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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


मेरा नशा काफूर हो गया। मैंने फटाफट कपड़े पहने और गेस्ट हाउस के रिसेप्शन की ओर भागी। वहाँ बैठे लड़के से पूछा, सुमित कहाँ हैं? क्या वे टहलने निकले हैं?

उसने भावहीन मुद्रा में कहा, वे तो चले गए।

मैं हैरान, चले गए? कहाँ चले गए?

लड़के ने बताया, आज सुबह ही उन्होंने गेस्ट हाउस से चेकआउट कर दिया। कल ही पूरा पेमंट कर दिया था। अरे हाँ, आपके लिए एक लिफाफा छोड़ गए हैं। कहा कि चौदह नंबर वाली मैडम को दे देना।

मुझे गुस्सा आ गया, तो तुमने अभी तक दिया क्यों नहीं?

लड़के की मुद्रा में कोई फर्क नहीं पड़ा। बोला, उनके गए अभी आधा घंटा भी तो नहीं हुआ है। दो गेस्ट आ गए थे। उनके लिए तुरंत इंतजाम करना था।...यह लीजिए, आपका लिफाफा।

लिफाफे पर लिखा हुआ था, फॉर सुनंदा ओनली।

मैंने पूछा, क्या वे अपना पता छोड़ गए हैं?

उसने निर्विकार भाव से कहा, नहीं तो।

सुमित को कहाँ ढूँढ़ूँ?

मुझे हताशा ने घेर लिया। मुझे पहले से ही मालूम था, गेस्ट हाउस के रजिस्टर में सुमित का अपना पता दर्ज नहीं था। उस पर केअर ऑफ लिख कर उसके किसी दोस्त का नाम लिखा हुआ था। सिर्फ नाम।

मन हुआ कि तुरंत लिफाफे को फाड़ कर देखूँ कि उसमें क्या है। लेकिन मैंने संयम से काम लिया। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपने कमरे में आई। लिफाफे को चूम कर मेज पर रख दिया। दिल धड़क रहा था। हाथ काँप रहे थे। मुझे लगा, इस लिफाफे में मेरी किस्मत बंद है। एक मन कह रहा था, लिफाफे को तुरंत खोलूँ और देखूँ, उसमें क्या है। जरूर सुमित ने लिखा होगा कि वह कहाँ जा रहा है। दूसरा मन कह रहा था, जल्दी मत करो; लिफाफे के भीतर साँप है, बाहर आते ही तुम्हें डँस लेगा।

बहुत देर तक द्वंद्व में पड़ी रही। फिर सोचा, नहा-धो लूँ, नाश्ता कर लूँ, उसके बाद आराम से पढ़ती हूँ।

बाथरूम में गई, पर नहाने की तैयारी करने में समय लगा। अपना ही शरीर कुछ अजनवी लग रहा था। उस पर बीती रात के चिह्न जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े थे। उन्हें छू कर अच्छा लग रहा था। तबीयत हुई कि नहाना कल पर टाल दूँ। मैं उन स्मृतियों से विलग होना नहीं चाहती थी। फिर हलके-हलके साबुन फेरा और झरने के नीचे बैठ गई। छल-छल करते हुए नीम-गरम पानी बरसने लगा। मैं एक बार फिर भीग रही थी।

नाश्ता करने में भी मन नहीं लग रहा था। मँगवा लिया था, इसलिए कुतरती रही। उसके बाद ठंडी हो चुकी चाय के घूँट लिए। मेरी नजर उस लिफाफे पर टँगी हुई थी। विविध प्रकार की कल्पनाएँ आ-जा रही थीं।

अब और सब्र नहीं हुआ। लिफाफे को ले कर मैं बेड पर लेट गई। उसे इत्मीनान से खोला। तीन तहों में मुड़ा एक पत्र था। अब तक मुझमें यथार्थ का सामना करने की ताकत आ गई थी। मैं एक ही झटके में पूरा पत्र पढ़ गई। उसके बाद पलकें मूँद कर सोच में डूब गई।

पत्र यों था :

प्रिय सुनंदे,

जा रहा हूँ।

अच्छा होता कि तुमसे मिल कर, बातचीत कर, कायदे से जाता। मुझमें इतना साहस नहीं है। पहले था, पर कल रात के बाद अपने को कुछ कमजोर पाता हूँ।

कल जो कुछ हुआ, उसे ले कर न दुख है, न परिताप। वह एक उत्सव था। आदमी और औरत के मिलन का उत्कृष्टतम उत्सव। मैं हृदय से तुम्हारा कृतज्ञ हूँ।

फिर यह पलायन क्यों ? क्या मैं अपने आपसे डर गया हूँ ? क्या मैं तुमसे डर गया हूँ ? अपने मन को टटोलता हूँ, तो कोई साफ जवाब नहीं मिलता। थोड़ा-सी हाँ, थोड़ी-सी ना।

डरना मेरी फितरत में नहीं है। आशंकित जरूर रहता हूँ। दुनिया को ले कर नहीं, अपने को ले कर। दुनिया जैसी है, है। मैं भी जैसा हूँ, हूँ। मैं यह दावा नहीं करता कि कीचड़ में कमल की तरह रहता हूँ। यह दावा कोई भी इनसान नहीं कर सकता। मुझे लगता है, जीने में ही कुछ गड़बड़ है। दुनिया पूरी तरह कीचड़ नहीं है। न ही उसके बीच कमल की तरह रहने की कोशिश करना कोई उपलब्धि। जिसे मुक्ति कहते हैं, वह भी एक बंधन है। अपने आपसे बँधे रहना। किसी बड़े उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि अपने आपको ही उद्देश्य मान कर। किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए यह असह्य है। अपने अहं का बोझ सबसे भारी बोझ होता है।

मुक्ति तो बंधन में ही है। हमारे आसपास जो कुछ बिखरा हुआ है - प्रकृति, पशु-पक्षी, मनुष्य, पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे, सभी के साथ अटूट बंधन का अनुभव करना और उनके भविष्य में अपना भविष्य देखना। पूर्ण साझेदारी। पर यह पूरी तरह शक्य नहीं है। मैं तो हाँफने लगता हूँ। आदमी एक साधारण जीव है। तरह-तरह की सीमाओं में बँधा हुआ। उसकी संवेदना की भी सीमा है। वह अपनी सभी जिम्मेदारियों के साथ न्याय नहीं कर सकता। शायद यही ' ओरिजिनल सिन ' है। इसका संबंध हमारे ' ओरिजिन ' से है। मेरा मतलब है, जीने में ही पाप है। इसीलिए हमारे अवचेतन में हमेशा एक पाप-बोध बना रहता है। इससे छुटकारा नहीं है।

मैंने अपने लिए एक अलग जीवन पद्धति का निर्माण किया था। अपने समाज, देश और दुनिया से मुझे बेहद लगाव है। उनके बारे में लगातार पढ़ता, समझता और सोचता रहता हूँ। लेकिन यह वेदना मुझे हमेशा सालती रहती है कि मैं किसी के लिए कुछ कर नहीं पा रहा हूँ। सिर्फ ले रहा हूँ, दे कुछ नहीं रहा हूँ। यह कोई बात हुई ? यहाँ तक कि रोटी के लिए भी मित्रों पर निर्भर हूँ। बेशक वे इसका बुरा नहीं मानते। उन्हें खुशी ही होती है। दरअसल, उनके पास इतना इफरात पैसा है कि मुझ पर जो खर्च होता है, वह उनके लिए मूँगफली के बराबर भी नहीं है। पर मैं तो हरामखोरी ही कर रहा हूँ।

पहले मैं सोचता था कि आदर्श जीवन वही है जिसमें कुछ करना न पड़े, आदमी को घूमने-फिरने, पढ़ने-लिखने और जैसे मन चाहे, वैसे समय बिताने की सुविधा हो। अभी तक यही करता भी रहा हूँ। पर अपने पैसे से नहीं, दोस्तों के पैसे से। अब इस पर बहुत ग्लानि होने लगी है। खासकर तुमसे बातचीत करने के बाद। हमने हर विषय पर बात की, पर मुफ्तखोरी पर नहीं। सच कहता हूँ, मुफ्तखोरी दुनिया में सबसे बड़ा पाप है। इस हिसाब से मैं अपराधी हूँ। मुझे सजा मिलनी चाहिए। मुझे पकड़ कर चौराहे पर बिजली के खंबे से लटका देना चाहिए, ताकि दूसरों को सबक मिल सके कि कमाए बिना खाना सामाजिक अपराध है। शायद मेरे साथ-साथ किसी अमीर आदमी को भी - यह बताने के लिए कि उससे ज्यादा कमाना गुनाह है जितना खाने के लिए जरूरी है।

अब मैं गंभीरता से सोच रहा हूँ कि मुझे अपनी रोटी कमाने के लिए कुछ करना चाहिए। कुछ नहीं तो किसी रेलवे स्टेशन पर कुलीगीरी तो कर ही सकता हूँ। या किसी मोची से मोचीगीरी तो सीख ही सकता हूँ। ऐसे छोटो-छोटे काम बहुत हैं। इनके लिए न किसी की सिफारिश चाहिए, न कोई परीक्षा पास करने का प्रमाणपत्र।

फिर लगता है, इसमें खास बात क्या है ? यह तो सभी कर रहे हैं। कमाना-खाना-जागना-सोना। मुझे कोई ऐसा काम खोजना चाहिए जिससे पेट भी पलता हो और समाज की कुछ सेवा भी होती हो। तुम कहोगी, क्या कुलीगीरी या मोचीगीरी समाज की सेवा नहीं है ? आखिर वे भी समाज की किसी न किसी जरूरत को पूरा करते हैं। तभी समाज उन्हें रोटी देता है। लेकिन ये रोजमर्रा के काम हैं। इन्हें करने के लिए बहुत लोग हैं। इस भीड़ में शामिल होने से क्या हासिल होगा ?

अतएव मुझे कोई ऐसा काम करना चाहिए जिसकी समाज को जरूरत हो और जो काम कोई और नहीं कर रहा हो। मेरे खयाल से, मैं अध्यापकी बहुत अच्छी तरह कर सकता हूँ। लेकिन मुझे अध्यापकी का काम कौन देगा ? न डिग्री, न अनुभव। स्कूलों और कॉलेजों के लिए मैं निरक्षर हूँ, किसी भी काम के लायक नहीं। दो कौड़ी का आदमी। यह मेरी खुशकिस्मती थी कि तुमने मुझे सुनने लायक समझा। अच्छ शिक्षक और अच्छा छात्र बहुत मुश्किल से टकराते हैं। यकीन करो, तुम्हें छात्र मैंने कभी नहीं समझा। न तुम्हारे साथ अध्यापकी की। जो कुछ हुआ, वह सब स्वतःस्फूर्त था। सच तो यह है कि तुमसे बातचीत करते हुए मैंने बार-बार अपने को आविष्कृत किया। इसकी उत्तेजना तुम्हारे प्रश्नों से आई। इसके लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ। मैंने पहली बार महसूस किया कि सत्य की खोज एक साझा यात्रा है। इसके लिए एक-दूसरे को कसौटी बनाना जरूरी है। अकेला आदमी भटक सकता है। वह अपने ही सोच का शिकार हो जा सकता है। इससे संवाद ही उसे उबार सकता है। एकालाप ज्ञान का सबसे बड़ा दुश्मन है।

माफ करना, मैं भटक गया। यह मेरी पुरानी बीमारी है। अभी तक भटकता ही तो रहा हूँ। लो, फिर भटकने लगा। मैं यह कह रहा था कि मुझे कुछ ऐसा काम करना चाहिए जिससे मुझे जीविका भी मिले और जो समाज के लिए नया हो, जिसकी समाज को वाकई जरूरत हो। ऐसा काम क्या हो सकता है ?

बहुत सोचने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि यह काम राजनीति है। इस समय, भारत में राजनीति ही है जिसमें सबसे ज्यादा घुन लगा हुआ है। यह भी कह सकते हैं कि राजनीति हो ही नहीं रही है। उसका स्थान संगठित लूट ने ले लिया है। राज्य इस समय शोषण और अन्याय का सबसे बड़ा औजार है। लोकतंत्र हर तरह से संदिग्ध हो चुका है। क्या इसमें कुछ जान डाली जा सकती है ? लोकतंत्र के बारे में तुम मेरे विचारों से अवगत हो। किसी भी औद्योगिक समाज में लोकतंत्र बचा नहीं रह सकता। उसमें कहीं-कहीं लोकतंत्र की झाँकियाँ दिखाई पड़ सकती हैं। पर मूल में वह एक लूट-खसोट वाला समाज ही होगा। बाकी दुनिया से उसका रिश्ता मित्रतापूर्ण नहीं हो सकता। तुम्हें यह भी बता चुका हूँ कि एक अच्छे समाज के बारे में मेरा यूटोपिया क्या है। क्या मुझे उसके लिए काम करना चाहिए ?

मैं इस पर जितना विचार करता हूँ, यह उतना ही ज्यादा स्पष्ट होता जाता है कि फिलहाल तो यह असंभव ही है। कोई मेरी बात नहीं सुनेगा। बल्कि अपनी ही बात कहते हुए मुझे संकोच होगा। लोग इतनी तरह की समस्याओं से परेशान हैं कि वे सुदूर भविष्य के बारे में सोच ही नहीं सकते। वर्तमान का दबाव इतना ज्यादा है कि उसने भविष्य को कुचल दिया है। इसलिए सबसे पहले लोगों में आशा पैदा करना जरूरी है। कि सब कुछ खत्म नहीं हो गया है। कि अब भी कुछ किया जा सकता है। कि यह खुद लोगों के द्वारा ही किया जा सकता है।

जाहिर है, यह काम करने के लिए सभी वर्तमान दल एक जैसे बेकार हैं। वे एक-दूसरे की कार्बन कॉपी बन चुके हैं। इसलिए किसी दल में दाखिल होने का तो सवाल ही नहीं उठता। वैसे भी मेरी कोई हैसियत नहीं कि कोई दल मुझे स्वीकार करने की उत्सुकता दिखाए। सभी दल ऐसे आदमियों से घबराते हैं जो आदतन चापलूस न हों और जो सिर्फ सुनना न जानते हों, बल्कि कहना भी चाहते हों।

इसलिए मुझे राजनीति की कोई नई विधा, कोई नई शैली खोजनी होगी। कई दिनों से इस पर विचार कर रहा हूँ कि वह शैली क्या हो सकती है। खेद है कि इस मसले पर मैंने तुमसे जरा भी साझा नहीं किया। जब तक मेरे सामने ही कुछ स्पष्ट हो न, मैं तुमसे क्या बात करता। अब एक क्षितिज उभर रहा है। लगता है, कुछ रचनात्मक काम करना चाहिए। किसी भी इलाके में जा कर लोगों की सेवा करनी चाहिए। सेवा से मेरा मतलब सहायता से है। दैनंदिन जीवन में उनके काम आना। लेकिन अन्याय के इतने बड़े-बड़े स्तूप खड़े हो चुके हैं कि सिर्फ सेवा करना बेहद, बेहद नाकाफी है। इसलिए यह भी उतना ही जरूरी है कि लोगों के साथ जहाँ-जहाँ अन्याय हो रहा है, उसका प्रतिरोध करने के लिए उन्हें तैयार करना। इस दिशा में खुद काम करना और स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित करना। सत्याग्रह भी करना होगा। जेल जाना तो पक्का ही है। सोचता हूँ, कम से कम पाँ साल तक यह प्रयोग करने के बाद पुनर्विचार करूँगा कि आगे क्या करना है।

तुम्हें यह जान कर खुशी होगी कि मेरी जानकारी में यह एकमात्र काम है जिसके लिए पैसों की जरूरत नहीं होगी। कोई भी समाज इतना कृतघ्न नहीं होता कि जो निःस्वार्थ भाव से उसकी सेवा करे, उसके लिए खाने-पहनने का इंतजाम करने से वह पीछे हट जाए।। आप जिसके लिए जी रहे हैं, वह आपके लिए मर भी सकता है।

तुम शायद जानना चाहो कि क्या मैंने स्त्री के साहचर्य की जरूरत कभी महसूस नहीं की ? जो इससे इनकार करता है, वह धोखेबाज है। शायद स्त्री पुरुष के बिना काम चला सकती है, पर पुरुष के लिए स्त्री के बगैर काम चला पाना संभव नहीं है। मैं ऐसी कई स्त्रियों को जानता हूँ जिनके जीवन में कोई पुरुष नहीं आया और जिन्हें अब इसकी प्रतीक्षा भी नहीं है। हो सकता है, यह मेरा अज्ञान हो, क्योंकि किसी के निजी जीवन के बारे में कौन कितना जान सकता है ? पर उनकी स्वीकारोक्ति और मेरा इंप्रेशन यही है। दूसरी ओर, मैं एक भी ऐसे पुरुष को नहीं जानता जो स्त्री के संपर्क में न आया हो या न आना चाहता हो। । मुझे भी स्त्रियाँ प्रिय हैं। वे दुनिया की सुंदरतम कला कृतियाँ हैं। ऐसा कहना उनकी मनुष्यता का अपमान नहीं है। वे उतनी ही सुंदर मनुष्य भी हैं।

यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसी ही एक स्त्री मेरे जीवन में आई थी। हम दोनों को लगता था जैसे हम एक-दूसरे के लिए ही पैदा हुए हैं। सुंदरता, भाव-प्रवणता और बौद्धिकता से लबालब भरी हुई। उसे देखते ही मैं हवा में उड़ने लगता था। उसकी याद आते ही मैं विह्वल हो उठता था। आज भी उसकी स्मृति को प्रणाम करता हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि एक विमान दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। कुछ पलों में ही मेरी दुनिया उजड़ गई। मुझे डिप्रेशन ने जकड़ लिया। तीन साल तक डिप्रेशन की दवाएँ खाता रहा। उन तीन वर्षों में मैंने कुछ नहीं किया। बस उसकी तसवीर को घूरता रहा। डिप्रेशन से किसी तरह उबरा, तो मैंने फैसला किया कि किसी भी स्त्री या पुरुष पर इतनी भावनात्मक निर्भरता उचित नहीं कि उसके बिना जीना ही कठिन हो जाए। प्रेम जीवन को शक्ति देने के लिए है, न कि उसे शवयात्रा में बदल देने के लिए। तब से कई स्त्रियों को मैंने चाहा, उन्होंने भी मुझे चाहा। पर मैंने अपने को किसी की चाह में डूबने नहीं दिया। प्रेम जीवन देता है, तो वह स्वतंत्रता का अपहरण भी करता है। मैं किसी भी कीमत पर अपनी स्वतंत्रता को छोड़ नहीं सकता।

तुम दूसरी स्त्री हो जिसने मुझे बहुत गहराई से आकर्षित किया। यह कहना गलत होगा कि मैंने तुममें उस स्त्री की झलक देखी। तुम तुम हो। तुम्हारा अपना व्यक्तित्व है। मैंने महसूस किया कि तुम्हारी ओर बड़ी तेजी से खिंचता जा रहा हूँ। एक वक्त ऐसा आया जब मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। उस दिन सारा समय मैं तुम्हारे बारे में सोचता रहा। तुम्हारे रेखांकन बनाता रहा। कल्पना में तुम्हें चूमता रहा। तुम्हारे बाल सहलाता रहा। तुम्हें अपनी बाँहों में लेता रहा। उस दिन तुम भी अपने कमरे से नहीं निकली। मेरे लिए यह अच्छा ही रहा। मैं नहीं जानता था कि तुम सामने पड़ गई, तो मैं मैं तुम्हारा सामना कैसे करूँगा।

रात आई, तो मेरी बेचैनी इस कदर बढ़ गई कि लगा, मेरा दिमाग फट जाएगा। मैं धीमे-धीमे तुम्हारे कमरे की ओर बढ़ चला। तड़प जितनी गहरी थी, संकोच भी उतना ही प्रबल था। तुम इसे रुढ़िबद्धता कहोगी, पर स्त्री-पुरुष संबंधों में मेरी दृढ़ मान्यता है कि पहल स्त्री की ओर से ही होनी चाहिए। यह अधिकार उसका ही है। पुरुष जल्दबाज होता है। उसमें धीरज नहीं होता। प्रेम में अभी तक आम तौर पर वही शुरुआत करता रहा है। उसने इसे अपना विशेषाधिकार मान रखा है। पुरुष का यह विशेषाधिकार खत्म होना चाहिए। पहल करने की स्वतंत्रता स्त्री को मिलनी चाहिए। शायद इसका कोई तर्क नहीं है। बस मेरा मन यही कहता है। तुमने कई बार संकेत दिया। पर मैंने संयम से काम लिया। उस रात मेरा यह संयम टूट गया। यह मेरे लिए लज्जित होने की बात है। मैं लज्जित हूँ भी। पर इसका कोई परिताप मुझे नहीं है। मैंने वही किया जो अस्तित्व की माँग थी - मेरे अस्तित्व की और शायद तुम्हारे अस्तित्व की भी।

फिर भी मेरे मन में गहरी हिचक थी। मैंने अपने आप को कई साल पहले जो वचन दिया था, वह टूटने जा रहा था, इसका असंतोष मुझमें थरथराहट पैदा कर रहा था। साथ ही, मुझे यह भी लग रहा था कि इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं है। स्त्री-पुरुष बने किसलिए हैं ? लगभग घंटे भर मैं दरवाजे पर खड़ा रहा। बीच-बीच में टहलने लगता। फिर दरवाजे पर आ खड़ा होता। मुझे इसकी भी परवाह नहीं रह गई थी कि कोई अचानक आ गया, तो वह क्या सोचेगा। तभी मेरा एक पैर दरवाजे से टकरा गया। मैंने पाया कि दरवाजा भीतर से बंद नहीं है। मैं दबे पाँव कमरे में दाखिल हो गया। चारों ओर अँधेरा था। सिर्फ एक खिड़की से लैंपपोस्ट की झीनी रोशनी आ रही थी। उस रोशनी में मैंने देखा कि तुम कंबल में लिपटी हुई बेड पर सो रही हो। अनुमान नहीं हो पा रहा था कि तुम जगी हुई हो या सो रही हो। मुझ पर पागलपन सवार था। मैंने सहमते हुए कदम बढ़ाए और तुम्हारे बगल में ओर लेट गया।

उसके बाद क्या हुआ, यह तुम मुझसे ज्यादा जानती हो।

सुख और थकान से बोझिल तुम बेसुध सो गई थी। तब भी तुम्हारा एक हाथ मेरी छाती पर था। कुछ देर तक मुझ पर भी तंद्रा छाई रही। फिर मैं जगा। उल्लास के आखिरी छोर पर जा कर मैं लौटा था। शरीर अभी भी थरथरा रहा था। पर मन शांत था। आँखें खुली हुई थीं। क्या जो कुछ हुआ, वह उचित था ? मेरी आत्मा ने कहा, हाँ, इसमें कुछ भी गलत नहीं था। जो भी हुआ था, दोनों की स्वेच्छा से हुआ था। हमसे कुछ भी अनोखा नहीं हुआ था। स्त्री-पुरुष के बीच संवाद का यह निविड़तम रूप है। यही सृष्टि का नियम है। इसी में चरितार्थता है।

लेकिन इसका भविष्य क्या है ? साधारण प्रेम होता, तो बहुत दिनों तक जारी रह सकता था। बिना किसी औपचारिक परिणति के भी। यह तो असाधारण प्रेम था। मेरा पूरा अस्तित्व ही दाँव पर लगा हुआ था। इस अनुभव के बाद क्या मैं कभी स्वतंत्र हो पाऊँगा ? अच्छा है, प्रिय भी है, पर मेरा एक हिस्सा दूसरे हिस्से का गुलाम बना रहेगा। मेरी आत्मा तृप्त रहेगी, पर मन अशांत रहेगा। मुझे अपनी प्रतिज्ञा याद आई - किसी भी व्यक्ति, वस्तु या स्थान के साथ इस कदर बँधना नहीं है कि उसके बिना जिया ही न जा सके। उसी क्षण मैं उस निर्णय तक पहुँच गया जो अधीरता से मेरा इंतजार कर रहा था। बादल छँट गए। आकाश साफ था।

यह भी स्पष्ट था कि जाना है, तो अभी जाना होगा। एक दिन की देर भी मेरे इरादे को विफल कर सकती है। बंधन मजबूत होता जाएगा। फिर मैं कभी जा नहीं पाऊँगा। मुझे अपने पर भरोसा नहीं रह गया था।

फिर तुम्हारी तरफ से सोचने लगा। क्या यह विश्वासघात नहीं है ? जिसके साथ मैं सुख की पराकाष्ठा तक पहुँचा, उसे छोड़ कर चल देना क्या कृतघ्नता नहीं होगी ? होगी, जरूर होगी। किसी वाजिब उम्मीद का तिरस्कार करना नैतिक अपराध है। क्या मैं वास्तव में अपराधी हूँ ? लेकिन हमने एक-दूसरे से कोई वादा तो नहीं किया था। हमारे बीच कोई प्रतिश्रुति नहीं थी। सब कुछ बेशर्त था। बदले में कुछ पाने की चाह नहीं थी। इसलिए मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। तुम्हारी भी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि तुम मेरे साथ किसी बंधन का अनुभव करो। कोई भी अतीत भविष्य को बाँध नहीं सकता। तुम अपने आपसे कैसे निपटोगी, इस बारे मैं क्या कह सकता हूँ ? तुम बुद्धमान हो। अपना रास्ता बना सकती हो। मेरी नियति मेरे सामने प्रत्यक्ष है। उसकी अवहेलना मेरे लिए आत्महत्या से कम नहीं होगी।

मैंने तुम्हारा हाथ धीरे से हटाया। तुम कुनमुनाई। मैंने विदाई का चुंबन लिया। तुम फिर कुनमुनाई। मेरी आँखें भीग गईं। एक क्षण के लिए कदम ठिठके। पर कोई उपाय नहीं था।

अपने कमरे में आ कर मैंने अपना सामान सहेजना शुरू कर दिया। सामान था ही कितना ? कुल दस-पंद्रह मिनट लगे। रात अभी भी बाकी थी। पूरा गेस्ट हाउस सोया हुआ था। मैंने कलम हाथ में ली और लिखने लगा।

कुछ ज्यादा ही लिख गया। पर मुझे संतोष है कि मैंने सारी बात तुम्हारे सामने रख दी। आशा है, तुम समझ सकोगी।

क्या लिख कर ही क्षमा माँगनी होगी ? क्या कृतज्ञता शब्दों से ही व्यक्त हो सकती है ?

हम अब शायद ही मिलें। तुम्हारी स्मृति हमेशा मेरे साथ रहेगी। अतीत मरता नहीं है। वह भविष्य में विलीन हो जाता है।

तुम्हारे लिए क्या कामना करूँ ? जो भी तुम्हें अच्छा लगे, मान लेना कि वही मेरी इच्छा है।

तुम्हारा

सुमित


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