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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


रविवार हमेशा मेरे लिए आलस का संदेश ले कर आता है। वैसे तो नैनीताल में प्रत्येक दिन मेरे लिए रविवार ही था। कुछ करने को तो था नहीं। सिर्फ किताबें पढ़ना, सुमित से मिलना, रेडियो सुनना और देश-दुनिया के बारे में सोचना-विचारना - यही काम था, अगर इसे काम कहा जा सकता है। फिर भी रविवार की अपनी खास खुशबू होती है। मेरा तो खयाल है, इस दिन तपस्या-रत साधु-संत भी अपनी आँखें खोल देते होंगे और आसपास देखने लग जाते होंगे।

ईसाइयों में मान्यता है कि ईश्वर ने छह दिनों में यह सृष्टि बनाई और सातवें दिन विश्राम किया। इसी दिन को रविवार कहा जाता है। मनुष्य ईश्वर की ही छाया है, इसलिए उसे भी रविवार की जरूरत होती है। किन्तु जिसने बाकी छहो दिन कोई काम न किया हो? उसके आदमी होने पर क्या शक करना चाहिए? ईश्वर के नियम मनुष्य पर क्यों लागू हो?

एक और कहावत है, काम ही पूजा है। अगर सचमुच काम ही पूजा है, तब तो रविवार को पूजा बंद रखने का कोई तर्क नहीं है। जरूर काम को पूजा बताने की शुरुआत वर्तमान युग की देन है, जिसमें निरंतर काम करने को प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि उत्पादन बढ़ता रहे। भाड़ में जाए ऐसा उत्पादन, जिसका उपभोग करने का समय भी न मिले। सो मैं जहाँ भी रहूँ, जैसे भी रहूँ, रविवार मेरे लिए छुट्टी का दिन होता है। लेकन आदमी खाली तो रह सकता नहीं। इसलिए कह सकते हैं कि मैं उस दिन वे काम करती हूँ जो सप्ताह के बाकी दिन नहीं कर पाती हूँ।

कल सुमित से मुलाकात नहीं हो पाई थी। वह सुबह से ही कोई किताब पढ़ रहा था। यह कोई बहुत दिलचस्प किताब थी - ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में। उसके हाव-भाव से संकेत मिला कि वह आज उस किताब में ही डूबे रहना चाहता है। सो उसे डिस्टर्ब करना मैंने उचित नहीं समझा। आधे दिन बिस्तर पर करवट बदलती रही, आधे दिन शहर में निरुद्देश्य घूमती रही। बहुत राहत का अनुभव हुआ। दिमाग को भी आराम मिला। बताते हैं, दिमाग कभी नहीं सोता। नहीं सोता होगा, पर वह झपकी तो ले ही सकता है। कल मेरे दिमाग ने एक लंबी झपकी ली। शायद इसीलिए आज वह बिलकुल ताजा था - अपना काम करने के लिए तैयार और उत्सुक।

नाश्ता करने और तीन बार चाय पीने के बाद मैंने अखबार उठाया, तो मुख्य खबर का शार्षक पढ़ कर झटका-सा लगा। पास के ही किसी गाँव में रात को एक दलित के घर में आग लगा दी गई थी। उस समय पूरा परिवार सोया हुआ था - उसकी बूढ़ी माँ, वह, उसकी पत्नी और दो छोटे-छोटे बेटे। आग लगाने के पहले दरवाजे पर बाहर से ताला लगा दिया गया था। नतीजा यह हुआ कि आग लगने पर घर का कोई भी सदस्य निकल कर भाग नहीं सका। सभी जल कर खाक हो गए। उस दलित का कसूर यह था कि उसने गाँव के एक सवर्ण से पाँच बीघा जमीन खरीदी थी। वह इस जमीन पर खेती करना चाहता था। पहले गाँव वालों ने उसे बहुत चेतावनी दी कि तुम्हें खेती करने तो दिया नहीं जाएगा, इसलिए तम्हारी भलाई इसी में है कि जमीन किसी और को बेच दो। पर दलित - उसका नाम सूखाराम था - अड़ा रहा। एक बार जब वह बाजार से लौट रहा था, उस पर चाकू से हमला भी किया गया। फिर भी उसने अपनी जिद नहीं छोड़ी। तब उसके घर में आग लगा दी गई। पुलिस पहुँची, इसके पहले ही गाँव के सभी सवर्ण भाग चुके थे। अखबार में जले हुए घर की बड़ी-सी तसवीर भी छपी थी।

समाचार पढ़ते हुए मेरी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। हे भगवान ! इस देश में यह सब कब तक होता रहेगा? खून की इसकी प्यास कब बुझेगी? दलितों के उत्पीड़न की खबरें बहुत पढ़ चुकी हूँ। कोई हफ्ता ऐसा नहीं जाता जब देश के किसी न किसी कोने से ऐसी खबर न आती हो। पर इस बार घटना एकदम नजदीक में ही हुई थी - लगभग अस्सी किलोमीटर दूर। हत्यारी आग की आँच को मैं अपनी त्वचा पर अनुभव कर रही थी। बार-बार जल कर मर गए पाँचों लोगों का खयाल आता था। जान जाते समय उन्हें कितनी पीड़ा हुई होगी। वे लपटों से बचने के लिए घर से बाहर आने का संघर्ष कर रहें होंगे, पर बाहर से ताला बंद था। उफ! कितनी घुटन, कितनी लाचारी। मुझे लगने लगा, मैं भी जल रही हूँ। मेरी साँस घुट रही है।

मैंने कपड़े बदले और जल्दी से बाहर निकल आई। ताजा हवा में कुछ राहत मिली। दिल लेकिन अभी भी छलनी हो रहा था। मैं सीधे सुमित के कमरे की तरफ बढ़ी। वह कमरे में ही था। मैंने उसे आज का अखबार दिखाया। उसे मेरी उठती-गिरती साँसों का अर्थ समझने में एक पल भी नहीं लगा। वह आ कर मेरे बगल में बैठ गया। मेरी हथेली थामते हुए बोला, 'लगता है, तुमने पहली बार ऐसी घटना पढ़ी है। यह सब पढ़ते-सुनते मेरे आँसू सूख चुके हैं।'

'लेकिन...फिर भी...' मुझे उसकी उदासीनता पर आश्चर्य हुआ।

'हाँ, फिर भी...पर समस्या इतनी गहरी है कि समझ में नहीं आता क्या किया जाए। ऐसी हर घटना बताती है कि हम कितने असभ्य हैं। कोई भी मौत सबसे पहले जिंदगी की क्वालिटी के बारे में एक बयान है...'

'चलो, उस गाँव को देख आएँ जहाँ यह घटना हुई है। ज्यादा दूर नहीं है,' मैंने प्रस्ताव रखा।

सुमित ने कहा, 'तुम चाहो तो चल सकते हैं। पर कोई लाभ नहीं होगा। सिर्फ हमारी उदासी बढ़ेगी। अगर परिवार में कोई बचा होता, तो हम कुछ मदद भी कर सकते थे। दलित समाज की नजर में हम सिर्फ पर्यटक कहलाएँगे। दुख की किसी भी जगह पर पर्यटक बन कर नहीं जाना चाहिए।'

दोपहर को मुझसे खाना नहीं खाया गया। सुमित भी गुमसुम ही रहा। बीच-बीच में उसकी मुट्ठियाँ भिंच जातीं, फिर जैसे असहायता-बोध उस पर तारी हो जाता।

अब हम मेरे कमरे में थे।

सुनंदा, तुमने दलित लेखकों की आत्मकथाएँ पढ़ी हैं?

बहुत पहले एक आत्मकथा पढ़ने के मिली थी। लेखक कोई लिंबाले थे। उनकी ट्रेजेडी पढ़ कर मैं कई दिनों तक छटपटाती रही थी। मुझे यकीन ही नहीं होता था कि ऐसा भी हो सकता है।

देश की सच्ची हालत जाननी हो, तो ऐसी सभी आत्मकथाओं को पढ़ना चाहिए। जिन्हें हिन्द पर नाज है, उनकी आँखें खुली की खुली रह जाएँगी। ये तो कुछ जिंदगियों और गाँवों के दस्तावेज हैं। संभव है, इससे भी ज्यादा नृशंस कहानियाँ किसी सक्षम लेखक का इंतजार कर रही हों।

मैंने कहीं पढ़ा है कि दलितों द्वारा अपनी आलोचनाओं के बारे में गांधी जी ने कहा था कि हम लोगों ने उनके साथ जो अत्याचार किया है, उसे देखते हुए दलित लोग मेरे मुँह पर थूक दें, तब भी कम है।

उन्होंने एकदम सही कहा था। आज दलित लेखक हिन्दू समाज के मुँह पर थूक ही तो रहे हैं। फिर भी यह समाज इतना बेशर्म है कि उसे होश नहीं आ रहा है। वह सोचता है कि हिन्दू समाज की इस सबसे बदसूरत विरासत को वह और आगे तक खींच सकेगा। जातिवाद और छुआछूत जैसी प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न हिंसा दुनिया में शायद ही कहीं रही हो। हिटलर एक हुआ है, स्टालिन भी एक ही हुआ था। यहाँ तो गाँव-गाँव में हिटलर और स्टालिन भरे पड़े हैं। हम शहर वाले भारत के इस यथार्थ से बिलकुल परिचित नहीं हैं।

तुम ठीक कहते हो। लिंबाले की आत्मकथा पढ़ने के पहले मुझे ही कहाँ पता था कि हमारे गाँवों में ऐसी भी जिंदगियाँ जी जा रही हैं। लेकिन इस समस्या का समाधान क्या है ? इस बारे में तुमने कुछ विचार किया है ?

एक प्रस्ताव तो यह है कि अंतरजातीय विवाह को अधिक से अधिक प्रोत्साहन दिया जाए। जाति प्रथा के दो आयाम हैं - रोटी और बेटी। रोटी के मामले में जातियाँ करीब आ रही हैं, हालाँकि गाँवों में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है। अभी भी हजारों गाँवों में चाय और खाने-पीने की दुकानों पर दलितों के लिए अलग गिलास और बरतन रखे जाते हैं। उनका छुआ या बनाया खाना अन्य जातियों के लोग स्वीकार नहीं करते। शहरों में ऐसी बात नहीं है। लेकिन बेटी के मामले में जातिगत दुराग्रह अभी भी जबरदस्त हैं। कोई भी अखबार उठा लो और वैवाहिक विज्ञापनों को देखो, जाति की हकीकत सिर पर चढ़ कर बोलती नजर आएगी। इस मामले में अंग्रेजी पढ़ा-लिखा वर्ग भी बराबर का कूपमंडूक है। इसलिए बहुत-से लोग सोचते हैं कि अगर बेटी की बाधा तोड़ी जा सके, तो जाति की पकड़ कमजोर होगी।

रबिश, टोटली रबिश। ये लोग शादी को समझते क्या हैं ? लोग अपनी मर्जी से शादी-ब्याह करते हैं, न कि समाज सुधार के लिए। समाज सुधार सामाजिक मामला है। विवाह व्यक्तिगत मामला है। दोनों को जोड़ने की वही सोच सकते हैं जिन्हें रात में ही नहीं, दिन में भी कम नजर आता है। जब माँ-बाप शादी तय करते हैं, तो वे अपनी जाति के भीतर ही घर, वर, दहेज आदि पर विचार करते हैं। उनसे यह उम्मीद करना कि वे जाति के बाहर ही लड़का या लड़की खोजेंगे, साधारण आदमी को महापुरुष बनाने की कोशिश करना है। महापुरुष पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते।

हाँ, प्रेम विवाह में जरूर जाति का ध्यान नहीं रखा जाता। लेकिन प्रेम विवाह का उद्देश्य भी जाति तोड़ना नहीं होता। यहाँ जाति टूटती है, तो अनजाने में। पर हमारे देश में प्रेम विवाह का स्कोप इतना कम है कि इससे कोई बड़ी उम्मीद नहीं की जा सकती। एक और बात है। प्रेम विवाह में जाति नहीं, वर्ग जरूर देखा जाता है। इसलिए ये ज्यादातर सवर्णों के अपने दायरे में ही होते हैं। ऐसा लाखों में एक ही होता है कि कोई ऊँची जाति का लड़का किसी दलित लड़की से विवाह करे। दलित लड़के के लिए तो सवर्ण प्रेमिका खोज पाना और भी मुश्किल है। इसलिए अंतरजातीय विवाहों से भी दलितों का कोई लाभ होगा, ऐसा नहीं लगता।

तो?

तो यह कि दलित समस्या का वास्तविक समाधान शायद यही है कि तीव्र आर्थिक विकास हो, ताकि दलित मध्य वर्ग में शामिल हो सकें। जब गरीबी और विषमता खत्म हो जाएगी, तब समाज में एक नए प्रकार की समता कायम होगी। तब जाति का महत्व धीरे-धीरे कम होता जाएगा।

यानी कृषि सभ्यता में अस्पृश्यता इसलिए चलती रही क्योंकि वह आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से लगभग स्थिर समाज था। दलित विद्रोह नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनकी जीविका के साधन तक द्विज जातियों के कब्जे में थे। गाँव के बाहर रोजगार नहीं था। था भी तो, तो दलित को रोजगार कौन देता ? दलित अपनी जाति छिपा कर काम करता, तब और भारी संकट था। उसकी जाति खुल जाने पर उसकी हत्या तक हो सकती थी। औद्योगिक समाज जाति और धर्म की बेड़ियों को खत्म भले ही न कर सके, पर कमजोर तो कर ही देता है। लेकिन सवाल यह है कि भारत का उद्योगीकरण होने में कितना समय लगेगा ?

पता नहीं। अगले पचास साल तक तो यह संभव दिखाई नहीं देता। दरअसल, देश भर का उद्योगीकरण करने में सरकार की दिलचस्पी भी नहीं है। वह किसानों को खेती तक सीमित रखना चाहती है - चाहे वे जलें या मरें।

मेरा खयाल है, बड़े-बड़े कारखानों और आधुनिकतम तकनीक से भारत का उद्योगीकरण हो भी नहीं सकता। इसमें पूँजी ज्यादा लगती है और रोजगार कम पैदा होता है। आजकल तो जॉबलेस ग्रोथ की चर्चा होने लग गई है। यानी आर्थिक प्रगति होगी, पर नए रोजगार नहीं पैदा होंगे। इससे सबसे ज्यादा खतरा दलितों को ही है।

इसीलिए तो मेरी राय में दलितों को पूँजीवाद में अपनी जगह खोजने के बजाय समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। तुम्हें पता है, डॉ. अंबेडकर खुद समाजवादी थे। उनका मानना था कि सभी भारी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए।

अच्छा ? तो फिर आज के अंबेडकरवादी बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था और विदेशी पूँजी का समर्थन क्यों कर रहे हैं ? क्या इससे उनके लिए मुक्ति का कोई रास्ता खुलता है ?

थोड़ा-बहुत खुल सकता है। पर इसका फायदा दलितों के पढ़े-लिखे हिस्से को मिलेगा। साधारण दलित की हालत तो बदतर हो जाएगी, क्योंकि वह तब भी बाजार पर आधारित अर्थव्यवस्था से बाहर ही रहेगा।

फिर दलित बुद्धिजीवी अपनी जमात के पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मार रहे हैं ? क्या वे इस हकीकत को नहीं समझते ?

वे सब समझते हैं। पर उनके सरोकार के केंद्र में गरीब दलित नहीं, मध्यवर्गीय दलित है। या, वह दलित है, जो जल्दी से जल्दी मध्य वर्ग में शामिल होने के लिए आकुल है।

दलितों का राजनीतिक नेतृत्व भी इसी लाइन पर काम करता नजर आता है। वह सारी सुख-सुविधा अपने लिए चाहता है। गरीब दलितों की हथेली पर चवन्नी-अठन्नी फेंक कर वह चाहता है कि वे उसे दलितों का भगवान समझें। ।

राजनीति की छोड़ो। यह तो छल का धंधा है। मुश्किल यह है कि दलित लेखक और विचारक भी आर्थिक विकास के कोण से विचार करना नहीं चाहते। शायद इसलिए कि तब मामला दलित समाज तक सीमित नहीं रह जाएगा, पूरे समाज का हो जाएगा, क्योंकि गरीबी सिर्फ दलितों में नहीं है, तीन-चौथाई समाज में फैली हुई है। इसीलिए गरीबी मिटेगी, तो पूरे समाज की मिटेगी, सिर्फ दलित समाज की नहीं।

एकदम ठीक। दलित प्रश्न जाति का मामला तो है ही, वर्ग का मामला भी है। सवर्णों ने दलितों को संपत्ति और आय के सभी साधनों से वंचित कर रखा है। उन्हें जन्म से ही जूठन पर पलने को मजबूर किया। इसीलिए दलितों में विद्रोह की भावना बहुत देर से पैदा हुई। आज जबकि उनमें जाग्रति आ रही है और मनुष्य की तरह जीने की छटपटाहट बढ़ रही है, वे पाते हैं कि उनके लिए सारे रास्ते बंद हैं। इसीलिए उनमें इतना आक्रोश दिखाई देता है। कल की घटना ऐसी ही है। इस दलित परिवार को जला कर खाक कर दिया गया, क्योंकि उसने कुछ संपत्ति बना ली थी। यह सवर्णों को गवारा नहीं हुआ।

लेकिन क्या तुम ऐसा नहीं सोचते कि सवर्णों के इस विद्वेष के पीछे मुख्यतः जाति की भावना ही है ? गाँव के ऊँची जाति वालों के मन में यह बात लगातार घुमड़ रही होगी कि एक दलित की यह हिम्मत कि वह जमीन का मालिक हो जाए ?

सचमुच। लेकिन ऐसा इसलिए है कि इक्का-दुक्का दलितों को ही इस तरह की सफलता मिल पा रही है। कल अगर सभी दलित और गैर-दलित एक साथ खुशहाली की जिंदगी जीने लगें, तो सवर्णों का आक्रोश घटने लगेगा। दुख की बात यह है कि दलित सिर्फ जाति व्यवस्था से नाराजगी दिखा रहे हैं। सिर्फ इस आक्रोश से जाति व्यवस्था को कोई बड़ा झटका लगने वाला नहीं है। अब यह भी साफ हो चुका है कि आरक्षण तथा विशेष सुविधाओं से दलितों की समस्या हल होने वाली नहीं है। इससे दलितों के बीच एक छोटा-सा मध्य वर्ग जरूर पैदा हो रहा है, पर साधारण, दीन-हीन दलितों को, जिनकी संख्या बहुत बड़ी है, कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। दलितों की सामूहिक शक्ति मुख्य मंत्री मायावती को जन्म दे सकती है, पर मायावती दलितों को संपन्न और सम्मानित नहीं कर सकतीं। मायावती जैसे दलित नेताओं के लिए दलित सिर्फ सीढ़ी हैं।

इसका मतलब यह है कि दलित विचारकों, लेखकों और कार्यकर्ताओं को समाज के प्रगतिशील वर्गों के साथ हाथ मिलाना चाहिए और दलित प्रश्न को एक वृहत्तर संदर्भ में देखना चाहिए। तभी कोई बड़ा अभियान चलाया जा सकता है।

रास्ता तो यही है। पर हो उलटा रहा है। दलितों में एक तरह का अलगाववाद विकसित हो रहा है। मैं नहीं समझता कि अलगाववाद के इस रास्ते से समस्या सुलझ सकेगी। बल्कि यह और जटिल होती जाएगी।

कैसे ?

भई, दलितों को रहना तो इसी देश और समाज में हैं। न वे अपना अलग देश बना सकते हैं न वे अपने को अन्य जातियों से अलग कर कोई अपना समाज बना सकते हैं। किसी एक समूह की अपनी स्वतंत्र अर्थव्यवस्था नहीं हो सकती। मेरे खयाल से, यह आत्म-बहिष्कार है, जो हो सकता है सवर्णों द्वारा किए जाने वाले बहिष्कार से कम दुखदायी हो, पर कई मामलों में उससे ज्यादा संकटपूर्ण होगा। प्रश्न सिर्फ सिद्धांतों का नहीं, व्यावहारिकता का भी है। अंतिम लक्ष्य तो यही होना चाहिए कि सवर्णों और अवर्णों के संबंध सुधरें तथा जाति के आधार पर कोई फैसला न लिया जाए।

इसका मतलब यह है कि जातिविहीन समाज बनाने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी सवर्णों पर है।

है ही। जिसने पाप किया है, प्रायश्चित भी उसे ही करना होगा। दुख इस बात का है कि सवर्ण समुदाय अभी भी अपने पाप को पाप मानने को तैयार नहीं हैं। वे अभी भी पाँच सौ साल पुरानी मानसिकता में जी रहे हैं।

मुझे तो लगता है कि हमारा सवर्ण वर्ग किसी भी स्तर पर आधुनिक और प्रगतिशील नहीं है। बस उसने आधुनिकता का खोल ओढ़ लिया है। उसके पाखंड की कोई सीमा नहीं है। दलित प्रश्न पर ही क्यों, स्त्री के प्रश्न पर, गरीबी के प्रश्न पर, शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रश्न पर, कला और साहित्य के प्रश्न पर वह अपने ही स्वार्थों से परिचालित होता है - बाकी दुनिया जाए भाड़ में।

हाँ, राजनीति में वह दलितों की बात जरूर करता है। यह उसकी मजबूरी है, क्योंकि उनका वोट जो लेना है। लोकतंत्र की यही सिफत है कि जीतने वाले को सभी वर्गों का वोट चाहिए।

लेकिन सुमित, दलित राजनीति भी तो इसी रास्ते पर चल रही है। उसने कोई अपना अलग राजनीतिक मॉडल नहीं खड़ा किया है।

यह दलित चेतना का पहला उभार है। संभव है, अगले दौर में धीरज और दूरदर्शिता के साथ सोचने की शुरुआत हो।

लेकिन दलितों की विचारधारा तभी बदलेगी, जब सवर्ण समाज दलितों की ओर ईमानदारी से दोस्ती का हाथ बढ़ाए। सिर्फ लिखने और बोलने के स्तर पर नहीं, जीवन व्यवहार में भी।

जम्हाई लेते हुए सुमित ने कहा, 'काश, मैं दलित होता'

'और मैं दलिता।'

इस बार हम हँसे नहीं, कुछ और संजीदा हो गए।


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