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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


आज 15 अगस्त था। कल से ही पूरे शहर में इसकी तैयारी शुरू हो गई थी। औरतें और बच्चे छोटे-छोटे तिरंगा झंडे बेच रहे थे। सुबह उठ कर टहलने के लिए बाहर निकली, तो देखा, अपने गेस्ट हाउस पर भी एक बड़ा-सा तिरंगा लहरा रहा है। चारों ओर छुट्टी का माहौल था। लड़के सड़क पर क्रिकेट खेल रहे थे। छात्र-छात्राएँ अपने-अपने स्कूल के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जल्दी-जल्दी भागे जा रहे थे, मानो वे समय पर न पहुँचे तो देश एक बार फिर गुलाम हो जाएगा। एक बेंच पर दो बूढ़े बहस कर रहे थे। एक का कहना था, आजादी के बाद जो हालात हैं, उनसे तो अंग्रेजों का जमाना ही अच्छा था। दूसरे का जवाब था - शायद तुम्हें वह दृश्य याद नहीं जब इसी नैनीताल में कोई गोरा घोड़े पर निकलता था, तो पूरी सड़क सुनसान हो जाती थी - उसे रास्ता देने के लिए। उनकी इतनी ही बात मुझे सुनाई पड़ी। मन किया, इनसे कहूँ कि आज भी पीएम, सीएम की गाड़ी जिस सड़क पर आती है, उसे पुलिस पहले से ही खाली करा लेती है। पर मुझे दखल देना ठीक नहीं लगा। सो चुपचाप चलती रही। लौटती में दो कुत्ते आपस में झगड़ रहे थे। उनमें से एक शायद दूसरे मुहल्ले का था, क्योंकि वह आगे जाने की कोशिश कर रहा था और दूसरा उसे रोकने की।

जैसे ही कमरे में पहुँची, इंटरकॉम के घनघनाने की आवाज सुनी। सुमित ही था। बिंदास उलाहने में बोला, 'देश आजाद हो रहा है और तुम अपनी गुलामियों में जकड़ी हुई हो। आओ, साथ-साथ चाय पीते हैं।'

मैंने ठसके से कहा, 'जनाब, देश आजाद हुआ है, मैं नहीं।'

'तुम कब आजाद होओगी?' प्रश्न में गंभीरता नहीं थी।

'जिस दिन या तो स्त्री नहीं रहूँगी या सारे पुरुषों की नजर बदल जाएगी।' खिलखिलाते हुए कहा मैंने।

कमाल है! कैसा जमाना आ गया है कि स्त्री के लिए स्त्री रह पाना मुश्किल हो रहा है।

क्योंकि लोग स्त्री को स्त्री रहने देना नहीं चाहते। वे उसे मिठाई मान कर चलते हैं और मक्खियों की तरह उसके आसपास भिनभिनाते रहते हैं।

जब भगवान ने स्त्री को इतना आकर्षक बनाया है, तो बेचारे पुरुष क्या करें ? क्या वे अपनी आँखें फुड़वा लें?

पुरुष स्त्री को कलाकृति की तरह देखें और उसकी सराहना करें। उसे अपनी भूखी आँखों से खा जाने की लोलुपता न दिखाएँ। इसी में स्त्री की स्वतंत्रता है।

तब तो तुम स्वतंत्र हो चुकी। पता है, कभी-कभी मैं भी तुम्हें वैसे ही देखता हूँ जैसे कोई आम पुरुष किसी आम स्त्री को देखता है।

आपकी बात और है। आपके लिए मैं कुछ भी बनने को तैयार हूँ

हे ईश्वर, मेरा क्या होगा!

आपका जो भी होगा , होगा ; मेरा तो भला ही होगा।

अच्छा, नीचे तो आओ। तेरा-मेरा का मामला यहीं सुलझाते हैं।

आती हूँ। बस, दस मिनट लगेंगे।

मैंने जल्दी-जल्दी में अपने को तैयार किया। सुमित के पास गई, तो वह आँखें बंद कर गा रहा था, सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा। रहने को घर नहीं है, सारा जहाँ हमारा।

मैंने तुक मिलाने की कोशिश की, टूटी हुई सड़कें हैं, गड्ढों की कतारें हैं, फिर भी रवाँ-दवाँ है यह कारवाँ हमारा।

सुमित ने आँखें बंद किए ही मेरा स्वागत किया। अब वह गा रहा था, इक़बाल कोई महरम अपना नहीं जहाँ में, मालूम क्या किसी को दर्दे-निहाँ हमारा।

मैंने कोमलता से पूछा, 'लगता है, आज आप कुछ उदास हैं। कल तो आप हमेशा की तरह खुश नजर आ रहे थे। इस बीच ऐसा क्या हो गया?'

मेरे दिमाग की छत पर पंद्रह अगस्त नाम का कबूतर आ बैठा है। कितनी भी कोशिश करूँ, वह हटता ही नहीं है।

ऐसी क्या बात है ? आज तो खुशी मनाने का दिन है।

होगा। इस दिन मैं तो उदास हो जाता हूँ। हमने आजाद होने के लिए कितना जबरदस्त संघर्ष किया और आजादी मिलते ही उसका क्या कर डाला।

यही तो आजादी की विडंबना है। जो अपनी आजादी का इस्तेमाल नहीं करते, उनके लिए आजादी का कोई मतलब नहीं रह जाता।

लेकिन आम जनता अपनी आजादी का इस्तेमाल करे तो कैसे करे ? वह सिर्फ वोट दे सकती है। वह अपने नेताओं का निर्माण नहीं कर सकती। उसके सामने विकल्प हमेशा प्रोफेशनल राजनेताओं के बीच चुनाव करने का होता है। मैं बहुत सोच-विचार के बाद इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि प्रोफेशनल राजनेता कभी भी लोकतंत्र का सच्चा संचालन नहीं कर सकते। वे अपने को जनता के मित्र के रूप में पेश करते हैं, पर वास्तव में जनता के शत्रु होते हैं। वे ही देश का कबाड़ा करते हैं। कभी-कभी मन करता है, उन सब को गोली मार दी जाए। लेकिन यह कोई समाधान नहीं है। इसके बाद प्रोफेशनल राजनेताओं की नई पीढ़ी आ जाएगी। हमारे पास इतनी गोलियाँ नहीं हैं कि सब सभी का सफाया करते चलें।

सवाल यह भी तो हैं कि फिर देश कौन चलाएगा ? जैसे हमें पुलिस चाहिए, सरकारी कर्मचारी चाहिए, अदालतें चाहिए, वैसे ही राजनेता भी चाहिए, जो सरकार चला सकें।

यही तो समस्या है। देश होगा, तो सरकार होगी, फौज होगी, अफसर होंगे, पुलिस होगी, हर विभाग के इंस्पेक्टर होंगे, अदालते होंगी, वकील होंगे और इन बड़े-बड़े बाघों के सामने जनता की हैसियत बकरी की तरह हो जाएगी। बकरियाँ लाख में-में करती रहें, बाघ अपनी राह पर चलते जाएँगे। उन्हें अहिंसक बनाने का कोई तरीका नहीं है।

तो रास्ता क्या है ? क्या देश को तोड़ दिया जाए ?

मेरा खयाल तो यही है। देश एक कृत्रिम इकाई है। जनता को इसकी जरूरत नहीं है। किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों, दुकानदारों, लेखकों, कलाकारों, समाज सेवियों, मनोरंजन करने वालों - किसी को भी देश की जरूरत नहीं है। देश की जरूरत पूँजीपतियों और तानाशाहों को है। एक आर्थिक रूप से हमारा शोषण करता है, सस्ती चीजों को महँगे दामों पर बेचता है और दूसरा हमारे पैसे पर पलता है और हमीं पर रुआब झाड़ता है। दोनों अपना उल्लू साधते हैं। देश और राज्य रहेंगे, तो बड़े पैमाने पर शासकों और प्रशासकों की आवश्यकता होगी। यह सारा वर्ग परजीवी वर्ग है। खुद कुछ उत्पादन नहीं करता, पर उत्पादन के एक बड़े हिस्से को चट कर जाता है। किसी जिला कलक्टर पर रोज जितना खर्च होता है, उससे कम से कम सौ परिवारों का निर्वाह हो सकता है। प्रधानमंत्री पर जितना रोज खर्च होता है, उससे कम से कम एक लाख परिवारों का निर्वाह हो सकता है।

तो आपके अनुसार देश वही अच्छा है जिसमें कोई परजीवी वर्ग न हो।

बिलकुल। और आधुनिक राज्यों के रहते हुए परजीवी वर्ग से छुटकारा नहीं है। वह हमारी पीठ पर बैठा रहेगा और हम उसके लिए चारा जुटाते रहेंगे।

लेकिन सर, देश और राष्ट्र तो शुरू से ही रहे हैं। पूरी दुनिया को उनकी आदत हो गई है।

जैसे स्त्री को पति के अधीन रहने की आदत पड़ी हुई है, क्यों ?

माफ कीजिए, अब आप मेरी निगाह में मुलजिम हैं। जनता की अदालत में आप पर स्त्री जाति की ओर से आरोप लगाया जाता है कि आप बात-बात में स्त्रियों का मजाक उड़ते हैं।

अगर यह आरोप है, तो सर-माथे। पर मेरी सफाई तो सुन लीजिए। मैंने स्त्री जाति की निन्दा नहीं की है, सिर्फ उन हालात का जिक्र किया है जिन्होंने अधिकतर स्त्रियों को मनुष्य से कुछ कम बना दिया है। इस प्रतीक का इस्तेमाल करते हुए मेरा कहना यह है कि राष्ट्रीय व्यवस्थाओं ने भी अपने नागरिकों को मनुष्य से कुछ कम बना कर रखा है।

आपत्ति खारिज की जाती है। अब आप आगे बढ़ सकते हैं।

तो मैं कह रहा था कि वास्तव में जनता को देश की जरूरत नहीं है, देश को जनता की जरूरत है।

लेकिन इसी जनता ने तो देश की स्थापना की थी।

झूठ, सरासर झूठ। पूरे इतिहास में जनता से पूछ कर कुछ भी नहीं किया गया। कुछ लोगों की मान्यता है कि जनता ही इतिहास का निर्माण करती है। तथ्य इसकी गवाही नहीं देते। जनता इतिहास का निर्माण नहीं करती, वह तो इतिहास का बोझ उठाती है।

क्या कह रहे हैं आप ?

कहा गया है कि सत्य कहानी से भी ज्यादा हैरतअंगेज होता है। देश, सरकार, संविधान, कानून वगैरह का मामला कुछ ऐसा ही है।

आपके कहने का आशय यह है कि ये सब कृत्रिम चीजें हैं ?

बिलकुल नहीं। मेरे कहने का आशय यह नहीं है। कृत्रिम चीजें ज्यादा दिनों तक नहीं चलतीं। वे अपने ही बोझ से भरभरा कर गिर जाती हैं। राज्य एक ठोस इकाई है। जब से राज्य बने हैं, वे कायम हैं। उनका स्वरूप जरूर बदलता गया है। राज्य आपस में जुड़े हैं, तो एक-दूसरे से अलग भी हुए हैं। पर किसी न किसी रूप में वे बने हुए हैं। निकट भविष्य में राज्य के खत्म होने के आसार दिखाई नहीं पड़ते।

क्यों ? कैसे ?

इसलिए कि राज्य प्रमुख रूप से जिन वर्गों की सेवा करता है. वे न केवल बने हुए हैं, बल्कि और मजबूत हो रहे हैं। उनके पास इतनी ज्यादा ताकत है कि वे राज्य को बिखरने नहीं देंगे। चूँकि जनता भी राज्य की अभ्यस्त हो चुकी है, इसलिए वह हमेशा बेहतर राज्य की कामना करती है। यह बात उसके दिमाग में आती ही नहीं कि शैतान भले ही बाइबिल के उद्धरण देता रहे, पर वह बाइबिल को अपने आचरण में कभी नहीं उतार सकता। राज्य भी ऊँची-ऊँची बातें करता है, पर वे अमल करने के लिए नहीं, जनता को मूर्ख बनाने के लिए होती हैं। इस मामले में उसका रवैया साधु-संतों की तरह होता है। वे श्रद्धालुओं को त्याग-तपस्या की सीख देते हैं, पर खुद सुख-सुविधाओं के ढूहों पर बैठे होते हैं।

फिर राज्य खत्म कैसे होगा ?

वह खत्म होगा वर्तमान आर्थिक व्यवस्था को बदलने से। हमें एक ऐसी दुनिया चाहिए जिसमें दो समाजों के बीच और प्रत्येक समाज के विभिन्न वर्गों के बीच लगभग समानता हो। यह मौजूदा सिस्टम में संभव नहीं है। इसमें तो दिन-प्रतिदिन लालच बढ़ता जाता है और ज्यादा से ज्यादा उत्पादन और उपभोग करने की प्रतियोगिता जारी रहती है। इससे विषमता बढ़ती जाती है। आज दुनिया में जितनी विषमता है, उतनी पहले कभी नहीं थी। सबसे बड़ी बात यह है कि धरती अपने ऊपर इतना अत्याचार नहीं सह सकती। वह बीमार हो गई है। इसका असर पर्यावरण पर पड़ रहा है। इसलिए हमें एक सादगी भरी अर्थव्यवस्था की खोज करनी ही होगी। इस नई व्यवस्था में बड़े-बड़े शहरों और महानगरों की जगह छोटे-छोटे गाँवनुमा शहर या गाँवनुमा शहर होंगे। आपस में प्रतियोगिता नहीं, समभाव और सहयोग होगा।

क्या यह पीछे लौटना नहीं होगा ? सुमित, इतना आगे आ कर क्या हम अब पीछे लौट सकते हैं ?

सुनंदा, यह पीछे लौटना नहीं है, सही जगह लौटना है। पूँजी और टेक्नोलॉजी के मद में हम कुछ क्या, बहुत ज्यादा आगे निकल आए हैं। जरा सोचो, आज यूरोप, अमेरिका, जापान आदि तथाकथित विकसित देश उपभोग की जिस शैली को अपनाए हुए हैं, क्या वह बाकी दुनिया के लिए सुलभ कराई जा सकती है? आज नहीं तो कल इसकी माँग उठेगी ही। तब क्या धरती का दिवाला नहीं निकल जाएगा? इस सर्वनाश के पहले क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम ऐसी जीवन शैली अपनाने की कोशिश करें, जो आगे भी मानव सभ्यता को टिकाए रख सके?

अच्छा, एक बात बताओ। जब देश, राष्ट्र आदि के बारे में तुम्हारे ये विचार हैं, तब तो तुम्हारे भीतर राष्ट्रीयता की भावना बिलकुल नहीं होगी। विश्व मानव होना तुम्हें ज्यादा आकर्षित करता होगा।

विश्व मानव का विचार आकर्षित करता है, बेहद आकर्षित करता है, पर अपनी राष्ट्रीयता की कीमत पर नहीं। जब तक राष्ट्र हैं, तब तक राष्ट्रीयता तो रहेगी ही। उसे रहना भी चाहिए। तुम इसे मेरा अंतर्विरोध मानो या पागलपन, मैं उग्र राष्ट्रवादी हूँ।

तब तो तुमसे विश्ववाद को खतरा है, नहीं ?

बिलकुल नहीं। मेरी राष्ट्रीयता विश्व के विरुद्ध नहीं, उसके भले के लिए है। राष्ट्रवाद भी दो तरह का होता है। एक राष्ट्रवाद दुनिया को लील जाना चाहता है,जैसे हिटलर का राष्ट्रवाद था। दूसरा राष्ट्रवाद अपने राष्ट्र के साथ-साथ दुनिया को भी एक बेहतर जगह बनाना चाहता है। मेरा राष्ट्रवाद इसी किस्म का है। मैं चाहता हूँ कि दुनिया के हर देश में ऐसा ही राष्ट्रवाद फैले। एक बात और।

वह क्या है ?

मैं सादगी की संस्कृति विकसित करने के लिए तब तक इंतजार नहीं करना चाहता जब तक बाकी देश भी इसे न अपना लें। मेरा बस चले, तो मैं भारत की सेना को तुरंत बर्खास्त कर दूँ। महानगरों को रहवास की छोटी-छोटी इकाइयों में बदल दूँ। बड़े उद्योगों को बंद कर दूँ। विलासिता के अड्डे खत्म कर दूँ। सरकारों के अधिकार न्यूनतम कर दूँ। सरकारी अधिकारियों की तनख्वाह आधी कर दूँ। लेकिन मेरी कौन सुनेगा? इसीलिए अकेलेपन में रमता रहता हूँ। पर मैंने अभी तक उम्मीद नहीं छोड़ी है। विक्टर ह्यूगो ने कहा था कि जब किसी विचार का समय आ जाता है, तब उसे कोई रोक नहीं सकता। देखो, वह समय कब आता है।

सुमित, कैलेंडर के पन्ने पलटते रहने का काम तुम जारी रखो, मैं तो वर्तमान सुख-सुविधाओं को छोड़ नहीं सकती। तुम्हारे साथ चलते हुए तो मैं गांधी जी के आश्रम में पहुँच जाऊँगी।

सचमुच पागल हो तुम। वह समय अगले पचास सालों में तो आता दिखाई नहीं पड़ता। लोग विचार से नहीं, दुर्घटना से सीखते हैं। दूसरे महायुद्ध में हुए व्यापक जनसंहार को देख कर ही यूरोप ने सीखा कि युद्ध की विभाषिका क्या होती है। उसके बाद से यूरोप की जमीन पर कोई युद्ध नहीं हुआ। इसी तरह, जब मौजूदा उपभोगवाद के परिणामस्वरूप भयावह ध्वंस होने लगेगा, तब लोग पीछे लौटने के बारे में फैसला करने को बाध्य हो जाएँगे।

चलो, तब तक तो हम मौज कर सकते हैं।

क्यों नहीं, क्यों नहीं। खूब मौज करो। कभी-कभी मैं भी तुम्हारे साथ मौज कर लिया करूँगा।

मुझे भी खुशी होगी और हाँ, इसके लिए तुम्हें मुझसे अपॉइंटमेंट नहीं लेना पड़ेगा।

यह कह कर मैं हँसने लगी। वह भी हँस रहा था। हम दोनों ने एक-दूसरे का गहरा चुंबन लिया और एक-दूसरे को कसे हुए अगल-बगल लेट गए। हम निस्पंद थे। पर हम दोनों के भीतर कुछ चल रहा था।

क्या उसके मन में भी वही विचार आ-जा रहे थे जो मेरे मन में?



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