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कविता

सपने में आतंकवादी
हेमधर शर्मा


पता नहीं वे नक्सली थे या आतंकवादी,
मेरी पांडुलिपियों से भरी पेटी की
तलाशी ले रहे थे।
वे खुद नहीं ले रहे थे
बंदूकें भी उनके हाथ में नहीं थीं
पर कंधे के पीछे झुकी आँखें
उस देश के सम्माननीय कवि के नाते
मेरे प्रति बरते जा रहे उनके सम्मान को
ढोंग साबित कर रही थीं।
अब याद आया -
वह इराक था और वे अमेरिकी सैनिक।
मेरी पेटी में वे किसी इनामी आतंकवादी का
कोई ऐतिहासिक वक्तव्य ढूँढ़ रहे थे।
बड़ा बवाल उठाया था उन्होंने उस वक्तव्य पर
लेकिन शर्मनाक था यह
कि पूरे देश की तलाशी के बावजूद
वे उसकी एक भी प्रति ढूँढ़ नहीं पाए थे।
मैं उस आतंकवादी से इत्तफाक नहीं रखता था
और जानता था कि ऐसी कोई बरामदगी
मेरी पेटी से असंभव है
पर उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था
मेरे हाथों से झपटते हुए
करीब-करीब सारी पांडुलिपियाँ
वे तार-तार किए दे रहे थे।
आखिर जब झल्ला कर
पेटी ही सौंप दी मैंने उन्हें
तो उतर आए वे असली रूप पर
और गुर्राते हुए बंदूक उठा ली।
उस आतंकवादी की बनिस्बत
इन सफेदपोश रक्षकों को देख
मेरी कँपकँपी छूट रही थी

और नींद खुलने के बाद
यह जानते हुए भी कि वह स्वप्न था
मैं अपनी कविताओं की चिंदियों को
चारों तरफ टटोल रहा था।


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