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उपन्यास

सुनंदा की डायरी
राजकिशोर

अनुक्रम सुमित की डायरी से - 2 पीछे     आगे

आदमी और आदमी के बीच वही रिश्ता सही है, जिसमें झूठ की जरूरत न हो। लेकिन क्या कोई रिश्ता ऐसा हो सकता है जिसमें झूठ की वास्तव में जरूरत न हो?

हम हमेशा अपने लिए झूठ नहीं बोलते, अकसर दूसरों के लिए झूठ बोलते हैं, ताकि उन्हें कष्ट न हो।

*

दूसरे नरक हैं।

लेकिन उनके बिना

क्या हम किसी स्वर्ग की

कल्पना कर सकते हैं?

 

*

जीवन जीने का सामान जमा करने में ही हम इतनी उम्र - और ऊर्जा - गँवा देते हैं कि जीवन को जीने का मौका ही नहीं आ पाता।

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कहते हैं, रोम एक दिन में नहीं बना था। ठीक, लेकिन क्या उसका विध्वंस भी एक दिन में हुआ था? जिंदगी के बारे में भी यह उतना ही सच है।

 

 

*

तुम जिससे प्रेम करते हो, जरुरत पड़ने पर क्या उसका मूत्र पी सकते हो और मल खा सकते हो? अगर नहीं, तो तुम उससे प्रेम नहीं करते ।

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जनमत दुनिया की सबसे मलबूत तानाशीही है । यह वह सत्य है जो झूठों को मिला कर बनता है ।


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