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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


आज मेरी दीक्षा का पहला दिन था। दीक्षा? मैं जो कहना चाहती हूँ, उसके लिए यह शायद उपयुक्त शब्द नहीं है। मैं कोई बच्ची नहीं हूँ, जिसे सिखाने-पढ़ाने के लिए शिक्षक की जरूरत हो। मैंने बहुत कुछ पढ़ा है। जीवन के अनुभव भी कम नहीं हैं। फिर भी मुझे लगता है कि कहीं कुछ छूट रहा है। हर मामले में उलझन-सी बनी रहती है। हर सवाल मुझे इस तरह घूरता है कि मैं आँखें बंद कर लेती हूँ। विचार के स्तर पर एक तरह की बैचैनी बनी रहती है। यही सोच कर नैनीताल आई हुई हूँ कि कुछ समय खाली बिताऊँगी और दिमाग को खुला छोड़ दूँगी। कई बार मैंने पाया है कि दिमाग पर जोर न दो और उसे आराम करने दो, तो वह अचानक एक ऐसा समाधान ले कर उपस्थित हो जाता है जिसके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। यह मेरा सौभाग्य है कि यहाँ एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हो गई, जिससे कुछ जाना जा सकता है, जिससे बातचीत की जा सकती है और जिसके आईने में अपने को देखा जा सकता है।

सुमित से मेरी बातचीत कुछ यों शुरू हुई।

सुमित जी , आपसे मुलाकात होना मेरे लिए एक महान अवसर है। बहुत दिनों से मैं किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में थी जो मेरी जिज्ञासाओं का समाधान कर सके।

मैं? अभी तो मेरी अपनी जिज्ञासाएँ ही शांत नहीं हो पाई हैं। मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?

आपके व्यक्तित्व से मैं बहुत प्रभावित हुई हूँ। मैं तो अब आपको अपना गुरु मानती हूँ । या कह लीजिए, गुरुतुल्य।

खतरा ! खतरा !

खतरा ? किस बात का खतरा ?

हर बात का खतरा। गुरु का उपयोग है, पर किसी को गुरु मान लेना एक खतरनाक फैसला है।

सर , मैंने तो यह सुन रखा है कि गुरु बिन होय न ज्ञान। सभी संतों ने यह बात कही है।

ले किन मैं संत नहीं हूँ। किसी भी अर्थ में संत नहीं हूँ। मेरे भीतर बहुत-सी लालसाएँ धधकती रहती हैं। इसलिए यह ओहदा मेरे लिए बहुत भारी पड़ेगा।

आप चाहे जो कहें , मुझे तो आप संत ही लगते हैं। मैं कई दिनों से आपके संपर्क में हूँ। मैंने आप जैसा निस्पृह व्यक्ति नहीं देखा। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर। संत और कैसा होता है ?

अगर संत होने की कसौटी यह है, तब तो मैं संत होने को दूर से नमस्कार करता हूं। मैं निस्पृह नहीं हूँ। किसी को दुश्मन नहीं मानता, पर ना काहू से दोस्ती, यह कैसे हो सकता है? सभी मेरे दोस्त हैं। कुछ को जानता हूँ, बहुतों को नहीं जानता। फिर भी सभी को दोस्त ही मानता हूँ।

हाँ , यह बात मुझे भी अपील करती है। मुझे तो लगता है , दुश्मन शब्द को ही खत्म कर देना चाहिए।

बिलकुल। वास्तव में तो कोई किसी का दुश्मन नहीं है। इतनी बड़ी सृष्टि में सबके लिए जगह है।

दमाशों के लिए भी?

हाँ, बदमाशों के लिए भी। हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि कोई बदमाश क्यों बन जाता है। भगवान तो किसी को बदमाश बना कर भेजता नहीं होगा। उसे क्या पड़ी है ऐसा करने की?

इस बारे में बाद में बाद में बात करना चाहूँगी। अभी तो हम संतों की चर्चा कर रहे हैं। आप यह तो मानेंगे ही कि दुनिया को आज संतों की सख्त जरूरत है। वे ही इस अशांत संसार में शांति ला सकते हैं।

पता नहीं। मुझे तो लगता है, आज दुनिया को संत नहीं, सिपाही चाहिए।

सिपाही चाहिए ?

सिपाही चाहिए। तभी तमाम तरह की बुराइयों से लड़ा जा सकता है। संत तो अकेले में डफली बजाते हुए मगन रहता है। उसे अपनी मुक्ति की चिंता रहती है , बाकी दुनिया की मुक्ति से उसे क्या मतलब !

आपकी बात ठीक लगती है। बड़े-बड़े संत आए और चले गए। आज भी संतों और बाबाओं का बोलबाला है। ये सभी अच्छी-अच्छी बातें कहते हैं। उनके अनुयायी भी लाखों की संख्या में है। फिर भी समस्याएँ हैं कि सुलझ नहीं रही हैं।

बुरा न मानें तो एक शेर कहूँ। एक शायर ने कहा है, बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना, तेरी जुल्फों का पेचो-खम नहीं है।

वाह वाह ! आप तो कविता-प्रेमी भी हैं , सुमित जी। आपके साथ बहुत मजा आएगा।

मुझे कविता बहुत पसंद है। पहले मैं भी कविताएँ लिखता था। फिर छोड़ दिया। अब पढ़ कर ही काम चला लेता हूँ। घटिया कविताएँ लिखने से अच्छी कविताओं का पाठक होना बेहतर है।

काश , तमाम अधकचरे कवि आपकी राह पर चल रहे होते।

नहीं, मैं उन्हें दोष नहीं देता। जैसे पंछी चहचहाते हैं, गाएँ रँभाती हैं, वैसे ही आदमी कुछ लिखता-गाता रहे, तो क्या हर्ज है? इससे दुनिया कुछ सुंदर ही होती है।

खैर, इस प्रसंग को छोड़िए। आप कह रहे थे कि आज संतों की नहीं, सिपाहियों की जरूरत है।

हाँ, बहुत सोचने-बिचारने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। संतों को हमने आजमा लिया। अब सिपाहियों को आजमा कर देखना चाहिए।

पर संत भी तो एक तरह के सिपाही ही हैं। वे भी बुराइयों से लड़ते हैं और लड़ने में मदद करते हैं।

हाँ, करते हैं। पर वे बुराइयों पर धावा नहीं बोलते। बस प्रेरणा दे कर रह जाते हैं। दुनिया को बदलने के लिए सिर्फ प्रेरणा काफी नहीं। इसके लिए संघर्ष करना होगा। यह काम सिपाहियों का है।

लेकिन ऐसे सिपाही किस काम के जिनका हृदय संतों जैसा न हो ? वे तो दुनिया को और तबाह कर देंगे।

यह हुई न बात ! पर संत होना आसान नहीं है। सिपाही होना उससे भी मुश्किल है। संत और सिपाही, दोनों साथ-साथ होना तो और भी ज्यादा मुश्किल है।

यह आप क्या कह रहे हैं ? फिर तो कोई उम्मीद ही नहीं बचती।

उम्मीद बचती है न ! हर मनुष्य में संत और सिपाही, दोनों होते हैं। मैं चाहता हूँ कि दोनों को साथ-साथ जगाया जाए।

इसके लिए तो किसी बहुत बड़े आदमी की जरूरत है। जैसे गांधी जी थे। वे संत भी थे और सिपाही भी थे।

हाँ, आपकी बात एकदम सही है। महान लोग समाज का बहुत भला करते हैं। पर उनसे नुकसान भी बहुत होता है। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली होता है कि वे सोच-विचार की हमारी शक्ति को अवरुद्ध कर देते हैं। जैसे किसी नदी के रास्ते में पहाड़ आ जाए। गांधी जैसा आदमी दुनिया में न हुआ है, न होगा। पर लाखों लोगों ने उन्हें अपना गुरु मान लिया। इससे देश को बहुत नुकसान हुआ।

आपकी इस बात में मुझे संदेह है। क्या यह सच नहीं है कि गांधी जी ने लाखों स्त्री-पुरुषों की जिंदगी बदल दी ?

बेशक बदल दी। पर उनमें से कोई गांधी जी की परछाईं को भी छू नहीं सका।

इसके लिए क्या गांधी जी खुद जिम्मेदार थे ?

हाँ, एक तरह से वे खुद भी जिम्मेदार थे। उनका कहना था कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता। वे खुद बहुत दिनों तक गुरु की खोज करते रहे। बाद में उन्होंने महसूस किया कि कलियुग में सच्चा गुरु पा लेना बहुत मुश्किल है। तब वे स्वयं अपना गुरु बन गए। पर बाद में धीरे-धीरे उन्होंने लोगों को अपना शिष्य बनाना शुरू कर दिया।

उन्होंने शिष्य बनाए या लोग उनका शिष्य बनते गए ?

एक ही बात है। गांधीजी ने अपने शिष्यों को अपनी स्वतंत्र विचार शक्ति विकसित करने की प्रेरणा कभी नहीं दी। हालाँकि वे गौतम बुद्ध की तरह हमेशा यही कहते रहे कि मेरी बात इसलिए मत मानो कि मैं कह रहा हूँ, इसलिए मानो कि तुम्हें यह बात जँच रही है। फिर भी उनके ज्यादातर शिष्यों में उनका अपना विवेक विकसित नहीं हो सका। वे गांधी जी की नकल करते रहे। आज भी बहुत-से गांधीवादी चरखा चलाते हैं। यह तो रूढ़िवादिता हुई। सच्चा गुरु रूढ़िवादिता को प्रश्रय नहीं देता। बल्कि उसे निरुत्साहित करता है। वैसे, विचार के स्तर पर गांधीजी इस मामले में बिलकुल स्पष्ट थे। उनका कहना था कि दुनिया में अगर गांधीवाद नाम की कोई चीज है, तो मैं अकेला गांधीवादी हूं। पर व्यवहार में वे गांधीवाद का कारखाना बन गए। इस कारखाने से जो माल निकला, वह एकदम कचरा तो नहीं था, पर उसमें कोई दम भी नहीं था। चावल के दाने कम थे, भूसा ज्यादा था।

तो सच्चे गुरु को कैसा होना चाहिए ?

मेरी राय में तो किसी को गुरु होने का दंभ ही नहीं पालना चाहिए। दुनिया में कोई भी व्यक्ति इतना महान नहीं है कि उसे गुरु के रूप में स्वीकार किया जा सके। जो गुरु बनना चाहता है, वह परले दरजे का धूर्त है। जो गुरु की खोज में रहता है, वह परले दरजे का बेवकूफ है। बुद्धिमत्ता कोई बनी-बनाई खीर नहीं है कि उसे खा कर आदमी ज्ञानी हो जाए। हर आदमी को अपना गुरु स्वयं बनना पड़ता है। इसीलिए महात्मा बुद्ध ने कहा था, अप्प दीवो भव। यानी अपना दीपक खुद बनो।

क्या यह मजेदार बात नहीं है कि अप्प दीवो भव जपते-जपते भी सभी बौद्ध गौतम बुद्ध की ही राह पर चलते रहे ? सभी ने अपनी-अपनी आत्मा का दीपक बुझा लिया , क्योंकि वे आश्वस्त थे कि उनके हाथ में तथागत की मशाल है।

यह कोई अनोखी बात नहीं है। सभी धर्मों और संप्रदायों में यही होता है। राजनीतिक विचारधाराओं में भी यही होता है। मुझे लगता है कि आम आदमी में भेड़ वृत्ति बहुत मजबूत होती है। वह अपने दिमाग का इस्तेमाल करने का कष्ट उठाना नहीं चाहता। बनी-बनाई लीक पर चलना उसे आसान लगता है। मानव जाति के विकास की राह में सबसे बड़ा खतरा यही है।

तो आपकी नजर में गुरु का कोई उपयोग नहीं है ?

मैं इस बात का समर्थन नहीं कर सकता कि गुरु का कोई उपयोग नहीं है। मैंने स्वयं बहुत-से गुरुओं से बहुत कुछ सीखा है। मैं जब कक्षा दस में पढ़ता था, तब एक मिल मजदूर अकसर मेरे पास आते थे। वे ही मेरे पहले राजनीतिक गुरु थे। उन्होंने ही मुझे समाजवादी बनाया। वे मुझे पढ़ने के लिए समाजवादी किताबें और पत्रिकाएँ देते थे। मेरे प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर देते थे। उन्होंने मुझे समाजवादी नेताओं से मिलवाया। उनसे भी मैं बहुत प्रभावित हुआ। तो मैं कैसे कह सकता हूँ कि गुरु का कोई महत्व नहीं है? अगर वे सज्जन मुझे नहीं मिलते, तो जो बातें मैंने कक्षा दस-ग्यारह में सीखीं, उन्हें जानने में पता नहीं कितने वर्ष लग जाते। क्या पता मैं किसी और दिशा में भटक जाता।

फिर आप गुरु-शिष्य संबंध का विरोध क्यों करते हैं ?

गुरु-शिष्य संबंध का विरोध मैं इसलिए करता हूँ कि अधिकांश क्या, सारे ही गुरु बाँधते हैं, कोई मुक्त नहीं करता। वे उम्मीद करते हैं कि उनके द्वारा सिखाई हुई बात को अंतिम मान लिया जाएगा। इससे प्रगति में अवरोध पैदा होता है।

फिर भी गुरु से कुछ ज्ञान तो मिलता ही है। आपने अभी-अभी कहा कि अगर आपको बचपन में ही राजनीतिक गुरु नहीं मिल गए होते , तो आपको ज्ञान की तलाश में बहुत भटकना पड़ता।

मैंने गलत नहीं कहा। यह मेरा सौभाग्य रहा कि मैं उन जैसे व्यक्ति के संपर्क में आया। यह भी मेरा सौभाग्य है कि वे कुछ समय के बाद अपने गाँव चले गए। इससे मुझे स्वतंत्र रूप से सोचने-बिचारने का मौका मिला। अगर वे गाँव नहीं गए होते, तो हो सकता है आगे चल कर हमारे बीच गंभीर मतभेद पैदा हो जाते। इससे उन्हें भी पीड़ा होती और मुझे भी।

तो गुरु का एक सीमा तक उपयोग है -- लेकिन एक ही सीमा तक।

इस बात को मैं दूसरी तरह से कहना चाहूँगा। किसी को गुरु नहीं बनना चाहिए, पर हर व्यक्ति को शिष्य बनना चाहिए। उसे पूरी विनम्रता के साथ हर आदमी से कुछ सीखना चाहिए। जो बड़े लोग हैं, उनसे ज्यादा सीखना चाहिए। असल में बड़ा आदमी वही होता है जिससे ज्यादा से ज्यादा सीखा जा सके।

लेकिन गुरुवर , किसी के पास कोई ऐसी चीज है जिसके बारे में वह सोचता है कि दूसरों को जरूर बतलाना चाहिए , तो इसमें हर्ज क्या है ?

गुरुवर कह कर मेरा मजाक मत उड़ाओ। मैं गुरु-वुरु नहीं हूँ। हर सिखाने में कुछ न कुछ समस्या जरूर होती है। दरअसल, मुश्किल यहीं आती है। हर आदमी सिखाना चाहता है, सीखना कोई नहीं चाहता। क्या ही अच्छा हो कि हम अपनी बात कह कर चुप हो जाएँ। जिसको सीखना है, वह सीखे। जिसे मेरी बात नहीं जँचती, वह उसे भूल जाए। मेरे खयाल से, ज्ञान के क्षेत्र में सबसे अच्छा संबंध वैज्ञानिकों में होता है। विज्ञान का छात्र अपने शिक्षकों से विज्ञान सीखता है। जब वह स्वयं वैज्ञानिक हो जाता है, तब उसे अपने गुरुओं की बातों में शक होने लगता है। विज्ञान की दुनिया में सत्य ही सबसे बड़ा गुरु है। संदेह ही रास्ता दिखाता है। तभी तो मार्क्स का एक मूल सूत्र यह था -- डाउट एव्रीथिंग (हर चीज पर संदेह करो)।

और मैं मार्क्स के इस कथन पर ही डाउट करने लगूँ तो ?

तुम्हारी मर्जी। पर मार्क्स का आशय यह नहीं था कि संदेह करना अपने आपमें कोई गुण है। डाउट इसलिए करना चाहिए ताकि किसी निश्चय तक पहुँचा जा सके। हर चीज पर डाउट करने से तो तुम कुछ कर ही नहीं पाओगी। करने के लिए कुछ निश्चय तो करना ही पड़ता है।

जब निश्चय ही कर लिया तो डाउट करने के सिद्धांत का क्या होगा ?

विचार के स्तर पर संदेह और कर्म के स्तर पर निश्चय। निश्चय इसलिए कि इसके बिना कर्म कर पाना असंभव है। संदेह इसलिए कि हम जो भी कर रहे हैं, उसके ठीक होने की जाँच लगातार करते रहें। यह एक तरह की द्वंद्वात्मकता है और यही विकास की कुंजी है। कवि के शब्दों में, एक पाँव चल रहा अलग-अलग और दूसरा किसी के साथ है।

यानी किसी भी विश्वास को प्रोविजनल ( सामयिक तौर पर सही) ही मानना चाहिए !

यकीनन। अंतिम सत्य क्या है, यह कौन जानता है?

तो अच्छा गुरु वह है जो शिष्य से कह सके कि मुझ पर भी संदेह करो , क्योंकि मैं भी नहीं जानता कि सत्य क्या है।

बेशक। सच पूछा जाए, तो गुरु और शिष्य, दोनों ही सत्य की खोज में निकले हुए मुसाफिर हैं। इसलिए दोनों में पिता-पुत्र का नहीं, भाई-भाई का संबंध होना चाहिए।

बहन-बहन का नहीं ?

दोनों एक ही बात है। चाहो तो बहन-भाई भी कह सकती हो।

धन्यवाद। कल फिर आऊँगी। आपसे मुझे बहुत कुछ जानना है।

एक शर्त पर।

यह शर्त क्या है ? सुनूँ तो।

मेरी किसी बात को बहस के बिना स्वीकार मत करना।

यह तो मेरा स्वभाव ही है। पर आपसे अधिक बहस मैं अपने आपसे करूँगी।

यही तो मैं भी करता हूँ। अपनी हर बात में मुझे कुछ कमी नजर आती है।

तभी तो मैं आपके प्रति आकर्षित हुई हूँ। अपने को महान जतानेवाले लोगों से मुझे चिढ़ होती है।

अच्छी बात है। कल फिर मिलेंगे।


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