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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


दूसरे दिन मैं सुमित के पास पहुँची, तो मेरे सारे कपड़े भीगे हुए थे। दरअसल, मैं थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गई थी। आसपास कोई दुकान नहीं थी। मुझे स्टेशनरी की कुछ चीजें लेनी थीं। वापसी में अचानक धुआँधार बारिश होने लगी। बारिश तो कुल दस मिनट हुई, पर सब कुछ भीग गया।

सुमित गेस्ट हाउस के दरवाजे पर ही मिल गया। गेस्ट हाउस की बिजली चली गई थी। शायद इसीलिए वह बाहर आ गया हो। मैंने कहा, 'अपने कमरे से कपड़े बदल कर आती हूँ।'

उसने कहा, 'बेकार है। पूरे गेस्ट हाउस में अँधेरा है। सीधे मेरे कमरे में चलिए। मेरे पास मोमबत्तियाँ हैं।'

हम उसके कमरे में दाखिल हुए। उसने एक बड़ी-सी मोमबत्ती जलाई। मुझे एक मोमबत्ती और दियासलाई दी। फिर एक बड़ा-सा सफेद रंग का तौलिया और साफ धुला हुआ कुरता-पाजामा मेरी गरदन पर रख दिया। कपड़े बदल कर जैसे ही बाथरूम से निकली, बिजली आ गई। मुझे मुझे बड़ा अजीब-सा लग रहा था। इसके पहले कभी मैंने किसी और के कपड़े नहीं पहने थे। फिर यह सुमित का कुरता-पाजामा था। दोनों ही मुझे ढीले थे, पर उनसे एक आत्मीय किस्म की सुगंध आ रही थी। मैंने लक्ष्य किया कि जब मैं वेश बदल कर कमरे में आई, तो सुमित दीवार की ओर देख रहा था। शरारतवश मैंने हलके-से ताली बजाई, तो वह मेरी ओर मुड़ा। अब वह देख मुझे ही रहा था, पर इस तरह जैसे वह मेरे पीछे की दीवार की ओर देख रहा हो।

फिर उसने एक सिगरेट निकाली और कहा, तो बातचीत की शुरुआत की जाए?

हाँ, क्यों न आज ईश्वर पर चर्चा की जाए?

ईश्वर पर? यह ईश्वर बीच में कहाँ से टपक पड़ा?

मुझे तो शुरू से ही ईश्वर के होने पर संदेह रहा है, पर आसपास के अधिकांश लोगों को ईश्वर में विश्वास करते हुए देखती हूँ, तो अपने पर ही संदेह होने लगता है। रास्ते में जब घनघोर बारिश होने लगी, तो मैंने ईश्वर को ही याद किया -- हे भगवान, इतना मत बरस कि आज की बैठक ही रद्द हो जाए।

और जब दस-बारह मिनट में बारिश रुक गई, तो तुमने क्या किया?

कुछ नहीं किया।

कुछ नहीं किया? भगवान को धन्यवाद तक नहीं दिया?

जल्दी से जल्दी होटल पहुँचने की धुन में ईश्वर की याद ही नहीं आई।

अब तुम्हें क्या ऐसा लगता है कि भगवान ने तुम्हारी सुन ली थी?

क्या पता। हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता।

क्यों , यह तय करने का कोई तरीका नहीं है?

मेरी समझ से तो नहीं है।

फिर हम कुछ भी घटित होने या नहीं घटित होने का श्रेय ईश्वर को कैसे दे सकते हैं?

बात तो सोचने की है। पर आखिर इतनी बड़ी सृष्टि को कोई तो चला ही रहा होगा। हम ऐसा क्यों न मान लें कि उसी का नाम ईश्वर है?

सृष्टि को कोई चला रहा है या यह अपने आप चल रही है?

सुमित साहब, बिना चलाए जब साइकिल जैसी छोटी चीज भी नहीं चलती, तो इतना बड़ा ब्रह्मांड कैसे चल सकता है?

साइकिल भले न चले, पर घड़ी तो चलती ही है।

गलत। घड़ी उतनी ही देर तक चलती है जितनी देर चलने की ऊर्जा उसमें भरी गई है।

तुमने बिलकुल ठीक कहा। अच्छा, यह बताओ, ब्रह्मांड के बारे में हम कितना जानते हैं?

बहुत ही कम। शायद नहीं के बराबर। हमें तो यह मामूली-सी बात भी नहीं मालूम कि इसका आकार कितना बड़ा है। कोई चींटी रेलगाड़ी के बारे में कितनी दूर तक कल्पना कर सकती है ? ब्रह्मांड के मुकाबले हमारी हैसियत तो चींटी के बराबर भी नहीं है।

अच्छा, यह बताओ, जो ब्रह्मांड को चला रहा है, उसे तो ब्रह्मांड के बाहर होना चाहिए न !

क्यों , कार को चलानेवाला कार के भीतर बैठा नहीं हो सकता ?

पर हम तो कार को ही देख पा रहे हैं। उसका ड्राइवर शुरू से ही अदृश्य है। आज भी उसका कुछ अता-पता नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में जब तक हम इस ब्रह्मांड के चालक तक अपनी पहुँच नहीं बना लेते या उसके होने का कुछ संकेत नहीं मिल जाता , तब तक उसके बारे में क्या कह जाए और किस आधार पर कहा जाए !

मत कहिए , पर इस बारे में चुप तो रहिए।

हाँ , यह हुई न बात। लेकिन जो लोग मेरी ही तरह अज्ञानी हैं , उन्हें भी तो ब्रह्मांड के चालक के बारे में चुप ही रहना चाहिए। जब वे ईश्वर-ईश्वर चिल्लाते हैं , तो हमें भी कुछ बोलना ही पड़ता है।

यानी आपका आशय यह है कि यह एक निगूढ़ विषय है और इस बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता ?

मुझे तो ऐसा ही लगता है। अगर ईश्वर के बारे में कोई आदमी ऐसी बात कहता है, जिसका परीक्षण किया जा सकता है या जिस पर तर्क-वितर्क किया जा सकता है, तो हम जरूर विचार करेंगे। लेकिन ऐसा मौका आज तक तो आया नहीं है।

लेकिन इस बात का क्या जवाब है कि इस सृष्टि की रचना किसने की ?

इसका कोई जवाब नहीं है।

आपका कहना यह है कि इतनी बड़ी दुनिया अपने आप बन गई। यह कैसे हो सकता है?

मुझे मालूम नहीं। हो भी सकता है, नहीं भी हो सकता है।

मेहरबानी करके पहेलियाँ मत बुझाइए। मैं ज्ञानहीन हो सकती हूँ , पर बेवकूफ नहीं हूँ। जब हम मेज को देखते हैं , तो कल्पना कर लेते हैं कि किसी बढ़ई ने यह मेज बनाई होगी। आदमी को देख कर उसके माता-पिता की कल्पना की जा सकती है। इसी तरह , सृष्टि है , तो इसका स्रष्टा भी होना चाहिए। उसे ही ईश्वर कहें , तो क्या हर्ज है ?

कह लो, तुम्हारा मन करे तो कह लो। लेकिन इससे समस्या हल नहीं होती।

कैसे ?

पहली बात तो यह है कि ईश्वर को हम स्रष्टा मान लेते हैं, तो सवाल यह उठेगा कि तब स्वयं ईश्वर किसकी सृष्टि है। उसका भी पता चल गया, तब ईश्वर के स्रष्टा के स्रष्टा की खोज करनी होगी। यह सिलसिला कभी खत्म होने का नहीं।

और दूसरी बात ?

दूसरी बात यह कि क्या उसने सृष्टि की रचना का काम पूरा कर लिया है? या वह अभी भी रचे जा रहा है? यह जानने का कोई तरीका अभी तक हमारे पास नहीं है। जैसे हम सृष्टि का अतीत नहीं जानते, वैसे ही हम सृष्टि का भविष्य नहीं जानते। हमें तो यहाँ तक मालूम नहीं है कि सृष्टि का वास्तविक आकार क्या है। वह किधर जा रही है? कहीं जा भी रही है या अपने को ही दुहरा रही है? इसलिए स्रष्टा के बारे में विचार करने का समय अभी आया ही नहीं है।

और तीसरी?

तीसरी बात यह है कि यह सृष्टि किसने रची और या अस्तित्व में कैसे आई, यह सब न जानने से भी हमारा काम चल सकता है। यह होटल किसने बनाया और कब बनाया, इससे उन चींटियों को क्या फर्क पड़ता है जो इस कमरे के फर्श पर रेंग रही हैं?

हम चींटियाँ नहीं, मनुष्य हैं। चींटियों में जिज्ञासा नहीं होती। हम जानना चाहते हैं। हम समझना सकते हैं कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है , हम क्यों जी रहे हैं या हमें किस तरह जीना चाहिए।

मुश्किल है, महा मुश्किल है। अभी तक तो हम यह भी नहीं जानते कि पृथ्वी को छोड़ कर कहीं और जीवन है या नहीं। अभी तक तो कोई नामो-निशान मिला नहीं है। आगे भी संभावना कम ही दिखाई देती है। हो सकता है, पृथ्वी पर जीवन का होना कोई रासायनिक दुर्घटना हो। यह तो तुम्हें पता ही होगा कि हमारे ब्रह्मांड में कुछ बुझे हुए ग्रहों-उपग्रहों को छोड़ कर ठोस जमीन बहुत कम है। ब्रह्मांड तारों से भरा हुआ है। हमारा सूर्य भी एक तारा है। और, सभी तारे जलती हुई गैस का पिंड हैं। यह सोच कर कितना भयानक लगता है कि इस गैसीय सृष्टि में हमें थोड़ी-सी ठोस जमीन मिली हुई है और इसका भी तीन हिस्सा पानी है।

हजरत , आपने तो मुझे उलझन में डाल दिया! मरने के बाद ब्रह्मांड में कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं है।

यह तो बाद की बात है। पहले यह तो बताओ कि जन्म लेने के पहले तुम कहाँ भटक रही थीं।

पता नहीं। मुझे कुछ भी याद नहीं है।

यही दूसरों के साथ भी सच है। मुझे खुद नहीं पता, मैं कहाँ से आया हूं और मुझे कहाँ जाना है। इसीलिए मैं इस तरह के सवालों में ज्यादा दिमाग, वह जितना भी है और जैसा भी है, नहीं खपाता।

चलो , मैं भी नहीं खपाती। फिर भी बात अभी पूरी तरह जमीनहीं। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि बहुत-से साधकों, ऋषियोंऔर आध्यात्मिक लोगों ने ईश्वर का साक्षात अनुभव किया है और उनमें से कुछ ने बाद में इसके बारे में बताया भी है?

बताया है, जरूर बताया है, पर हम उनकी बातों पर विश्वास कर लें, यह आवश्यक तो नहीं। लोग तो भूत-प्रेत के अस्तित्व के बारे में भी बताते हैं, अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी बताते हैं। तो क्या हमें भी भूत-प्रेत का अस्तित्व मान लेना होगा?

सर , आप मजाक मत कीजिए। भूत-प्रेत और ईश्वर को एक ही दर्जे में न डाल दीजिए। कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली !

मेरे लिए तो दोनों एक ही श्रेणी की चाजें हैं। दोनों हमारे मन में रहते हैं।

वाह जी वाह ! तो आपका कहना यह है कि जिन्होंने ईश्वर के दर्शन करने का दावा किया है , वह कुछ और नहीं , उनकी कपोल कल्पना है। क्या रामकृष्ण परमहंस फ्रॉड थे ?

नहीं, किसी को फ्रॉड कहनेवाला मैं कौन होता हूँ? जब तक कोई साधू ईश्वर के नाम पर पैसा नहीं बटोरता या व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं साधता, तब तक उसे फ्रॉड मानने की जरूरत नहीं है। पर यह तो हो ही सकता है कि ईश्वर या देवी-देवता को माननेवाला व्यक्ति अपने कल्पना जगत में रहता हो और उसे ही यथार्थ मान बैठा हो।

हाँ , ऐसे एक व्यक्ति को मैं जानती हूँ। वे मेरे पापा के दोस्त थे। अकसर हमारे घर आते थे। उनका अटल विश्वास था कि पूर्व जन्म में वे सेना में कर्नल थे। उनका आचरण , बोलचाल , कपड़े सब किसी फौजी कर्नल जैसे ही थे। जब कोई उनसे कर्नल जैसा व्यवहार नहीं करता था , तो वे आगबबूला हो जाते थे। एक बार तो उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को पकड़ कर हवा में उछाल दिया था।

कई पागल भी ऐसा सोचते हैं या करते हैं। ऐसे इनसानों को सहानुभूति के साथ देखा जाना चाहिए। हो सकता है, मनश्चिकित्सकों के पास इसका कोई समाधान हो। मेरे लिए तो वे कौतूहल का विषय हैं।

तो क्या रामकृष्ण परमहंस भी कल्पना की दुनिया में रहते थे ?

मुझे क्या पता। मैंने उन्हें देखा थोड़े ही है। पर आज कोई उनके जैसा आचरण करे, तो मैं उसका परीक्षण करना चाहूँगा। इस काम में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की मदद भी लूँगा। वैसे, यह संभावना मुझे ज्यादा ठोस लगती है कि उसका ईश्वर या उसके देवी-देवता उसके अपने दिमाग में ही हों। दूसरे क्या मानते हैं -- चाहे वे कितने ही महत्वपूर्ण या प्रामाणिक व्यक्ति हों, मैं तो अपनी ही बुद्धि के अनुसार चलूँगा। मेरे पास कोई और मार्गदर्शक तंत्र नहीं है।

लेकिन सिर्फ बुद्धि पर चलनेवाले भी तो धोखा खा सकते हैं! जैसे पहले के अनेक वैज्ञानिक मानते थे कि पृथ्वी ही ब्रह्मांड या सौर मंडल के केंद्र में है। बाद में गैलीलियो ने साबित किया कि पृथ्वी की यह हैसियत नहीं है। वह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।

यही मैं भी कहना चाहता हूँ। बु्द्धि के रास्ते पर चलनेवाले आपस में तर्क-वितर्क कर सकते हैं और जिसकी बात ज्यादा तार्किक लगे, उसे मान सकते हैं। विज्ञान की प्रगति इसी रास्ते से होती है। यहाँ छोटा से छोटा वैज्ञानिक बड़े से बड़े वैज्ञानिक को चुनौती दे सकता है। पर ईश्वरवादियों का मामला अलग है। वे विचार-विमर्श और बहस में विश्वास नहीं करते।

यह तो है। हिन्दू , मुसलमान , ईसाई , पारसी सबके अपने-अपने ईश्वर हैं। आदिवासियों के भी अपने-अपने ईश्वर हैं। कोई इनसे कहे कि आप सब लोग एक साथ बैठ कर तय कर लो कि ईश्वर का वास्तविक स्वरूप कैसा है , तो विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के बीच झगड़ा ही खत्म हो जाए।

ठीक बात है। धार्मिक लोगों ने धर्म के नाम पर इस धरती पर कितना खून बहाया है, पर वैज्ञानिकों में हिंसक लड़ाइयाँ नहीं होतीं। क्योंकि वे विश्वास से नहीं, पर्यवेक्षण और तर्क से चलते हैं। आखिर मेरे और तुम्हारे बीच कोई तो सामान्य कसौटी होनी चाहिए, वरना हमारे बीच कोई संवाद नहीं हो सकता। ईश्वर पर विवाद होता है, तो विचार करने की कोई सामान्य कसौटी नहीं होती। सब अपनी-अपनी हाँकते हैं। कुछ तो मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। मेरा खयाल है कि ईश्वर हो भी तो वह इस शोर-गुल से घबरा कर घटना स्थल से फरार हो जाता होगा।

कहा तो यह भी जाता है कि ईश्वर एक है , जुदा-जुदा धर्म उस तक पहुँचने के जुदा-जुदा रास्ते हैं।

दिल को बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है। ईश्वर एक है, यह धर्म के कारण होनेवाले झगड़ों और दंगों को रोकने के लिए बनाई गई एक कॉमन तरकीब है। साधारण लोग ही कभी-कभी ऐसे नहीं कह बैठते, बड़े-बड़े लोगों ने भी यह सबक दिया है। हमारे जमाने में गांधी जी इसके सबसे बड़े पैरोकार थे। उनकी प्रार्थना सभाओं में भजन, कुरआन, बाइबिल सभी का पाठ होता था। उन्होंने सभी धर्मों की पुस्तकों का अध्ययन किया था। लेकिन उनकी बात किसने मानी? परंपरागत हिन्दू उन्हें हिन्दू नहीं मानते थे, मुसलमान उन्हें नहीं, जिन्ना को अपना नेता समझते थे, ईसाई पादरी उन्हें ईसाई बन जाने के लिए प्रेरित करते रहते थे। इस तरह सबके हो कर वे किसी के भी न रहे। आज भी भारत ही नहीं, विश्व भर की जनता उनका सम्मान करती है, पर सभी धर्मों को एक करनेवाले नेता के रूप में नहीं, बल्कि सत्य और अहिंसा के पुजारी के रूप में।

अर्थात आपके विचार से जो सभी धर्मों का सम्मान करता है , वह किसी एक धर्म का नहीं रह जाता। सभी ईश्वरों का सम्मान करते-करते वह ईश्वरविहीन हो जाता है , क्योंकि आदमियों में तो फिर भी एकता हो सकती है , पर ईश्वरों के बीच कोई संवाद नहीं हो सकता।

ईश्वरों के बीच संवाद इसलिए संभव नहीं है क्योंकि उनका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं है। वे कहीं और नहीं, हमारे दिमागों में रहते हैं। हर समुदाय अपना ईश्वर खुद पैदा करता है और फिर उसे जड़ बना देता है। मानव सभ्यता और संस्कृति का विकास जारी रहता है, पर ईश्वर महोदय अपने पुराने रंग-रूप में जमे रहते हैं। किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह उन्हें अपडेट और रिन्यू करता चले।

फिर इतने लोग अभी भी आस्तिक क्यों बने हुए हैं ?

मुझे क्या पता। यह तो उन्हीं लोगों से पूछना चाहिए।

आप फिर मजाक कर रहे हैं। विज्ञान दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, फिर भी लोग मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों में जाते हैं। यहाँ तक कि बड़े-बड़े और मशहूर डॉक्टर और वैज्ञानिक भी अपने बेटे-बेटियों की जन्म कुंडली बनवाते हैं और कोई प्रोजेक्ट शुरू करने पर और फिर उसके सफल हो जाने के बाद ईश्वर या किसी बाबा की पूजा करते हैं तथा प्रसाद चढ़ाते हैं। इसकी वजह क्या है?

मुझे तो यही लगता है कि वे ईश्वर से डरते हैं। वे ईश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं, ताकि वह उनकी इच्छाएँ पूरी करता रहे, अपने पापों की माफी चाहते हैं, ताकि उनका ग्लानि बोध मिट जाए और अपने अकेलेपन से घबरा कर एक हमेशा का साथी ढूँढ़ते हैं, जो विपत्ति में उनकी पुकार सुन सके। वे ईश्वर से एक व्यक्तिगत, भौतिकवादी रिश्ता बनाना चाहते हैं। यह बेवजह नहीं है कि कोई अमीर हो जाता है, तो वह सबसे पहले एक मंदिर बनवाता है।

इसमें हर्ज क्या है ?

वैसे तो कोई हर्ज नहीं। हममें से सभी लोग कुछ न कुछ ऐसे काम करते रहते हैं जिनका बुद्धि और तर्क के आधार पर समर्थन नहीं किया जा सकता। ईश्वर की आराधना आसी कोटि में आती है। इससे लोगों को संतोष मिलता है। वे सर्वशक्तिमान के आगे झुकना सीखते हैं और अपनी शक्ति की सीमा पहचानते हैं।

तो फिर ?

तो फिर क्या ? ठेंगा !

लगता है , आपका मूड खराब हो रहा है। चाय हम दो बार पी चुके हैं। अब आप अपना विशेष पेय निकालिए और दो-चार घूँट ले लीजिए।

ऐ लड़की, मेरा उपहास मत करो , नहीं तो अनंत काल तक नरक की आग में जलती रहोगी।

छोड़िए , छोड़िए , हमने भी जहाँ देखा है। आजकल न किसी को स्वर्ग का लोभ है और न नरक का डर। मुझे तो खैर इस भाषा में सोचने की आदत ही नहीं रही।

फिर ईश्वर ने तुम्हें कैसे फाँस लिया? लगता है, तुम्हारी सुंदरता और आकर्षण ने उसे तुम्हारा दीवाना बना दिया।

आप फिर मजाक

जब भी ईश्वर पर बहस छिड़ती है, तो मुझे हँसी आ जाती है। न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठा। दरअसल, समस्या यह है कि लोग अपने कर्मों के फल से बचना चाहते हैं और किसी महाशक्ति की कृपा प्राप्त कर अपने लक्ष्यों तक पहुँचना चाहते हैं। इसी चाह पर पूजा-आराधना का सारा दर्शन खड़ा है।

इसमें भी मुझे कोई समस्या दिखाई नहीं देती।

समस्या है, बहुत बड़ी समस्या है। वे एक गंभीर भ्रम के शिकार हैं और इस अज्ञानजन्य भ्रम को फैलाने में मदद करते हैं। वे मानते हैं कि ईश्वर सबकी व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान कर सकता है। इसीलिए ईश्वर को परम दयालु माना जाता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं।

ऐसा नहीं है ? ईश्वर किसी की भी प्रार्थना से नहीं पिघलता ?

कैसे पिघल सकता है? अगर वह अपने ही बनाए नियमों को तोड़ने लगेगा, तब भी हम उसे ईश्वर ही कहेगे? दुनिया में इस समय करीब सात अरब लोग हैं। वह किस-किसकी सुनेगा? क्या वह एक-एक आदमी का रजिस्टर बनाएगा और उसमें सभी का हिसाब रखेगा? पता है, यह काम ठीक से चलाने के लिए उसे कितना बड़ा ऑफिस चाहिए? यह भी कि तब तो वह चिर शांति में रह ही नहीं सकता, जैसा कि उसके भक्त मानते हैं।

यानी पर्सनल गॉड की अवधारणा में कहीं न कहीं घपला है ?

जरूर घपला है। जो ईश्वर इतने विशाल ब्रह्मांड का स्वामी है, अनंत काल से इसका संचालन कर रहा है, उससे यह उम्मीद करना कि वह किसी एक व्यक्ति की प्रार्थना सुनेगा और उस पर गौर फरमाएगा, पागलपन नहीं तो और क्या है? ऐसा लगता है कि हम ईश्वर को अपने जैसा ही समझते हैं, जो जुदा-जुदा मौकों पर नाराज होता है, खुश होता है, क्रूर बन जाता है और करुणा से आर्द हो कर आँसू बहाने लगता है। तभी तो मेरा मानना है कि ईश्वर हमसे बाहर नहीं, हमारे दिमाग में ही रहता है।

तो क्या ऐसा कहा जा सकता है कि प्रकृति ही ईश्वर है ? क्योंकि सभी काम प्रकृति के नियमों के अनुसार ही चल रहे हैं। आग हमेशा जलाती है और पानी गरम हो कर हमेशा ऊपर की ओर भागता है। इन नियमों को बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी बदल नहीं सकता। वह ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकता कि डाली से टूटने पर सेब नीचे न गिरे , बल्कि आकाश की ओर जाने लगे।

कुछ लोग ऐसा कहते हैं। यह एक हद तक तर्कपूर्ण भी लगता है। पर इस विचार में भी समस्या है।

क्या है वह समस्या ?

समस्या यह है कि प्रकृति मानव या जीव-निरपेक्ष है। उसका व्यवहार व्यक्तियों या समाजों के अनुसार नहीं बदलता। वह एक विशाल व्यवस्था है। जब हम उसे ईश्वर का नाम देते हैं, तो उसे व्यक्ति बना देते हैं। प्रकृति को प्रकृति ही क्यों न कहें? उसके साथ कोई व्यक्तिवाचक संज्ञा जोड़ने की जरूरत क्या है?

बात तो समझ में आती है , पर ईश्वरविहीन संसार में रहना कोई आसान बात नहीं है। हर आदमी कहीं न कहीं दिलासा खोजता है। शायद इसे ही उसने ईश्वर का नाम दे रखा है। पेड़ और पहाड़ की पूजा करने से क्या मिलेगा , जबकि ईश्वर को अपना साथी , मित्र , अभिभावक बनाया जा सकता है। विपत्ति के समय उसे याद किया जा सकता है।

तुम्हारी बात सच है। लेकिन यह तो यथार्थ से पलायन करना हुआ। यथार्थ यह है कि हम सभी अकेले हैं, सारे संबंधों के बावजूद हममें से हरएक अकेला है। हमें इस अकेलेपन को सहने की शक्ति हासिल करनी चाहिए, तभी हम जिंदगी की पहेली को कुछ हद तक समझ सकते हैं। ईश्वर की शरण में जा कर सरलीकृत या मिथ्या जीवन जीने से संसार की असलियत समझ में नहीं आ सकती और दुख को कम करने तथा सुख को बढ़ाने के तरीके नहीं खोजे जा सकते। आखिर इसी संघर्ष का नाम तो जीवन है। बाकी सब रहस्य है।

हे भगवान , बात ही बात में नौ बज गए। चलिए , कल की तरह आज भी हम साथ-साथ ही खाना खाएँगे।

अच्छी बात है। तुम चलो , मैं दस-पंद्रह मिनट में आता हूँ।


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