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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


सेक्स पर बात करना हमेशा असुविधापूर्ण होता है। लोग सेक्स के बारे में पढ़ते हैं, सोचते हैं, पर इस पर गंभीरता के साथ बात नहीं करना चाहते हैं। शायद उनके दिमाग में यह रहता है कि यह कोई गुह्य चीज है जिसके बारे में बात करने से उसका जादू खत्म हो जाएगा। शायद यह भी कि यह इतना प्रगट मामला है कि इस पर बात क्या करना। दरअसल, सेक्स पर बात करने का मूल अभिप्राय होता है, स्त्री-पुरुष संबंधों पर बात करना और यहाँ खूब मुखरता देखी जाती है। लेकिन जो चीज दोनों को जोड़ती है, उस पर चर्चा करना तुच्छ माना जाता है, क्योंकि यह दो व्यक्तियों का 'आपसी मामला' है।

क्या सचमुच? क्या सचमुच यह दो व्यक्तियों का आपसी मामला है या इसके और भी आयाम हैं? जहाँ तक एक शारीरिक घटना का सवाल है, इसके बहुत-से विश्लेषण और मार्गदर्शिकाएँ बजार में उपलब्ध हैं। शुरू में वे मुझे दिलचस्प लगती थीं। फिर वे इतनी उबाऊ लगने लगीं कि उन्हें छूने तक का मन नहीं करता था। लेकिन मीडिया में सेक्स का ऐसा सैलाब आया हुआ है कि इस पर विचार करने से आप बच नहीं सकते।

कई दिनों से मन कर रहा था कि इस विषय पर सुमित से बातचीत छेड़ी जाए, पर इसका मौका नहीं आया। यह विषय ऐसा नहीं है जिस पर बात करते हुए मैं शर्म से मर-मर जाऊँ। सुमित और मैं आपस में इतना खुल चुके थे कि हमें किसी भी मसले पर बात करने में संकोच नहीं हो सकता था। बौद्धिक विमर्श में संकोच बहुत बड़ी बाधा है। मेरे लिए हर चीज को बौद्धिक स्तर पर समझना ही काम्य रहा है। शायद सुमित के लिए भी।

हमारी बातचीत कुछ यों शुरू हुई।

सुमित, सेक्स के बारे में क्या सोचते हो ?

यह सोचने की नहीं, करने की चीज है।

मजाक नहीं। जो करने की चीजें होती है, वही तो सोचने की चीजें होती हैं।

शायद। लेकिन सेक्स का मामला थोड़ा अलग है। कुछ विद्वानों ने कहा है कि यह हमारे खून में बहता है, इसका दिमाग से कोई खास रिश्ता नहीं है। इसीलिए तो मौका आने पर बड़े-बड़े ब्रह्मचारियों के पैर फिसल जाते हैं।

आप इसे पैर फिसलना क्यों कह रहे हैं ? क्या यह प्राकृतिक जीवन की ओर वापसी नहीं है, जिसकी माँग अवचेतन में उठती ही रहती है ?

तुम्हारी बात सही है। मैं भी मानता हूँ कि ब्रह्मचर्य नकली ही नहीं, फालतू चीज है। हालाँकि यह मंजूर करने में मुझे हिचक नहीं है कि ब्रह्मचर्य भी एक जीवन शैली हो सकती है। गांधी जी का मानना था कि सामाजिक सेवा के क्षेत्र में जो उतरना चाहते हैं, उनके लिए ब्रह्मचर्य का व्रत लेना आवश्यक है।

ऐसा क्या सोच कर कहा होगा उन्होंने ? उन्होंने तो खुद बार-बार कहा है कि मैं पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर पाया हूँ - मेरी लाख कोशिश के बावजूद पता नहीं कहाँ से कुविचार मेरे मन में घुस आते हैं।

गांधी जी ने यह सलाह इसलिए दी होगी कि सार्वजनिक कार्यकर्ता को अपने काम के दौरान तमाम तरह के स्त्री-पुरुषों से मिलना होता है। अगर उसने ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं ले रखा है, तो यह आशंका बनी रहती है कि वह मौका मिलते ही फिसल जाएगा।

मेरा खयाल है कि ब्रह्मचारी की तुलना में शादीशुदा आदमी के फिसलने की संभावना ज्यादा होती है। जिसने एक स्त्री पर विजय पा ली, वह और-और स्त्रियों पर विजय पाना चाहता है।

शायद तुम्हारी ही बात सही है। यह भी कहा जा सकता है कि फिसलना चाहने वाले के लिए इस बात का कोई खास महत्व नहीं है कि वह ब्रह्मचारी है या विवाहित।

यह हुई न बात !

मेरी समझ यह है कि आदमी दो तरह के होते हैं - जो फिसलने का मौका खोजते रहते हैं और जो अपने को फिसलने से रोकते रहते हैं।

गलत। बहुतायत उन लोगों की है जो अपने जीवन से संतुष्ट हैं - वे न बाएँ देखते हैं न दाएँ।

अधिकांश मानवता ऐसी ही होती है - नाक की सीध में चलने वाली। उस पर चर्चा कम होती है। चर्चा उन्हीं की होती है जो जरा हट कर चलते हैं।

हट कर चलने की खूब कही। ऐसे संत भी हुए हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे जीवन भर सेक्स से विरत रहे, जैसे दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, विनोबा भावे ...

कहा ही जाता है। सचाई कौन जानता है?

यार, सभी पर शक मत करो।

मैं शक नहीं कर रहा हूँ, मानव स्वभाव की बात कर रहा हूँ। हो सकता है, कुछेक व्यक्ति असंभव को संभव कर डालें, पर यह आम आदमी के लिए मुमकिन नहीं है। इसीलिए हर धर्म में संन्यासियों और गृहस्थों के लिए अलग-अलग व्यवस्था है। लेकिन आदमी तो दोनों ही एक ही हैं। जो एक के लिए ठीक है, वही दूसरे के लिए भी ठीक होना चाहिए। लेकिन ब्रह्मचर्य को महत्व देने वाले धर्म आदमियों की एक खास श्रेणी पैदा करना चाहते हैं, जो एक बेकार की जिद के साथ जिंदगी बिताएँ।

लेकिन इसका एक और पहलू है। सेक्स का मतलब है परिवार, परिवार का मसलब है बच्चे, बच्चों का मतलब है परिवार के पोषण के लिए धन अर्जन। इस रास्ते पर चलते हुए धार्मिक व्यक्ति या सामाजिक व्यक्ति अपने लक्ष्य से भटक नहीं जाएगा ?

क्यों, इससे बचने का उपाय तो है। जब से गर्भ निरोधक आए हैं, सेक्स का प्रजनन से संबंध टूट गया है। अब शुद्ध आनंद के लिए भी सेक्स की ओर जाया जा सकता है। इसलिए यह संभव हो गया है कि जिनके लिए सेक्स निंदनीय या अवांछित माना जाता है, उन्हें सेक्स की सुविधा दे दी जाए, इस शर्त के साथ कि वे बच्चा पैदा नहीं करेंगे।

ओके। मैं एक ऐसे बुद्धिजीवी-राजनीतिज्ञ को जानती हूँ जिन्होंने विवाह ही इस शर्त पर किया था कि वे बच्चा नहीं होने देंगे। उनका कहना था कि मैं कुछ कमाता तो हूँ नहीं, इसलिए बच्चा पालने की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता।

मेरा खयाल है, यह नियम उन सभी लोगों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए जो सत्ता में आना चाहते हैं या राजनीति करना चाहते हैं। तब कम से कम उनके लालची और भ्रष्ट होने की संभावना कुछ कम हो जाएगी। लेकिन उन्हें सेक्स की छूट होगी, क्योंकि इसके बिना वे रह नहीं सकेंगे।

यह प्रयोग करने लायक है। अगर नतीजा थोड़ा भी पॉजिटिव हो, तो इसे जारी रखा जा सकता है।

जीवन के हर क्षेत्र के लिए कुछ विशेष नियम होने ही चाहिए।

चलो, यह तो पुरुषों की बात हुई। स्त्रियों का पक्ष क्या है ?

स्त्रियों का अपना कोई पक्ष नहीं है। वे पुरुष मान्यताओं के अनुसार अपने को ढालने की कोशिश करती रहती हैं।

मसतब ?

पहले पुरुष मांसल स्त्रियों को पसंद करते थे। अब उनका झुकाव स्लिम और स्लीक की तरफ है। सो सारी औरतें ऐसा दिखने के लिए मरी जा रही हैं। जिनके स्तन अपेक्षाकृत छोटे हैं, वे सर्जरी करवा कर उनमें सिलिकन भरवा रही हैं। पहले औरतें बाल नहीं कटवाती थीं। अब स्त्रियाँ तरह-तरह से बाल कटवाती और रँगवाती हैं ताकि वे आकर्षक दिखाई दें।

पर यह तो स्त्री की मजबूरी है कि उसे आकर्षक दिखना चाहिए।

ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। प्रकृति ने उसे पुरुष से जितना भिन्न बनाया है, वह काफी है। उसे थोड़ा-बहुत सँवारा जा सकता है, पर सौंदर्य उद्योग की अपरंपार लीला देख कर मेरा माथा ठनकने लगता है। स्त्रियों को यौन पदार्थ बनाने में कोई कसर नहां छोड़ी जा रही है। इसमें कुछ तो उद्योग जगत का स्वार्थ है, कुछ स्त्रियों की भी कमजोरी है। आजकल हर स्त्री सेक्सी नजर आना चाहती है।

सुमित, सच कहती हूँ, यह सेक्सी शब्द सुनते ही मेरा खून उबलने लगता है ।

क्यों, तुम तो खुद भी सेक्सी हो।

पेपरवेट फेंक कर तुम्हारा सिर तोड़ दूँगी, समझे।

माफ करो, भाई माफ करो। मुझे अपने सिर की उतनी फिक्र नहीं है जितनी तुम्हारे गुस्से की। गुस्से से हर किसी का चेहरा विकृत दिखाई पड़ने लगता है।

गुस्से की बात ही है। सेक्सी होने का मतलब है जिसे देख कर पुरुष के मन में कामेच्छा पैदा हो जाए। क्या स्त्री जीवन की सबसे बड़ी चरितार्थता इसी में है ? मेरा तो खयाल है, स्त्री नहीं, पुरुष ही सेक्सी होता है - हर समय काम भावना से घिरा हुआ।

मगर इससे कैसे इनकार किया जा सकता है कि स्त्रियाँ भी अपने को आकर्षक बनाने के लिए जी-जान से जुटी रहती हैं?

यही तो मुसीबत है। कोई अविवाहित लड़की ऐसा करे, तो समझ में आता है। उसे अपने लिए अच्छा से अच्छा वर चुनना है। लेकिन विवाहित स्त्रियाँ ? उन्हें क्या पड़ी रहती है अपने नख-शिख सौंदर्य को सँवारते रहने के लिए ? वे किसे आकर्षित करना चाहती हैं ?

उनकी समझ शायद यह है कि वे अपने पति या प्रेमी के लिए तभी तक काम्य हैं जब तक वे अन्य पुरुषों के लिए भी काम्य हैं। तुम तो जानती ही हो, हम एक प्रतिद्वंद्वी समाज में जी रहे हैं। पुरुषों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की प्रतिद्वंद्विता और स्त्रियों में ज्यादा से ज्यादा आकर्षक दिखाई पड़ने की प्रतिद्वंद्विता। स्त्रियों के लिए सुंदरता ही हर चीज के लिए पासपोर्ट है। या, कम से कम वे ऐसा समझती हैं।

इनसे अच्छी तो मुझे आदिवासी या गँवई महिलाएँ लगती हैं जिनके मन में अपने शरीर को ले कर विशेष सचेतनता नहीं होती। वे अपने को हमेशा बाजार में उपस्थित नहीं समझतीं।

मुझे भी।

सच, जो सुंदरता प्रकृति की ओर से स्त्रियों के लिए एक नायाब तोहफा है, वही आज उनका सबसे बड़ा दुश्मन हो गई है। क्योंकि सेक्स आधुनिक सभ्यता के केंद्र में आ बैठा है।

इसीलिए तो सेक्स उद्योग किसी संक्रामक बीमारी की तरह बढ़ता जा रहा है।

दरअसल, औरतों के पास और है ही क्या जिसे वे बेच सकें ? जब उन्हें उचित रोजगार नहीं मिलता, तो वे बाजार में बैठ जाती हैं !

ऐसी सड़ी-गली बात तुम्हारे दिमाग में आई कैसे? एक जमाने में तर्क दिया जाता था कि जब तक वेश्याएँ हैं, तभी तक भले घरों की इज्जत सुरक्षित है। यानी कामी लोगों को इधर-उधर मुँह मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी, वे अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए वेश्याओं के पास जा सकते हैं। इसका मतलब यही हुआ कि वेश्याएँ पब्लिक बाथरूम हैं। इस तर्क से यही ठहरता है कि कुलवधुएँ प्राइवेट बाथरूम हैं। पुरुषों ने अपनी सुविधा के लिए कैसे-कैसे तर्क गढ़ रखे हैं!

लेकिन जो स्त्रियाँ स्वेच्छा से इस पेशे में आती हैं, उन पर रोक लगाने वाले हम कौन होते हैं ?

मेरा खयाल है, कोई भी स्त्री स्वेच्छा से इस कुत्सित पेशे में नहीं आती। सिमोन दी बुआ के जुमले को बदल कर कहा जा सकता है कि वेश्या होती नहीं है, बनाई जाती है। बाकी दुनिया की मैं नहीं जानता, पर भारत में तो यह एक बहुत बड़ा व्यापार है। लड़कियों को फुसला कर, डरा कर, धमका कर, बहका कर इस पेशे में लाया जाता है, ताकि पैसे दे कर स्त्री शरीर हासिल करने वालों की वासना को पूरा करने के लिए औरतों की मंडियाँ गुलजार रहें। तुम्हें पता है? जिस लड़की या औरत को इस पेशे में लाया जाता है, वह शुरू में विद्रोह करती है, रोती है, चिल्लाती है। उसे मार-पीट कर, कई-कई दिनों तक भूखा-प्यासा रख कर उसके मनोबल को तोड़ दिया जाता है। तब जा कर वह अजनवी पुरुषों के साथ सोने के लिए राजी होती है। इसमें स्वेच्छा की बात कहाँ से आती है? कौन-सी औरत रंडी कहलाना पसंद करेगी?

सुमित, तुम अब ज्यादती कर रहे हो। रंडी कह कर किसी बेबस औरत का अपमान ठीक नहीं है। जैसा कि तुमने बताया, रंडी होने में उस औरत का कसूर क्या है ? इसके बजाय सेक्स वर्कर शब्द मुझे बेहतर लगता है।

बेकार की बात मत करो। रंडी कह कर मैं औरत का अपमान नहीं कर रहा हूँ, बल्कि उस समाज की आलोचना कर रहा हूँ जिसने स्त्रियों की यह श्रेणी बना रखी है। किसी भी सभ्य समाज में किसी भी औरत को इस दर्जे तक नहीं गिराया जा सकता कि वह पेट भरने के लिए देह बेचती रहे। मेरी निगाह में, रंडी शब्द उसी वर्ग में आता है जिस वर्ग में गुलाम, नौकर, बँधुआ मजदूर आदि शब्द आते हैं। शब्दों पर नहीं, स्थितियों पर नाराज होने की जरूरत है।

तब तो सेक्स वर्कर शब्द बेहतर ही ठहरता है। आखिर ऐसी औरतें सेक्स की मजदूरी करती हैं और जैसे पुरुष कारखाने या दफ्तर में काम करके मजदूरी कमाता है, वैसे ही ये देह बेच कर मजदूरी करती हैं।

तुम्हें या तुम्हारे वर्ग की औरतों को यह मजदूरी कर कमाना-खाना पड़े, तब तुम लोगों को आटे-दाल का भाव पता चलेगा। तुम्हारे लिए और विदेशी पैसे से एनजीओ चलाने वाले तुम्हारे वर्ग के लोगों के लिए किसी मजबूर औरत को सेक्स वर्कर कहना आसान है, क्योंकि यह नया माफिया वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दिलाना चाहता है। यह उसकी धारणा नहीं, उसका बिजनेस है। इससे घिनौनी बात क्या हो सकती है?

नाराज मत होओ। हम लोग बौद्धिक चर्चा कर रहे हैं, एक गंभीर समस्या पर बात कर रहे हैं। उत्तेजित होने पर हमारे पटरी से उतर जाने का खतरा है।

जो बात सुन कर खून खौलने लगता है, उस पर हम उत्तेजित न हों? माफ करना, 'कूल-कूल' में मेरा यकीन नहीं है। बात गुस्से की हो, तो शांत रहना पाप है।

मान लो, वेश्याओं को कानूनी लाइसेंस दे दिया जाता है, तो इसमें हर्ज क्या है ? दलाल खत्म हो जाएँगे, वेश्यागृह चलाने वाली मौसियों का धंधा बंद हो जाएगा, अपनी पूरी कमाई पर वेश्याओं का हक होगा, पुलिस उन्हें परेशान नहीं कर सकेगी, उनके स्वास्थ्य का नियमित परीक्षण संभव हो सकेगा, एड्स का प्रसार रुकेगा वगैरह, वगैरह...

लगता है, तुम भी एनजीओ वालों की बातों में आ गई हो। इन्हें देह व्यवसाय की नहीं, अपने प्रोजेक्ट की चिंता है। वेश्याओं को लाइसेंस मिलने लगेगा, तो एनजीओ चलाने वालों के लिए नए प्रोजेक्ट बनाने में आसानी होगी। ये महानुभाव अपने दानदाता देशों से क्यों नहीं पूछते कि आप पहले अपने देश में देह व्यवसाय को कानूनी मान्यता दे दीजिए, फिर हमें इस तरह की सलाह दीजिएगा?

चलो, मान लिया कि यह विदेश से आया हुआ विचार है। लेकिन अच्छा है, तो इसे अपनाने में बुराई क्या है ?

बुराई यह है कि एक नया लाइसेंसिंग विभाग खुलेगा, जो लाइसेंस जारी करने के पहले खुल कर शोषण करेगा और पुलिस की कमाई भी बढ़ जाएगी। हेल्थ इंस्पेक्टर भी खूब कमाएँगे। दूसरे, अभी यह व्यवसाय लगभग खुले आम चल रहा है। लाइसेंस प्रणाली शुरू होने के बाद यह भूमिगत हो जाएगा, जिससे वेश्याओं को ही नुकसान होगा। पता नहीं, क्या-क्या नई परेशानियाँ शुरू हो जाएँगी।

तो उपाय क्या है ?

एक उपाय तो यह है कि आर्थिक व्यवस्था को ऐसा बनाया जाए कि न तो किसी को भीख माँगने की जरूरत हो और न किसी को देह बेचने की। इसमें समय लगेगा। तब तक प्रशासन में यह सख्ती लाने की जरूरत है कि वह देह व्यवसाय को समाप्त करने के लिए कमर कस ले। पुलिस चाहे तो चौबीस घंटों में सभी वेश्यालयों को बंद करा सकती है। पुलिस की मिलीभगत के बिना समाज में कोई भी काला धंधा नहीं चल सकता।

यह भी तो सोचो कि देह व्यवसाय खत्म हो जाने पर समाज में व्यभिचार बढ़ जाएगा।

फिर वही बासी तर्क। व्यभिचार बढ़ेगा तो बढ़े। वह एक अलग समस्या है। उसका निदान करने के लिए दूसरे तरीके हैं।

जैसे ?

उसके पहले मैं एक बात कहना चाहता हूँ।

बताओ।

मैं एक ऐसे समूह की बात सोचता हूँ जो लड़के-लड़कियों को यौन प्रशिक्षण दे। इस समूह में स्त्रियाँ भी होंगी और पुरुष भी। स्त्रियाँ लड़कों को प्रशिक्षण देंगी और पुरुष लड़कियों को। चाहें तो दोनों ही लड़की-लड़कों को यौन प्रशिक्षण दे सकते हैं।

मजाक तो नहीं कर रहे हो ?

मैं हमेशा मजाक नहीं करता। फिलहाल सभी तरह के प्रशिक्षण की सुविधा है - इंजीनियरिंग, डॉक्टरी, बढ़ईगीरी, बिजली मिस्तिरी, प्रबंधन...। सिर्फ यौन प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है। हर लड़की-लड़के को सब कुछ अपने स्तर पर सीखना पड़ता है। फलस्वरूप बहुत-सा अज्ञान बना रह जाता है। कुछ मिथक भी चलते रहते हैं। जैसे हमारे यहाँ अभी भी बहुत-से लोग मानते हैं कि पुरुष स्त्री का हाथ छू ले, तो गर्भ ठहर जाता है। हस्तमैथुन के बारे में तरह-तरह की भ्रांतियाँ हैं कि इससे कमजोरी आती है, यौनांग टेढ़ा हो जाता है आदि। अधिकांश स्त्रियों को तो पता भी नहीं है कि सहवास में पुरुष को ही नहीं, स्त्री को भी चरमसुख मिल सकता है। वे बेचारी इसे सिर्फ झेलती हैं, क्योंकि उन्हें इसमें कोई आनंद नहीं आता। और भी बहुत-सी चीजें हैं जिन्हें जानना हर व्यक्ति के लिए जरूरी है। इसके लिए यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। पर किताबी ज्ञान किताबी ही होता है...

यह तो एक तरह से वेश्यावृत्ति को ही मान्यता देना हुआ।

जी नहीं, यह वेश्यावृत्ति नहीं, एक तरह की स्कूलिंग होगी। इसमें काम करने वाले यौन प्रशिक्षक कहलाएँगे। उन्हें या तो वेतन मिलेगा या वे स्वतंत्र रूप से अपना स्कूल चला सकते हैं। यह धंधा नहीं होगा, समाज सेवा की कोटि में आएगा, जैसे स्कूल-कॉलेज में शिक्षक के काम को धंधा नहीं, समाज सेवा का काम माना जाता है।

लेकिन इसमें दुराचार की काफी गुंजाइश है। नहीं ?

है, दुराचार की गुंजाइश है। लेकिन उससे बहुत कम, जितना दुराचार यौन प्रशिक्षण के अभाव में फैलता है। कोई भी नया काम शुरू करने में जोखिम तो होता ही है। समाज उन्नत होता जाएगा, तो सब कुछ धीरे-धीरे ठीक होता जाएगा। दुराचार की गुंजाइश भी कम होती जाएगी। दरअसल, हम जो भी नई बात सोचते हैं, अच्छे समाज के संदर्भ में ही। वर्तमान समाज में तो हर चीज हास्यास्पद हो चुकी है। किसी मकान के एक खंबे को मजबूत बनाना बेकार है। सारे खंबे मजबूत होंगे, तभी मकान टिकाऊ हो सकता है।

खैर, इसमें तो कोई संदेह ही नहीं कि जैसे विज्ञान में नए-नए प्रयोग होते रहते हैं, वैसे ही समाज में भी प्रयोग होते रहने चाहिए।

बिलकुल। एक जड़ समाज ही प्रयोगों से घबराता है।

जैसे तुमने यौन प्रशिक्षण की बात कही, वैसी ही एक बात मैं कहना चाहती हूँ।

कहो, जरूर कहो।

बहुत पहले मैंने बर्ट्रेंड रसेल की एक किताब पढ़ी थी। इस किताब में उन्होंने परीक्षण विवाह की सलाह दी थी।

परीक्षण विवाह क्या?

ट्रायल मैरिज।

रसेल का प्रस्ताव क्या है?

रसेल का कहना है कि विवाह का पंजीकरण किए जाने के पहले ट्रायल मैरिज होना चाहिए। चूँकि विवाह का बंधन एक लंबी अवधि के लिए होता है - बल्कि जीवन भर के लिए, तो इस बंधन को स्वीकार करने के पहले कुछ दिन साथ रह कर देख लेना चाहिए कि वर-वधू में मेल है या नहीं। ऐसा न हो कि सामयिक आकर्षण में पड़ कर विवाह कर लिया और बाद में पछताते फिरें।

विचार बुरा नहीं है। बल्कि मामला अब तो बहुत आगे चला गया है। लोग विवाह के बिना ही साथ रह रहे हैं। कुछ देशों में तो विवाह संस्था ही खत्म हो रही है। ऐसे माहौल में ट्रायल मैरिज की क्या उपयोगिता हो सकती है?

क्यों नहीं हो सकती? दुनिया की बहुत बड़ी आबादी में अभी भी विवाह ही स्त्री-पुरुष के एक साथ रहने का माध्यम है। अपने देश को ही लो। सह-जीवन पर चलने वालों की कुल संख्या दो-तीन लाख से ज्यादा नहीं होगी। शायद कम ही हो। यूरोप और अमेरिका में भी विवाह का चलन कुछ कमजोर जरूर हुआ है, पर समाप्त नहीं हुआ है।

ओके। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि विवाह और सेक्स के रिश्ते को तोड़ देना चाहिए। विवाह केवल सेक्स के लिए नहीं होना चाहिए। सेक्स विवाह के पहले भी और विवाह के बाहर भी हो सकता है। इसके अलावा...

इसके अलावा?

मेरी समझ में नहीं आता कि सेक्स का इतना हौआ क्यों खड़ा कर दिया गया है। दो आदमी एक-दूसरे से मिल बैठे, तो पता नहीं क्या हो गया - धरती हिल गई या आसमान टूट पड़ा।

सुमित, यह भी तो सोचो कि यदि सेक्स को इतनी मामूली-सी चीज बना दिया गया, तो क्या विवाह की नींव ही नहीं भहरा जाएगी ?

अगर विवाह की नींव सेक्स पर ही आधारित है, तो उसका भहरा जाना ही ठीक है। सेक्स को हौआ बनने से रोकने में ट्रायल मैरिज सहायक साबित हो सकता है।

रसेल ने भी यही कहा है। ट्रायल मैरिज में बच्चा पैदा करने को छोड़ कर हर तरह की छूट होगी। हाँ, ट्रायल मैरिज की अवधि निश्चित की जा सकती है और यह भी कि इसके लिए लाइसेंस अधिकतम कितनी बार मिल सकता है, नहीं तो बहुत-से लोग...

...बहुत-से लोग एक के बाद दूसरा ट्रायल मैरिज करते हुए ही जिंदगी काट देंगे।

अच्छा, यह बताओ कि समलैंगिकता पर तुम्हारे विचार क्या हैं ?

बहुत-सी अन्य चीजों की तरह समलैंगिकता भी मेरी समझ से बाहर है। इसलिए इस पर मैं विचार ही नहीं करता।

लेकिन अब तो यह बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है...

बनता है तो बने। मुझे क्या।

आखिर इस पर कोई स्टैंड तो लेना ही होगा।

मेरा स्टैंड यही है कि दो बालिग व्यक्ति आपस में जो मन में आए, करें - बस मारपीट न करें, कोई कानून न तोड़ें।

और समलैंगिक विवाह ?

यह जरा पेचीदा मामला है। मेरी समझ में नहीं आता कि समलैंगिक लोग इसके लिए मारामारी क्यों कर रहे हैं। लगता है, उनके लिए भिन्नलिंगी संबंध अभी भी मॉडल बना हुआ है। विवाह का एक पहलू संतान पैदा करना भी है। समलैंगिकता में यह संभव नहीं है। तो फिर विवाह का अर्थ क्या होगा?

मेरी समझ से तो सिर्फ सेक्स का स्वरूप बदला है, मानसिकता अब भी वही है। वैसी ही घर-गृहस्थी, वैसा ही एकाधिकार, वैसा ही नियंत्रण...।

कुछ देशों में समलैंगिक विवाहों को मान्यता मिल गई है। पश्चिमी देशों में तरह-तरह के अजूबे होते रहते हैं। हाँ, इसका एक सकारात्मक पहलू हो सकता है।

वह क्या ?

दो पुरुष या दो स्त्रियाँ मैत्री के सघन बंधन में बँध कर एक साथ रहें। यह बंधन इतना सघन हो कि एक तरह से दांपत्य में बदल जाए। वे यह व्यवस्था भी कर सकते हैं कि एक के मरने के बाद दूसरे को उसकी संपत्ति मिल जाए। दोनों का संयुक्त बीमा भी हो सकता है। लेकिन इस सब के लिए मैं विवाह की जरूरत नहीं समझता। यह खयाल ही बेहूदा है। जिनकी यौनिकता भिन्न तरह की है, उन्हें अन्य मामलों में भी भिन्न तरीके से सोचना चाहिए।

मैंने पढ़ा है कि समलैंगिक रिश्तों में एक पति की भूमिका अपना लेता है और दूसरा पत्नी का।

यह तो और भी बुरा है। क्या यहाँ भी पति-पत्नी का फार्मूला लागू होगा? ऐसा क्यों नहीं हो सकता है कि दोनों पति हों और दोनों ही पत्नियाँ हो? इस तरह समानता के आधार पर एक नई किस्म का परिवार अस्तित्व में आ सकता है।

लेकिन सुमित, यह समलैंगिक रुझान आता कहाँ से आता है ? मुझे तो यह प्राकृतिक बात नहीं लगती।

यह विषय जीववैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों का है। वे शोध करके बताएँ। जहाँ तक अप्राकृतिक या असामान्य होने की बात है, तो इस बारे में मेरी कोई राय नहीं है। जरूरी नहीं कि ज्यादातर लोग जिसे सामान्य मानते हों, वह सामान्य हो। प्रकृति और जीवन की लाला अपरंपार है। हाँ, यह देख कर मुझे जरूर गुस्सा आता है कि आजकल हर चीज की जिम्मेदारी जीन्स पर डाल दी जाती है। मानो आदमी जीन्स का पुतला हो - उसकी रचना में इतिहास और संस्कृति की कोई भूमिका ही न हो।

जीन्स वाली बात मुझे भी एक सीमा से ज्यादा कायल नहीं करती।

क्या आज हम लोग दिन भर सेक्स पर ही बातचीत करते रहेंगे? आज तुम्हें भूख नहीं लग रही है?

क्यों नहीं लग रही है ? चलो, डाइनिंग हॉल में चलें।

चलो। यह भूख सेक्स की भूख से ज्यादा प्रबल है। भूखे पेट अगर भजन नहीं हो सकता, तो सेक्स भी नहीं...

खबरदार। डाइनिंग हॉल से निकल कर यह मत कहने लगना कि चलो, अब दूसरी भूख भी मिटा लें।

इसमें कहने की बात क्या है? मैंने शुरू में ही कहा था, यह कहने का नहीं, करने का मामला है।

मैं भी यही सोच रही थी।

सच?

सच नहीं तो क्या झूठ ?

*

खाना खाते समय सुमित कुछ विचारमग्न लग रहा था। खा चुकने के बाद सुमित ने अचानक कहा, मुझे बहुत जोर की नींद आ रही है। शाम को मिलेंगे।


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