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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर

अनुक्रम सुमित की डायरी से - 4 पीछे     आगे

 

सभ्यता के सारे तीर

छाती पर सहता हूँ

शहर के बीचोबीच

आदिवासी-सा रहता हूँ

*

खानखाना साहब

दुरुस्त फरमाया था आपने

अपनी बिथा

मन ही में छिपा कर रखना

सुन कर लोग सिर्फ इठलाएँगे

कोई बाँट नहीं लेगा

फिर भी यह तो बताइए

क्या सचमुच

आपको कोई ऐसा नहीं मिला

जिससे आप अपना दुख बाँट सकें

क्या आप भी

मेरी तरह अभागे थे ?

*

संयोग ने

हमें मिलाया

हमने अपनी करनी से

एक-दूसरे को गँवा दिया


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