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कविता

घर शांत है
मंगलेश डबराल


धूप दीवारों को धीरे धीरे गर्म कर रही है
आसपास एक धीमी आँच है
बिस्तर पर एक गेंद पड़ी है
किताबें चुपचाप हैं
हालाँकि उनमें कई तरह की विपदाएँ बंद हैं
 
मैं अधजगा हूँ और अधसोया हूँ
अधसोया हूँ और अधजगा हूँ
बाहर से आती आवाजों में
किसी के रोने की आवाज नहीं है
किसी के धमकाने या डरने की आवाज नहीं है
न कोई प्रार्थना कर रहा है
न कोई भीख माँग रहा है
 
और मेरे भीतर जरा भी मैल नहीं है
बल्कि एक खाली जगह है
जहाँ कोई रह सकता है
और मैं लाचार नहीं हूँ इस समय
बल्कि भरा हुआ हूँ एक जरूरी वेदना से
और मुझे याद आ रहा है बचपन का घर
जिसके आँगन में औंधा पड़ा मैं
पीठ पर धूप सेंकता था
 
मैं दुनिया से कुछ नहीं माँग रहा हूँ
मैं जी सकता हूँ गिलहरी गेंद
या घास जैसा कोई जीवन
मुझे चिंता नहीं
कब कोई झटका हिलाकर ढहा देगा
इस शांत घर को।
 

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