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कविता

रामकिशुन की खोज बनाम एक आदमी के गायब होने की उत्तर-कथा
विशाल श्रीवास्तव


मैं रामकिशुन को उतना ही जानता था
जितना बादलों को जानते हैं समुद्र
दिन भर सामने रहने और परछाईं ढोने के बाद भी
कभी नहीं छू पाते उनके मुलायम रेशों को
फिलहाल, रामकिशुन खो गया है
और मैं उसे उस फोटो के सहारे ढूँढ़ रहा हूँ
जो हमने एकसाथ खिंचवाया था
नुमाइशी स्टूडियो के धाँसू रंगीन पर्दे के सामने
 
चले जाने के बाद आदमी छोड़ जाता है
बुरे और गैर जरूरी अंदेशों के साथ 
कुछ चमत्कारिक कल्पनाएँ
रामकिशुन के असमय पलायन पर 
मुझे बुद्ध याद आते हैं
और मैं उसकी बीवी और बच्ची के चेहरों पर
गंभीर और अनासक्त चुंबन तलाशता हूँ
वहाँ मुझे ठहरी और जमी हुई उदासी दिखती है
और किसी सघन विलाप के लिए बची हुई जगह
 
सहमी हुई उसकी बच्ची पूरी तन्मयता से 
रोज एक कत्थई फूल काढ़ती है चादर पर
मैं एक कत्थई जंगल के बारे में सोचता हूँ
जो हो सकता है आदमियों के इस जंगल से बेहतर हो
जहाँ किसी के कंधों पर सिर रखकर
समूचेपन से हम बहा सकें अपना दुख
और उसे अपनी कमीज के खराब होने की परवाह न हो
 
पास की फैक्ट्री में काम करता था रामकिशुन
यूँ उसे ठीक-ठीक कामरेड भी नहीं कह सकते
मैंने कभी नहीं देखा उसकी सिगरेट से उठता लाल धुआँ
फिर भी मैंने फोन मिलाए 
तमाम पार्टियों के जर्जर दफ्तरों में
और निराश उत्तरों को अवसाद की तरह सुना
 
इधर कुछ दिनों से 
मैं एक भयानक सपना देख रहा हूँ
कि अँधेरे मगर प्रशस्त राजपथ पर 
एक मशाल जुलूस चला आ रहा है
जिसमें नायक की तरह शामिल है रामकिशुन 
वह मुझे देखकर ठिठकता है
भावहीन आवाज में फुसफुसाता है मुझसे
जाओ और जाकर गाढ़ी नींद हासिल करो
क्योंकि जिनके दिमाग में विचार 
किसी कीड़े की तरह रहता है
जो कभी सोते नहीं, जागते रहते लगातार
वे अकसर गायब हो जाते हैं
इस दिनरात चमकती और चुँधियाती
बदगुमान दुनिया के नीरव अँधेरे में
 

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