचना के प्रतिकूल तथा वैयक्तिकता उसे अनुकूल हो, ऐसा नहीं है, दोनों की संधि 'आत्मीयता' ही अनुभूति-प्रवण गीत रचना के लिए अनिवार्य है।" दूसरी बात वहाँ नवगीत के बदलते हुए तेवर को पहचान घोषित करने के क्रम में कही गई थी... "जनसंघर्ष की अनिवार्य परिस्थितियाँ और राजनैतिक रणनीति, यदि समकालीन वैचारिक कविता के द्वारा संप्रेष्य है, तो तबकों में बँटे आम आदमी की और सर्वहारा की वैयक्तिक-पारिवारिक और पारिवेशिक-सामाजिक मनस्थितियाँ, जो दिनचर्या के एक टुकड़े को दूसरे टुकड़े से जोड़ती हैं और अलग करती हैं... नए मोड़ पर खड़े जनबोधी नवगीत के द्वारा प्रेषणीय हैं। ऐसे नवगीतों में वक्तव्य भी भोक्तव्य के ही अंशों की हैसियत से आते हैं। समग्रतः नवगीत का स्वभाव जनबोधी हो रहा है और वह उपलब्धियों की नई यात्रा शुरू कर चुका है।" अपने इस आलेख के द्वारा राजेंद्र प्रसाद सिंह ने 'जनबोधी नवगीत' या जनगीत का घोषणा पत्र प्रस्तुत करते हुए जिस आरंभ की सूचना दी थी, वह नवें दशक तक आते-आते पूरी तरह परिपक्व हो गया। नवें दशक के आरंभिक वर्षों में ही वह, नवगीत की लोकाश्रित प्राणवत्ता की सक्रिय सोद्देश्य परिणति की हैसियत से कार्यक्रमबद्ध नई भूमिका पाकर, विभिन्न क्रांतिकारी जनसंगठनों के कार्यक्रमों में प्रस्तुत्य-श्रव्य सामग्री की शैली में संस्कृतिकर्मियों द्वारा प्रयुक्त होने लगा।

'गजर आधी रात का' की भूमिका लिखते हुए राजेंद्र प्रसाद सिंह ने घोषणा की - "आज के जनबोधी नवगीत में जन-जीवनगत मनःस्थितियों के मूर्तन की दिशा में जनसांस्कृतिक मानवीयता, पेशों से प्रभावित श्रमजीवी स्वभाव, जीवन-स्तर से बँधी रुचि-धारणा, विकास करती पर्व-चेतना और सबसे बढ़कर, आचारित यथार्थ के आधार पर, संस्कार और संघर्षशक्ति की सक्रिय द्वंद्वात्मकता से फलीभूत जनविरोधी शब्द-जाल और भ्रमों से मुक्त जनबोधी नवगीत, जनसांस्कृतिक क्रांति के लिए सही मानसिकता का निर्माण करने की ओर अभियान में है।" जाहिर है कि राजेंद्र प्रसाद सिंह केवल राजनैतिक क्रांति की जगह पूरी सांस्कृतिक क्रांति की अवधारणा को स्वीकार करते हुए इस संदर्भ में जनबोधी नवगीत की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि इसके द्वारा ही आम जनता की मानसिकता में वह परिवर्तन घटित किया जा सकता है जिससे वह क्रांतिकारी संगठनों द्वारा समाजार्थिक परिवर्तन के लिए की जा रही पहल को उचित प्रतिक्रिया देने में सक्षम हो सके। वस्तुतः जब तक खेत-मजूर और निम्न मध्यवर्ग की पूरी मानसिकता सक्रिय तौर पर राजनीतिकरण के द्वारा प्रशिक्षित, संगठित और विचारधारात्मक दृष्टि से 'जनवादी' नहीं होती, तब तक 'वाद' नहीं, 'बोध' के स्तर पर ही उनकी मानसिकता से गीत जुड़ा रहेगा। ऐसा इसलिए कि राजेंद्र प्रसाद सिंह के अनुसार गीत ही वह विधा है जो कवि और जन की मानसिकता के भाव-लय के आधार पर खड़ी होती है; विचारधारात्मक उत्साह मात्र के आधार पर नहीं। आम जनता की मानसिकता को नारों भरी कवायद के-से गीतों द्वारा नहीं बदला जा सकता, उसे तो व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवहार के गीत ही बदल सकते हैं। यह कहना अनुचित न होगा कि ऐसे गीत 'वाद' की जड़सूत्रात्मक, नारों-भरी कवायद से नहीं, 'वाद' की भी 'बोधपरक मनोवस्था' से जुड़े होते हैं।"

गीत-नवगीत के क्षेत्र में इस प्रकार की सार्थक पहलकदमी को राजेंद्र प्रसाद सिंह द्वारा रचित जन-संस्कार-गीतों में कथ्य एवं शिल्प, दोनों ही स्तरों पर संपूर्णता के साथ लक्षित किया जा सकता है। वस्तुतः इन गीतों को आस्वादित करके ही यह समझ पाना संभव है कि किसी मजूर के घर में गाया जाने वाला बच्चे के जन्म का 'सोहर', उसके पूरे बदलाव की आस्था से परिपूर्ण 'बधावा', 'मुंडन-गीत', जवानी में गाया जाने वाला 'कीर्तन', उसके विवाह के अवसर पर मजूर-वधुओं द्वारा गाई जाने वाली 'परिछन' आदि रचनाएँ किस सीमा तक कवि की जनसांस्कृतिक संबद्धता को अभिव्यक्त करती हैं। उदाहरण के लिए बिहार के देहातों में प्रचलित 'परिछन' की लोकधुन पर आधारित जनबोधी नवगीत का एक अंश द्रष्टव्य है -

"घुटनों के नीचे है धोती गुलाबी,
माथे अँगोछा सजीला;
कुर्ता पुराना है लेकिन केसरिया
जूता रबड़ का रंगीला।
x x x x x x
बजा दिया तूने नगाड़ा रे दुल्हा,
खूब ढोल पीटे नगरिया।"

ग्रामीण मजूर-जीवन की संवेदना को संपूर्ण स्वाभाविकता में वही कवि सफलतापूर्वक अभिव्यक्ति दे सकता है जो उसे नगरीय-महानगरीय दूरबीन से नहीं देखता हो, बल्कि गाँव में उनके बीच रहकर नंगी-खुली आँखों से सहृदयता के साथ देख और परख सका हो। इस रचना का जनबोधी तेवर तब और अधिक स्पष्ट हो जाता है जब भूस्वामियों के विरुद्ध बँटाईदारी की तैयार फसल को संगठित रूप से काटने-लूटने वाली जमात को इकट्ठा करने के लिए नगाड़ा बजा देनेवाले, इस खेत-मजूरों के अगुआ 'दुलहा' को डराने-धमकाने वाले सामंतों के लिए बददुआ करती हुईं मजूर-स्त्रियाँ गाती हैं -

"घूरें जो पीछे से मालिक-महाजन,
ढह जाए उनकी अटारी। (पृ.सं. 49)

'गजर आधी रात का' के फ्लैप पर छपा है - 'निरंकुशता-विरोधी राष्ट्रीय सम्मेलन के अवसर पर प्रकाशित'। जो लोग इसकी प्रासंगिकता से वाकिफ नहीं थे उन्हें अचानक प्रकट हुए इस 'बैनर' से बड़ा आश्चर्य हुआ और वे समझ नहीं पाए कि यह घटित भी हुआ हो तो नवगीत-प्रवर्तक कवि का इससे क्या संबध? दरअस्ल राजेंद्र प्रसाद सिंह ने कभी अपने गौरवशाली जीवन-तथ्य का मुआवजा लेने के लिए स्वयं को स्वाधीनता सेनानी के रूप में प्रचारित करने का कोई हाहाकारी प्रयास नहीं किया। कवि एवं उनके क्षेत्र के प्रमुख नागरिकों से कवि की सामाजिक-राजनैतिक सक्रियताओं के विषय में बातचीत करते हुए जो तथ्य सामने आए उसी प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण कड़ी है 'इंडियन पीपुल्स फ्रंट'(1982,दिल्ली) के स्थापना सम्मेलन में कवि की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी और उसी अवसर पर प्रकाशित अपनी चौथी नवगीत-कृति 'गजर आधी रात का' - का निःशुल्क वितरण।

'गजर आधी रात का' की रचनाओं को सीधे 'जनबोधी नवगीत' मानते हुए 'जनबोध' शीर्षक से रचनाकार ने भूमिका में निष्कर्ष दिया है- "आज के जनबोधी नवगीत में, जन-जीवनगत मनःस्थितियों के मूर्तन की दिशा में जन सांस्कृतिक मानवीयता, पेशों से प्रभावित श्रमजीवी स्वभाव, जीवनस्तर से बंधी रुचि-धारणा, विकास करती पर्व-चेतना और सबसे बढ़कर, आचरित यथार्थ के आधार पर, संस्कार और संघर्षशक्ति की सक्रिय द्वंद्वात्मकता से फलीभूत जन-जिजीविषा के विभिन्न प्रारूपों की अभिव्यक्ति हो रही है। आज मतवादों के अंतर्विरोधी शब्द-जाल और भ्रमों से मुक्त जनबोधी नवगीत, जनसांस्कृतिक क्रांति के लिए सही मानसिकता का निर्माण करने की ओर अभियान में है।" - इसी मानसिकता के निर्माण हेतु कवि पहले हालात की दोतरफा मगर दो-टूक हकीकत का जायजा लेता हुआ - 'धोबियाही' की लोक धुन में रचित 'न यह समझो' शीर्षक रचना में लिखता है -

जिधर 'लछमी जी सदा सहाय'
उधर आँखें हैं सोने की
गड्डियों में कीमत चुकती
खिलखिलाने या रोने की
न अहसासों का कोई मोल
न कुछ मजबूरी की परवाह
न ऐसी नन्ही-नन्ही खुशी
न ऐसी उम्र खींचती आह।
× × ×
इधर है पड़ी गरीबी गले
जिधर सीने हैं फौलादी,
पसीना बिकता अपना रोज,
गैर की होती आबादी !
न अरमानों के खिलते फूल
न उम्मीदों की बढ़ती बेल,
गरीबी फाँक रही जो रेत,
अमीरी उसे बनाती तेल।

राजेंद्र प्रसाद सिंह के जन-संस्कार-गीतों को ग्रहण कर एवं आस्वादित कर ही यह समझा जा सकता है कि मजदूर के घर बच्चे के जन्म का 'सोहर' उसके पूरे बदलाव की उम्मीदों से भरा 'बधावा', किशोरावस्था को असीसता 'मुंडन गीत', नौजवानी का 'कीर्तन' ('कूदे उछल कुदाल हँसिया बल खाए'), ब्याह का 'परिछन' आदि रचनाएँ किस हद तक रचनाकार के जन-जुड़ाव से ओतप्रोत मनःस्थितियों का सार्थक मूर्तन करती है। 'कीर्तन' की धुन में रचित एक जनगीत की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -

भैया, कूदे उछल कुदाल / हँसिया बल खाए !
भोर हुई, चिड़यन संग जागे / खैनी दाब, ढोर संग लागे,
आँगन लीप, मेहरिया ठनकी / दे न उधार बनियवाँ सनकी,
कारज-अरज जिमदार न माने / लठियल अमला बिरद बखाने।
X x x x
भैया, गुजरे दो-दो साल / कुर्ता सिलवाए ! (पृ.32)

इसी प्रकार 'खँजरी-गीत', 'बंटगवनी' 'करताली भजन' तथा 'समूहिक श्रम-गान' के सहारे जनता में सांगठनिक जुड़ाव एवं सक्रियता उत्पन्न करने का गहरा संबंध संस्कार और संघर्ष-शक्ति की सक्रिय द्वंद्वात्मकता से ही है, जो जिजीविषा के प्रारूपों को फलीभूत करता है। इन जनबोधी नवगीतों में व्याप्त जनचेतना का आधार, आचरित यथार्थ ही है, प्रचारित और तथाकथित या भ्रांतिमूलक यथार्थ नहीं। यह आचरित यथार्थ सामूहिक जीवन-स्थिति में बार-बार आते विचार-बोध में खुलता है और जनांदोलनों से जीवन-दृष्टि के जुड़ाव में प्रमाणित होता है।

'गजर आधी रात का' में निरंकुशता-विरोधी स्वतःस्फूर्त जनांदोलन का दमन, आपातकाल, आम चुनाव, सत्ता परिवर्तन आदि का लेखा-जोखा आदि के क्रमिक प्रभावों पर टिकी प्रारंभ की पाँच रचनाएँ तथा बिहार-आंदोलन (1974-77, जिसे बाद में नागार्जुन ने 'खिचड़ी विप्लव' कहा) की स्मृति से जुड़े नवगीत महत्वपूर्ण हैं। इनमें जन-पक्ष का सर्वाधिक कलात्मक जनबोधी नवगीत है -

"अभी-अभी विहँसे थे फूल" -
अब तो दिखा जंगल, नर्मदा उधर धुनती
ढेर-ढेर चाँदी की रुई,
शब्द संगमरमर को मोम-सा तराशें, अब
मर्म-दान की बेला हुई।
यहीं कहीं उतरेंगे, श्रम-कण पर बिखरेंगे
इंद्रधनुष के अनछू रंग,
कूल फिर उगा लेंगे फूल
रंग बदलती शाखों में।

अतः स्पष्ट है कि जिस प्रकार "नई कविता के साठोत्तर विघटन और वामपंथी कविता के पुनःसंगठन के साथ सुपरिगणित आज की जनवादी कविता में जनजीवन की परिस्थितियाँ अंकित करने की दिशा में वर्गसंघर्ष, वर्गहितों की पड़ताल, चरित्रालोचन, व्यवस्था का पर्दाफाश और व्यापक तौर पर समाजवादी - यथार्थवादी दृष्टि से जनसंघर्ष की वास्तविक अवस्थाओं और प्रक्रियाओं से जुड़ी संरचनाएँ प्रस्तुत हो रही है;" - उसी प्रकार 'गजर आधी रात का' के जनबोधी नवगीतों में युग के तेजाबी यथार्थ को संवेदना की कोमल अँजुरी में सह सकने का अदम्य साहस आद्योपांत परिलक्षित होता है।

सरकारी आँकड़े बताते हैं कि सन 2012 में भारत सरकार द्वारा आयोजित एक सामान्य रात्रिभोज में प्रति अतिथि लगभग 7700 रुपए का खर्च आया था, जबकि वर्तमान नियम के तहत जिन लोगों की रोजाना आमदनी 28 रुपए से ऊपर है वे गरीबी रेखा के अंतर्गत नहीं आते। इस तथ्य के मद्देनजर राजेंद्र प्रसाद सिंह रचित एक जनगीत उल्लेखनीय है,जिसमें उद्बोधनात्मक शैली में मौजूदा समाजार्थिक विसंगति और विडंबना को उभारा गया है :

कस्बा-कस्बा गाता चल ओ साथी / टोले-गाँव जगाता चल ओ साथी
रात रहे जो भूखेsss उनकी रोटी / कैसे छिनी बताता चल ओ साथी
सत्तू औ' गुड़ जिनको नहीं कलेवा/ लंच-डिनर समझाता चल ओ साथी।

राजेंद्र प्रसाद सिंह वस्तुतः न केवल नवगीत के नामकर्ता, तत्वनिरूपक एवं प्रथम ऐतिहासिक प्रस्तावना-कृति 'गीतांगिनी' के संपादक हैं; अपितु नवगीत के स्वीकृति-संघर्ष के सारथी एवं तत्पर व्याख्याता की भी हैसियत उन्हीं की है। साथ ही वे नवगीत के अग्रगामी रचयिताओं में भी अद्वितीय, गत्वर एवं प्रासंगिक रहे हैं।

सन् 1958 में 'गीतांगिनी' के संपादन-प्रकाशन एवं चार स्वतंत्र नवगीत-कृतियों के अतिरिक्त राजेंद्र प्रसाद सिंह की जो काव्य कृतियाँ चर्चित-समीक्षित होती रही हैं उनमें 'भूमिका' (1950), 'मादिनी' (1955), 'दिग्वधू' (1956), 'संजीवन कहाँ'(1965), 'उजली कसौटी'(1969), 'डायरी के जन्मदिन'(1973), 'शब्दयात्रा (1984) और 'प्रस्थानबिंदु'(1985),आदि उल्लेखनीय हैं। 'गीतांगिनी' के प्रकाशन वर्ष (1958) में ही 'स्ट्रीम ऑफ कांशसनेस' की शैली में राजेंद्र प्रसाद सिंह का 'अमावस और जुगनू' नामक बहस-तलब मनोवैज्ञानिक उपन्यास प्रकाशित हुआ। इस सबके अलावा कवि की हिंदी कविताओं का ही अँग्रेजी में स्वानूदित एक संग्रह 'सो हीयर आइ स्टैंड' (बीचग्रोव 1973) कनाडा से प्रकाशित हुआ जिसकी एक रचना 'मैन : ए डिफिनिशन' लंदन से प्रकाशित अँग्रेजी-भाषी समाज की कविताओं की एक एन्थोलोजी 'मेनी पीपुल्स मेनी वॉयसेज' (1974, हचिन्सन) में संकलित की गई

राजेंद्र प्रसाद सिंह की किशोरावस्था में ही उनकी रचनात्मकता ऊर्जा से प्रभावित होकर राष्ट्रकवि 'दिनकर' ने लिखा था "वह एक निर्मित होता हुआ महान कवि है, वह आलोचक भी है और चिंतक भी मामूली दर्जे का नहीं।" दिनकर की उक्त उद्घोषणा की चरितार्थता राजेंद्र जी की जिन दो कृतियों में सहज रूप में दृष्टिगत है, वे हैं 'जनवादी लेखन और रचनास्थिति', 'साहित्य की पारिस्थिकी' एवं 'भारतीय संगीत का समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य'। (वाणी प्रकाशन,दिल्ली)। इसके साथ ही कवि द्वारा एक लंबे अरसे तक संपादित प्रकाशित साहित्यिक मासिक पत्रिका 'आईना' के विभिन्न अंकों व विशेषांकों के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में अनेक विषयों पर प्रकाशित उनके निबंधों का भी विशेष महत्व है।


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हिंदी समय में रवि रंजन की रचनाएँ