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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


दूसरे दिन सुबह नाश्ते के समय के बाद सुमित मेरे ही कमरे में आ गया। उसकी शक्ल देखने से ही लग रहा था कि वह जम कर पिए हुए है। उसके पैर थोड़ा लड़खड़ा रहे थे। जब उसने 'गुड मॉर्निंग, मैडम' कहा, तो मैंने महसूस किया कि उसकी जबान भी कुछ लड़खड़ा रही है। मैं रात भर सोई नहीं थी। ईश्वर के बगैर मुझे यह पूरी दुनिया भुतही लग रही थी। इससे मैं अपने आपको कनेक्ट नहीं कर पा रही थी। क्या हमारी चेतना में तनिक भी स्थायित्व नहीं है? क्या सचमुच हम सब चींटियाँ हैं? कीड़े-मकोड़े हैं? एक दिन पता नहीं कहाँ से आए थे और एक दिन पता नहीं कहाँ चले जाएँगे? फिर जिस जीवन को हम इतना महत्व देते हैं, उसका क्या? बेशक मैं ईश्वर के बारे में ज्यादा नहीं सोचती थी। मेरा खयाल है, आम तौर पर कोई भी नहीं सोचता। फिर भी मेरे मन की गहराई में कहीं यह आश्वासन था कि कोई परम शक्ति है जो हमें चलाती है, मुसीबत में हमारी रक्षा करती है और अंत में जिससे हम एकाकार हो जाएँगे। कल की बातचीत से लगा कि हमारे चारों ओर एक महाशून्य है। चींटी इसका अनुभव नहीं करती, क्योंकि उसके ज्ञान और अनुभव की सीमा है। पर हम अनुभव कर सकते हैं और कहीं कोई परम सत्ता नजर नहीं आती, तब हमारे पैरों तले की जमीन ही खिसक जाती है। ओ गॉड, ह्वाट शुड आई डू?

तभी सुमित ने एक खाली गिलास खींचा और अपनी जेब से एक बोतल निकाल कर उसका कुछ द्रव गिलास में ढाल दिया। फिर वह मेरे पास आया और मेरी दाहिनी बाँह पकड़ कर लगभग खींचते हुए मेज के पास ले गया, जहाँ शराब से आधा भरा हुआ गिलास मानो मेरा इंतजार कर रहा था।

सुमित का इरादा समझते हुए मैंने कहा, 'लेकिन मैंने आज तक कभी शराब चखी भी नहीं है!'

सुमित बोला, 'तो आज शुरू कर दो। स्कॉच ह्विस्की है। पियोगी, तो इसका लोहा मान लोगी।'

लोहा तो मैं आपका मानती हूँ। इसका मतलब यह नहीं कि आप जिस-जिस चीज का लोहा मानते हैं , उसे-उसे मुझे भी स्वीकार करना होगा।

बिलकुल नहीं, बिलकुल नहीं। पर यह कुछ अलग-सी चीज है। अलग और अनोखी।

लेकिन आप तो शाम को या रात को पीते हैं। आज दिन में ही पी ली। आज क्या खास बात है ?

खास बात है। खास बात यह है, जैसा कि एक दार्शनिक ने कहा है, कि अगर ईश्वर नहीं है, तो इस धरती पर कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है। जिसके मन में जो आए, वह कर सकता है। क्या ऐसी दुनिया हमें मंजूर होगी?

यह बात मन में इस कदर चक्कर मारने लगी कि पिए बिना रहा नहीं गया।

सुमित ने हँसते हुए कहा, आज मैंने कुछ ज्यादा ही ले ली है। तुम भी लो, नहीं तो फिक्र के मारे मर जाओगी। इस दुनिया को बर्दाश्त करने के लिए इससे अच्छा उपकरण कोई और नहीं है। कम से कम मेरा अनुभव तो ऐसा ही है।

मुझे लगा जैसे किसी रहस्यमय घर की दहलीज पर खड़ी हूँ और मुझे लगभग जबरन भीतर ले जाया जा रहा है। मैंने काँपते हुए हाथ से गिलास उठाया और होंठों से लगाने से पहले पूछा, 'बहुत ज्यादा नशा तो नहीं होगा?'

'नशा? तबीयत खुश हो जाएगी। पर आज थोड़ी-सी ही और रुक-रुक कर लेना।' यह कहते हुए सुमित ने सिगरेट सुलगा ली।

शराब का रंग बेहद खूबसूरत था। कुछ-कुछ शहद जैसा। मैंने आँख बंद कर एक घूँट ले ली। गले में कड़वाहट की लहर-सी दौड़ गई। कुछ मिनट बाद फिर हिम्मत की। दूसरी घूँट। दस-पंद्रह मिनट बाद एक और घूँट। इस बीच सुमित की नजर मुझ पर टिकी रही। उस नजर में राग था और अनुराग भी। उसी तरह जैसे आँचल तले दीया जल रहा हो और उसकी मद्धम रोशनी बाहर फैल रही हो। थोड़ी देर में सरूर आने लगा। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था। अद्भुत। अवर्णनीय। अब जा कर मेरी समझ में आया कि लोग इसके दीवाने क्यों हो जाते हैं।

बहुत-बहुत शुक्रिया , सर। यह सुख मुझे कभी नहीं मिला था।

धन्यवाद। जीवन इतनी बोझिल चीज है कि कभी-कभी हवा में उड़ते जाने का मन करता है। हफ्ते में एक दिन सभी हलके हो कर उड़ने लगें, तो सभ्यता का रंग ही बदल जाए।

पर अभी तो आप कह रहे थे कि ईश्वर नहीं है, तो...

हाँ , ईश्वर के बिना जी पाना बहुत मुश्किल है। इसका मतलब है अपने लिए खुद ईश्वर बन जाना। एक असंभव माँग। यह सोच कर ही सिहरन होने लगती है।

ईश्वर न हो, तब भी धर्म तो है। हम उससे काम चला सकते हैं।

काम चल जाता, तो क्या बात थी।

क्यों , धर्म के साथ क्या दिक्कत है ?

दिक्कत है। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ज्यादातर धर्म ईश्वर से जुड़े हुए हैं। अगर ईश्वर नहीं है, तो धर्म का आधार ही लुप्त हो जाता है। अगर आप खुदा को नही मानते, तो कुरआन में यकीन कैसे कर सकते हैं?

खुदा के बिना तो हम काम चला सकते हैं , पर धर्म के बिना कैसे काम चलेगा ?

क्यों , क्यों नहीं चलेगा? धर्म में ऐसी क्या खास बात है?

धर्म हमें बताता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

नैतिकता भी तो यही काम करती है। फिर धर्म की क्या जरूरत है?

क्या यह सच नहीं है कि नैतिकता के बहुत-से सूत्र धर्म से ही निकले हैं?

जरूर निकले हैं। वह इसलिए कि एक लंबे समय तक धर्म ही हमारे जीवन और समाज व्यवस्था पर हावी रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि जब धर्म नहीं था, तब नैतिकता भी नहीं थी। धर्म ने सिखाया कि चोरी बुरी बात है। पर यह तो धर्म के पहले भी एक ऐसा नैतिक सूत्र था, जिसके बिना किसी भी समाज का काम नहीं चल सकता था। आज भी चोरी को बुरा साबित करने के लिए धर्म की कोई जरूरत नहीं है। तर्क से भी हम यहाँ तक पहुँच सकते हैं। जिस समाज में सभी चोरी करने लगें, वह समाज एक दिन भी नहीं चल सकता।

कहीं आप यह तो नहीं कह रहे हैं कि धर्म नैतिकता का ही एक रूप है ?

हाँ भी और नहीं भी। हाँ इसलिए कि धर्म ने वास्तव में मनुष्य को नैतिक बनाने की कोशिश की है। नहीं इसलिए कि इसका आधार तर्क नहीं था। धर्म को हमेशा किसी मसीहा, किसी पैगंबर, किसी वेद, किसी पुराण, किसी धर्म ग्रंथ की जरूरत पड़ती रही है। भय से पैदा होनेवाली नैतिकता टिकाऊ नहीं हो सकती। दूसरी बात यह कि धार्मिक वचन हमेशा बहस से परे माने जाते रहे हैं। यह मानव स्वभाव के विरुद्ध है। मनुष्य यकीन करना चाहता है, तो वह तर्क से समझना भी चाहता है। जहाँ किसी बात को मानने की अनिवार्यता हो जाती है, वहाँ सब कुछ रूढ़ हो जाता है। यही कारण है कि सभी धर्मों में रूढ़ियों का बड़ा सम्मान है। नैतिकता प्रवाहशील है, इसलिए वह अपने को नया बनाती चलती है। परिवर्तन धर्म में भी होते हैं, पर लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के आधार पर नहीं। अचानक कोई संत प्रगट होता है और घोषणा कर देता है कि धर्म वह नहीं है जो तुम लोग मानते आए हो; धर्म वह है जो मैं कहता हूँ। इसके बाद एक ही धर्म के दो संप्रदाय हो जाते हैं। फिर दो से तीन, तीन से चार … यह सिलसिला जारी रहता है।

होने दीजिए , इससे क्या फर्क पड़ता है ? जिसको जो अच्छा लगे , वह उसे माने।

जरूर। मामला यहीं तक सीमित रहे, तब तो कोई बात ही नहीं है। मुश्किल तब होती है जब दो धर्म या दो संप्रदाय आपस में लड़ने लगते हैं। धर्म के नाम पर दुनिया भर में कितना खून बहाया गया है, तुम्हें पता ही होगा। आज भी धर्म मामूली उत्पात नहीं मचा रहा है। भारत तो धार्मिक वैमनस्य के कारण हिल उठा है।

कहीं आप सांप्रदायिकता को तो धर्म नहीं कह रहे हैं ?

तुम्हारा सवाल जायज है। धर्म और सांप्रदायिकता उत्तर और दक्षिण ध्रुवों की तरह हैं। कोई भी धार्मिक आदमी सांप्रदायिक नहीं हो सकता। मैं तो यह सोच कर हैरान हो जाता हूँ कि जो अपने को धार्मिक बताते हैं, वे लोग किसी भी स्तर पर हिंसा कैसे कर सकते हैं? धर्म अगर धर्म है, तो उसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। धर्म का आविष्कार ही मनुष्य को मनुष्य से और इस चराचर सत्ता से जोड़ने के लिए हुआ था। यह एक खुले मन की भावना थी। विभिन्न धर्मों के बीच एक मूलभूत एकता है। इसी तरह, संप्रदायों में भी कोई विशेष अंतर नहीं है कि एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों के खून के प्यासे हो जाएँ। धर्मों और संप्रदायों में जो फर्क दिखाई देता है, वह तफसील में है। इसका निपटारा आपस में बैठ कर खूब आसानी से किया जा सकता है।

यानी धर्म को सांप्रदायिक भावना का स्रोत नहीं माना जाना चाहिए ?

सीधे-सीधे तो नहीं, पर जब तक धर्म है, तब तक सांप्रदायिकता की गुंजाइश बनी रहेगी। धर्म सिर्फ आध्यात्मिक चीज तो रह नहीं जाता। वह किसी समुदाय की पहचान बन जाता है। बाइबल को माननेवालों का एक समुदाय है, तो कुरआन को माननेवालों का दूसरा समुदाय। इसी तरह बौद्ध, जैन और पारसी अपना अलग-अलग समुदाय बना लेते हैं। इसके बाद विभिन्न समुदायों के बीच एकता की नहीं, पृथकता की खोज शुरू हो जाती है। 'हम' और 'वे' की भावना पैदा होती है। 'हम' सोचते हैं कि 'वे' पिछड़े हुए हैं और 'वे' सोचते हैं कि 'हम' इनसान नहीं, दरिंदे हैं। यही सांप्रदायिकता की जन्मभूमि है। जब शुद्ध धार्मिक भावना कमजोर होती है, तब सांप्रदायिक भावना जोर पकड़ती है। इसका फायदा उठा कर फसादी तत्व लड़ाई-झगड़ों को प्रोत्साहित करते हैं। यह मानवता का दुर्भाग्य है कि आज भी धर्म के नाम पर लड़ाइयाँ हो रही हैं।

धर्म के नाम पर शायद सबसे ज्यादा जुल्म औरतों पर होता है !

इसमें क्या शक है। धर्म पुरुष सत्ता का सबसे बड़ा औजार है। पुरुष स्त्री को अपनी ओर से जो आदेश देना चाहता है, उसे वह ईश्वरीय या दैवी आदेश के रूप में पेश कर देता है। इससे पुरुष की गुलामी करते हुए स्त्री सोचती है कि वह ईश्वर की आज्ञा का पालन कर रही है। ईश्वर अगर है, तो वह पुरुष और स्त्री के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं कर सकता। उसकी नजर में हम सब बराबर हैं। जो पक्षपात या भेदभाव करे, वह और चाहे जो हो, ईश्वर नहीं हो सकता। न ही धर्म में इसकी कोई गुंजाइश है।

क्या आपने इस पर कभी विचार किया है कि ईश्वर को सभी जगह पुल्लिंग ही माना गया है ?

अरे, इधर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था। मैं, तुम ठीक कहती हो। ईश्वर पुल्लिंग है, क्योंकि वह पुरुष सत्ता का प्रतिनिधि है। जब राजतंत्र था, तब राजा लोग दावा करते थे कि हम धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं। राज करने का हमारा अधिकार दैवी अधिकार है। प्रजा हमसे यह अधिकार छीन नहीं सकती। धर्म तंत्र चलानेवाले भी दावा करते थे कि धरती पर खुदा का राज चलाने की जिम्मेदारी हम पर ही है। ये भी पुरुष ही होते रहे हैं। इस तरह धर्म के नाम पर न केवल जनसाधारण को प्रजा बना दिया गया, बल्कि स्त्री को डबल प्रजा में बदल दिया गया। वह राजा की भी गुलाम थी और अपने पति की भी।

आज भी जो लोग धर्म का झंडा लिए घूमते हैं , वे स्त्रियों को दमित करके रखना चाहते हैं। इनमें से बहुत-से तो स्त्री शिक्षा के भी खिलाफ हैं। उनका कहना है कि पुरुष की आज्ञा मानना ही स्त्री का धर्म है। उनकी माँग है कि स्त्री हमेशा परदे में रहे और निगाह नीची करके चले। किसी भी मामले में वह खुद कोई फैसला न करे। सब कुछ पति और घरवालों पर छोड़ दे। पढ़-लिख लेने से औरतें बेगैरत हो जाती हैं, मनमानी करने लगती हैं।

एकदम ठीक। शिक्षा स्वतंत्रता की दिशा में पहला कदम है। कहा भी गया है कि शिक्षा वही है जो विमुक्त करे। कट्टरपंथी नहीं चाहते कि स्त्री मुक्त हो, क्योंकि तब वह सोच-विचार कर फैसले करेगी और उस पर पुरुष का एकाधिकार खत्म हो जाएगा।

लेकिन इसकी वजह क्या है कि सभी धर्म संघों में स्त्रियों की तादाद ही ज्यादा है ? अगर धर्म स्त्रियों का उत्पीड़न करने में मददगार है , तो वे इतनी बड़ी संख्या में धर्म की शरण में क्यों जाती हैं ? वहाँ उन्हें क्या मिलता है ?

यह शोध का विषय है। सरसरी तौर पर मैं इतना ही कह सकता हूँ कि जुल्मी परिवार और समाज से राहत पाने के लिए वे धर्म की शरण में जाती हैं। पर्व-त्योहार उन्हें अच्छा लगता है, क्योंकि इसी बहाने उन्हें कुछ स्वायत्तता की अनुभूति होती हैं। वे महसूस करती हैं कि कुछ है जो उनके परिवार और समाज से बड़ा है। दूसरी ओर, पारिवारिक और सामाजिक जुल्म से बचने के लिए बहुत-सी स्त्रियाँ धर्म संघों में शामिल हो जाती हैं। वे भिक्षुणी बन जाती हैं। इस तरह वे पुरुष की तानाशाही से मुक्त हो जाती हैं। धर्म संघ में शामिल हो जाने के बाद उन्हें सामाजिक सम्मान भी मिलने लगता है। जो उसे हुक्म देता था, वही अब उसे प्रणाम करने लगता है, उसके पाँव छूने लगता है। यह क्या मामूली उपलब्धि है?

लेकिन उनका जीवन? वह तो पूरी तरह स्थगित हो जाता है। फिर धर्म संघ में भी उनकी हैसियत दोयम दर्जे की होती है। क्या किसी स्त्री को कभी पोप या शंकराचार्य बनाया गया? क्या आज भी यह संभव है?

जब तक स्त्री भौतिक दृष्टि से और वैचारिक स्तर पर स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं हो जाती, वह जहाँ भी रहेगी, उसका शोषण होता रहेगा। यही बात पुरुष पर भी लागू होती है। बाबा तुलसीदास ने कहा है, पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। धर्म भावनात्मक यथार्थ है। भौतिकता ठोस यथार्थ है। भौतिकता अकसर भावना पर भारी पड़ती है। भावनावश कोई एक पुरुष किसी एक स्त्री को बराबरी का दर्जा दे सकता है, पर इससे सभी स्त्रियाँ बराबर नहीं हो जातीं। धर्म की समस्या यह है कि वह भौतिक स्थिति को बदले बिना भावनाओं में परिवर्तन ला कर दुनिया को सात्विक बनाना चाहता है। यह नल के पानी से पेट्रोलवाली कार चलाने जैसा है।

अच्छा, यह जो कहा जाता है कि धर्म अफीम है, इससे आप सहमत हैं ? यह तो धर्म को बदनाम करना हुआ, नहीं ?

कोई किसी को बदनाम नहीं कर सकता। धर्म बदनाम हुआ है, तो अपने कारण ही हुआ है।

क्यों, धर्म को अफीम कहना उसे बदनाम करना नहीं है ?

यह उक्ति कार्ल मार्क्स की है। उसका आशय यह था कि जैसे अफीम कुछ समय के लिए हमारा कष्ट हर लेती है, पर उसका उपचार नहीं करती, वैसे ही धर्म जनता को सामयिक राहत तो देता है, पर उसके कष्ट दूर नहीं कर सकता। यह धर्म को बदनाम करना नहीं है, उसकी सीमाएँ उजागर करना है। जो लोग धर्म का समर्थन करते हैं, उन्हें इस आलोचना का जवाब देना चाहिए। इसके बजाय वे मार्क्स को ही बदनाम करने की कोशिश करते हैं। यह न्याय नहीं है।

धर्म के साथ एक और समस्या मुझे दिखाई दे रही है। कोई जन्म से ही हिन्दू या मुसलमान क्यों हो ? प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म चुनने की आजादी होनी चाहिए। इस आजादी का उचित इस्तेमाल वह तभी कर सकता है, जब वह बालिग हो जाए। लेकिन सभी धर्मावलंबी अपने बच्चों पर उनके जन्म से अपना धर्म लाद देते हैं। कायदे से तो हना यह चाहिए कि जब वह बड़ा हो जाए, तब उसे सभी धर्मों के बारे में बताया जाए और उसे यह छूट दी जाए कि वह जिस धर्म को अच्छा समझता है, उसे अपना ले।

बेशक। अगर बाल विवाह बुरा है, तो बाल धर्म भी गलत है।

लेकिन हमारे धर्मगरंथों में धर्म को जिस तरह परिभाषित किया गया है, उसे स्वीकार करने में क्या हर्ज है ? धर्म माने क्षमा, धैर्य, सत्य, संयम, अक्रोध, चोरी न करना, इंद्रियों पर नियंत्रण रखना आदि। अन्य धर्मों में भी इसी तरह की अच्छी-अच्छी बातें हैं। इस्लाम भाई-चारे की शिक्षा देता है। बाइबल में कहा गया है कि ऊँट सुई के छेद से निकल सकता है, पर दौलत वाला ईश्वर के राज्य में दाखिल नहीं हो सकता।

देखो, अच्छी बातों के लिए हम धर्म के मोहताज नहीं है। चोरी न करना या क्षमा करना या धीरज रखना या सत्य की पूजा उनके लिए भी वांछित हैं जो किसी भी धर्म को नहीं मानते। ये तो मानवीय गुण हैं जो व्यक्ति और समाज, दोनों के लिए आवश्यक और उपयोगी हैं। इनका स्रोत मनुष्य का विवेक है, न कि कोई धार्मिक विचारधारा। मसलन शोषण न करना हर आदमी का कर्तव्य है, भले ही किसी धर्म पुस्तक में इसका जिक्र न हुआ हो। नास्तिक दुष्ट थोड़े ही होता है। वह ईश्वर को नहीं मानता, धर्म में विश्वास नहीं करता, पर अच्छा व्यक्ति और अच्छा समाज उसे भी ईष्ट है। अच्छाई किसी धर्मग्रंथ
या किसी धर्मोपदेशक की शिक्षाओं पर टिकी हुई हो, इससे बेहतर है कि वह मनुष्य की तर्कशक्ति तथा विवेक पर टिकी हुई हो। धर्म पुराना पड़ सकता है, पर विवेक की कोई सीमा नहीं होती।

तो सर , रास्ता क्या है ? ईश्वर नहीं , धर्म नहीं , तो समाज किस आधार पर चलेगा ? व्यक्ति के आचरण की कसौटी क्या होगी ?

नैतिकता।

नैतिकता ?

हाँ , नैतिकता।

लेकिन नैतिकता तो पानी की तरह चीज है। उसे जिस बरतन में रख दो, वह उसी की शक्ल में ढल जाता है। नहीं?

नहीं, मैडम, बिलकुल नहीं। पर इस पर बातचीत अभी नहीं। आखिर थकावट नाम की भी एक चीज होती है।

ओके। खाने की मेज पर मिलते हैं। तब तक रहा-सहा नशा भी उतर जाएगा।

और मुझे नशा पैदा करने के लिए एकाध गिलास और लेना होगा।


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