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कविता संग्रह

कबीर ग्रंथावली
कबीर
संपादन - श्याम सुंदर दास

अनुक्रम रमैणी (सतपदी रमैणी) पीछे     आगे

कहन सुनन कौ जिहि जग कीन्हा, जग भुलाँन सो किनहुँ न चीन्हा॥
सत रज तम थें कीन्हीं माया, आपण माझै आप छिपाया॥

तुरक सरीअत जनिये, हिंदू बेद पुरान॥
मन समझन कै कारनै, कछु एक पढ़िये ज्ञान॥

जहाँ बोल तहाँ आखिर आवा, जहाँ अबोल तहाँ मन न लगावा॥
बोल अबोल मंझि है सोई, जे कुछि है ताहि लखै न कोई॥
ओ अंकार आदि मैं जाना, लिखि करि मेटै ताहि न माना॥
ओ ऊकार करै जस कोई, तस लिखि मरेणां न होई॥
ककाँ कवल किरणि मैं पावा, अरि ससि बिगास सपेट नहीं आवा॥
अस जे जहाँ कुसुम रस पावा, तौ अकह कहा कहि का समझावा॥
खखा इहै खोरि मनि आवा, तौ खोरहि छाँड़ चहूँ दिस धावा॥
खसमहिं जानि षिमा करि रहै, तौ हो दून षेव अखै पद लहै॥
गगा गूर के बचन पिछाना, दूसर बात न धरिये काना॥
सोइ बिहंगम कबहुँ न जाई, अगम गहै गहि गगन रहाई॥
घघा घटि निमसै सोई, घट फाटा घट कबहुँ न होई॥
तौ घट माँहि घाट जो पावा, सुघटि छाड़ि औघट कत आवा॥

नना निरखि सनेह करि, निरवालै संदेह॥
नाहीं देखि न भाजिये, प्रेम सयानप येह॥

चचा चरित चित्र है भारी, तजि बिचित्र चेतहुँ चितकारी॥
चित्र विचित्र रहै औडेरा, तजि बिचित्र चित राखि चितेरा॥
छछा इहै छत्रापति पासा, तिहि छाक न रहै छाड़ि करि आसा॥
रे मन हूं छिन छिन समझाया, तहाँ छाड़ि कत आप बधाया॥
जजा जे जानै तौ दुरमति हारी, करि बासि काया गाँव॥
रिण रोक्या भाजै नहीं, तौ सूरण थारो नाँव॥
झझा उरझि सुरझि नहीं जाना, रहि मुखि झझखि झझखि परवाना॥
कत झषिझिषि औरनि समझावा, झगरौ कीये झगरिबौ पावा॥

नना निकटि जु घटि रहै, दूरि कहाँ तजि आइ।
जा कारणि जग ढूँढियो, नैड़े पायौ ताहि॥

टटा निकट घाट है माहीं, खोलि कपाट महील जब जाहीं॥
रहै लपटि जहि घटि परो, आई, देखि अटल टलि कतहुँ न जाई।
ठठा ठौर दूरि ठग नीरा, नीठि नीठि मन कीया धीरा॥
सूक बिरख यहु जगत उपाया, समझि न परै बिषम तेरी माया॥
साखा तीनि पत्रा जुग चारी, फल दोइ पापै पुंनि अधिकारी॥
स्वाद अनेक कथ्या नहीं जांहीं, किया चरित सो इन मैं नाहीं॥

तेतौ आहि निनार निरंजना, आदि अनादि न आंन॥
कहन सुन कौ कीन्हु जग, आपै आप भुलाँन॥

जिनि नटवे नटसारी साजी, जो खेलै सो दीसे बाजी॥
मो बपरा थें जोगपति ढीठो, सिव बिरंचि नारद नहीं दीठी॥
आदि अंति जो लीन भये हैं, सहजै जाँनि संतोखि रहे हैं॥
जजा सुतन जीवतही जरावै, जोबन जारि जुगुति सो पावै॥
अंसंजरि बुजरि जरि बरिहै, तब जाइ जोति उजारा लहै॥
ररा सरस निरस करि जानैं, निरस होइ सुरस करि मानै॥
यहु रस बिसरै सो रस होई, सो रस रसिक लहै जे कोई॥

लला लहौ तो भेद है, कहूँ तो कौ उपगार॥
बटक बीज मैं रमि रह्या, ताका तीन लोक बिस्तार॥

ववा वोइहिं जाणिये, इहि जाँण्याँ वो होइ॥
वो अस यहु जबहीं मिल्या, इहि तब मिलत न जाषे कोइ॥

ससा सो नीको करि सोधै, घट पर्‌या की बात निरोधै॥
घट पर्यो जे उपजै भाव, मिले ताहि त्रिभुवनपति राव॥
षषा खोजि परे जे कोई, जे खोजै सो बहुरे न होई॥
षोजि बूझि जे करै बिचार, तौ भौ जल तिरत न लागे बार॥
शशा शोई शेज नू बारे, शोई शाव संदेह निवारे॥
अति सुख बिसरे परम सुख पावै, सो अस्त्री सो कंत कहावै॥
हहा होइ होत नहीं जानै, जब जब होइ तबै मन मानै॥
ससा उनमन से मन लावै, अनंत न जाइ परम सुख पावै॥
अरु जे तहाँ प्रेम ल्यौ लावै, तो डालह लहैं लैहि चरन समावै॥
षषा षिरत षपत नहीं चेते, षपत षपत गये जुग केते॥
अब जुग जानि जोरि मन रहै, तौ जहाँ थै बिछरो सो थिर रहै॥
बावन अषिर जोरै आनि, एकौ आषिर सक्या न जानि॥
सति का शब्द कबीरा कहै, पूछौ जाइ कहा मन रहै॥
पंडित लोगन कौ बौहार, ग्यानवंत कौं तन बिचारि॥
जाकै हिरदै जैसी होई, कहै कबीर लहैगा सोई॥2॥

सहजै राम नाम ल्यौ लाई, राम नाम कहि भगति दिढाई।
राम नाम जाका मन माँनाँ, तिन तौ निज सरूप पहिचाँनाँ॥

निज सरूप निरंजना निराकार अपरंपार अपार।
राम नाम ल्यौ लाइस जियरे, जिनि भूलै बिस्तार॥

करि बिस्तार जग धंधै लाया, अंत काया थैं पुरिष उपाया।
जिहि जैसी मनसा तिहि तैसा भावा, ताकूँ तैसा कीन्ह उपावा॥
तेतौ माया मोह भुलाँनाँ, खसम राम सो किनहूँ न जांनां॥
ता मुखि बिष आवै बिष जाई, ते बिष ही बिष मैं रहै समाई॥
माता जगत भूत सुधि नांहीं, भ्रमि भूले नर आवैं जाहीं॥
जानि बूझि चेते नहीं अंधा, करम जठर करम के फंधा॥

करम का बाँधा जीयरा, अह निसि आवै जाइ॥
मनसा देही पाइ करि, हरि बिसरै तौ फिर पीछै पछिताइ॥

तौ करि त्राहि चेति जा अंधा, तजि पर कीरति भजि चरन गोब्यंदा॥
उदर कूप तजौ ग्रभ बासा, रे जीव राम नाम अभ्यासा॥
जगि जीवन जैसे लहरि तरंगा, खिन सुख कूँ भूलसि बहु संगा॥
भगति कौ हीन जीवन कछू नांहीं, उतपति परलै बहुरि समाहीं॥

भगति हीन अस जीवनां, जनम मरन बहु काल॥
आश्रम अनेक करसि रे जियरा, राम बिना कोइ न करै प्रतिपाल॥

सोई उपाय करि यहु दुख जाई, ए सब परहरि बिसै सगाई॥
माया मोह जरै जग आगी, ता संगि जरसि कवन रस लागी॥
त्राहि त्राहि करि हरी पुकारा, साधु संगति मिलि करहु बिचारा॥
रे रे जीवन नहीं बिश्रांमां, सुख दुख खंउन राम को नांमां॥
राम नाम संसार मैं सारा, राम नाम भौ तारन हारा॥

सुम्रित बेद सबै सुनै, नहीं आवै कृत काज।
नहीं जैसे कुंडिल बनित मुख, मुख सोभित बिन राज॥

अब गहि राम नाम अबिनासी, रि तजि जिनि कतहूँ कैं जासी॥
जहाँ जाइ तहाँ तहाँ पतंगा, अब जिनि जरसि संमझि बिष संगा॥
चोखा राम नाम मनि लीन्हा, भिंग्री कीट भ्यंग नहीं कीन्हा॥
भौसागर अति वार न पारा, ता तिरबे का करहु बिचारा॥
मनि भावै अति लहरि बिकारा, नहीं गमि सूझै वार न पारा॥

भौसागर अथाह जल तामैं बोहिथ राम अधार।
कहै कबीर हम हरि सरन, तब गोपद खुद बिस्तार॥3॥



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