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कविता

ग्लोबलाइजेशन
हेमधर शर्मा


खुश होता था कभी
ग्लोबलाइजेशन के नाम से
इसी के तो देखता था
सपने साहित्य में
दुनिया सब एक हो
सबमें हो भाई-चारा
करें सब विकास मिल।
लेकिन मैं ठगा गया
नाम तो वही था पर
छद्म वेश धारण कर
कोई और आ गया।
करता ही जा रहा यह
हत्याएँ गाँवों की
नष्ट कर सब संस्कृतियाँ
अपने ही पैर यह

फैलाए जा रहा
अरे, कोई मारो इसे
यह तो हत्यारा है!
नष्ट करता जा रहा
खेत-खलिहानों और
गाँवों-जवारों को।

सुनता पर कोई नहीं चीख मेरी
शामिल हैं लोग उसके साथ सब
लड़ते हैं गुरिल्ला जो
लैस वे भी दीखते हैं
उसी के हथियारों से।


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