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कहानी

खंडित प्रतिमाएँ
विवेक मिश्र


राघव अभी भी मुँह बाए, आँखें फाड़े, जड़वत खड़े थे और वह भारी देह वाला छ सवा छ फुट का आदमी बड़े इत्मीनान से उसी कुएँ से पानी निकाल रहा था, जिसमें अभी कुछ देर पहले ही उसने एक जीते-जागते इनसान को काटकर फेंक दिया था। यह सब करते हुए वह इतना सहज था कि जैसे इनसान की जिंदगी का कोई मोल न हो उसके लिए। बाल्टी के कुएँ से बाहर आते ही, उसने अपने ओक में पानी भरकर मुँह धोया, अपनी कुहनी के नीचे तक रगड़कर हाथ धोए। हाथों में लगा खून पानी के साथ कुएँ के नीचे बनी नाली में बहने लगा। उसने उसी बाल्टी में से एक लोटा भरकर अपने हलक में उड़ेल लिया और पानी का आखरी घूँट गले में रोककर, भारी गर्जना के साथ गलगलाया और दूर बुलक दिया।

राघव अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि यह सब उनके सामने हो रहा था। कुएँ के पाट पर पड़े खून के धब्बे धीरे-धीरे सूखकर गहरे हो रहे थे। ताजे खून की चमक फीकी हो गई थी। राघव ने सूखे गले से बमुश्किल थूक सटकते हुए कुछ कहने की कोशिश की, पर शब्द हलक से निकली हवा पर सवार होकर बाहर नहीं आ सके। जो गले से बाहर आया उसे ठीक-ठीक चीख भी नहीं कहा जा सकता, वह कँपकँपाती रुलाई जैसी कोई चीज थी, जिसे सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था।

उस आदमी ने राघव को कई दिनो जागने के कारण अपनी सूजी हुई आँखों से ऐसे घूरा कि राघव के दिल की धड़कनों की लय बिगड़ गई। रक्त कई धड़कनें लाँघता, उन्हें अधूरी छोड़ता नसों में बेतहाशा भागने लगा। वह खड़े-खड़े ही हाँफने लगे।

उसने राघव की घबराहट को भाँपते हुए, उनकी ओर एक भयावह और क्रूर मुस्कराहट फैला दी। शायद उसने राघव की आँखों में उठा सवाल पढ़ लिया था, इसीलिए उसने अपनी मुस्कराहट को समेटा और अपने चेहरे को किसी बड़े कटहल की तरह सख्त और कँटीला बनाते हुए कहा, 'जे चंबल है, हैंयाँ ऐसौई होत, जाकी आदत डाल लेओ'।

भय और अनिष्ठ की आशंकाओं ने राघव की जुबान पर ताला डाल दिया। उनके मुँह से उस समय कुछ भी नहीं निकला। उस आदमी ने अपने जबड़ों को ढीला करते हुए, चेहरे पर लोहे के कँटीले तारों की तरह बेतरतीब उगी दाढ़ी से झाँकते अपने मोटे और काले होंठों में बीड़ी दवाई और उसे सुलगाते-सुलगाते ही एक लंबा सुट्टा खींचा, जिससे उसकी सूजी हुई आँखें लाल हो गईं, फिर थोड़ा रुककर उसने मुँह से बीड़ी के गाढ़े धुएँ के साथ कुछ तपते हुए शब्द और निकाले, 'तुमैं मल्लीक सिंह की गैंग ने उठाऔ तौ, जिऐ हमनै काट कैं कुआ में फैंक दऔ, वो मल्लीक सिंह कौ मझलो मौड़ा हतौ, अब तुमाई फिरौती हम लै हैं, चलौ अब हैंयां सैं, हैंयां कुत्तन की नाक भौत तेज है।, अबई खून देख कैं चील-कौआ मंडरान लगैं इतै'। उसने अपनी बात खत्म करने के साथ ही बीड़ी का भी आखिरी सुट्टा खींचा और उसे फेंक दिया।

वह एक नजर में किसी कोयले की खदान से निकला हुआ आदमी लगता था, या फिर लोहा पिघलाने वाले कारखाने का मजदूर, जिसकी गहरे हरे रंग की लगभग काली पड़ चुकी डांगरी में कई छेद थे, जो कपड़े के जलने से बने थे। उसके जूतों के तल्लों में डामर लगी थी, जिससे वह सड़क बनाने बाला रोजनदार लगता था, पर समय के साथ बढ़ी आई दाढ़ी और निष्ठुर आँखों से वह खूनी लगता था। उसकी उपस्थिति भर से कोई भी असहज हो सकता था। उसने अचानक इस तरह वहाँ आकर राघव को भी भीतर तक हिला दिया था। राघव अचानक जिस दुनिया में पहुँच गए थे, वहाँ उनके लिए सब कुछ अविश्वसनीय था। कल शाम उन्हें भिंड से मड़ोरा जाने वाली बस से बिना कुछ बताए जबरन उतार लिया गया था। उसके बाद उनकी आँखों पर पट्टी बाँधकर, उन्हें एक जीप में बिठाकर तीन-चार घंटे का सफर कराया गया था। इस सबसे जितना वह समझ पाए थे उससे उन्हें यही पता चला था कि उनका अपहरण कर लिया गया था, पर वह यह नहीं समझ पाए थे कि उन्हें इस तरह क्यूँ उठाया गया है? वह कोई सेठ-साहूकार, बहुत बड़े अधिकारी या फिर कोई छुटभइए नेता नहीं थे। वह तो एक भाषा विज्ञानी थे और भाषा और मानवीय व्यवहार पर किए जा रहे एक बड़े सर्वेक्षण और शोध कार्य का हिस्सा थे। वह राज्य सरकार के साथ भी भाषा-संस्कृति और मानवीय व्यवहार पर काम कर चुके थे। उन्होंने कई क्षेत्रों की भाषाओं और वहाँ के नागरिकों की समस्याओं के अंतर संबंधों पर भी काम किया था, पर यहाँ आकर वह स्वयं को ज्ञान और भाषा से शून्य, एक निरीह, पिंजरे में बंद पक्षी-सा महसूस कर रहे थे, जिसकी अभी किसी भी क्षण बलि दी जा सकती थी और वह डर के मारे चीख भी नहीं पा रहे थे।

कल शाम बस से उतार लिए जाने के बाद तीन-चार घंटे के जीप के सफर और फिर आँखों पर पट्टी बाँधे-बाँधे उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए उन्हें यह भी अंदाजा हो गया था कि इसमें लगभग तीन लोग शामिल थे। एक वह जो निर्देश दे रहा था और दो वे जो उसका हर आदेश मान रहे थे। आज सुबह से ही वह पैदल चल रहे थे। जीप वहीं छोड़ दी गई थी, जहाँ रात वह थोड़ी-सी देर के लिए रुके थे।

चलते-चलते जब उन्हें यह एहसास हुआ ही था कि वह सुनसान बीहड़ों से होते हुए किसी विरल-सी आबादी वाले क्षेत्र में पहुँच गए हैं, तभी उन्हें रोक कर, उनकी आँखों की पट्टी उतार दी गई थी। वह एक पेड़ के नीचे एक सुनसान पगडंडी पर खड़े थे। पगडंडी का सामने वाला सिरा गाँव की ओर जा रहा था, जिसके एक ओर उथली-सी एक नहर थी और दूसरी ओर गेहूँ के खेत थे। उन खेतों के बीच एक ऊँचा चबूतरा दिखाई पड़ रहा था।, जिससे सटा हुआ एक कुआँ था, जिसका पाट चौड़ा था और मुँड़ेर पर एक रस्सा-बाल्टी रखा दिखाई दे रहा था। उसे देखकर राघव को लगा था कि उन्हें बहुत प्यास लगी है और कल शाम से ही उन्होंने कुछ खाया-पिया नहीं है। आँखों से पट्टी उतरने पर उन्होंने डरते हुए उन चेहरों को भी देखा था जिनके साथ वह यहाँ पहुँचे थे। उनके साथ चलने वालों में दो आदमी गहरे काले रंग के सत्ताईस-अटठाईस साल के मझोले कद के थे, जिनकी शक्लें आपस में थोड़ी-बहुत मिलती-जुलती थीं। तीसरा आदमी जो इन दोनो को आदेश दे रहा था, वह बाँस की तरह पतला और लंबा था। वह उम्र में उन्हें उन दोनो से छोटा लग रहा था। वह उत्तेजना में कई बार कुछ बुदबुदाता और फिर जोर से गालियाँ बकने लगता। अब वह सबसे आगे चल रहा था, उसके पीछे राघव थे और उनके पीछे वे दोनो मँझोले कद के एक जैसी शक्लों वाले आदमी थे। शायद वह कुएँ की ओर बढ़ रहे थे। थोड़ा आगे जाने पर पता चला था कि वह ऊँचा चबूतरा दरअसल हनुमान जी का तकिया था, जिस पर दो बड़े-बड़े सिंदूर से सने पत्थर रखे थे। चबूतरे के पास का कुआँ शायद यहाँ से गुजरने वाले हनुमान जी के भक्तों की सेवा के लिए बनवाया गया था। वे अभी चबूतरे का घेरा लेकर कुएँ तक पहुँचने ही वाले थे कि एक जोर का धमाका हुआ, आवाज इतनी तेज थी कि खेतों में खड़ी फसल को दहलाती हुई, क्षितिज से टकरा कर लौटती मालूम हुई। इस आवाज के साथ एक कराह भी गूँजी। राघव के पीछे चलते दोनों आदमियों में से एक के कंधे से खून बह रहा था। उसे गोली लगी थी। दूसरा अपनी जेब से देशी तमंचा निकाल कर गालियाँ देता हुआ उसी दिशा में लपका जहाँ से गोली चली थी, पर जरा-सा आगे बढ़ने पर ही लगा जैसे उसे लकवा मार गया हो। वह जैसे पत्थर का हो गया। उसका केवल वह हाथ जिसमें उसने तमंचा पकड़ा था, लगातार काँप रहा था। राघव ने देखा, भय से काँपते उस आदमी के सामने एक छ-सवा छ फुट का भारी भरकम देह वाला आदमी खड़ा था, जिसके जूतों में डामर लगी थी और उसके हाथ किसी फावड़े की तरह बड़े और सख्त थे। राघव के आगे चल रहे बाँस की तरह लंबे आदमी ने अचानक प्रकट हुए इस भारी भरकम देह वाले आदमी को लक्ष्य करके गोली चलाई, पर हड़बड़ाहट में चली गोली निशाने को छोड़कर कहीं नेपथ्य में खो गई। वह दूसरी गोली दाग पाता कि उससे पहले अभी-अभी प्रकट हुए इस आदमी ने अपनी कमर से बँधे कैनवास के थैले से लोहे के गड़ासेनुमा कोई हथियार निकाला और उस पर टूट पड़ा। राघव सकपका कर एक ओर हट गए। उन्होंने मदद के लिए उस आदमी की ओर देखा जो गोली चलने पर उसी दिशा में गालियाँ देता हुआ दौड़ा था, पर वह हिल तक नहीं रहा था। भय से उसकी पतलून गीली हो गई थी। बाँस की तरह लंबा आदमी जमीन पर लहूलुहान पड़ा था। राघव ने आँखें मूँद लीं, थोड़ी ही देर में उन्होंने किसी भारी चीज के कुएँ में गिरने की आवाज सुनी, उसके बाद कुछ देर तक सभी दिशाओं में एक भयावह सन्नाटा छाया रहा।

अब राघव भय के वशीभूत उस दैत्याकार आदमी, जो अचानक उनके सामने प्रकट हुआ था, के पीछे-पीछे चल रहे थे। बाँस की तरह लंबे आदमी को मारकर उसने कुएँ में फेंक दिया था। बाकी के दोनों आदमी आस-पास दूर-दूर तक कहीं नहीं दिख रहे थे। तीन आदमियों द्वारा अपहृत किए जाने के बाद से, वह जिन आशंकाओं से घिरे थे और लगातार अपने बचाव के लिए जो युक्तियाँ सोच रहे थे, वे सब उनके दिमाग से अनायास ही उड़ गई थीं। इस अचानक घटी घटना से वह एक विचित्र मनःस्थिति में पहुँच गए थे, जहाँ वह समझ नहीं पा रहे थे कि वह संकट से बच गए थे या अब गहरे संकट में थे, पर वह इतना समझ गए थे कि वह जहाँ हैं वहाँ बिना वजह भी उनके साथ कुछ भी घट सकता है। उनके मस्तिष्क ने अपने सामने घटती घटनाओं के पीछे के संभव तर्कों के बारे में विचार करना बंद कर दिया था।

वह जिस रास्ते से हनुमान जी के तकिए और उसके पास बने कुएँ तक पहुँचे थे, अब वापस उस रस्ते पर नहीं बल्कि उसके दाहिनी ओर नहर के किनारे, धीरे-धीरे नहर से दूर होते जा रहे रास्ते पर चल रहे थे। किसी खेत पर लोहे के लंबे सरिए, मोटे-मोटे गर्डर और लाल मिट्टी की बारिश खाई पुरानी इटें पड़ी थीं। कुछ खेतों पर आधी-अधूरी दीवारें उठी थीं, जो कमरों या घरों में बदलते-बदलते रह गई थीं। कई खेतों में पिलर उठाने या नींव डालने के लिए खोदे गए गड्ढ़ों में बरसाती पानी भरा सड़ रहा था। यह किसी गाँव का ऐसा हिस्सा था, जिसकी खेती की जमीन रिहायशी प्लाटों में कटने के बाद, एक छोटी कॉलोनी में तब्दील होने की प्रक्रिया के बीच में ही रुक गई थी। गाँव का यह हिस्सा अब गाँव जैसा नहीं था पर शहर भी नहीं था, बल्कि शहर बनते-बनते रह गया था। यहाँ-वहाँ खुदे बेतरतीब गड्ढ़े और उनके बीच उगे झाड़-झंकाड़, धरती की देह पर किसी तेजी से फैलने वाले भयावह चर्मरोग की तरह लग रहे थे। आस-पास इसके उपचार की कोई औषधि नहीं दीखती थी। चारों तरफ दूर-दूर तक कोई इनसान भी दिखाई नहीं दे रहा था। हाँ, राघव को कुछ देर पहले कहीं दूर एक कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनाई दी थी। कुछ देर इस औंधक-नीचे रास्ते पर चलने के बाद वे इस इलाके को पार करके जिस रास्ते पर पहुँचे थे, उसे देखकर लगता था कि शायद दो-तीन दशक पहले वहाँ एक पक्की सड़क रही होगी। क्योंकि सूखी मिट्टी के इस रास्ते पर कहीं-कहीं गिट्टी और तारकोल के कुछ टुकड़े फँसे हुए दिख जाते थे। उसके किनारे दो-एक बिजली के खंबे खड़े थे, जिनपर तार लगने अभी बाकी थे। राघव ने अभी उस रास्ते पर चलना शुरू ही किया था कि उनकी नजर रास्ते के किनारे लगे एक बोर्ड पर पड़ी, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, 'मल्लीक सिंक नगर मे आपका स्वागत है'। बोर्ड पर लिखे नाम को पढ़ते हुए एक बारगी राघव की टाँगें काँप गई थीं। यह वही नाम था, जिसे उन्होंने अपने आगे चलते उस भारी भरकम आदमी के मुँह से सुना था। क्या इसी नाम के आदमी के बेटे को मारकर इस विछिप्त से दिखने वाले आदमी ने कुएँ में फेंक दिया था। वे थोड़ी दूर उसी रास्ते पर चलकर रास्ते के दूसरे किनारे से एक ढलान पर उतरते चले गए थे, जो कि बाद में एक छोटे मैदान में बदल गई थी, जिसमें एक साथ, एक दूसरे से टिकी कई झोपड़ियाँ खड़ी थीं। उसी मैदान के दूसरी ओर ऐसी ही दस बारह झोपड़ियों के अवशेष पड़े थे। उन्हें देखकर लगता था कि कभी वहाँ भी ऐसी ही, एक दूसरे के सहारे खड़ी हुई झोपड़ियाँ रही होंगी, जिन्हें जला दिया गया था। काले, अधजले बाँस, रस्सियाँ, टूटे बर्तन और कई आकार खो चुकी चीजों की राख अभी तक वहीं थी। उसी राख में एक मरियल कुत्ता अपने पंजों से कुछ कुरेद रहा था, तभी शायद उसे वहाँ कुछ मिल गया था, जिसे वह अपने जबड़े में दबाए उस ओर भागा था, जहाँ वर्षों पुराना जंग खाया हैंडपंप लगा था। ध्यान से देखने पर पता चला था कि वह वहाँ बैठकर लगभग कोयले में तब्दील हो चुकी हड्डी चबाने लगा था। राख में अभी और भी हड्डियाँ रही होंगी। क्योंकि हड्डी चबाते-चाबाते कुत्ता अपना मुँह उठाकर, उस राख के ढेर से दूर रहने की चेतावनी दे रहा था।

राघव को उस कुत्ते का उस जली हुई हड्डी को चबाना बहुत अजीब लग रहा था। राघव को न जाने क्यूँ अपने घर की रसोई याद आ रही थी। वह अचानक रसोई में रखे बर्तनों और करीने से सजे डिब्बों, उनमें भरी खाद्य सामग्रियों के बारे में सोचने लगे थे। उन्हें अपना मानसिक संतुलन बिगड़ता हुआ लग रहा था। तभी उन्हें लगा वह कुत्ता जली हुई हड्डी नहीं उनके बच्चे की गर्दन चबा रहा है। वह अपनी पत्नी को भी इन्हीं झोपड़ियों में किसी से निकलते और किसी में घुसते हुए देख रहे थे।

देशी शराब की गंध उनके नथुनों में जबरन घुसी जा रही थी, जिससे रह-रहकर उन्हें उबकाई आ रही थी। वह अपने भीतर के उफान को दबाते हुए आगे बढ़ रहे थे कि तभी उन्हें रास्ते में पड़े पत्थर से जोर की ठोकर लगी। वह गिरते-गिरते बचे थे, पर उस ठोकर ने उन्हें चैतन्य कर दिया था। उन्हें यहाँ लेकर आने वाले आदमी ने एक नाटे, चौंड़ी नाक वाले, गहरे काले रंग के आदमी की ओर इशारा करते हुए उनसे कहा था, 'अपनौ नाम, पतौ और फोन लिखवा दो इखौं'। उस नाटे आदमी ने राघव के ही हाथ में कागज और पेन थमा दिया। उन्हें अपना नाम, पता और फोन नंबर लिखने में बहुत कठिनाई हुई थी, उन्हें लगता था उनका नाता उस दुनिया से कट गया है, पर अपना पता लिखते हुए, उनका घर, जो वहाँ से किस दिशा में और कितनी दूरी पर था, वह नहीं जानते थे, उनकी आँखों के आगे घूम गया था। उसके बाद वह आदमी उन्हें एक इतनी छोटी झोंपड़ी में ले आया था, जिसमें न तो वह सीधे खड़े हो सकते थे और न ही पैर पसार कर लेट सकते थे। वह विशालकाय अजनबी जिसके साथ वह यहाँ तक पहुँचे थे, बाहर ही रह गया था। उसकी अनुपस्थिति ने उन्हें थोड़ी-सी राहत दी थी। वह एक कोने में उस बल्ली से पीठ सटा कर बैठ गए थे जिसके सहारे वह झोपड़ी खड़ी थी। वहाँ बमुश्किल डूबते सूरज की टूटती किरणों के दो-एक तार जमीन पर गिर रहे थे। समय टूटती किरणों में धीरे-धीरे तैर रहा था। राघव थके हुए थे, पर भूख-प्यास और नीँद का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं था। लगभग एक-डेढ़ घंटे बाद वही नाटा आदमी एक हिंडॉलियम के कटोरे में गंदली दाल उनके लिए ले आया था। राघव ने कटोरा हाथ में तो ले लिया था, पर उनसे उसे मुँह से नहीं लगाया जा रहा था। तभी वह नाटा आदमी गुर्राया, 'अगर इसे नहीं पिएगा, तो यही दाल अपने जूते में डाल कर पिलाऊँगा, तुझे'। राघव ने उसके बाद उस दाल को पीने में जरा भी देर नहीं की थी। बाहर रात उतर चुकी थी, लगता था वह रात हमेशा-हमेशा के लिए धरती पर उतरी है। झोपड़ी में पूरी तरह अँधेरा हो गया था। राघव के लिए वह रात एक काली, लंबी सुरंग थी, जिसका दूसरा सिरा कहाँ है, पता ही नहीं चल रहा था, पर बाहर अब दिन जैसा सन्नाटा नहीं था। वहाँ से रुदन, चीत्कारों, ठहाकों और किलकारियों की मिली-जुली आवाजें आ रही थीं। उस शोर से बनते-बिगड़ते शब्द राघव जैसे एक भाषा विज्ञानी के लिए भी अबूझ थे, वहाँ पनप रहे समाज और संस्कृति की थाह पा पाना तो शयद किसी के लिए भी लगभग असंभव ही था, पर वहाँ एक बात, जो साफ समझी जा सकती थी वह यह थी कि यह समाज और सत्ता की तथाकथित मुख्यधारा से बहिष्कृत लोगों की एक बस्ती थी, जहाँ समाज और कानून जैस शब्द बेमानी थे, बस हवा में एक भयावह अराजकता तारी थी।

राघव को लगा था कि रात चाहे कितनी भी लंबी हो पर वह सो नहीं सकेंगे। वह ऐसे बैठे-बैठे ही रात काट देंगे, पर जब सुबह उसी नाटे आदमी ने उन्हें हिलाकर जगाया था, तभी उन्हें पता चला था कि उनके लाख चाहने पर भी वह रात में एक समय नींद की चपेट में आ ही गए थे। उन्हें यहाँ इस माहौल में अपने इस तरह सो जाने पर आश्चर्य हो रहा था, शायद उनके मन में किसी कवि की लिखी वे पंक्तियाँ तैर गई थी, जिनमें कहा गया था, 'नींद मनुष्य का, मनुष्य पर विश्वास है', पर यहाँ सब कुछ आदिम था, मूल आवश्यकताओं पर निर्भर, बिना किसी रियायत के जीवन अपने पूरे निर्मम रूप में उनके सामने था, पूरी तरह अनावृत।

सुबह होते ही उन्हें झोपड़ियों के झुरमुट से निकाल कर बाहर ले जाया गया था। अब वे उसी लंबी-चौड़ी कद-काठी के आदमी के साथ चल रहे थे, जो उन्हें यहाँ तक लेकर आया था। वह तेजी से चल सकें इसलिए उनकी आँखों पर पट्टी नहीं बांधी गई थी लेकिन उन्हें पीछे मुड़कर देखने की मनाही थी, पर आगे बढ़ते हुए उन्हें ऐसा आभास हो रहा था कि उनके पीछे दो-एक लोग और भी चल रहे हैं और उनमें से एक वह नाटा आदमी भी है जिसे उन्होंने अपना नाम, पता और फोन नंबर लिखकर दिया था। लगभग पौन घंटा पैदल चलने के बाद, वे एक पहाड़ी पर बने ऐसे खंडहर में पहुँचे थे, जो किसी मंदिर या महल के अवशेषों के रूप में उस पहाड़ी पर वीरान पड़ा था।

खंडहर के जिस हिस्से में जाकर वह रुके थे, वह उसकी दूसरी मंजिल पर जाने के लिए बनी सीढ़ी के नीचे बना हुआ कमरा था। इसमें बने एक तक्के से पहाड़ी के नीचे तक देखा जा सकता था। उस खंडहर में छुपने की सचमुच ही वह बहुत उपयुक्त जगह थी। ऊपर जाती हुई सीढ़ियों के नीचे एक खंडित मूर्ति पड़ी थी, जिसके चार हाथ थे, जिनमें से ऊपर के दो हाथों में शस्त्र थे, पर उसके नीचे के दोनो हाथ कटे थे। लगता था किसी ने बहुत क्रोध और घृणा में, किसी धारदार तलवार से उस मूर्ति के नीचे की ओर लटकते दोनो हाथ काट दिए थे। ऐसी खंडित प्रतिमाएँ राघव ने पहले भी कई बार संग्रहालयों में देखी थीं, पर आज उन्हें उसे देखकर अपने भीतर भी कुछ तेजी से कटता और चिरता हुआ मालूम हो रहा था। तभी उस विशालकाय आदमी ने घोषणा की थी, जिसका आशय राघव को यही समझ आया था कि उसके घर वालों को खबर कर दी गई है, जैसे वह अभी तक चुपचाप इन लोगों का कहा मानते आ रहे हैं, वैसे ही उनके घरवालों को भी इनके निर्देशों का पालन करना होगा। उसने साथ ही साथ इस बात के लिए भी उन्हें आगाह किया था कि यदि फिरौती की रकम यहाँ पहुँचने से पहले, मल्लीक सिंह के आदमी यहाँ आ गए, तो ऐसे हालात में उन्हें इन लोगों के साथ ही यहाँ से भागना होगा। हालाँकि उसने इस बात के लिए भी राघव को आश्वस्त किया था कि उनके पास मल्लीक सिंह के आदमियों का सामना करने के लिए पर्याप्त गोली-बारूद है और अगर वह मुठभेड़ के लिए कम पड़ता है तो उसके पास एक ऐसी बड़ी गोली है, जिसे प्रयोग करके वह मिनटों में यहाँ से निकल सकते हैं। उसकी इस बात से राघव ने भय और आश्वस्ति दोनो का एक साथ अनुभव किया था। तभी काले और नाटे आदमी ने खंडहर की छत की ओर देखते हुए कहा, 'हमाय पीछे सैं बस्तियन में आग लगौत फिर रै, इनकी पूरी कौम खौं काट डारें'। वह अभी आगे कुछ और कहता कि उसके साथ बैठे उससे अपेक्षाकृत पतले और लंबे आदमी ने कहा, 'तुम दोउ जने तौ जेल में हते, हमने एकौ पिलाट नईं बिकन दओ, ...सारे मल्लीक नगर ठाणौं कर रै, हमाई छाती पै'। उसकी बात समाप्त होने के बाद खंडहर में कुछ देर सन्नाटा रहा। सब एक साथ किसी आने वाले क्षण को शून्य में ताक रहे थे।

अब खंडहर में उपस्थित हर आदमी को उस एक क्षण का ही इंतजार था, जिसमें राघव के घर वालों को माँगी गई फिरौती की रकम को लेकर वहाँ पहुँचना था और उसके बाद राघव को छोड़ दिया जाना था।

राघव के लिए यह अपने चारों ओर अनायास ही उग आए इस डरावनी दुनिया से मुक्ति का क्षण होने वाला था। लंबी कद-काठी के, किसी खुरदुरी चट्टान से निष्ठुर दिखते आदमी के लिए और उसके साथ आए दोनो सहायकों के लिए के लिए शायद यह मल्लीक सिंह से पुरानी दुश्मनी निकालने का समय था, पर वे इसका इंतजार किसी रोजमर्रा के साधारण से काम के पहले के किसी बहुत ही मामूली क्षण तरह कर रहे थे। समय बहुत धीरे-धीरे बीत रहा था।

राघव को लग रहा था कि समय मोमबत्ती की लौ-सा आनायास बुझ जाने के भय से काँप रहा था। राघव ही क्या भय की हल्की-सी थरथराहट वहाँ की हवा में साँस लेने वाले हर आदमी के फेफड़ों में सुनी जा सकती थी। लगता था मृत्यु डैने फैलाए हर पल सिर पर मंडरा रही है। मानो समय अपनी ही अराजकता से आक्रांत था।

राघव के मन में तमाम आशंकाएँ तैर रही थीं, पर इस समय जैसे उसके अपहरणकर्ता उसे अपने संरक्षक लग रहे थे। उनके मन में उस आदमी की कही उस छोटी-सी बात ने बड़ा भरोसा पैदा कर दिया था कि उसके पास एक ऐसी बड़ी गोली है, जिससे वह सब किसी भी हालत में यहाँ से निकल सकते हैं।

राघव ने अभी वहाँ से एक बड़ी गोली के सहारे निकल जाने की बात सोची ही थी कि एक अदृश्य दिशा से चली गोली से खंडहर की जर-जर दीवार का सदियों पुराना चूने का पलस्तर झड़ गया। गोली की आवज सुनते ही नाटा आदमी अपने साथी को लेकर, कमरे से बाहर आकर, खंडहर में पड़ी खंडित मूर्ति के पीछे से बंदूक निकाल कर पहाड़ी के नीचे की ओर गोलियाँ चलाता हुआ भागा था। उसका साथी भी अपनी बंदूक लेकर खंडहर के दरवाजे की ओट में छुपकर खड़ा हो गया।

राघव जैसे उस अराजक समय में भारहीन तिनके से तिर रहे थे। कमरे से बाहर खुलने वाले तक्के से भारी भरकम देह वाला आदमी भी अपने तमंचे से गोलियाँ दाग रहा था। पाँच-सात मिनटों में उस खंडहर की दीवारें कई बार ऐसे काँपी थी मानो अभी भरभरा कर गिर पड़ेंगीं। धीरे-धीरे खंडहर से गोलियाँ चलनी बंद हो गई थीं।

राघव कमरे से बाहर देख रहे थे। उन्हें वहाँ से अब वे दोनो आदमी नहीं दिख रहे थे, जो लगातार खंडहर से गोली का जवाब गोली से ही दे रहे थे, उन्हें बस उस एक मूर्ति के सिवा कुछ भी नहीं दिख रहा था, जिसके ऊपर के हाथों में शस्त्र थे और नीचे के दोनों हाथ कटे थे। सचमुच ही ऊपर के बाजुओं से नीचे के हाथ परास्त हो गए थे। बाहर से अभी भी गोलियाँ चल रही थीं। शायद खंडहर में गोली-बारूद खत्म हो गया था।

राघव ने एक निरीह प्राणों के याचक की दृष्टि से, उस छ सवा छ फुट के विशालकाय आदमी की ओर देखा, फिर कुछ सोचकर गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'वो बड़ी गोली'।

उस अजेय से दिखने वाले आदमी ने, अपने कमर में बँधे थैले से बादामी रंग के कागज की एक पुड़िया निकाली, जिसमें सफेद रंग की दो बड़ी-बड़ी गोलियाँ थीं। उसने बिना कुछ कहे एक गोली अपने मुँह में रख ली और दूसरी राघव की ओर बढ़ा दी। राघव के मन में बैठी बड़ी गोली की धारणा भर भराकर ढहने लगी। गोली उनकी हथेली पर रखी थी। न जाने क्यूँ वह अब भी बड़ी उम्मीद से उसे देख रहे थे। पहली बार उस आदमी ने सामन्य लहजे में राघव से कहा, 'वे दर्जनों हैं, चारों तरफ हैं, ...उन्होंने हमारे चारों ओर एक नरक खड़ा कर दिया है, जब लड़ नहीं सकते, तो इस नरक से निजात पाने की यही आखरी दवा है।' यह कहते हुए वह दीवार का सहारा लेकर बैठ गया था। उसकी पलकें अब बहुत धीरे-धीरे झपक रही थीं। राघव भी घुटनों के बल जमीन पर बैठ गए।

राघव के एक हाथ में सफेद गोली थी, उसका असर वह उस आदमी के चेहरे पर देख रहे थे, अब वह पहले-सा क्रूर नहीं लग रहा था। उसके चेहरे की भयावहता कहीं खो गई थी, मांसपेशियाँ शिथिल हो गई थीं। उन्हें उसका धीरे-धीरे जाना उस खंडहर से जीवन की आस का जाना लग रहा था, उन्हें उसका जाना धरती से संघर्ष का जाना लग रहा था। राघव को उसका मरना स्वयं का मरना लग रहा था।

उनकी दृष्टि हाथ पर रखी गोली पर थी और उनके कान गालियाँ बकते, गोलियाँ चलाते खंडहर की ओर बढ़ते मल्लीक सिंह के आदमियों के आक्रांत करने वाले कोलाहल पर लगे थे। दूर कहीं नीचे से गहरा धुआँ उठ रहा था। शायद इस संघर्ष में फिर किसी बस्ती में आग लगा दी गई थी।

वह सोच रहे थे यहाँ से निकलने का, क्या कोई और रास्ता भी है?


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