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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


खाने की मेज से सुनी गई बातचीत :

क - निराला ने अपनी एक कविता में कहा है...

ख - निराला कौन? मैंने उनका नाम कभी नहीं सुना।

क - वे हिन्दी के एक बड़े कवि थे।

ख - अच्छा? मैं कविता नहीं पढ़ता।

क - कोई बात नहीं। उपन्यास-कहानी तो पढ़ते ही होंगे?

ख - इन फालतू चीजों के लिए मेरे पास समय नहीं है।

यह बातचीत सुन कर मैं दंग रह गई। उस दिन दोपहर को सुमित कहीं गया हुआ था। खाना वहीं खा कर लौटा। मैंने उसे इस बातचीत के बारे में बताया, तो वह हँसने लगा। बोला, ये दूसरे महाशय जरूर कपड़े-लत्ते से मॉडर्न होंगे। कलाई में महँगी घड़ी होगी।

थी तो, मैंने कहा।

हिन्दी भी वे अंग्रेजी लहजे में बोलते होंगे, सुमित ने पूछा।

हाँ, लग तो ऐसा ही रहा था। डिशेज भी बहुत महँगी मँगा रखी थीं, मैंने अतिरिक्त सूचना दी।

सुमित ने कहा, इसी वर्ग के सदस्यों के लिए संस्कृत में कहा गया है : जो साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह ऐसा पशु है जिसके सींग-पूँछ नहीं है।

मुझे हँसी आ गई। यह कहावत मैं पहली बार सुन रही थी।

आगे की हमारी बातचीत इस प्रकार है।

लेकिन सुमित, क्या यह ज्यादती नहीं है ?

क्या ज्यादती नहीं है?

यही कि किसी को साहित्य में रुचि न हो, तो उसे जानवर करार दिया जाए ?

वह है ही जानवर, इसमें करार देने की बात क्या है? जानवर को अपनी भौतिक जरूरतों से मतलब होता है। वह न कहानी रचता है, न कविता का आनंद ले सकता है। सुनते हैं, उस पर संगीत का प्रभाव पड़ता है, पर वह खुद संगीत नहीं पैदा कर सकता। यों कहो कि वह प्रकृति से ऊपर उठ कर संस्कृति के स्तर तक नहीं आ पाया है। अगर मनुष्य भी यही करता है, तो उसे और क्या कहेंगे?

तब तो जो वैज्ञानिक नहीं है, अर्थशास्त्री नहीं है, मनोविज्ञान का पंडित नहीं है, उसे भी तुम इसी कोटि में डाल दोगे।

इतना बेवकूफ नहीं हूँ मैं।

तो कितने हो ?

यह तो दूसरे तय करेंगे। दूसरे, अपनी बेवकूफियाँ मैं जानता हूँ। उनका प्रचार क्यों करता फिरूँ? क्या मुझे पागल कुत्ते ने काटा है?

चलो, जिस भी कुत्ते ने काया हो, अपनी मूल बात पर आओ।

दूसरी लड़की ऐसी बात कहती, तो मैं उसे उठा कर खिड़की के बाहर फेंक देता।

बड़े आए खिड़की से बाहर फेंकने वाले। मच्छर तक को तो मारने की हिम्मत नहीं है।

यह तुम्हें कैसे मालूम?

मैंने एक दिन देखा था। गेस्ट हाउस के बाहर बरामदे में तुम और एक दूसरा आदमी बैठे हुए थे वह बार-बार मच्छरों को पकड़ और हथेलियों से मसल रहा था। तुम उन्हें रूमाल से उड़ा रहे थे।

इसलिए कि वे मच्छर मेरा मजाक नहीं उड़ा रहे थे। हा हा हा!

मैं अपने शब्द वापस लेती हूँ। अब यह बताओ कि जो वैज्ञानिक नहीं है, अर्थशास्त्री नहीं है, मनोविज्ञान का पंडित नहीं है, उसे भी तुम जानवर की कोटि में डाल दोगे।

नहीं, वे जानवर से कुछ कम हैं।

मतलब ?

मतलब यह है कि सिर्फ विज्ञान की आराधना मनुष्यतत्व नहीं है। कोई संवेदनाहीन अथवा दुष्ट व्यक्ति भी वैज्ञानिक हो सकता है। डॉ. डेविल को केंद्र में रख कर कई कहानियाँ और उपन्यास लिखे गए हैं। अपने यहाँ रावण को भी बहुत बड़ा ज्ञानी माना गया है। मूल चीज है संवेदना, जिसका चरित्र से गहरा संबंध है। जिस व्यक्ति में संवेदना नहीं है, जिसके पास चरित्र की पूँजी नहीं है, वह अगर ज्ञानी भी हुआ तो क्या?

तो क्या संवेदना के विकास में ज्ञान की कोई भूमिका नहीं है ? क्या अज्ञानी ही संवेदनशील हो सकता है ?

तुम तो वकीलों की तरह जिरह कर रही हो। वकीलों को सत्य की परवाह नहीं होती। उनकी मुख्य चिंता अपने मुवक्किल को बचाने की होती है। इसके लिए वे तर्क भी कर सकते हैं और कुतर्क भी।

माफ कीजिए। मेरा आशय यह नहीं था। चूँकि आप ज्ञान को बहुत नीचे के पायदान पर रख रहे थे, इसीलिए मुझे यह प्रश्न करना पड़ा।

सुनंदा, मैं ज्ञान की अवहेलना या अवमानना नहीं कर रहा था। संवेदना के विकास में ज्ञान की बड़ी और निर्णायक भूमिका रही है।

जैसे ?

जैसे...जैसे गरीबों की मदद करनी चाहिए, यह आम संवेदना है। अधिकांश लोग इसी से परिचालित होते हैं। लेकिन जिन्हें गरीबी के अर्थशास्त्र की जानकारी है, वे कहेंगे कि गरीबी मिटाना राज्य की जिम्मेदारी है। जिस राज्य में लोग भूख से मरते हैं या सभी बच्चों को पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं मिलता, वहाँ की सरकार वर्ग विशेष के हित में काम कर रही है। वह सरकार जन विरोधी है, इसलिए अवैध है। ऐसी सरकार को उखाड़ फेंकना चाहिए।

ऐसा भी हो सकता है कि खुद साहित्य ही संवेदनारहित हो जाए। जैसे तुलसीदास की यह अर्धाली - जिमि सुतंत्र भइ बिगरहिं नारी। या कबीर का यह दोहा - नारी तो हमहूँ करी तब ना किया बिचार ; जब जानी तब परिहरी नारी महा विकार।

देवी, यह साहित्य की नहीं, साहित्यकार की सीमा है। यह सीमा उसके समय की भी हो सकती है। तुलसी और कबीर चार-साढ़े चार सौ साल पहले पैदा हुए थे। उस समय की संवेदना का स्तर यही था। लेखक भी इसका शिकार हो गया। आज का लेखक अगर ऐसी बातें लिखें, तो वह पिट जाएगा। साहित्यकार अपना योगदान कर चला जाता है। पर साहित्य नहीं मरता। वह जिंदा रहता है। उसका भंडार बढ़ता जाता है। इसी क्रम में साहित्य की संवेदना भी परिष्कृत होती जाती है। इसलिए पाठक को सावधान हो कर पढ़ना चाहिए। आज अगर वह तुलसी या कबीर के समय की संवेदना को अपना गाइड बनाता है, तो वह बीते जमाने का आदमी हो कर रह जाएगा। जैसे हममें से कोई पाषाणकालीन मनुष्य की तरह जीना चाहे। उसे लोग पागल कहेंगे। तुमने तो सड़कों पर यह चेतावनी देखी ही होगी - सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

लेकिन सर, यह तो व्यक्तिगत संबंधों पर इतना ही लागू होता है - सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। मैंने ऐसी अनेक दुर्घटनाएँ देखी हैं।

जी। पर हम यहाँ साहित्य की बात कर रहे थे।

तो आपका कहना यह है कि साहित्य हमारी संवेदना को जगाता है, उसका निरंतर परिष्कार करता है। लेकिन यह काम तो और तरीकों से भी किया जा सकता है।

जैसे?

जैसे धर्म, नैतिकता, शिक्षा, विचारधारा, कानून वगैरह।

सही है। लेकिन ये माध्यम रूखे हैं और संवेदना के पहले विचार जगत को संबोधित करते हैं। साहित्य की खूबी यह है कि वह यही काम रस और आनंद पैदा करके करता है। वह बहुत ज्यादा ब्योरे में नहीं जाता, बल्कि किसी कहानी, कविता या नाटक के माध्यम से करता है। दूसरे माध्यम जो काम दो महीने में करते हैं, साहित्य वह दस मिनट में कर सकता है। इसके अलावा एक और बात है...

हूँ...

साहित्य जीवन और जगत के बारे में हमारी समझ बढ़ाता है। वह हमारी भीतरी और बाहरी दुनिया को मिनट भर में उद्भासित कर देता है - भाषण दे कर नहीं, बल्कि यथार्थ का कोई टुकड़ा पेश कर, जिससे चमत्कृत हो कर हम सोचने लगते हैं - अरे, जिंदगी ऐसी भी होती है। या, जिंदगी ऐसी भी हो सकती है।

शायद इसीलिए आप कह रहे थे कि साहित्य सबके लिए जरूरी है।

हाँ, साहित्य के बिना भी कोई प्रतिभाशाली आदमी काम चला सकता है - उसकी संवेदना इतनी विराट हो सकती है जिसके दायरे के बाहर कुछ भी न रह जाए। लेकिन यह रास्ता सभी के लिए खुला नहीं है। वह तो सीढ़ी-दर-सीढ़ी उपर उठता है। साहित्य इसमें सबसे ज्यादा मददगार होता है। विज्ञान को समझे बिना आदमी रह सकता है, कानून की जानकारी के बिना भी वह रह सकता है, पर वह साहित्य के संपर्क में नहीं आया, तो एक अविकसित प्राणी हो कर रह जाएगा।

कमाल है।

हाँ, साहित्य के बिना भी कोई प्रतिभाशाली आदमी काम चला सकता है - उसकी संवेदना इतनी विराट हो सकती है जिसके दायरे के बाहर कुछ भी न रह जाए। लेकिन यह रास्ता सभी के लिए खुला नहीं है। इसके लिए अध्ययन चाहिए या फिर साधना। साहित्य सबके लिए है। कक्षा पाँच का विद्यार्थी भी प्रेमचंद की कहानी समझ सकता है। विज्ञान को समझे बिना आदमी रह सकता है, कानून की जानकारी के बिना भी वह रह सकता है, पर वह साहित्य के संपर्क में नहीं आया, तो एक अविकसित प्राणी हो कर रह जाएगा।

गजब।

एक और बात। साहित्य में कुछ खास है जो अन्य किसी भी विधा या ज्ञान की शाखा में नहीं है। हम सभी दूसरों की जिंदगी के बारे में जानना चाहते हैं, क्योंकि कोई दो जिंदगियाँ एक-सी नहीं होतीं। हरएक की जिंदगी अनोखी है। दूसरे शास्त्रों में व्यक्ति नहीं होता, व्यक्तियों का समूह होता है। वर्ग होते हैं, तबके होते हैं। इससे भी जानकारी मिलती है। पर व्यक्ति व्यक्ति को भी जानना चाहता है। हम जानना चाहते हैं कि दूसरे अपनी जिंदगी किस तरह बिता रहे हैं, उनकी खुशियाँ और दुख क्या हैं, उनकी जिंदगी में कौन-से द्वंद्व हैं, दूसरों से उनके रिश्ते कैसे हैं...।

यह सच है। दूसरे के बेडरूम में झाँकना आदमी का पुराना शगल है।

यहाँ मामला बेडरूम का नहीं है, पूरी जिंदगी का है। लेखक भी किसी की जिंदगी को पूरा नहीं जान सकता, पर वह कल्पना से वहाँ भी पहुँच जाता है 'जहाँ न पहुँचे रवि'। उसका हाथ पकड़ कर हम भी परकाया प्रवेश करते हैं। इससे हमारी जान-पहचान का दायरा फैलता है और जीवन बोध उन्नत होता है। इससे जो मनोरंजन होता है, वह सर्वोच्च किस्म का है। इसीलिए साहित्य में जो आनंद है, वह कहीं और नहीं है।

वाह, एक टिकट में दो खेल। जो आदमी साहित्य से दूर है, वह जिंदगी से भी दूर है। ' अपनी ही दुम के पीछे भागने वाला कुत्ता ' - यह मुहावरा शायद ऐसे ही आदमी के लिए बना है। तब तो हर व्यक्ति के लिए साहित्य पढ़ना अनिवार्य कर देना चाहिए।

जरूर, पर यह कानून बना कर थोड़े ही हो सकता है। यह काम माता-पिता कर सकते हैं, स्कूल-कॉलेज कर सकते हैं।

साहित्य की पढ़ाई स्कूलों में तो अनिवार्य है, शायद कुछ हद तक कॉलेजों में भी। पर विश्विद्यालय में साहित्य एक अलग विषय हो जाता है। दूसरे विषयों के छात्र-छात्राओं को साहित्य नहीं पढ़ाते हैं।

मेरी राय में विज्ञान, वाणिज्य, मेडिकल, इंजिनियरिंग, कानून, मैंनेजमेंट, यानी प्रत्येक क्षेत्र की ऊँची से ऊँची पढ़ाई में छात्रों के लिए साहित्य का एक परचा अनिवार्य होना चाहिए। इससे उनकी मानवीय संवेदना का विकास होगा। जरूरी नहीं कि सभी छात्रों की संवेदना का विकास एक जैसा ही हो। कोई दो आदमी समान नहीं होते। फिर भी उम्मीद की जाती है कि साहित्य का कुछ न कुछ असर तो पड़ेगा ही।

हाँ, साहित्य चूँकि बेहतर आदमी बनने में मदद करता है, इसलिए साहित्य से जुड़ा डॉक्टर या मैंनेजर निरा अपने क्षेत्र का जानकार हो कर नहीं रह जाएगा, बल्कि वह बेहतर आदमी होगा और इसलिए उसके पेशवर जीवन में भी कम या ज्यादा संवेदनशीलता आएगी या सावधान हो कर कहा जाए तो आ सकती है।

इसीलिए तो मैं कह रहा हूँ कि साहित्य को साहित्यकारों तक सीमित रखना सामाजिक अपराध है। साहित्य हर आदमी की जिंदगी में होना चाहिए। इसकी बुनियाद बचपन से ही रखी जाए तो बेहतर है। नहीं तो आदमी जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, कमाने-खाने के गोरखधंधे में उलझता जाता है।

आपका तर्क समझ में आ रहा है। जो चीज समझ में नहीं आ रही है, वह यह है कि तो फिर शिक्षा व्यवस्था का संचालन करने वाली सरकारें या संस्थान इसके महत्व को क्यों नहीं समझते ? एक खास बिंदु के बाद वे साहित्य को अलग विषय बना देते हैं और बाकी छात्रों को साहित्य की पढ़ाई से मुक्त कर देते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं ? इस तरह, वे क्या समाज का अमंगल नहीं कर रहे हैं ?

बात यह है कि वे साहित्य के महत्व को नहीं समझते। उनके लिए साहित्य किस्सा-कहानी है। उन्हें अपने जीवन में ऐसे अभिभावक और शिक्षक ही नहीं मिले जो साहित्य में उनकी दिलचस्पी पैदा करते। एक और बात है। हमारी शिक्षा व्यवस्था का मूल लक्ष्य व्यक्ति को संवेदनशील बनाना है ही नहीं। उसका लक्ष्य है युवाओं को वर्तमान औद्योगिक समाज में सफलतापूर्वक जीने के लायक बनाना। हो सकता है, शिक्षा के मैनेजर यह भी मानते हों कि साहित्य पढ़ने से इस लक्ष्य में बाधा आ सकती है। इस औद्योगिक समाज के लिए संवेदना से ज्यादा सफलता अहम है। संवेदनहीन हुए बगैर इस क्रूर व्यवस्था को चलाया ही नहीं जा सकता। पूँजी के लिए हर वह चीज बेकार है जो आदमी को चीजों का गुलाम न बनाती हो, जो बाजार का विस्तार नहीं करती हो, जो आदमी में नैतिक बोध पैदा करती हो। कहा जा सकता है कि अपने मूल रूप में साहित्य बाजार-विरोधी ताकत है। वह हमारे भीतर बैठे शैतान पर हमला करती है। पूँजीवाद को हर जगह शैतान चाहिए, तभी वह बिना किसी विघ्न के अपना काम कर सकता है।

क्या इसीलिए समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को सदियों से अक्षरों की दुनिया से बाहर रखा गया है ?

दूसरी वजह क्या हो सकती है? साहित्य न केवल हमारी संवेदना का विस्तार करता है, बल्कि हममें शोषण और अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की ताकत भी पैदा करता है। यही बात है कि प्रत्येक देश का शासक वर्ग साहित्य को खतरनाक मानता है।

लेकिन पहले के समय में तो राजा-महाराजा ही लेखकों, कवियों को आश्रय और प्रश्रय देते थे। वे नहीं होते, तो शायद बहुत-से साहित्यकार पैदा ही नहीं होते।

सच है। लेकिन इस तरह का साहित्य ज्यादातर दिल बहलाने वाला साहित्य होता था। वह नैतिक बोध कम पैदा करता था, मनोरंजन ज्यादा करता था। आज भी बहुत-सा लेखन ऐसा किया जा रहा है जो हमारी खुजली मिटाता है, बस। तब सामंतवाद था, आज पूँजीवाद है।

इससे तो जनता के सांस्कृतिक विकास में काफी रुकावट आई होगी ? उनके पास न पढ़ने के लिए कुछ था न लिखने के लिए।

एक तरह से। मगर कोई भी जीवंत समाज साहित्य के बिना जी नहीं सकता। इसलिए तथाकथित उच्च साहित्य से वंचित स्त्री-पुरुषों ने अपनी भाषाओं में अपना साहित्य खुद रचा। उनके अपने गीत थे,अपनी कहानियाँ थीं, अपने नाटक थे। इन्हीं के द्वारा लोक ने अपने को अभिव्यक्त किया। इस साहित्य में मनोरंजन भी था, पर मनोरंजन से ज्यादा उसकी पीड़ा थी। उसकी खुशियाँ भी थी। इसी साहित्य को लोक साहित्य कहने का रिवाज है - लोक कथाएँ, लोक गीत, नाटक के विविध लोक रूप आदि। वास्तव में यही जनता का साहित्य है। बाकी साहित्य गैर-जनता का, गैर-जनता द्वारा और गैर-जनता के लिए था। यही साहित्य आजकल स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाया जाता है, हालाँकि इसे लोकतंत्र का युग कहा जाता है। कमाल है !

कमाल है, सौ बार कमाल है। यहाँ मैं एक बात जोड़ना चाहती हूँ। यह लोक साहित्य आज नहीं रचा जा रहा है, क्योंकि जिस लोक समाज में इसकी रचना होती थी, वही खत्म होता जा रहा है, बल्कि खत्म ही है। लेकिन जनता की साहित्यिक जरूरतें तो खत्म हुई नहीं हैं। सो साहित्य की जगह फिल्मों और फिल्मी गीतों ने ले ली है। अब टेलीविजन भी इस भीड़ में शामिल हो गया है। लेकिन इस सबमें कला कम है, मनोरंजन का औद्योगिक और व्यावसायिक उत्पादन ज्यादा है। यह कबाड़ जनसाधारण की संवेदना का बढ़ा कम रहा है, उसे कुंद ज्यादा कर रहा है।

बेशक। जैसा आज का समाज, वैसी ही उसकी कला। लेकिन इसमें सारा दोष जनता का, बल्कि मध्य वर्ग का भी नहीं है। उनकी साहित्यिक जरूरतों को पूरा करने का जिम्मा औद्योगिक क्षेत्र ने लिया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना है। उसकी निगाह जनता के दिलो-दिमाग पर नहीं, उसकी जेब पर रहती है। जेब काटने के लिए वह जनता के दिलो-दिमाग को भी बदल रहा है। वह शाकाहारी जानवर को मांसाहारी बना रहा है। ऐसे जीव में तरह-तरह की असामान्यताएँ पैदा हो जाती हैं। हमारा समाज अब इन असामान्यतों के बीच जीने का अभ्यस्त होता जा रहा है। इसका असर आम जनता पर भी पड़ रहा है। वह अनजाने में ऐसे सांस्कृतिक उत्पादन का शिकार हो रही है, जो सीधे उसके खिलाफ जाता है। बीस-पचीस साल बाद पता नहीं क्या होगा!

होगा क्या, ठेंगा। तुम ठीक कहते हो, सब कुछ का विकेंद्रीकरण होना चाहिए, नहीं तो विकास का यह दैत्य हम सभी को लील लेगा। अब मेरी समझ में आ रहा है कि तुम यह आवारा और अराजक जीवन क्यों जी रहे हो। यह व्यवस्था के खिलाफ तुम्हारा निजी विद्रोह है।

अरे, इतनी बड़ी-बड़ी बातें न करो, वरना मुझे अपने आपसे इश्क हो जाएगा।

वह तो हो ही चुका है। मुझे कोशिश करने दो कि तुम्हारे इश्क के दरिया को ...

इश्क के दरिया को...?

कुछ अपनी ओर...

कुछ अपनी ओर...?

कहलवाना ही चाहते हो, तो सुनो, अपनी ओर मोड़ सकूँ।

कोशिश करने में क्या हर्ज है? भारत के संविधान में इसकी मनाही नहीं है।

सुमित, निजी को सार्वजनिक बनाने में तुम्हें बहुत मजा आता है। परवरदिगार, कुछ तो निजी रहने दिया करो।

पता नहीं, कुछ निजी होता भी है या नहीं? तुमने सुना ही होगा, पर्सनल इज पॉलिटिकल।

सुना तो है, पर यह मुझे पूरी तरह सच नहीं लगता।

सुनंदा, पूरी तरह सच कुछ भी नहीं होता। जितना हमारे हाथ आता है, हम उसी से काम चलाते हैं। और चारा भी क्या है?

मेरी विनम्र सम्मति में, चारा यह है कि तुम कभी-कभी तो फरिश्तई छोड़ कर आदमी हो जाया करो। मेरे लिए ही सही।

बेचारा मैं और फरिश्ता! कोई और लतीफा सुनाओ, मैं भी जिसका मजा ले सकूँ।

मैं कुछ देर तक सुमित को देखती रह गई - अपलक। यह आदमी है या मशीन?


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