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कविता

वो आई
विशाल श्रीवास्तव


वो आई
उसके आने ने जैसे 
रात के आसमान में फेंका कंकड़
खिड़की के आकाश में 
पहले चाँद थरथराया
फिर जल काँपा आसमान का
फिर एक एक करके झिलमिलाए तारे
सबने कहा देखो वो आई
 
उसके आने से जागा मेरे कमरे का अँधेरा
उसकी तांबई रंगत से खुश हुआ दरवाजा
खुश हुए मेरे गंदे कपड़े और जुराबें
खिल उठीं बेतरतीब किताबें
सब खुसफुसाए - वो आई
 
वो आई मेरे मनपसंद पीले कपड़ों में
जिनके हरेक तंतु की गंध मुझे परिचित
मैंने जैसे कपड़ों से कहा - बैठो
कपड़े बैठे - वो बैठी
 
जैसा कि उसकी आदत है, उसने कहा
कि मन नहीं लगता मेरे बिना उसका
जीना असंभव है
उसने कहा - मैंने सुना
 
फिर
मैंने कहा - बीत गया है अब सब कुछ
मैंने कहा - उसने सुना
 
उसने कहा - बीतना भूलना नहीं होता
दर्द को सम्मिलित करना होता है जीवन में
मैंने कहा दर्द - हाँ दर्द कहाँ बीतता है
सिर्फ हम बीतते हैं थोड़ा-थोड़ा समय के साथ
वह थोड़ा और उदास हुई 
गीली हो गईं उसकी आँखें
आखिर वह उठी
मैंने उठते हुए देखा पीले कपड़ों को
मैंने देखा पीले कपड़ों को जाते हुए 
 
काँपना बंद हुआ आसमान का
सो गया फिर से कमरे का अँधेरा
दुखी हुए कपड़े और जुराबें
दुखी हुआ दरवाजा
इस बार 
सब जैसे चीखकर बोले 
वो गई - वो गई - वो गई 
 
मैंने सिगरेट सुलगाई 
और आहिस्ते से कहा 
जाने दो
 

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