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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर


आज सुबह उठी, तो तन और मन, दोनों ही अलसाए हुए थे। रात को सुमित के साथ बहुत देर तक बातचीत होती रही। उसके जिद करने पर दो पेग शराब भी पी। इस बार और ज्यादा सकून मिला। दिमाग मानो उड़ रहा था। मैंने यह भी महसूस किया कि थोड़ी पी लेने पर दिमाग की अर्गलाएँ खुल जाती हैं और हम वे चीजें देख सकते हैं जो पहले नहीं दिखाई पड़ती थीं। सुमित भी तन्मय हो कर बात कर रहा था। कभी-कभी यह भी समझ में नहीं आता था कि वह मुझसे बात कर रहा है या अपने आपसे। विचार का भी एक रहस्यवाद होता है, यह मैंने पहली बार अनुभव किया।

उसकी बातें सुनते-सुनते एकाएक मुझे झपकी आने लगी। शायद नशा अपने चरम पर था। झपकी आते-आते मैं कब कालीन पर ही सो गई, मुझे पता नहीं चला। एकदम बेसुध थी। नींद इतनी गहरी थी जैसे बरसों की नींद आज पूरी हो रही हो। पता नहीं कितनी देर तक मैं सोई रही। जब जगी तो मैं सोफे पर लेटी हुई थी। होश अभी पूरी तरह आया भी नहीं था कि मेरे मन में सवाल उठा, अरे, मैं यहाँ कैसे आ गई। आँख बंद होते-होते अपने को गिरने से बचाने के लिए मैं कालीन पर लेट गई थी। यह तो हो नहीं सकता कि सोए-सोए ही मैंने बिस्तर बदल लिया और कालीन से उठ कर सोफे पर आ गई। अब मैंने अपने कपड़ों पर निगाह डाली। सब कुछ यथास्थान था। साड़ी थोड़ी तुड़-मुड़ गई थी। ब्लाउज ढीला हो आया था। पर कुछ भी कहीं से उघड़ा हुआ नहीं था। सामने नजर गई, तो देखा, सुमित सामने की कुर्सी पर बैठा पेपर होल्डर में लगे कागज पर कुछ आँक रहा था। अचानक उसने सिर उठा कर देखा - जाहिर है, मेरी तरफ -- तो खुशी से मुसकराने लगा - 'वेलकम टू दिस अग्ली वर्ल्ड !'

मुझे हलकी-सी शर्मिंदगी ने घेर लिया। मैंने माफी माँगी, 'माफ कीजिएगा, मैं थोड़ा सो गई थी। शायद यह शराब का असर था। आपको बोर होना पड़ा।'

जवाब आया, 'बोरियत? बोरियत तब होती है, जब तुम जगी रहती हो। सोए में तो तुम दिव्य लग रही थीं। मैं घंटे भर तक तुम्हें नख-शिख निहारता रहा। अगर यह कहूँ कि ऐसा सुख मुझे पहली बार मिल रहा था, तो यह झूठ होगा। यह सच है कि इस बार जो सुख मिला, वह पहले के सभी अनुभवों से अलग था। मेरी सारी इंद्रियाँ स्तब्ध हो गई थीं। मेरी पूरी चेतना तुम्हारी आकृति पर केंद्रित थी। सम्मोहन क्या होता है, यह मैंने पहली बार जाना। फिर सोचा कि यह दृश्य भविष्य में कभी नसीब हो या नहीं, इसलिए मैंने तुम्हारा स्केच बनाना शुरू कर दिया। यह देखो...'

स्केच को हाथ में ले कर मैंने उस पर नजर डाली। आकृति मुझसे काफी मिलती-जुलती थी, पर पूरी देह कुछ बोल रही थी। मैंने सिर उठा कर कहा, 'सभी मर्द औरतों की चापलूसी करते हैं। खासकर तब जब वे अकेले हों। बस आपकी चापलूसी ऊँचे दर्जे की और काफी कलात्मक है।'

'हे ईश्वर,स्त्री का निर्माण कर तुम्हें पछतावा नहीं हुआ? इतना सुंदर शरीर बनाया और दिमाग में भूसा भर दिया।' सुमित ने खिलखिलाते हुए कहा।

मैं भी हँसने लगी। बोली, 'पुरुषों के दिमाग में भूसा भर देने के बाद जो बचा-खुचा था, शायद वही हमारे हिस्से में आया।'

सुमित थोड़ा गंभीर हो आया। उसने कहा, 'तुम ठीक कहती हो, हर आदमी कहीं न कहीं बेवकूफ होता है। चाहो तो यह भी जोड़ सकती हो, कम से कम दूसरों की नजर में।'

मैं भी गंभीर हो आई, 'तभी तो जब मैं सो रही थी, आप मुझे घूरते रहे और फिर मेरी तसवीर बनाते रहे। क्या यह नैतिक था?'

सुमित - 'यह... शायद... प्रेम था और प्रेम नैतिक-अनैतिक, दोनों से परे होता है।'

मैं कुछ देर तक सोचती रही। तब तक सुमित ने चाय मँगा ली थी। चाय की चुस्की लेते हुए मैंने पूछा, क्या प्रेम की कोई नैतिकता नहीं होती?

क्यों नहीं होती ? बल्कि प्रेम ही एकमात्र नैतिकता है। बाकी जो कुछ है, वह अनैतिक है।

और जो नियम-कानून समाज के सुचारु संचालन के लिए बनाए जाते है, जो नैतिक संहिताएँ व्यक्ति के मार्गदर्शन के लिए तैयार की जाती हैं, वे ?

वे वहीं तक वैध हैं, जहाँ तक उनके पीछे प्रेम है। बाकी सब तानाशाही है। धर्म की तानाशाही, समाज की तानाशाही, राज्य की तानाशाही, विचारधारा की तानाशाही, परिवार की तानाशाही ... इसीलिए तानाशाही जैसी भी हो, उसके खिलाफ विद्रोह होता रहता है।

क्या इसी अर्थ में रूसो ने कहा था कि मनुष्य पैदा तो स्वतंत्र होता है, पर हर जगह जंजीरों में बँधा हुआ मिलता है ?

हो सकता है, लेकिन मुझे इसमें संदेह है कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है। यह एक रूमानी धारणा है। सच यह है कि बच्चा दुनिया का सबसे ज्यादा पर-निर्भर प्राणी होता है, इसलिए सभी उस पर रंग जमाने की कोशिश करते हैं। तुमने पढ़ा होगा, चीन में पहले शिशु कन्याओं के पैरों में तंग जूते बाँध दिए जाते थे, ताकि उनके पैर गोलमटोल और छोटे-छोटे रहें। बालिग लोग हमेशा अपना सौंदर्य बोध और नैतिक बोध अपने बच्चों पर लादने की कोशिश करते हैं। वे हर जगह अपना क्लोन देखना चाहते हैं। यह अपराध है। अब तो यह भी हो रहा है कि बच्चा ठीक उस मुहूर्त में पैदा हो जिसे उसके माता-पिता शुभ मानते हैं। वे डॉक्टर भी महान हैं जो थोड़े-से पैसों की खातिर प्रकृति के साथ इस तरह का हस्तक्षेप करना मंजूर कर लेते हैं।

यानी चिकित्सक की भी अपनी कोई नैतिकता नहीं होती !

जिस समाज में हर चीज पर पैसा हावी हो, वहाँ कोई भी गतिविधि पूरी तरह नैतिक नहीं हो सकती। पैसा सबकी स्वायत्तता में हस्तक्षेप करता है। चिकित्सक का पेशा उसी तरह धन पर आधारित है जिस तरह वकील का। सबसे कुशल कानूनी सहायता उसे मिलेगी जो सबसे ऊँची फीस दे सकता है। इसी तरह, सबसे बेहतर चिकित्सीय सेवा उसे मिलेगी जो सबसे ज्यादा खर्च कर सकता है।

यह सुन कर मैं दहल-सी गई। चाय पी ली थी, पर प्याला अभी भी मेरे हाथ में था। प्याला काँप रहा है, यह मैने महसूस किया। फिर नजर इस तरफ गई कि प्याला जिस हाथ से थाम रखा था, वह भी काँप रहा है। मुझे याद आया, हमारे घरेलू नौकर का बच्चा डायरिया से मर गया था, क्योंकि उसका समय पर इलाज नहीं हो सका था। नौकर केमिस्ट से पूछ-पूछ कर दवा लाता रहा। जब हमें यह बात मालूम हुई, तो हम बच्चे को अस्पताल ले गए। पर वह भर्ती होने के दूसरे दिन ही गुजर गया। क्या हमारे परिवार के किसी सदस्य के साथ इस तरह की घटना हो सकती थी? क्या चिकित्सा के अभाव में मेरी मौत हो सकती थी?

लेकिन सर, प्रेम तो भावना की चीज है, पर नैतिकता का आधार यह है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा , मैंने जानना चाहा।

सुमित बोला, 'तुम्हीं बताओ, क्या अच्छा है और क्या बुरा?'

मैं कुछ देर तक सोचती रही। अच्छाई और बुराई की बहुत-सी परिभाषाएँ याद आ रही थी। उनमें परस्पर द्वंद्व भी था। अंत में मैंने कहा, जो समाज के लिए अच्छा है, वह अच्छा है और जो समाज के लिए बुरा है, वह बुरा है।

इस पर सुमित हँस पड़ा। उसने बगल से कागज का एक टुकड़ा उठाया और उसे गोल करके मेरी तरफ फेंका। मैंने उसे लोकने की कोशिश की, पर सफलता नहीं मिली। वह मेरी गोद में आ गिरा। मैंने उसे उठा कर सुमित की ओर फेंका, तो उसने लोक लिया। कुछ देर तक यह खेल चलता रहा।

खेल को रोक कर सुमित बोला, तुमने नैतिकता की जो परिभाषा की है, वह ऐसी ही है। एक चक्करदार सफर, जिसमें आदमी कहीं नहीं पहुँचता। वह फुटबॉल की तरह इधर से उधर और उधर से इधर फेंका जाता रहता है। उसमें गति होती है, पर प्रगति नहीं। भली लड़की, यही तो सवाल है कि समाज के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है।

इसकी कोई स्थायी रूपरेखा नहीं बनाई जा सकती। कल जो अच्छा था, वह आज बुरा लग सकता है। इसी तरह, कल जो बुरा था, वह आज अच्छा हो सकता है।

तो तुम्हारे खयाल से नैतिकता एक समय-सापेक्ष धारणा है। साथ ही, यह समाज-निरपेक्ष धारणा भी है।

बिलकुल। समय और समाज के लिहाज से नैतिकता बदलती रहती है। एक जमाने में विधवा विवाह की मुमानियत थी। आज कोई इसका बुरा नहीं मानता।

यों भी कह सकते हैं कि नैतिकता एक विकासशील धारणा है। इसे किसी चौहद्दी में नहीं बाँधा जा सकता।

एकदम ठीक। रूढ़ हो जाने पर नैतिकता स्वयं अनैतिक हो जाती है।

लेकिन वह क्या चीज है जो नैतिकता को रूढ़ नहीं होने देती यानी उसे विकासमान बनाए रखती है?

मेरे खयाल से, स्वस्थ और सुखी जीवन के बारे में हमारी बदलती हुई धारणाएँ। मानव समाज एक विकासशील इकाई है, इसलिए क्या नैतिक है और क्या अनैतिक है, इसे ले कर हमारे विचार भी एक जैसे नहीं रहते।

लेकिन कोई तो मूल चीज होगी जो बदलती हुई नैतिक धारणाओं के पीछे सक्रिय रहती है। वह चीज क्या है?'

मैं सोचने लगी।

सुमित ने कहा, मेरे खयाल से, वह चीज है मनुष्य के प्रति मनुष्य का प्रेम। यह प्रेम जितना निर्मल और उदात्त होता है, नैतिकता का स्तर उतना ही ऊँचा होता है। जो किसी से प्रेम नहीं करता, अपने आपमें केंद्रित होता है, वह चाहे जितने महान कर्म करता रहे, उसे तो मैं अनैतिक व्यक्ति ही कहूँगा। दरअसल, मनुष्य सामाजिक जीवन बिताने के लिए ही बना है। कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जिन्हें समाज की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती, वे अपने एकांत में ही संतुष्ट रहते हैं, पर उनके मनोविज्ञान को मैं आज तक समझ नहीं पाया। उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि ये असामान्य व्यक्ति हैं। किसी वजह से वे समाज से विमुख हो गए। वे अपने नियमों के अनुसार जीते हैं।

तो नैतिकता का आधार हम खुद नहीं हैं, दूसरे हैं?

मेरा खयाल तो यही है। हम अपने साथ क्या करते हैं, इसका नैतिकता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। हर आदमी अपने आपमें स्वायत्त इकाई है। इसलिए उसे अपने ढंग से जीने का अधिकार है। इस मामले में क्या नैतिक है और क्या अनैतिक, कुछ कहा नहीं जा सकता। नैतिकता का सवाल तब पैदा होता है जब हम दूसरों के संपर्क में आते हैं। यह दूसरा व्यक्ति आदमी भी हो सकता है, पशु-पक्षी भी और हवा-पानी-मिट्टी भी। इनसे हम जितना प्यार करेंगे, हमारा जीवन उतना ही नैतिकता माना जाएगा।

यानी स्वार्थीपना अनैतिक है और उदारता नैतिक। इसकी पराकाष्ठा यह है कि किसी और को बचाने के लिए कोई अपनी जान दे।

बेशक। दूसरों के लिए जीना या मरना इस पर निर्भर है कि आपको उनसे कितना प्रेम है। आपको किसी से भी प्रेम नहीं है, तो आपके लिए नैतिक-अनैतिक का फर्क मिट जाएगा। जरा सोचो, किसी समाज के सभी सदस्य स्वार्थपरता को सिद्धांत मान कर चलने लगें, तो समाज की दशा क्या हो जाएगी? कोई किसी से न अपना सुख बाँटेगा, न कोई किसी के दुख में साझा करेगा। क्या ऐसे समाज में कोई व्यक्ति सुखी हो सकता है - सुख की उसकी परिभाषा जो भी हो।

क्यों, कोई व्यक्ति किसी कारण से निर्जन टापू में रहने लगे, तो वहाँ वह जैसे चाहे रह सकता है ? क्या वह वहाँ कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है? क्या उसके मन में नैतिक-अनैतिक के द्वंद्व नहीं उठ सकते?

क्यों नहीं उठ सकते? यह तो तुम मानोगी ही कि सच्ची नैतिकता मनुष्य के भीतर से उठती है। जो कुछ ऊपर से आरोपित होता है, वह अनुशासन है। यह अनुशासन भी तभी सफल होता है, जब व्यक्ति ने उसे स्वेच्छा से आत्मसात कर लिया हो। वरना वह अनुशासन बार-बार टूटता रहेगा। जहाँ तक टापू में पड़े अकेले आदमी का सवाल है, उसकी नैतिक कसौटियाँ वही होंगी जो उसके पूर्व सामाजिक जीवन से उसके भीतर बद्धमूल हो चुकी हों। जैसे, अगर उसने यह सीखा है कि मांसाहार गैरजरूरी हिंसा है, इसलिए अनैतिक है, तो वह उस टापू पर भी शाकाहारी जीवन जीने का प्रयास करेगा।

ओके। चूँकि ढेर सारे प्राकृतिक संसाधन उसके पास उपलब्ध हैं, इसलिए वह उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा। वह उतना ही लेगा जितने की उसकी जरूरत है। सिर्फ इस उम्मीद में नहीं कि इस टापू पर कोई और भी हो सकता है, बल्कि तब भी जब ऐसी कोई उम्मीद न हो। यहाँ तक कि यह मानने का भी कोई आधार न हो कि भविष्य में उसकी तरह कोई और भी घटनावश उस टापू में रहने आ सकता है।

एकदम सही।

बहुत-से लोगों का मानना है कि खान-पान से नैतिकता का कोई संबंध नहीं है। जिसे जो रुचता है, वह खाए। यह उसका निजी मामला है।

मेरी समझ से, यह एक तर्कहीन स्थिति है। इस तर्क से तो आदमी आदमी का मांस भी खा सकता है।'

नहीं खा सकता, क्योंकि यह बात सोचने से ही जी मिचलाने लगता है। और फिर कानून भी इसके लिए मना करता है। कानून की निगाह में यह हत्या है।

नैतिकता का दायरा कानून से बड़ा है। अकसर कानून नैतिकता के पीछे-पीछे चलता है। अभी हाल तक समलैंगिक संबंध को अनैतिक माना जाता था। गैरकानूनी तो था ही। आज बहुत-से देशों में यह नैतिक और कानून-सम्मत भी है।

तो क्या ऐसी स्थिति की कल्पना की जा सकती है जिसमें आदमी का मांस खाना नैतिक मान लिया जाए ?

तर्क और सिद्धांत के स्तर पर इसमें कुछ भी आपत्तिजनक प्रतीत नहीं होता। किसी सुदूर अतीत में शायद नर भक्षण का प्रचलन रहा भी हो। सभ्यता के किसी चरण में यह तय किया गया होगा कि मानव हत्या समाज के हित में नहीं है। उसके बाद यह टैबू हो गया। तब से आज तक यह टैबू है।

अगर मनुष्य की हत्या बुरी है, तो पशुओं की हत्या अच्छी कैसे हो सकती है। उनमें भी जान होती है, वे भी सुख-दुख महसूस करते हैं।

मेरा भी यही मानना है। जहाँ भी हिंसा से बचा जा सकता है, बचना चाहिए। हिंसक व्यक्ति और हिंसक समूह, दोनों को अनैतिक माना जाना चाहिए।

तब तो शाकाहार में भी समस्या है। वनस्पतियों में भी तो जीवन है।

तुम्हारी बात एकदम सही है। लेकिन मनुष्य के लिए यह आवश्यक हिंसा है। इस न्यूनतम हिंसा के बिना वह जीवित नहीं रह सकता। असल में, अहिंसा या प्रेम के मूल्य प्राकृतिक व्यवस्था में नहीं हैं। प्रकृति नैतिकता-अनैतिकता से परे है। वह बस है और अपने नियमों से चलती है। उसके नियम कोई और नहीं बना सकता। लेकिन आदमी नियम-मुक्त नहीं हो सकता। जीने के लिए जरूरी है कि जीवन में कुछ मूल्य हों। इन मूल्यों का आविष्कार मनुष्य ने इसलिए किया है, क्योंकि वह उचित-अनुचित की धारणा से मुक्त नहीं हो सकता। आदिम से आदिम कबीलों में भी उचित-अनुचित या अच्छे-बुरे की भावना पाई जाती है। मानव जीवन के विकास के साथ-साथ यह भावना विकसित होती जाती है। जहाँ प्रेम है, वहाँ किसी भी प्रकार की हिंसा ठहर नहीं सकती। एक बार किसी महापुरुष से पूछा गया कि प्रेम और न्याय, दोनों में से किसे चुनना चाहिए? महापुरुष ने तुरंत जवाब दिया, प्रेम को, क्योंकि जहाँ प्रेम है, वहाँ अन्याय हो ही नहीं सकता। प्रेम की कोई सीमा नहीं है। हम आदमियों से, पशु-पक्षियों से, पेड़-पौधों से, यहाँ तक कि नदियों और पहाड़ों से भी प्रेम कर सकते है। शायर का कहना है, मेरा पैगाम मुहब्बत है, जहाँ तक पहुँचे।

अगर खाना-पीना नैतिक मामला है, तब तो पहनना-ओढ़ना भी नैतिक मामला हो सकता है।

हो सकता है नहीं, है। लेकिन उस अर्थ में नहीं जिस अर्थ में औरतों पर कोई खास ड्रेस कोड लादने की कोशिश होती रहती है। ऐसी हर कोशिश हास्यास्पद है। लेकिन ऐसा पहनना-ओढ़ना जरूर अनैतिक है, जो गरीबों पर व्यंग्य लगे। जब साधनहीन लोग ठंड से काँप रहे हों, उस वक्त कोई स्वेटर, कोट, ओवरकोट वगैरह पहन कर निकले, तो इसे निश्चय ही अनैतिक कहा जाएगा। कुछ लोग यहाँ अनैतिक की जगह अश्लील शब्द का प्रयोग करना चाहेंगे, पर मैं अश्लील को अनैतिक का पर्यायवाची ही मानता हूँ। अश्लील वही है जो अनैतिक है। जो अनैतिक है, वह अश्लील भी है।

यानी समता ही नैतिक है, विषमता हर सूरत में अनैतिक है।

बिलकुल। इसमें यह भी जोड़ो कि यह समता सिर्फ भौतिक स्तर पर नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी होनी चाहिए। इसी को भाई-चारा कहते हैं। औरतें इस भावना के लिए बहनापा शब्द का इस्तेमाल कर रही हैं। काश, कोई ऐसा शब्द होता, जो स्त्री-पुरुष दोनों पर एक जैसी तीव्रता से लागू होता हो।

मनुष्यता ? मानवअधिकार की तर्ज पर मानव अनुराग ?

ये शब्द घिस-पिट चुके हैं। इनका पर्याप्त शोषण हो चुका है। इनमें वह बात नहीं है जो हम भाई-चारा या बहनापा से व्यक्त करना चाहते हैं। ये परिवार से जुड़े हुए शब्द हैं। पारिवारिकता शब्द एक अच्छा विकल्प हो सकता है। परंपरागत मुहावरे में, हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं, अतः हम मूलतः भाई-बहन हैं।

लेकिन भाई-बहन के बीच यौन संबंध कैसे हो सकता है?

यह भी एक टैबू है। खून के रिश्ते में विवाह या यौन संबंध वर्जित है। लेकिन गौर किया जाए, तो ऐसे जोड़ों में भी भाई-बहन का मूल तत्व बना रहे, तो यह उनके संबंध को ज्यादा मानवीय और उदात्त बनाएगा। मूल संबंध तो भाई-बहन का ही है। जब दूसरी तरह के संबंध बनते हैं, तो यह मूल संबंध मिट नहीं जाता। मेरा खयाल है कि इस मसले पर और सोच-विचार की जरूरत है।

*

एक बार फिर मैं सोच-विचार में पड़ गई। अभी तक मैं नैतिकता के सवाल को इतने व्यापक रूप में नहीं देखती थी। सुमित ने इस सवाल के इतने आयाम खोल दिए कि मुझे डर लगने लगा। अपने जीवन के कई अनैतिक पक्ष मेरी आँखों के सामने स्पष्ट होने लगे।

मेरे अंतर्द्वंद्व को सुमित ने महसूस किया। वह उठ कर मेरे पास आ गया और मेरे बालों को सहलाते हुए बोला, सुनंदा, अच्छा जीवन जी पाना लगभग असंभव है। इस मामले में तुम ही नहीं, मैं भी गुनहगार हूँ।'

पता नहीं मेरे भीतर कौन-सी बिजली कौंधी कि मैं सुमित से लिपट गई। हम दोनों ही एक दूसरे की बाँहों में सिसक रहे थे।


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