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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


आम तौर पर मैं साड़ी ही पहनती हूँ। मैंने बहुत-सी सुंदर स्त्रियाँ, बहुत ही सुंदर पोशाक में, देखी हैं। लेकिन जो साड़ी में नहीं थी, वह मुझे कभी नहीं जँची। बेशक सुंदरता शरीर में होती है - उससे भी ज्यादा भाव और मुद्रा में, पर पोशाक की भी कुछ भूमिका होती है। मैंने पार्टियों में अकसर ऐसी स्त्रियाँ देखी हैं जिन्होंने ऊटपटाँग पोशाक पहन कर अपनी कुदरती सुंदरता का नाश कर लिया था। इसके विपरीत, जो स्त्रियाँ सुन्दर नहीं थीं यानी जिन पर प्रकृति ने बहुत कृपा नहीं की थी, उन्होंने अपनी सजावट इस तरह की थी कि उन्हें देखते ही बनता था। यह सुंदरता के साथ शऊर का सम्मिश्रण है जो किसी प्राकृतिक घटना को सांस्कृतिक घटना बनाती है।

फिर भी साड़ी मेरी पहली पसंद है। शायद यह दुनिया भर में अपने ढंग की अकेली पोशाक है। पता नहीं, मैं सुंदर हूँ या नहीं, पर साड़ी में अपने आपको बेहतर लगती हूँ, अगरचे पहनती दूसरे कपड़े भी हूँ। । आज मेरे मन में पता नहीं क्या आया कि मैंने नीली जींस पर सफेद टॉप डाल लिया। लगता है, इस बीच मेरा वजन कुछ बढ़ा है, क्योंकि दोनों ही कुछ कसे हुए लग रहे थे, हालाँकि इतने नहीं कि अपने आप पर शर्म आने लगे। स्पोर्ट्स वाले नीले-सफेद जूते पहन कर जब आईने के सामने खड़ी हुई, तो अपने आप पर गरूर-सा हो आया। होठों पर मेरा एक पसंदीदा गाना सरसराने लगा - चेहरे पे खुशी छा जाती है आँखों में सरूर आ जाता है; जब तुम मुझे अपना कहते हो, अपने पे गरूर आ जाता है। लेकिन यहाँ कौन था जो मुझे अपना कह सकता था? सुमित? पता नहीं।

आज मैं अपने को स्त्री रूप में पेश करने पर आमादा थी। मेरे साथ ऐसा बहुत कम होता है। मैं जानती हूँ कि पुरुषों की दुनिया में स्त्री होने - खासकर युवा स्त्री होने - का मतलब क्या होता है। यही कारण है कि हर स्त्री अपने अस्तित्व को ले कर बहुत सतर्क रहती है। शुरू में मैं भी सतर्क रहा करती थी। फिर यह भाव मन में आया कि यह फालतू बोझ हमेशा अपने सिर पर ले कर क्यों चला जाए। क्या हमें कुछ और काम नहीं है? उसके बाद सजावट-लिपावट-पहरावट पर ध्यान देना मैंने बहुत कम कर दिया। अगर किसी को आकर्षित होना हो तो मेरे व्यक्तित्व से हो - इससे नहीं कि मैंने अपने आपको कितना 'प्रजेंटेबल' बना रखा है। और, कोई आकर्षित हो ही क्यों? क्या उसके पास कोई और काम नहीं है?

अपने आप पर रीझना कभी अच्छा नहीं होता। पर आज यह नियम मुझ पर लागू नहीं हो रहा था। या, जान-बूझ कर मैंने इस नियम को परे रख दिया था। हलके नशे में गिरफ्तार जब मैं सुमित के कमरे में पहुँती, तब वह सो रहा था। समझ में नहीं आता कि यह शख्स ज्यादा सोता है या ज्यादा जगता है। दरवाजा उसने जब खोला था, तब वह उनींदा था। जब मैं भीतर आ कर कुरसी पर बैठ गई, तब भी उसकी आँखें कायदे से खुली नहीं थीं। किसी सोए हुए या आधा सोए हुए व्यक्ति को जगाना पाप है। सो मैं कुरसी पर बैठे इंतजार करती रही। झुँझलाना बेकार था, इसलिए झुँझलाने का मन नहीं हुआ।

सुमित जब पूरी तरह जग गया, तो मैंने बेड टी मँगवाई। जैसे-जैसे चाय के घूँट भीतर गए, वह चौकन्ना होता गया। उसने मुझ पर एक भरपूर नजर डाली और हलकी-सी अँगड़ाई ले कर कहा, 'सुनंदा, तुम भी?'

मुझे याद आया, 'ब्रूटस, तुम भी?' लेकिन मुझे गुस्सा नहीं आया। अब तक गुरुदेव को जान गई थी। सीधा-सरल वाक्य बोलने में उन्हें परेशानी होती है। उनका इशारा मेरी जींस की ओर थी। इस पोशाक में उन्होंने मुझे पहले कभी नहीं देखा था। मुझे पता था कि इन आधुनिक चीजों के प्रति गुरुदेव को कोई आकर्षण नहीं था। बल्कि वे नापसंद ही करते हैं। मैंने हँस कर जवाब दिया, 'सुमित, तुम भी?'

सुमित हँसने लगा। बोला, 'माफ करना। इस मामूली बात पर मुझे एतराज नहीं करना चाहिए था। जिसे जो ठीक लगे, वह पहनना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।'

'इस तर्क से तो अगर कोई कुछ भी न पहनना चाहे, तो यह भी उसका जन्मसिद्ध अधिकार होना चाहिए।'

'सुनंदा, मेरा उत्तर है - हाँ, जरूर होना चाहिए। मेरी तर्क पद्धति के अनुसार, पहनने में नहीं पहनने का अधिकार भी शामिल है। जैसे विवाह करने के अधिकार में विवाह न करने का अधिकार शामिल है।'

'वाह जी, वाह। तुम्हारी बात मान ली जाए, तो कपड़ा उद्योग तो बैठ ही जाएगा।'

'बैठ जाने दो। मानवता के इतिहास में कपड़ा उद्योग है कितने दिनों का ?'

'भविष्य की छोड़ो। विवस्त्र जीवन जब आम हो जाएगा, तब तक हम रहेंगे या नहीं, पता नहीं। शायद वह सचमुच उत्तर-आधुनिक युग होगा, जिसके बारे में एक हिन्दी लेखक बताते ही रहते हैं। अभी तो हम कायदे से आधुनिक भी नहीं हो पाए हैं।'

'तुम्हारी बात सौ फी सद सही है। लेकिन आज तो तुम बहुत स्मार्ट लग रही हो।'

मैंने ठसके से कहा, 'और आधुनिक भी।'

'इतनी भोली न बनो। आधुनिकता का कपड़ों से क्या संबंध है?'

इसके बाद आधुनिकता पर बातचीत शुरू हो गई। इसी बीच हमने नाश्ता भी किया और चाय के कई प्याले खाली किए।

तो आप मानते हैं कि आधुनिकता का जीवन शैली से कोई संबंध नहीं है ?

संबंध है क्यों नहीं। जैसे बुरका पहनना आधुनिकता नहीं है। एक जमाने में यह आधुनिक होगा। हजरत साहब ने कहा था कि स्त्रियों को ऐसी पोशाक पहनने से बचना चाहिए जिससे पुरुषों में वासना पैदा होती हो। सो मुल्लाओं ने तय कर दिया कि कोई भी औरत अपना चेहरा ढँके बिना घर के बाहर नहीं निकलेगी। घर में भी वह सभी के सामने बिना हिजाब के नहीं रहेगी। प्रायः सभी समाजों ने स्त्रियों पर इस तरह की पाबंदी लगा रखी थी।

अगर स्त्री का चेहरा देखने भर से पुरुष में कामुकता का संचार होने लगता है, तब तो यह कायदा आज भी उतना ही ठीक है जितना पहले था। इस तर्क से यह भी मानना होगा कि चेहरा ढँक कर चलना पूरी तरह से तर्कसम्मत और आधुनिक है।

खाक आधुनिक है। पुरानी संस्कृति वास्तविकता से पलायन करती थी। इसलिए उसने दमन का रास्ता चुना। पुरुष मनचले हैं, तो उनसे बचाने के लिए औरतों को बाड़े में कैद कर दो। आधुनिक संस्कृति का मानना है कि दमन से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। स्त्रियों को घूँघट या परदे में रखने के बजाय पुरुषों में यह तमीज पैदा करनी चाहिए कि वे स्त्रियों का सम्मान करें। पुरुषों को कोई स्त्री अच्छी लगती है, तो वे उसे सराहना की नजर से देख सकते हैं, पर यह नजर ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे लोलुपता टपकती हो।

इस मामले में तुमने गांधी जी को कोट नहीं किया ?

करता हूँ, करता हूँ। अभी मेरी बात खत्म कहाँ हुई है। गांधी जी का कहना था कि मैं भारत को सभ्य देश तभी मानूँगा जब कोई लड़की कश्मीर से कन्याकुमारी तक अकेले सुरक्षित चली जाए।

तो तुम्हारा आशय यह है कि आधुनिकता और सभ्यता के बीच गहरा संबंध है ?

जरूर। आज आधुनिक हुए बिना कोई भी समाज सभ्य नहीं कहला सकता। इसका उलटा भी इतना ही सच है। यानी सभ्य हुए बिना कोई भी समाज आधुनिक नहीं हो सकता।

तब तो आधुनिकता का उदय होने के पहले के सभी समाज असभ्य थे !

खबरदार। ऐसे ही कुतर्क करती रहोगी, तो तुम्हारा सिर फट जाएगा।

गार्गी की तरह ?

हाँ, गार्गी की तरह। जब याज्ञवल्क्य गार्गी के सवालों का जवाब नहीं दे सके, तब उन्होंने यही शाप दिया था।

और गार्गी चुप हो गई थी।

गार्गी इसलिए चुप हो गई थी, क्योंकि वह आधुनिक समय में नहीं रह रही थी। उसका दिमाग आधुनिक था, पर उसका समय पिछड़ा हुआ था। आज की गार्गियों को आज के याज्ञवल्क्य इस तरह चुप नहीं करा सकते।

इससे तो मेरी ही बात का समर्थन होता है। पहले के समाज पिछड़े हुए थे, तभी तो गार्गियों को ही नहीं, चार्वाकों को भी धमकी दे कर चुप करा दिया जाता था।

लेकिन अधिकतर चार्वाक पुरुष थे, इसलिए वे चुप हो कर बैठने वाले नहीं थे। उन्होंने अपने समय के पंडितों से खूब तर्क-वितर्क किया। जब पंडित बहस में हार जाते थे, तब वे यह आरोप लगाने लगते थे कि ये तो नास्तिक हैं, क्योंकि वेदों को नहीं मानते। नास्तिको वेदनिंदकः।

लेकिन चार्वाक यह सलाह भी तो देते थे कि ऋणं कृत्वा धृतं पित्वा।

मैं इस बात को अफवाह मानता हूँ। यह अफवाह चार्वाकों को बदनाम करने के लिए फैलाई गई होगी। नास्तिक समझदार लोग थे। वे ऐसी अहमक सलाह कैसे दे सकते थे? हुँह ! कर्ज लो और घी पियो। बाद में जिससे कर्ज लिया गया था, वह अपना पैसा वसूल करने आए, तो मुँह चियार दो और जेल की हवा खाओ।

लेकिन सुमित, भारत सरकार तो यही करती आ रही है। हर साल उसका विदेशी ऋण बढ़ता जा रहा है।

इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि वह आधुनिक नहीं है। वह पोंगापंथी सरकार है। वह आधुनिक समय में है, पर उसका आचरण पुराने जमाने के जमींदारों की तरह है जिनकी कमाई चार आने थी, पर जो ऐयाशी की अपनी भूख मिटाने के लिए बारह आने खर्च करते थे। नतीजे में वे हमेशा कर्ज में डूबे रहते थे।

लेकिन इस व्यवस्था का संचालन तो आधुनिक लोग कर रहे हैं ।

वे रहन-सहन के हिसाब से आधुनिक माने जाते हैं। वे यह दावा भी करते हैं कि हम एक आधुनिक समाज का निर्माण कर रहे हैं। वास्तव में, वे एक पिछड़े हुए समाज को और पिछड़ा बना रहे हैं। उनकी नीतियों के चलते इस देश के करीब सत्तर प्रतिशत निवासी जीवन यापन की समस्याओं से कभी मुक्त नहीं हो सकेंगे । दूसरी ओर, ये मुस्तंडे देश के संसाधनों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर ऐश करते रहेंगे।

लेकिन ऐश करना भी तो आधुनिकता है ? मेरा मतलब फालतू की ऐयाशी से नहीं है, जीवन को ज्यादा से ज्यादा आरामदेह और सुखमय बनाने से है।

पता नहीं, इसमें आधुनिकता कितनी है। पश्चिम में जब आधुनिकता का दौर शुरू हुआ, तो उसका संबंध दो चीजों से था - विचार के स्तर पर तर्क और उत्पादन के स्तर पर टेक्नोलॉजी। बाद में दोनों चीजें गड्डमड्ड हो गईं। तर्क-वितर्क की प्रक्रिया आज भी जारी है, पर टेक्नोलॉजी की प्रकृति पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। टेक्नोलॉजी आगे-आगे चलती है, लेखक और विचारक उसकी आलोचना-प्रत्यालोचना करते हुए उसके पीछे-पीछे चलते हैं । चूँकि वर्तमान टेक्नोलॉजी मुख्यतः मुनाफा कमाने के लिए है, इसलिए वह रोज नई-नई चीजें निकालती है और उनके लिए माँग पैदा करती है। इस उपभोक्ता समाज में उद्योगपति सबसे बड़ा दार्शनिक हो गया है। वही पुरुषों को समझाता है कि उन्हें किस तरह की कार में चलना चाहिए, स्त्रियों को कि उन्हें कैसा दिखना चाहिए और बच्चों कि किन चीजों के बगैर उनका जीना बेकार है। मानो हम सरकस के जानवर हों जिन्हें तरह-तरह के करतबों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा हो । जो इस प्रणाली से सहमत नहीं हैं, उन्हें हाशिए पर फेंक दिया जाता है। यह आधुनिकता है या दास प्रथा की वापसी?

तुम्हारा आशय शायद यह है कि आधुनिकता दो प्रकार की होती है - एक, विचारों की और दूसरी, रहन-सहन की। समस्या यह है कि दोनों के बीच तालमेल नहीं है।

बिलकुल। जो आधुनिकता हम देख रहे हैं, वह पूरी तरह से आधुनिक नहीं है। इस पके फल में कीड़े हैं।

मेरा खयाल है, ये कीड़े शुरू से हैं, तब से जब यह फल पकना शुरू हुआ ही था।

कैसे?

ऐसे कि आधुनिकता का विकास हुआ यूरोप में पूँजीवाद के साथ-साथ और पूँजीवाद का विकास हुआ आधी से ज्यादा दुनिया को उपनिवेश बनाने से।

शाबाश !

इस आधुनिकता का मतलब था यूरोप और अमेरिका के लिए बढ़ती हुई अमीरी और बाकी दुनिया के लिए गरीबी और गुलामी। पूँजीवादी देशों ने अपने उपनिवेशों के साथ जो किया, अब इन उपनिवेशों के देशी मालिक अपनी बहुसंख्य प्रजा के साथ वही कर रहे हैं। नहीं ?

फिर शाबास !

यह क्या शाबाश, शाबाश लगा रखा है ? क्या मुझे कुछ भी नहीं मालूम ?

इसीलिए तो, इसीलिए तो...तुमने अपने जींस की धज्जियाँ खुद उड़ा दीं।

शट अप। जींस भले ही पश्चिम से आया हो, पर हमारे लिए सुविधाजनक है, तो हम इसका तिरस्कार क्यों करें ?

तिरस्कार करने को कौन कह रहा है? मेरी चले तो मैं इसे विश्व-पोशाक बना दूँ। मेरा संकेत इस ओर था कि जींस पहन लेने के बाद भी बहुत-से लोग दिमाग से पिछड़े रह जाते हैं। मैंने बहुत-से जींसधारियों को दहेज-लेते-देते, ज्योतिषियों के यहाँ लाइन लगाते, मनौती मानते और भोग चढ़ाते देखा है।

मुझ पर तो कटाक्ष नहीं कर रहे हो ? अठारह वर्ष की हो जाने के बाद मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।

यहाँ बात व्यक्ति की नहीं, समाज की हो रही है।

मुझे एक शक है। कहीं तुम यह तो नहीं कह रहे हो कि आधुनिक समय के पहले चारो ओर अँधेरा ही अँधेरा था, सब मूर्ख और अंधविश्वासी थे और उनमें सोच-विचार की शक्ति ही नहीं थी। उनके पास टेक्नोलॉजी भी नहीं थी। मानव समाज में जो भी उन्नति हुई, वह न्यूटन और जेम्स वाट से ही शुरू हुई।

दुष्टे ! ऐसा मैं कैसे कह सकता हूँ? आधुनकता की भी एक परंपरा है। कोई भी समाज अचानक यथार्थवादी या तर्कशील नहीं हो जाता। नहीं हो जाता। दरअसल, अचानक कुछ भी नहीं होता। धीरे-धीरे और एक प्रक्रिया के तहत होता है। आधुनिकता के आने के पहले भी लोग सोचते-विचारते थे। संस्कृत में बहस और शास्त्रार्थ की एक लंबी परंपरा है। बाद में चार्वाक, बुद्ध और कबीर जैसे लोग हुए जिन्होंने गलत और अतार्किक चीजों का विरोध किया। यूरोप में भी बहस-मुबाहसे की लंबी परंपरा रही है। किसी समाज में न्यूटन ऐसे ही नहीं पैदा हो जाते। उसकी एक पृष्ठभूमि होती है। आधुनिकता की भी एक पृष्ठभूमि है जिससे उसका जन्म हुआ है।

शायद यही बात टेक्नोलॉजी पर भी लागू होती है। जेम्स वाट ने भाप के इंजन की खोज की। यह बहुत बड़ी घटना थी। पर टेक्नोलॉजी उसके पहले भी थी। खेत जोतना, बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बनाना, नौका और पानी का जहाज बनाना, वाद्य यंत्रों का निर्माण आदि क्या टेक्नोलॉजी के बगैर संभव था ? आधुनिक चिकित्सा पद्धति नहीं थी, पर दवाएँ तो थीं और वे काम भी करती थीं।

बिलकुल ठीक। हर आदमी में तर्कबुद्धि तन्मजात होती है। सभ्यता की शुरुआत से ही वह बुद्धि और तर्क के सहारे आगे बढ़ता आया है। इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि किसी खास शताब्दी में अचानक उसके दिमाग को पंख लग गए। लेकिन विकास यात्रा में कुछ लंबी छलांगें भी होती हैं, जैसे आग का आविष्कार, खेती की शुरुआत, दस्तकारी का विकास, भवन निर्माण कला। आधुनिक चेतना की शुरुआत भी एक लंबी छलाँग है। आधुनिकता ने कुछ सौ वर्षों में ही दुनिया को कितना बदल दिया है। सिर्फ चीजों की दुनिया नहीं, विचार और आचरण की दुनिया भी। क्या सौ साल पहले हम-तुम किसी होटल के कमरे में इस तरह आमने-सामने बैठ सकते थे?

सचमुच। स्त्री की आजादी भी आधुनिकता की एक बड़ी देन है।

लेकिन आधुनिकता के काले पहलू भी हैं। इसने पहले बड़े पैमाने पर गुलाम पैदा किए और उनका जम कर शोषण किया । उसके बाद आधुनिकता ने उन्हें मुक्त प्रदान करने का अभियान भी छेड़ा। यहाँ तक कि अब्राहन लिंकन को इस मुद्दे पर गृह युद्ध भी लड़ना पड़ा।

इसका मतलब यह हुआ कि आधुनिकता के भीतर भी द्वंद्व है।

द्वंद्व कहाँ नहीं है? कोई भी पूर्ण व्यवस्था अभी तक सामने नहीं आई है। इसलिए हर व्यवस्था में द्वंद्व है। इस द्वंद्वात्मकता से ही समाज आगे की ओर बढ़ता है। यह गज-ग्राह की लड़ाई है। कभी ग्राह मजबूत तो कभी गज मजबूत । कभी-कभी वाहियात चीजें भी आधुनिकता की पोशाक पहन कर आती हैं, क्योंकि यही सिक्का आजकल चल रहा है। इसलिए क्या आधुनिक है और क्या आधुनिक नहीं है, इस बारे में अच्छी तरह सोच-विचार करने के बाद ही किसी चीज को स्वीकार या खारिज करना चाहिए।

जैसे ?

जैसे एटम बम। नाभिकाय ऊर्जा के कुछ संयत प्रयोग उचित हैं - उदाहरण के लिए चिकित्सा में, पर बिजली पाने के लिए बड़े-बड़े नाभिकीय संयत्र खड़ा करना सरासर बेवकूफी है। एटमिक ऊर्जा जिन्न है। बोतल से बाहर आ जाने के बाद उसे बोतल के भीतर वापस भेजना असंभव है।

तब तो वे लोग ही सही हैं जो आधुनिकता से नाराज हैं और उसका विरोध करते हैं।

पता नहीं। इनमें दो तरह के लोग हैं। एक वे जो पश्चिम की प्रभुता के खिलाफ हैं। चूँकि आधुनिक जीवन की शुरुआत मुख्य रूप से पश्चिम में ही हुई थी, इसलिए ये लोग पश्चिम से जुड़ी हुई हर चीज का विरोध करते हैं । इनकी निगाह में, पश्चिम की सभ्यता शैतानी सभ्यता है। दूसरी तरह के लोग वे हैं जो हर तरह की आधुनिकता या नएपन के विरुद्ध हैं। ये परंपरागत जीवन पद्धति के कायल हैं।

मुझे तो दोनों ही धाराओं में अतिवाद दिखाई देता है। जैसे हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसना, लगातार आत्म-परीक्षण करना और गलती दिखाई पड़ने पर संशोधन कर लेना। इसी तरह, परंपरागत जीवन पद्धति भी कभी जड़ और परिवर्तनहीन नहीं रही। उसमें हमेशा कुछ न कुछ नया जुड़ता गया है।

यही तो सवाल है। पीछे जाते-जाते आप कितना पीछे जाना चाहते हैं ? मामला यह भी है कि आप किन आधुनिक चीजों को छोड़ेंगे और किन परंपरागत चीजों को अपनाएँगे ? थोक भाव से न किसी व्यवस्था को अपनाया जा सकता है, न खारिज किया जा सकता है ।

बिलकुल। सही नतीजे पर पहुँचने के लिए आधुनिकों और आधुनिकता - विरोधियों को, बिवा किसी हठ या पूर्वाग्रह के, एक मंच पर बैठना होगा और विचार विमर्श करना होगा।

ताकि लघु समुदायों का आपका यूटोपिया दर्शन के आधार पर स्वीकार्य हो सके ! आप तो बहुत चतुर हैं, जी ।

सुमित ठठा कर हँसने लगा। हँसी रुकी तो बोला, निश्चिंत रहो, उस सभा की अध्यक्षता करने के लिए मुझे नहीं बुलाया जाएगा।

अब तक मुझे भूख लग आई थी। सुमित भी कुलबुला रहा था। बातचीत पर पूर्ण विराम लगाते हुए मैंने कहा, सुमित, आज की कक्षा यहीं खत्म करते हैं। चलो, कुछ खा-पी आएँ।

सुमित उठते हुए बोला, पेट भरना ही तो ऐसी चीज है जो हमें हमारे करोड़ साल पहले के पूर्वजों से हमें जोड़ता है। मनुष्य के मूल आवेग परंपरा में भी वही हैं जो आधुनिकता में।

मैंने अँगड़ाई-सी ली और शिकायत के स्वर में कहा, लगता है आप हर क्षण विचार ही में जीते हैं।

सुमित बड़े जोर से हँसा - इतने जोर से कि लगा, धरती काँप रही है।

दरअसल, मुझे हलका-सा चक्कर आ गया था।


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