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कविता

दूरवर्ती से



शेष जीवन
जी सकूँ सुख से
तुम्हारी याद
          काफी है!

कभी
कम हो नहीं
एहसास जीवन में
तुम्हारा
यह बिछोह-विषाद
       काफी है!

तुम्हारी भावनाओं की
धरोहर को
सहेजा आज-तक
          मन में,
अमरता के लिए
केवल उन्हीं का
सरस गीतों में
सहज अनुवाद
         काफी है!


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