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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


लगता है, मेरे मन में एक सपना उमड़ रहा है।

मलय का साथ छूटने के बाद मैंने प्रतिज्ञा की थी कि अब किसी से प्रेम नहीं करूँगी। मुझे लगता है, कुछ चीजें ऐसी हैं जो जिंदगी में एक ही बार घटित होती हैं। प्रेम भी इन्हीं में है। ऐसा नहीं है कि यह दूसरी या तीसरी बार - और तर्क के लिए, चौथी या पाँचवीं बार - नहीं हो सकता, पर हर अगली बार वह एक ही घटना का विस्तार होता है। यह कुछ-कुछ कौमार्य के टूटने की तरह की घटना है। वह एक ही बार टूटता है। पर एक दूसरे कोण से देखा जाए, तो वह बार-बार टूटता है। मलय के साथ मैंने इतनी खुशी पाई थी और फिर इतना दुख कि इस प्रयोग को दुहराने की इच्छा ही पैदा नहीं हुई। कई महीनों तक मैं आशा करती रही कि मलय आखिर जाएगा कहाँ - जल्द ही मेरे पास लौट आएगा। पर वह मेरा अभिमान था - खोखला अभिमान। तब मैंने तय किया कि इस अभिमान को कब्र खोद कर गहरे गाड़ दूँगी।

आदमी जो चाहता है, वह हो पाता है क्या?

अब तो मुझे पहले प्रेम पर भी शक होने लगा है। क्या होता है पहला प्रेम? वह जो कैलेंडर के हिसाब से पहला हो? या वह जिसने पहली बार प्रेम के गहरे एहसास से अवगत कराया? सुमित से बात करने के बाद से तो मुझे लगता है कि वास्तविक प्रेम का उदय होने के पहले प्रेम नहीं, उसका रिहर्सल होता है। शुरू में हम रिहर्सल देख कर ही इतने मुग्ध हो जाते हैं कि उसे ही सच्चा मान बैठते हैं और जब असली प्रेम दस्तक देता है, तो हम सब कुछ छोड़ कर उसके पैरों पर अपना सिर रख देते हैं।

लेकिन कितनी बार? कितनी बार? कितनी नावों में कितनी बार? भावनाओं की थकावट नाम की भी एक चीज होती है। शायद इसीलिए ज्यादातर लोग इस समस्या से दूर ही रहते हैं। पूरी जिंदगी के लिए एक बला ही काफी है। जहाँ इतनी समस्याएँ हों, वहाँ एक और समस्या क्यों पाली जाए?

मैंने भी यही तय किया था।

अब मेरा यह संकल्प बूँद-बूँद कर रिस रहा है।

सुमित को मैं धीरे-धीरे समझने लगी हूँ। वह सामान्य इनसान नहीं है। वह बिजली की तरह है जो बादलों में सोई रहती है। उसका कोई घर नहीं है। उसका कोई परिवार नहीं है। शायद उसका कोई देश भी नहीं है। विचार हैं, पर उनका अपना गुंजलक है। भावनाएँ भी हैं, पर पूरी तरह अंकुश में। वह खुद में इतना डूबा रहता है कि किसी और में डूबने के लिए उसके पास वक्त ही नहीं है। दूसरों के लिए वह बस सुगंध है।

क्या वह आत्म-प्रेम का चरम उदाहरण है ? हम सभी अपने आप से प्रेम करते हैं। न चाहें तब भी इससे मुक्ति नहीं है। क्या सुमित भी किसी गहरे आत्म-सम्मोहन का शिकार है? क्या वह दुनिया में रहते हुए भी दुनिया में रहना नहीं चाहता? या, ऐसी कोई दुनिया ही नहीं है जिसमें रहना वह चाह सके?

सहसा विश्वास नहीं होता। विश्वास इसलिए नहीं होता, क्योंकि उसका विचार जगत बहुत विस्तृत है। वह लगातार अपने बारे में नहीं, अपने आसपास की दुनिया के बारे में सोचता रहता है। अपने बारे में बोलना ही नहीं चाहता। मानो उसने इतिहास से बाहर एक गहरी छलाँग लगा रखी हो। बहुत मुश्किल से उसने अपने जीवन के बारे में संक्षेप में कुछ बताया है। लेकिन क्या उसके जीवन का फलक इतना भर है - इतना भर हो सकता है? मानने को जी नहीं चाहता।

मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ ! इस तूफान को मुट्ठी में बाँध लेने का इरादा मुझे ललचा रहा है। हाँ, यह लालच ही तो है। एक बार फिर अपने से बाहर जा कर किसी दुर्लभ चीज को आँचल में बाँध लेने का लालच।

क्या यह संभव है? सुमित की नजरों से ऐसा लगता है कि उसके भीतर भी एक बेकरारी घर बना चुकी है। मुझे देख कर उसका चेहरा ऐसे खिल उठता है जैसे अमावस की रात पूरा चंद्र आकाश में दीप्त हो उठा है। मनहूसी उसके स्वभाव में नहीं है। एक ही दो बार मैंने उसे उदास देखा है। बाकी समय उसे प्रशांत या खिलखिलाते हुए पाया है। मैंने यह भी लक्ष्य किया है कि जब मैं उसके पास होती हूँ, तो वह जैसे ट्रांस में चला जाता है। ज्यादा से ज्यादा समय वह मेरे साथ बिताना चाहता है। अकसर मेरे लिए कोई उपहार ले आता है - कभी कोई किताब, कभी कोई सीडी, कभी स्कार्फ ... एक बार तो वह साड़ी भी लाया था। सफेद रंग की ताँत की साड़ी, जिस पर हरे बूटे काढ़े हुए थे। अभी तक वह साड़ी मैंने एक बार भी नहीं पहली है। उसकी नजरों से कई बार लगा कि वह मुझे कोई और साड़ी पहने हुए देख कर निराश-सा हो गया है। उस वक्त मुझे अपने ऊपर बड़ी खीज होती है। लेकिन क्या करूँ? मुझे लगता है, हरे बूटों वाली वह ताँत की साड़ी पहनने का अर्थ है किसी ऐसी चीज की घोषणा, जिसे अभी गोपन रखना ही उचित है। किसी भी औरत को उघड़ने में समय लगता है। बहुत-सी औरतें तो जीवन में एक बार भी नहीं उघड़तीं - निर्वस्त्र होना और बात है।

कभी-कभी लगता है, मैं एक असंभव सपना देख रही हूँ।

प्रभु, मेरा क्या होगा?

मैं कमजोर प्राणी हूँ। ऐसी कठोर परीक्षा में मुझे नहीं डालना था तुम्हें ...


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