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कविता

चिर-वंचित



जीवन-भर
                रहा अकेला,
अनदेखा -
सतत उपेक्षित
घोर तिरस्कृत!


जीवन-भर
अपने बलबूते
झंझावातों का रेला
                झेला!
जीवन-भर
जस-का-तस
               ठहरा रहा झमेला !


जीवन-भर
असह्य दुख-दर्द सहा,
नहीं किसी से
भूल
शब्द एक कहा!
अभिशापों तापों
दहा - दहा!

रिसते घावों को
सहलाने वाला
                  कोई नहीं मिला -
पल-भर
नहीं थमी
सर-सर
                 वृष्टि-शिला!
एकाकी
फाँकी धूल
                  अभावों में -
घर में :
                  नगरों-गाँवों में!
यहाँ-वहाँ
जानें कहाँ-कहाँ!


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