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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


खिड़की से झाँक कर देखा, तो धूप खिली हुई थी। उसका ताप कमरे में भी महसूस हो रहा था। कल पूरे दिन अपने कमरे में ही सिमटी रही। अब दिन के उजाले में सारी धुंध छँट चुकी थी। मैंने अपने आपको परिस्थिति के हवाले कर दिया। मेरे पिछले अनुभवों का एक निचोड़ यह भी था कि बहुत-सी स्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनमें आप कुछ कर नहीं सकते। नहीं, आप दर्शक नहीं बने रहते। भागीदारी पूरी होती है, पर किसी चीज को प्रभावित नहीं कर सकते, अगर्चे हर चीज आपको प्रभावित करती है।

कमरा आज काटने लगा। मैंने सुमित को फोन किया। वह नहीं था। कमरे में ही भारी-सा नाश्ता मँगा लिया और स्वाद ले कर खाती रही। कॉफी पीने के बाद मैंने सुमित को फिर फोन किया। उसने इस तरह फोन उठाया जैसे वह मेरा इंतजार ही कर रहा था। मैंने बच्चों की-सी उमंग के साथ कहा, आज हम बाहर खाना खाएँगे। मॉल रोड पर। चलते हो?

सुमित तुरंत राजी हो गया। बोला, तैयार होते ही फोन कर दूँगा। तुम रिसेप्शन पर आ जाना।

कुछ देर के बाद हम मॉल रोड पर थे। धूप का लुत्फ लेने के लिए बहुत-से लोग वहाँ चहलकदमी कर रहे थे। मैंने अपना प्रिय झक्क सफेद रंग का सूट पहन रखा था। ललाट पर नीले रंग की बिंदी थी। बाल खुले हुए थे। सुमित अपनी रूटीन पोशाक में था - जींस की तुड़ी-मुड़ी पैंट, भूरे रंग की कमीज और उसी रंग का स्वेटर।

चहलते-टहलते सुमित ने पूछा, अमेरिका चलोगी?

मैंने जवाब दिया, अचानक अमेरिका? बात क्या है? क्या वहाँ की तुम्हारी कोई प्रेमिका तुम्हें बुला रही है?

सुमित ने हँसते हुए कहा, प्रेमिका? आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमाँ होंगे! वहाँ मेरा एक दोस्त रहता है। उसकी एक छोटी-सी संस्था है - वर्ल्ड गवर्नमेंट लीग। उसकी चिट्ठी आई है कि अगले महीने उसके संगठन की सालाना बैठक है। वह जानता है कि मैं फक्कड़ हूँ। सो उसने लिखा है कि मेरे हाँ करते ही वह हवाई जहाज का रिटर्न टिकट भेज देगा।

मैं मुसकरा दी - तुम्हारे साथ तो मैं अमेरिका क्या, अन्टार्कटिका भी जा सकती हूँ। लेकिन यह वर्ल्ड गवर्नमेंट लीग है क्या?

सामने से दो गोरे जा रहे थे। उनके बीच साड़ी पहने, जूड़ा बाँधे एक गोरी युवती अलसाई-सी चली जा रही थी।

उनकी ओर उड़ती-सी नजर डाल कर सुमित मुझसे मुखातिब हुआ, इस संस्था का उद्देश्य विश्व सरकार की स्थापना है। इसका उद्घाटन अल्बर्ट आइंस्टीन ने किया था। कुछ साल तक वर्ल्ड गवर्नमेंट लीग का बहुत जलवा रहा। फिर धीरे-धीरे सब कुछ क्षीण होने लगा। संस्था को एक के बाद कई लोगों ने चलाने की कोशिश की। पर उसमें जान नहीं आ पाई। पिछले तीन सालों से मेरा यह मित्र उसका सचिव है। कोई बाकायदा दफ्तर नहीं है। वह घर से ही सारा काम करता है। उसका नाम है, मार्क क्रेस्ट।

मैंने पूछा, यह मार्क करता क्या है? संस्था चलाने के लिए उसके पास पैसे कहाँ से आते हैं?

सुमित की आँखों में उदासी-सी तैर आई। बोला, रईस का बेटा है। उसके पिता बैंकर हैं। वही मार्क को पैसे भेजते रहते हैं। पर वह उतना ही लेता है जितने की उसे जरूरत है। रहन-सहन में नंबर एक कंजूस है। एक बैठक में कॉफी का दूसरा प्याला न पिएगा न पिलाएगा। दो साल पहले यहाँ आया था - अपनी संस्था की भारत इकाई खोलने के लिए। तभी उससे दोस्ती हुई थी। वह एक महीने तक दिल्ली-बंबई-बेगलूर करता रहा, कहीं कोई बात नहीं बनी। जाते समय कह रहा था - तुम्हारा बुद्धिजीवी वर्ग ढोंगी है। किसी भी चीज में उसकी आस्था नहीं है। अपनी जेब से तो पाँच रुपए भी खर्च नहीं कर सकता। जिससे भी मिला, वह मेरी बात सुनने के बाद पहला सवाल यही पूछता, इसकी फंडिंग कौन कर रहा है? किसी-किसी ने जानना चाहा कि यह प्रोजेक्ट किसका है? इसका सालाना बजट कितना है?

मैंने विनोद में कहा, उसे पता नहीं था कि यह वसुधैव कुटुंबकम् का देश है।

फुटपाथ पर चाय की दुकान दिख गई। पास में ही बेंच थी, जिस पर तीन लोग बैठे हुए थे। हमारे लिए भी जगह बन गई।

धुआँ छोड़ती हुई चाय की चुस्कियाँ लेते हुए हम आने-जाने वालों को देखते रहे। ज्यादातर सैलानी थे - चेहरे से उल्लास छलकता हुआ, सजे-धजे और निरुद्देश्य घूमते हुए। जब हम यह ठान कर किसी जगह जाते हैं कि वहाँ मौज करनी है, तो सचमुच मौज का माहौल बन जाता है।

चाय पी लेने के बाद हम उठे और सड़क पर टहलने लगे। इसके साथ ही हमारी बातचीत भी खुलने लगी।

यह विश्व सरकार क्या है, जी ? हमने तो इसका नाम कभी सुना ही नहीं।

सुनोगी कैसे? यह विचार अभी भ्रूण अवस्था में है। एक समय था जब विश्व सरकार की खूब चर्चा होती थी। रसेल और आइंस्टीन जैसे लोग इसकी वकालत करते थे। पर अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध ने सब कुछ बरबाद हो गया। एकता की तरफ बढ़ने के बजाय दुनिया दो खेमों में बँट गई। बुद्धिजीवी भी विखंडनवाद के चक्कर में पड़ गए। सब कुछ बिखरने लगा। लेकिन अभी भी मेरा मानना यही है कि दुनिया की समस्याएँ तभी सुलझ सकती हैं जब राष्ट्रीय सरकारों को जोड़ने वाली और उनके ऊपर एक विश्व सरकार हो।

लेकिन तुम तो राष्ट्र के भी खिलाफ हो। फिर यह आइडिया तुम्हें क्यों आकर्षित करने लगा ? राष्ट्र बने रहेंगे, तभी तो विश्व सरकार बनेगी !

तुम ठीक कहती हो। मेरा अपना खयाल यह है कि राष्ट्र-वाष्ट्र सौ-पचास सालों में तितर-बितर हो जाएँगे। इतिहास अपने उद्गम की ओर लौट आएगा। पर जब तक राष्ट्र मौजूद हैं, उनकी शक्ति को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है। नहीं तो सभ्यता ही नष्ट हो जाएगी। राष्ट्र एक सुंदर भावना है, पर इसमें बर्बरता के बीज भी छिपे हुए हैं। हिटलर कुछ नहीं कर सकता था अगर उसके पास राष्ट्र नहीं होता। एक जमाने में संयुक्त राज्य अमेरिका भी एक खूबसूरत विचार था। तब वह राष्ट्र बन ही रहा था। जब राष्ट्र बन गया, तो अमेरिका दुनिया का सबसे खौफनाक देश हो गया। सोवियत संघ भी एक खतरनाक इकाई थी। अपने समय का सबसे बड़ा साम्राज्यवादी। आज वह नहीं है, तो एक बहुत बड़ी आबादी चैन की साँस ले रही है। भारत जब राष्ट्र नहीं था - एक बृहत समाज था, तब वह इतना आततायी नहीं था। अंग्रेजों ने इसे राष्ट्र बनाया और एक अच्छे-खासे समाज का बंटाधार कर दिया। आजादी के बाद यह राष्ट्र और मजबूत हुआ तथा देश भर के गरीबों, कमजोर लोगों पर बुलडोजर की तरह चढ़ बैठा। मानो मध्य वर्ग के लोग ही इस देश के नागरिक हों और दूसरे कीड़े-मकोड़े हों।

हाँ, पर समस्या यह है कि राज्य की शक्ति को नियंत्रित कैसे किया जाए। यह तो नागरिकों के हस्तक्षेप से ही संभव है। जहाँ के नागरिक निष्क्रिय बैठे रहेंगे, वहाँ की सरकार पर कोई दबाव नहीं बनेगा और वह जो चाहे करती रहेगी।

निःसंदेह राष्ट्र की शक्ति का सरकारों द्वारा किए जा रहे दुरुपयोग का रोकने का यह एक रास्ता है। राष्ट्र की लगाम तो राष्ट्र के सदस्यों के हाथ में ही होती है। जब तक घुड़सवार झपकी लेता रहेगा, घोड़ा मनमानी राह पर चलता जाएगा। सोचने की बात है, अगर जर्मन समाज ने साथ नहीं दिया होता, तो हिटलर किस हद तक जा सकता था? इसी तरह, भारत की जनता खामोश नहीं बनी रहती, तो इंदिरा गांधी द्वारा घोषित इमरजेंसी कितने दिनों तक चल सकती थी? इसलिए आंतरिक प्रतिरोध बहुत जरूरी है। इसके बिना तो काम ही नहीं चलेगा। दुनिया में जितने भी बड़े परिवर्तन हुए हैं, आंतरिक प्रतिरोध से ही हुए हैं।

तब तो राष्ट्रों के भटकाव के इलाज के लिए यही काफी है। लोग सहने से इनकार कर देंगे, तो सरकारें खुद सुधरने लगेंगी।

नहीं, आंतरिक प्रतिरोध काफी नहीं है। जनता रोज-रोज नहीं उठ खड़ी होती। जब कोई बड़ा मुद्दा सामने आता है, तभी वह बगावत पर उतारू हो जाती है। नागरिकों के पास इतना समय नहीं होता कि वे हर छोटे-बड़े मामले पर मीटिंग, प्रदर्शन करते रहें। इसके अलावा बहुत-से मामले ऐसे होते हैं जिन पर जनता को गुमराह करना आसान होता है। इसलिए बाहरी दबाव बनाना भी जरूरी है। इसके लिए एक विश्व सरकार चाहिए, जो सरकारों द्वारा फैलाई जाने वाली अराजकता को नियंत्रित कर सके।

मगर विश्व सरकार बनेगी कैसे ?

वह बनेगी सभी देशों के नागरिकों के मतदान से। इसके कई तरीके हो सकते हैं। कौन-सा तरीका सबसे ज्यादा कारगर होगा, यह मिल-बैठ कर तय किया जा सकता है। जाहिर है, सिर्फ विश्व सरकार नहीं होगी, विश्व संसद भी होगी, विश्व का संविधान भी होगा। विश्व सेना भी हो सकती है। मूल बात यह है कि जैसे राष्ट्रीय सरकारों का गठन होता है, वैसे ही विश्व सरकार का गठन होगा। जैसे राष्ट्रीय सरकारें देश को चलाती हैं, वैसे ही विश्व सरकार विश्व का संचालन करेगी।

इसके लिए तो संयुक्त राष्ट्र है ही। वह भी एक तरह की विश्व सरकार है।

सॉरी, वह विश्व सरकार नहीं, विश्व क्लब है, जहाँ बैठ कर बड़े देश शतरंज खेलते हैं। तिस पर पाँच देशों के पास वीटो पॉवर है। इनमें से कोई भी देश संयुक्त राष्ट्र के फैसले पर पानी फेर सकता है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र विश्व के नागरिकों का प्रतिनिधित्व नहीं करता, उनकी सरकारों का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए उसमें वे सारी कमियाँ और कमजोरियाँ हैं जो सरकारों में दिखाई देती हैं। नहीं, इससे मौजूदा दुनिया का काम नहीं चल सकता।

चलो, मान लिया। अब यह बताओ कि विश्व सरकार करेगी क्या ?

सबसे पहले तो वह युद्ध को रोकेगी। भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार भिड़ंत हो चुकी है। कोई विश्व सरकार होती, तो वह इसे रोक सकती थी। कश्मीर का ही विवाद लो। भारत विभाजन के बाद से ही कश्मीर दोनों सरकारों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। इस विवाद में कश्मीर के लोगों की राय नक्कारखाने में तूती की आवाज जितनी भी असरदार नहीं है। कश्मीर के लोग क्या चाहते हैं, इससे ज्यादा अहम यह है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें क्या चाहती हैं। यह भी कम अहम नहीं कि अमेरिका क्या चाहता है। इसलिए इस विवाद के सुलझने के कोई आसार दिखाई नहीं पड़ते। मामला लंबे अरसे से संयुक्त राष्ट्र में है, पर वह इस पर विचार नहीं कर पाता, क्योंकि उस पर कई देशों का दबाव है। इसलिए उसका होना - न होना बराबर है। हाँ, उसकी जगह कोई विश्व सरकार होती, तो वह जरूर किसी विवेकसंगत निर्णय पर पहुँच सकती थी। उसका निर्णय सभी पक्षों को मानना होता।

और ?

विश्व सरकार होने पर राष्ट्रीय सेनाओं की जरूरत नहीं रह जाएगी। सोचो, इससे कितना पैसा बचेगा। इस समय आधे से ज्यादा शोध कार्य सामरिक तैयारियों के लिए हो रहा है। विश्व सरकार को न तो मिसाइलों की जरूरत होगी न एटम बमों की। सैनिक तैयारी पर होने वाला शोध कार्य बंद हो जाएगा, तो विज्ञान और टेक्नोलॉजी का उपयोग मानव हित में किया जा सकता है। कैंसर और एड्स की दवा खोजना ज्यादा अहम है या ऐसा हथियार बनाना जो पल भर में किसी देश को नष्ट कर दे? दरअसल, विज्ञान अब इतना शक्तिशाली हो गया है कि उसे सरकारों के नियंत्रण से मुक्त करना आवश्यक हो गया है। युद्ध की तैयारी शेर की सवारी की तरह है। एक बार आप शेर की पीठ पर बैठ गए, तो उतर नहीं सकते। शेर आपको खा जाएगा।

और ?

और यह कि आज शायद ही कोई समस्या हो जो किसी एक देश तक सीमित हो। पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं, तो सभी देशों के लोग प्रभावित होते हैं। किसी एक देश में अन्न का उत्पादन कम या ज्यादा होता है, तो विश्व भर की मंडियों में हलचल मच जाती है। आतंकवाद तो विश्व समस्या है ही। इससे कोई भी देश अकेले नहीं लड़ सकता। नशीले पदार्थों के व्यापार का विश्वव्यापी संजाल है। इस संजाल को छिन्न-भिन्न करने के लिए कोई विश्व व्यवस्था बननी चाहिए। इस मामले में राष्ट्रीय सरकारें फेल हो चुकी हैं।

और ?

और? इन दिनों दो मामले उभर कर आ रहे हैं। एक, मानव अधिकारों का और दूसरा, पर्यावरण का। मानव अधिकारों का संबंध किसी एक देश से नहीं है। ये अधिकार दुनिया के सभी व्यक्तियों के हैं और उन्हें मिलने ही चाहिए। लेकिन इसमें सरकारें आड़े आ जाती हैं। विश्व भर में शायद ही कोई देश हो, जहाँ मानव अधिकारों का सम्मान होता है। मानव अधिकारों का दम भरने वाला अमेरिका तो इस मामले में सबसे बड़ा गुनहगार है। दूसरे देश अपनी सीमाओं के भीतर मानव अधिकारों का हनन करते हैं, अमेरिका दूसरे देशों में घुसपैठ कर मानव अधिकारों का हनन करता है। इसलिए मानव अधिकारों का सम्मान हो, इसके लिए तो कोई विश्व संस्था ही चाहिए जो मानव अधिकारों का हनन करने वाले देशों को सभ्य व्यवहार करने के लिए बाध्य कर सके।

और ?

पर्यावरण की सुरक्षा का मामला भी इतना ही गंभीर है। पर्यावरण की समस्याओं और जलवायु परिवर्तन पर पता नहीं कितने सम्मेलन हो चुके हैं। राष्ट्राध्यक्ष भी कई बार बैठक कर चुके हैं। पर जमीनी स्तर पर कोई ठोस काम नहीं हो पा रहा है। लक्ष्य निश्चित किए जाते हैं, पर कोई उन्हें पूरा नहीं करता। मानो प्रकृति विश्वव्यापी है, इसलिए उसे बचाए रखने की जिम्मेदारी किसी एक देश पर न हो। जो सब का है, वह किसी का भी नहीं है। वाह जी वाह ! मानो हवा देशों के बीच बँटी हुई हो, बादलों का राष्ट्रीयकरण हो गया हो, सूर्य की किरणों की अलग-अलग नागरिकता हो चुकी हो। । सच तो यह है कि प्रदूषण और पर्यावरण की समस्या ने आदमी की आँखों में उँगली डाल कर यह स्पष्ट कर दिया है कि यह दुनिया एक समग्र इकाई है और टुकड़ों-टुकड़ों में उसकी समस्याओं को सुलझाया नहीं जा सकता।

और ?

और क्या? तुम्हारा सिर! कड़ाके की भूख लग आई है और तुम्हारा 'और?' खत्म होने का नाम नहीं लेता। चलो, किसी अच्छे-से रेस्त्राँ में बैठते हैं।

*

तब तक हम लोग दो बार मॉल रोड को नाप चुके थे। थकान तो महसूस नहीं हो रही थी, पर भूख मुझे भी लग आई थी। हम एक खूबसूरत रेस्त्रां में दाखिल हुए। जम कर जीमे।

गेस्ट हाउस की ओर लौटते हुए हम दोनों चुप थे। हम शायद एक ही तरह की बातें सोच रहे थे : एक विश्व, एक सरकार।

जब होटल नजदीक आ गया, तो मैं सुमित से यह पूछे बिना नहीं रह सकी - मान लो, विश्व सरकार बन गई, तो राष्ट्रीय संप्रभुता का क्या होगा? क्या हर समुदाय को अपनी मर्जी के अनुसार जीने का हक नहीं है? दुनिया को यह अधिकार कहाँ से मिल सकेगा कि वह किसी समुदाय के आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी कर सके?

सुमित ने मेरी पीठ पर धौल लगाते हुए कहा, राष्ट्रीय संप्रभुता की ऐसी की तैसी। व्यक्ति की संप्रभुता सबसे ऊपर है। संप्रभुता समुदाय की भी होती है, पर वह व्यक्तियों की संप्रभुता का एक सामूहिक रूप है। जब कोई समूह अपने सदस्यों की संप्रभुता का या दूसरे समूहों की संप्रभुता के साथ छेड़छाड़ करता है, तो उस पर अंकुश लगाना जरूरी हो जाता है। मानव जगत विभिन्न समुदायों में बँटा हुआ है और एक समग्र इकाई भी है। दुनिया दोनों के मेल से आगे बढ़ती है। आज यह मेल और ज्यादा जरूरी है, क्योंकि प्रत्येक समुदाय के हाथ में अपार शक्ति है, जिसके सामने व्यक्ति अपने को असहाय पाता है। विश्व सरकार विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व करेगी। जब सभी की अपनी-अपनी संप्रभुता है, तो विश्व समाज की भी अपनी संप्रभुता होनी चाहिए। नहीं?

अपने कमरे के दरवाजे का ताला खोलते हुए मैं सुमित के विचारों में डूब-उतरा रही थी। दुनिया की समस्याओं पर इस नजरिए से मैंने कभी विचार नहीं किया था। मेरे सामने एक नया, बृहत परिप्रेक्ष्य खुल रहा था


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