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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


ऐसे दृश्य की मैं कल्पना जरूर कर सकती हूँ, पर देखा कभी नहीं था। सुबह टहल कर लौट रही थी। स्टेशनरी की दुकान से मुझे कुछ चीजें लेनी थीं। आठ बजे होंगे। दुकान बंद थी। दुकानदार अपने बच्चे को पीट रहा था। उसकी गुस्सैल बातों से पता चला कि उसका बेटा कई दिनों से स्कूल नहीं जा रहा था। स्कूल जाने के नाम पर घर से निकलता था, पर जाता नहीं था। इधर-उधर घूम-घाम कर सही समय पर घर लौट आता था। जब स्कूल से शिकायत आई, तब घरवालों को उसकी कारगुजारी का पता चला। खूब मार पड़ी। आज सबेरे पिता उसेअपने साथ स्कूल ले जाना चाहता था और बच्चा किसी भी कीमत पर इसके लिए तैयार नहीं था। दोनों के बीच तुमुल संघर्ष चल रहा था।

जब मैं वापस गेस्ट हाउस पहुँची, तो सुमित रिसेप्शन हॉल में एक सोफे पर बैठा चाय पी रहा था और अखबार पढ़ रहा था। मैं उसके बगल में जा कर बैठ गई। सुमित ने अखबार का एक पन्ना दिखाया, जिसमें एक लड़के द्वारा आत्महत्या करने की खबर थी। लड़के का पिता राज्य सरकार में बड़ा अफसर था। वह लड़के को डॉक्टर बनाना चाहता था। लेकिन वह मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में फेल हो गया। दिल्ली के अपने एक दोस्त से अपने फेल होने की सूचना उसे शाम को मिली। उसी रात उसने फाँसी लगा ली। अखबार में फोटो भी छपा था, जिसमें अफसर महोदय बैठकखाने में सिर झुकाए कुरसी पर बैठे हुए थे और उनकी पत्नी फर्श पर बैठी आँसू बहा रही थी। आसपास के लोग जमा हो गए थे और उन्हें ढाढ़स बँधा रहे थे। यह सारा दृश्य दिल दहला देने वाला था।

मैंने सुमित को सबेरे वाली घटना बताई। उसने उदास होते हुए कहा, दोनों एक ही कहानी के अलग-अलग टुकड़े हैं। शिक्षा के हमारे मैनेजरों को पता नहीं कब अक्ल आएगी।

पास बैठे एक सज्जन ने टिप्पणी की, भाई साहब, उन्हें खूब अक्ल है। कल की बात बताता हूँ। मेरे एक दोस्त का बेटा पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी है। दो हफ्ता पहले वह बरेली के एक कॉलेज में लेक्चरर लग गया। कल मुझे पता चला, तो मैंने दोस्त को फोन किया। उसने बताया कि पाँच लाख में सौदा हुआ था। मैंने झिड़का तो बोला, यार, क्या करता। लड़के को कहीं न कहीं लगाना था। उसके अंक इतने कम हैं कि उसे कोई अच्छी नौकरी तो मिल नहीं सकती थी। सो मैंने सोचा कि कुछ खर्च करके लेक्चरर ही लगवा दूँ। जितना खर्च किया है, उतना तो वह दो-तीन साल में कमा लेगा। आगे मौज ही मौज है। पेंशन भी मिलेगी। समझो, उसकी जिंदगी बन गई।

सज्जन ने मेरी तरफ नजर घुमाई। बोला, बताइए मैडम, क्या तो यह लड़का पढ़ाएगा और क्या तो लड़के पढ़ेंगे। आप क्या समझती हैं, पाँच लाख की रकम किसी एक आदमी के पास गई होगी? सब मिल-बाँट कर खाते हैं। मैंने तो सुना है, मुख्य मंत्री और शिक्षा मंत्री तक उनका हिस्सा जाता है।

हमने सिर हिला कर उनकी बात का अनुमोदन किया और माफी माँग कर नाश्ता करने के लिए डाइनिंग हॉल में जा बैठे। नाश्ते का आदेश दे कर बातचीत करने लगे।

सुमिता, मेरा खयाल है, हमारे यहाँ जिस व्यवस्था में सबले ज्यादा सड़ाँध है, वह शिक्षा व्यवस्था ही है। लोग कहते हैं, हमने यह शिक्षा पद्धति पश्चिम से नकल की है। सभी मैकाले को दोष देते हैं। इन मूर्खों को पता नहीं कि पश्चिम की शिक्षा प्रणाली कहाँ से कहाँ चली गई है और हम उसकी सौ साल पुरानी जूठन ले कर पगुरा रहे हैं। काश, हम पश्चिम की अच्छी नकल ही कर पाते।

मुझे तो लगता है, हमने शिक्षा के बारे में कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं। जो भी शिक्षा मंत्री आया, कुछ दिन तक मौज करके चला गया। वह भी क्या करता, जब सरकार चाहती ही नहीं कि शिक्षा के बारे में कोई ठोस नजरिया अपनाया जाए। जो देश के लिए योजनाएँ बनाते थे, उनकी माँग सिर्फ यह थी कि नए भारत का निर्माण करने के लिए हमें बड़ी संख्या में डॉक्टर और इंजीनियर चाहिए। यह सपना उन्होंने देखा ही नहीं कि हमारे सभी नागरिक शिक्षित हों, हर बच्चा पढ़ने जाए, सबकी ऊर्जा का इस्तेमाल हो। सो हमारी शिक्षा व्यवस्था लँगड़ाती-भचकती चलती रही। हिन्दी के किसी कवि की लाइन है न, चरमर चरमर चूँ मरर मरर जा रही चली भैंसा गाड़ी। यह कविता मैंने बचपन में पढ़ी थी।

मुझे तो लगता है, यह पूरा देश ही भैंसागाड़ी है - चरमर चरमर चूँ मरर मरर..

पर भैंसागाड़ी की भी कोई दिशा होती है। वह कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल नहीं घूमती।

इस भैंसागाड़ी की भी दिशा है, सुनंदा। यह भैंसागाड़ी एक पूर्व-निर्धारित लक्ष्य की ओर ही बढ़ रही है। पहले हम समझते थे कि नादानी है या गफलत है। अब यह साफ हो चुका है कि षड्यंत्र है। नहीं तो हमारे मंत्री और नेता लोग कम से कम इतना तो कर ही सकते थे कि एक राष्ट्रीय अभियान चला कर पूरे देश को साक्षर ही बना दें। इतने दिन बीत गए, अभी भी केरल को छोड़ कर कोई भी राज्य शत प्रतिशत साक्षर नहीं हो पाया है। केरल छोटा-सा राज्य है। वहाँ की अपनी एक शिक्षा परंपरा भी है। इसलिए उसे अपवाद मानना चाहिए। पश्चिम बंगाल में तो वामपंथी पार्टियाँ पूरे चौंतीस साल तक शासन करती रहीं, पर उन्होंने सर्व शिक्षा को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। मैं तो चाहता हूँ कि तीन साल तक सारे कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद कर दिए जाएँ और प्रोफेसरों को प्राथमिक शिक्षा फैलाने में लगा दिया जाए। तीन साल तक बीए, एमए न निकलें, तो आसमान टूट कर गिरने वाला नहीं है।

सुमित, तुम भूल रहे हो। यह योजना कितनी भी अच्छी हो, पर हमारा मध्य वर्ग इसे सफल होने नहीं देगा। वह देश भर में शोर मचाने लगेगा कि इससे हमारे बच्चों का कॉरियर बरबाद हो जाएगा। वे हायर स्टडी में पूरे तीन साल पिछड़ जाएँगे। प्रोफेसर लोग भी गाँवों की खाक छानने के लिए तैयार नहीं होंगे। सभी कार्ट चले जाएँगे और जज लोग इस अभियान को जन हित के विरुद्ध करार दे कर निरस्त कर देंगे। वे कहेंगे कि एक की भलाई के लिए दूसरे का नुकसान नहीं किया जा सकता। सरकार मुँह देखती रह जाएगी।

अजी छोड़ो, सरकार चाहे तो और भी दूसरे तरीके हैं। एक साक्षरता सेना तैयार की जा सकती है। इसमें बड़े पैमाने पर पढ़े-लिखे लोगों की भरती की जा सकती है। सभी विभागों के सरकारी कर्मचारियों से कहा जा सकता है कि वे दफ्तर में दो घंटे कम काम करें और वह वक्त साक्षरता अभियान को दें। इस तरह कोशिश की जाए, तो मेरा अनुमान है कि सिर्फ दो साल में देश भर को साक्षर बनाया जा सकता है। अगले दो वर्ष नागरिकों को शिक्षित तथा जागरूक बनाने में लगाए जाएँ। उन्हें संविधान के बारे में बताया जाए, जरूरी कानूनों से अवगत कराया जाए, उनके अधिकारों से अवगत कराया जाए, उन्हें बताया जाए कि नागरिक के रूप में उनके कर्तव्य क्या हैं, तो देश भर में भारी बदलाव आ जाएगा।

यही तो सरकार नहीं चाहती। उसे जागे हुए लोग नहीं, सोए हुए लोग चाहिए। तभी देश में उस तरह का लोकतंत्र चल पाएगा जैसा वे चला रहे हैं। मतदाता जागरूक हो जाएँ, तो हमारी इस सड़ी-गली राजनीति का क्या होगा ?

एक घटना बताता हूँ। एक दोस्त के सुझाव पर मैंने साल भर तक एक मजदूर यूनियन में काम किया था। उस यूनियन के सदस्य ज्यादातर अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे लोग थे। जैसा कि उन दिनों किसी भी कारखाने के मजदूर होते थे। । मुझे उम्मीद थी कि उनके हक की लड़ाई के दौरान उन्हें कम से कम न्यूनतम पढ़ा-लिखा दिया गया होगा। एक-दो महीना काम करने के बाद पता चला कि इस दिशा में कोई काम नहीं किया गया था। यूनियन के प्रेसिडेंट को मैंने सुझाव दिया कि मजदूरों को शिक्षित करने के लिए मैं रोज शाम को दो घंटे देना चाहता हूँ। वे हँसने लगे। बोले, इन्हें पढ़ाने की क्या जरूरत है? इनकी लड़ाई लड़ने के लिए हम हैं न। मैंने कहा कि शिक्षित होने पर ये अपने अधिकारों को ज्यादा अच्छी तरह समझ सकेंगे और उनकी मदद से हम उनकी लड़ाई को और तेज कर सकेंगे। यह सुन कर उनकी त्यौरी चढ़ गई। बोले, तुम्हें जो कहा जा रहा है, करो। क्रांति करनी है, तो कहीं और चले जाओ। हमारे यहाँ तो वैसे ही काम होगा जैसे होता रहा है।

अच्छा ! शायद इसलिए कि अनपढ़ मजदूरों पर वे अपना राज ज्यादा असरदार तरीके से लाद सकेंगे। मजदूरों में चेतना जग गई, तो वे अपने नेताओं को दलाली नहीं करने देंगे।

और नहीं तो क्या। इसीलिए किसानों को भी अनपढ़ रखा गया। उनसे सिर्फ यह उम्मीद की जाती है कि वे अन्न का उत्पादन बढ़ाएँ। मानो किसान अनाज पैदा करने की मशीन हों, जीते-जागते इनसान न हों। खेती की जमीन उतनी ही रहे और हल चलाने के लिए कई पीढ़ियाँ और जुड़ जाएँ। इसी से तो खेती चौपट हुई है।

लेकिन बच्चों को बड़े पैमाने पर पढ़ाई-लिखाई से वंचित क्यों रखा गया ? सरकार के पास सड़क और पुल बनाने के लिए पैसे थे, शानदार इमारतें खड़ी करने के लिए पैसे थे, हर साल दो-चार नए विश्वविद्यालय खेलने के लिए पैसे थे, पर पर्याप्त संख्या में स्कूल खोलने के लिए पैसे नहीं थे।

बात बहुत सीधी है। आजादी के बाद जिस तरह का आर्थिक सिस्टम बनाया गया, उसमें थोड़े-से लोगों को ही रोजगार दिया जा सकता था। जब सारे बच्चे पढ़ने-लिखने लगेंगे, तो वे बड़े हो कर रोजगार की माँग करेंगे। पूरी आबादी को रोजगार मुहैया करने की योजना ही नहीं थी, तो शिक्षितों की इतनी बड़ी फौज तैयार करने का खतरा सरकार कैसे उठा सकती थी? यह तो सीधे-सीधे अशांति और उपद्रव को न्योता देना था। आज भी सबसे ज्यादा बेकारी शिक्षित युवकों में ही है। वे अपनी डिग्रियों को ढोते-ढोते ऊब गए हैं।

मैंने तो सुना है कि आजकल इंजीनियर और एमबीए भी मारे-मारे फिर रहे हैं। एमए, बीए को तो कोई पूछता ही नहीं।

क्या बताएँ। अब तो यह कहा जाने लगा है कि भारत के अधिकांश लोग बेकार हैं तो इसीलिए कि वे कोई काम करने के काबिल ही नहीं हैं। उन्हें रोजगार दे कर कौन अपने पाँवों पर कुल्हाड़ मारना चाहेगा ?

बात वैसे पूरी तरह गलत नहीं है, पर यह तो पूरे देश का अपमान है। इस अपमान के लिए कौन जिम्मेदार है ? निश्चय ही वे नहीं जो यह तहमत लगाते हैं। वे तो एक व्यावहारिक बात कर रहे हैं। इसकी जिम्मेदारी उनके सिर है जो देश की शिक्षा प्रणाली का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने एक पूरी अधकचरी पीढ़ी पैदा कर रखी है। यही सिलसिला आगे भी चलने वाला है, क्योंकि चीजें लगातार बिगड़ती जा रही हैं।

बिगड़ेंगी ही, क्योंकि अब तो सरकार ने बाकायदा नीति बना कर शिक्षा की जिम्मेदारी से अपने हाथ झाड़ लिए हैं। शिक्षा के विकास का काम निजी सेक्टर को दे दिया गया है। दरअसल, उच्च और मध्य वर्ग ने अपने बच्चों के लिए अलग स्कूल चलाना बहुत पहले ही शुरू कर दिया था। जो छिटपुट था, वही अब नियम बन गया है। शिक्षा की एक समानांतर व्यवस्था बन गई है। निम्न-मध्य और निर्धन वर्गों के बच्चों के लिए या तो अधकचरे सरकारी स्कूल हैं या फिर पब्लिक स्कूलों की नकल पर खड़े किए जा रहे टुटपुँजिया इंग्लिश मीडियम स्कूल। जब इन बच्चों का कंपटीशन संपन्न प्राइवेट स्कूलों के टाईदार नफीस बच्चों से होगा, तो बिलकुल साफ है कि कौन जीतेगा। मैं शिक्षा मंत्री बनूँ, तो सबसे पहले स्कूलों में टाई पहनने को गैरकानूनी करार दूँ।

इसमें कोई शक-शुबहा नहीं है। सुना है कि यूरोप-अमेरिका में सभी के लिए एक ही तरह के स्कूल हैं। मालिक और नौकर, दोनों की संतानें एक ही स्कूल में पढ़ती है। इसीलिए ध्यान रखा जाता है कि स्कूलों का स्तर गिरने न पाए। हमारे अभागे देश में पता नहीं कितनी तरह के स्कूल हैं - पंचायत का स्कूल, नगरपालिका का स्कूल, राज्य सरकार का स्कूल, केंद्र सरकार का स्कूल, अमीर प्राइवेट स्कूल, गरीब प्राइवेट स्कूल, गली-गली में चलने वाले फटीचर स्कूल ... अब तो कई स्कूल अपने नाम के पहले अंतरराष्ट्रीय लिखने लगे हैं। एक सिरे पर लाखों स्कूल ऐसे हैं जिनके बच्चों के सिर पर छत तक नहीं हैं। दूसरी तरफ ऐसे स्कूल खुलते जा रहे हैं, जिनके क्लासरूम ही नहीं, बसें तक एअरकंडीशंड हैं। यह है शिक्षा का हमारा लोकतंत्र, जिसमें अमीर परिवार के एक बच्चे पर उससे बहुत ज्यादा खर्च होता है जितना गरीब परिवारों के एक हजार बच्चों पर खर्च होता है। तिस पर हम दावा करते नहीं अघाते कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। मैं तो कहूँगी, यह दुनिया का सबसे भोंडा लोकतंत्र है। हम लोग शायद लोकतंत्र का मतलब ही नहीं समझते।

लोकतंत्र का मतलब समझते होते, तो अंग्रेजी को इतनी तरजीह न दी जाती। दुनिया के सभी शिक्षाशास्त्री मानते हैं कि पढ़ाई अपनी मातृभाषा में ही होनी चाहिए। तभी छात्रों की प्रतिभा निखर सकती है। पर हम अंग्रेजी को छाती से चिपकाए बैठे हैं। लोग कहते हैं कि अंग्रेजी के बिना देश की तरक्की नहीं हो सकती। मेरा मानना है कि अंग्रेजी हमारे देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। तुम्हें पता है, सबसे ज्यादा बच्चे अंग्रेजी में ही फेल होते हैं। जब तक स्कूल-कॉलेजों में अंग्रेजी बनी रहेगी, हमारी शिक्षा व्यवस्था का कूबड़ जाने वाला नहीं है। टाई की तरह अंग्रेजी भी रास्ते का भारी पत्थर है।

अब तो सभी राज्यों में अंग्रेजी कक्षा एक से पढ़ाई जा रही है !

इससे ज्यादा बेहूदा बात और क्या हो सकती है? वे समझते हैं कि इससे पूरा देश अंग्रेजीमय हो जाएगा। कैसे हो जाएगा? अंग्रेजी पढ़ाने वाले इतने शिक्षक कहाँ हैं? और हों भी जाएँ, तो इससे फायदा क्या है? क्या हम अंग्रेजी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाना चाहते हैं? होगा यह कि देश का एक छोटा-सा हिस्सा इंग्लैंड या अमेरिका बन जाएगा और बाकी लोग धूप में तपते रहेंगे।

यार, यह तो अभी ही हो गया है। हर शहर में अंग्रेजी वालों का एक खास तबका है। उन्हीं के हाथ में सारी सत्ता है। जितनी मल्टीनेशनल कंपनियाँ आ रही हैं, वे सभी अंग्रेजी में काम करती हैं। अंग्रेजी न जानने वाले बच्चे उनमें घुस भी नहीं सकते। जो भारतीय कंपनियाँ मल्टीनेशनल हो रही हैं, उनके यहाँ भी अंग्रेजी का प्रकोप है। मुझे इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि यह देश के ज्यादातर हिस्सों को पिछड़ा बनाए रखने की साजिश है।

सच तो यह है कि हमारे देश में लोक भाषाओं को कभी सम्मान मिला ही नहीं। न धर्म में, न कर्म में। एक जमाने में संस्कृत का महत्व था, फिर फारसी का हुआ, उसके बाद अंग्रेजी का। जन भाषाएँ उपेक्षित की उपेक्षित रहीं। यह ताकतवर लोगों के हाथ में एक ऐसा औजार रहा है, जिसकी मदद से उन्होंने सदियों तक देश के अधिकांश लोगों को शिक्षा से वंचित किया हुआ है। यही कुत्सित परंपरा आज भी जारी है। इसके लिए जाति प्रथा भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। शिक्षा और ज्ञान पर ऊँची जातियों का एकाधिकार बना रहा। देश को पिछड़ा बनाए रखने में इनका निहित स्वार्थ था। ये जातियाँ हमेशा अपने वर्ग हित में काम करती रहीं। आज भी कर रही हैं। मुश्किल यह है कि जो पिछड़ी जातियाँ या दलित सत्ता में आ रहे हैं, वे भी अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती नहीं देते। वे भी अपने लड़कों-लड़कियों को अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में पढ़ाते हैं। जो ज्यादा समर्थ हैं, वे तो सीधे विदेश भेज देते हैं।

इस हरामजादी अंग्रेजी ही के कारण भारत की उच्च शिक्षा का फायदा इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि देशों को मिल रहा है। हमारी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएँ यहाँ सस्ते में पढ़ाई करती हैं और ज्यादा पैसा कमाने के लिए विदेश चली जाती हैं। मेरे कई अच्छे दोस्त देश छोड़ कर पश्चिम की ओर कूच कर चुके हैं। इन दोस्तों से फोन पर बात होती है, तो मैं इन्हें भारतद्रोही कह कर संबोधित करती हूँ। उन्हें शर्म भी नहीं आती। वे इसे जोक समझते हैं और ठठा कर हँसने लगते हैं।

अगर मैं शिक्षा मंत्री होता, तो यह कानून बना देता कि जिसने भी भारत में रह कर उच्च शिक्षा हासिल की है, वह कम से कम पाँच साल तक भारत में काम करने के बाद ही विदेश में नौकरी करने जा सकता है।

माफ करना, तुम्हारे इस प्रस्ताव को मंत्रिमंडल पहली बैठक में ही खारिज कर देता। आखिर इसी वर्ग के लड़के-लड़कियाँ डिग्री लेते ही विदेश भागते हैं।

इसका मतलब यही है कि जब तक देश में सामंतवाद, सरकारवाद और पूँजीवाद जारी है, तब तक शिक्षा प्रणाली में कोई सुधार नहीं हो सकता।

तुम्हारी ही बात दुहराऊँ, तो इन तीन बुराइयों के जारी रहते किसी भी प्रणाली में कोई सुधार नहीं हो सकता।

बेशक। जब जड़ में ही घुन लगा हुआ है, तब पत्तों और फूलों में मुसकान कहाँ से आ सकती है?

कुछ लोगों का कहना है कि पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को शामिल करने से मूल्यों के क्षरण को रोका जा सकता है। इस बारे में तुम्हारी राय क्या है ?

मैं क्या कह सकता हूँ ? इसे ले कर मेरे मन में कई संदेह हैं। पहली बात यह है कि वह नैतिक शिक्षा हो, धार्मिक शिक्षा न हो। जिन्हें अपने बच्चों को धार्मिक शिक्षा देनी है, वे यह काम घर पर करें। इसके लिए अलग से पाठशालाएँ खोलें, जिन्हें सरकार की ओर से एक पैसे का भी अनुदान न दिया जाए। दूसरी बात यह है कि नैतिक शिक्षा तभी कारगर होगी जब आसपास का वातावरण भी नैतिक हो। घर के माहौल में अनैतिकता हो, समाज में अनैतिकता हो, खुद स्कूल में अनैतिकता हो, तो अकेले नैतिक शिक्षा क्या करेगी ? शास्त्रों को ढोने वाला गधा गधा ही रहता है।

सुमित, नैतिक शिक्षा से कुछ तो भला होगा ही। आखिर कानों से एक रास्ता दिमाग की ओर भी जाता है।

तुम्हारी बात मान लेता हूँ। लेकिन लड़के-लड़कियाँ मूर्ख नहीं होते हैं। न उनका दिमाग मशीन की तरह काम करता है। वे अपने आसपास के वातावरण को बहुत बारीकी से निरखते रहते हैं। एक छोटा-सा उदाहरण लो। घर में पिता माँ को पीटता है। स्कूल में मास्टर लड़कों और लड़कियों के बीच भेदभाव करता है। ऐसे में, अगर किसी लड़के को किताबी ज्ञान दिया जाए कि स्त्री-पुरुष, सबके साथ एक जैसा व्यवहार करना चाहिए, तो बच्चों पर क्या इसका कुछ असर पड़ सकता है? बल्कि वे क्लास रूम से बाहर जा कर टीचर की हँसी उड़ाएँगे। नैतिक शिक्षा किताबों से नहीं, वातावरण से पैदा होती है। घर और बाहर का वातावरण ठीक हो, तो बच्चे में नैतिकता का जज्बा पैदा करने के लिए अलग से कुछ नहीं करना पड़ता। दुनिया की अच्छी से अच्छी किताब अकेले कुछ नहीं कर सकती। मेरे खयाल से भारत का संविधान दुनिया की कुछ उत्कृष्टतम किताबों में एक है। हमारे सांसद, विधायक, मंत्री, प्रधान मंत्री, मुख्य मंत्री सभी उसी की कसम खा कर पद ग्रहण करते हैं। पर वे संविधान के प्रति कितनी श्रद्धा दिखाते हैं? शैतान बाइबल के उद्धरण दे सकता है, पर वह बाइबल का अनुसरण नहीं कर सकता। उसके पास उसकी अपनी बाइबल होती है, जिसे वह अपने पेट में छिपा कर रखता है।

बातों ही बातों में हमें पता ही नहीं चला कि कब हमने नाश्ता किया और कब लंच का समय शुरू हो गया। गेस्ट हाउस के कर्मचारी हॉल को साफ करने के लिए खड़े हैं। चलो, चलते हैं।

चलो। चलते-चलते एक बात कह लेने दो। भारत का शिक्षित वर्ग ही भारत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है। हमारे देश में शिक्षा भी शोषण का हथियार बन गई है। बेहतर होता कि पूरा देश निरक्षर होता। तब कम से कम इतनी विषमता तो न होती!

*

हम बाहर आए तो एक सूटेड-बूटेड सज्जन कुली को, जो उनके तीन भारी सूटकेस लाया था, डाँट रहे थे, बीस रुपए तय हुए थे, तो बीस ही दूँगा। डेढ़-दो किलोमीटर ज्यादा चलना पड़ गया, तो क्या हो गया? क्या तुम्हारी नानी मर गई? या, तुम्हारे पैर टूट गए?


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