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कविता

केशव अनुरागी
मंगलेश डबराल


ढोल एक समुद्र है साहब केशव अनुरागी कहता था 
इसके बीसियों ताल हैं सैकड़ों सबद 
और कई तो मर-खप गए हमारे पुरखों की ही तरह 
फिर भी संसार में आने और जाने के अलग-अलग ताल साल 
शुरू हो या फूल खिलें तो उसके भी अलग 
बारात के आगे-आगे चलती इसकी गहन आवाज 
चढ़ाई उतराई और विश्राम के अलग बोल 
और झोड़ा चांचरी पांडव नृत्य और जागर के वे गूढ़ सबद 
जिन्हें सुनकर पेड़ और पर्वत भी झूमते हैं अपनी-अपनी जगह 
जीवन के उत्सव तमाम इसकी आवाज के बिना जीवनहीन 
यह जितना बाहर बजता है उतना अपने भीतर भी 
एक पाखे से फूटते बोल सुनकर बज उठता है दूसरे पाखे का कोई ढोल 
बतलाता उस तरफ के हालचाल 
देवताओं को नींद से जगाकर मनुष्य जाति में शामिल करता है 
यह काल के विशाल पर्दे को बजाता हुआ
और जब कोई इस संसार से जाता है 
तो मृत्यु का कातर ढोल सुनाई देता है 
दूर-दूर से बुला लाता लोगों को 
शवयात्रा में शामिल होने के लिए
 
लोग कहते थे केशव अनुरागी ढोल के भीतर रहता है 
ढोल सागर के भूले-बिसरे तानों को खोजनेवाला बेजोड़ गायक 
जो कुछ समय कुमार गंधर्व की संगति में भी रहा 
गढ़वाल के गीतों को जिसने पहुँचाया शास्त्रीय आयामों तक 
उसकी प्रतिभा के सम्मुख सब चमत्कृत 
अछूत के घर कैसे जन्मा यह संगीत का पंडित 
और जब वह थोड़ी पी लेता तो ढोल की तानों से खेलता गेंद की तरह 
कहता सुनिए यह बादलों का गर्जन 
और यह रही पानी की पहली कोमल बूँद 
यह फुहार यह झमाझम बारिश 
यह बहने लगी नदी 
यह बना एक सागर विराट प्रकृति गुंजायमान 
लेकिन मैं हूँ अछूत कौन कहे मुझे कलाकार 
मुझे ही करना होगा 
आजीवन पायलागन महराज जय हो सरकार
 
बिना शिष्य का गुरु केशव अनुरागी 
नशे में धुत्त सुनाता था एक भविष्यहीन ढोल के बोल 
किसी ने नहीं अपनाई उसकी कला 
अनछपा रहा वर्षों की साधना का ढोल सागर 
इस बीच ढोल भी कम होते चले गए हमारे गाँवों में 
कुछ फूट गए कुछ पर नई पूड़ें नहीं लगीं 
उनके कई बाजगी दूसरे धंधों की खोज में चले गए 
केशव अनुरागी 
मदहोश आकाशवाणी नजीबाबाद की एक कुर्सी पर धँसा रहा 
एक दिन वह हैरान रह गया अपने होने पर 
एक दिन उसका पैर कीचड़ में फँस गया 
वह अनजाने किसी से टकराया सड़क पर 
एक दिन वह मनुष्यों और देचताओं के ढोल से बाहर निकल गया
अब वह रहता है मृत्यु के ढोल के भीतर

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