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कविता

कविताएँ
प्रियंकर पालीवाल


प्रतीत्य समुत्पाद
सब से बुरा दिन
तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो
प्रेम पत्र
महास्वप्न
इक्कीसवीं सदी की रथयात्रा

वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि
मेरा दुख
जिसे तुम सपना कहती हो और मैं भविष्य
कहता है गुरु ग्यानी
अटपटा छंद
कृतज्ञ हूँ मैं भी



प्रतीत्य समुत्पाद

भाषा चाहिए, संस्कृति नहीं
पूँजी चाहिए, संस्कृति नहीं
बहुराष्ट्रीय बाज़ार चाहिए, संस्कृति नहीं
भूमंडलीकृत व्यापार चाहिए, संस्कृति नहीं

पैंट के साथ कमीज चाहिए
कमीज के साथ शमीज
आकाश को मापने का हौसला चाहिए
इस महामंडी में मिल सके तो

चाहिए पृथ्वी पर मनुष्य की तरह
रहने की थोड़ी-बहुत तमीज

सकल भूमंडल की विचार-यात्रा के लिए
चाहिए एक यान - हीन या महान
प्रतीत्य समुत्पाद की समकालीन व्याख्या के लिए
एक अदद बुद्ध चाहिए

करघे पर बैठा कबीर व्यस्त हो
तो शायद कुछ काम आ सके
चरखेवाला काठियावाड़ी मोहनदास
आभासी यथार्थ की दुनिया में
बहुत मुश्किल है समझना प्रतीत्य समुत्पाद ।

.

सब से बुरा दिन


सब से बुरा दिन वह होगा
जब कई प्रकाशवर्ष दूर से
सूरज भेज देगा
' लाइट ' का लंबा-चौड़ा बिल

यह अँधेरे और अपरिचय के स्थायी होने का दिन होगा
पृथ्वी मांग लेगी
अपने नमक का मोल
मौका नहीं देगी

किसी भी गलती को सुधारने का
क्रोध में काँपती हुई कह देगी
जाओ तुम्हारी ली ज खत्म हुई
यह भारत के भुज बनने का समय होगा

सबसे बुरा दिन वह होगा
जब नदी लागू कर देगी नया विधान
कि अब से सभ्यताएँ
अनुज्ञापत्र के पश्चात ही विकसित हो सकेंगी

अधिकृत सभ्यता-नियोजक ही
मंजूर करेंगे बसावट और
वैचारिक बुनावट के मानचित्र
यह नवप्रवर्तन की नसबंदी का दिन होगा

भारत और पाकिस्तान के बीच
विवाद का नया विषय होगा
सहस्राब्दियों से बाकी
सिंधु सभ्यता के नगरों को आपूर्त

जल के शुल्क का भुगतान
मुद्रा कोष के सँपेरों की बीन पर
फन हिलाएँगी खस्ताहाल बहरी सरकारें
राष्ट्रीय गीतों की धुन तैयार करेंगे

विश्व बैंक के पेशेवर संगीतकार
आर्थिक कीर्तन के कोलाहल की पृष्ठभूमि में
यह बंदरबाँट के नियम का अंतरराष्ट्रीयकरण होगा
शास्त्र हर हाल में

आशा की कविता के पक्ष में है
सत्ता और संपादक को सलामी के पश्चात
कवि को सुहाता है करुणा का धंधा
विज्ञापन युग में कविता और ' कॉपीराइटिंग ' की

गहन अंतर्क्रिया के पश्चात
जन्म लेगी ' विज्ञ कविता '
यह नई विधा के जन्म पर सोहर गाने का दिन होगा
सबसे बुरा दिन वह होगा

जब जुड़वाँ भाई
भूल जाएगा मेरा जन्म दिन
यह विश्वग्राम की
नव-नागरिक-निर्माण-परियोजना का अंतिम चरण होगा।

तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो

भले किसी और की हो जाएँ
ये गहरी काली आँखें
वे सितारे मेरी स्मृति के अलाव में
रह-रह कर चमकते रहेंगे जो

उस छोटी-सी मुलाकात में
चमके थे तुम्हारी आँखों में

भटकाव के बीहड़ वन में
वे ही होंगे पथ-संकेतक
गहन अँधियारे में
दिशासूचक ध्रुवतारा

तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो
अभौतिक अक्षांशों के
अलौकिक फेरे

संभव नहीं हैं तुम्हारे बिना
जीवन लालसा के तट पर
हाँफते रहने का नाम नहीं
किंतु अब निर्वाण भी

प्राथमिकता में नहीं है
मोक्ष के बदले
रहना चाहता हूँ
तुम्हारी स्मृति के अक्षयवट में

पर्णहरित की तरह
स्नेह की वह सुनहरी लौ
नहीं चाहता - नहीं चाहता
वह बेहिसाब उजाला

अब तुम्हें पाने की
कोई आकांक्षा शेष नहीं
जगत-जीवन के
कार्य-व्यापार में

प्रेम का तुलनपत्र
अब कौन देखे !
अपने अधूरे प्रेम के
जलयान में शांत मन

चला जाना चाहता हूँ
विश्वास के उस अपूर्व द्वीप की ओर

जहाँ मेरी और तुम्हारी कामनाओं
के जीवाश्म विश्राम कर रहे हैं ।

प्रेम पत्र

कागज की नाव पर
सवार, चले आते हैं
तुम्हारे शब्द
नि:शब्द !

सुबह की उजली
नर्म धूप की तरह
मन के आँगन में
उतर आता है

तुम्हारा स्नेह
कुछ यूँ कि
जैसे झरते हों
रजनीगंधा के सूखे फूल

आहिस्ता से
फूल शुभकामना के
जिन्हें तुम
भेजती हो धड़कते हृदय से

मैं भी स्वीकारता हूँ
कँपकँपाती अँजुरियों से ही
स्वीकार्य के बाद ही
तो आती है वह शक्ति

जिसके लिए विख्यात हैं
मनु के वंशज
स्नेह का स्वीकार्य
ही तो हर सकता है

जीवन के सब
दाह दंश पीड़ा और शूल
स्नेह का स्वीकार्य ही तो
सिखा सकता है

बहना धारा के प्रतिकूल
आज समझा हूँ
अभिव्यक्ति की
इस सच्चाई को

कि क्षण चाहे अजर-अमर
न भी हों
पूर्ण होते हैं
सेतु चाहे कागज के हों
महत्वपूर्ण होते हैं ।

जब सब कुछ सीमाओं में कैद हो
तब भी आ सकते हैं
बिना किसी पारपत्र के
मेरे ठोस शब्दों के उत्तर में
तुम्हारे वे तरल शब्द

मेरे जटिल प्रश्नों के उत्तर में
तुम्हारे वे सरल शब्द ।



महास्वप्न

कुछ सुना तुमने
प्यार की हवाओं ने अब रुख बदल लिया है
स्नेह की नदी अब अपने चतुष्कोणीय प्रवाह के साथ
हमारी ओर मुड़ चली है
खेतों में प्यार की फसल लहलहा रही है

कुछ सुना तुमने
जमीन की तासीर बदल गई है
अब कुछ भी बोओ फसल प्यार की ही उगेगी
स्नेह रक्तबीज बन गया है

अब से वृक्षों की किस्में नहीं होंगी
केवल स्नेह के बिरवे ही रोपे जायेंगे
किसी ने हवा-पानी सब में स्नेह घोल दिया है
राजहंस अब स्नेह की लहरों पर ही तैरेंगे

सोनपाखी प्यार में ही उड़ान भरेंगे
और प्यार ही गाया करेंगे

कुछ सुना तुमने
स्नेह की नदी ने मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे को माँज दिया है
पंचनदों में स्नेह का उफान है गंगोत्री अब स्नेह की गंगोत्री है
और भारत है स्नेह का प्रायद्वीप

कुछ सुना तुमने
सारे अवरोधक बाँध तोड़ चुका है स्नेह
गाँव-गली घर-आँगन चौबारे स्नेह से पगे हैं
स्नेह का ज्वार वृक्ष की सबसे ऊँची फुनगी से होता हुआ

मस्जिद की मीनार और मंदिर के कलश को डुबो चुका है
बुजुर्गोँ की कहनूत है ऐसा ज्वार
पहले कभी नहीं देखा
ये हो क्या रहा है ?
सब अचरज में हैं
वातावरण में बारूद की नहीं चंदन की महक है
लालिमा अब रक्त की नहीं गुलाल की है लाज की है

बन्दूकें अब स्नेह की बौछार कर रही हैं
बच्चे पिचकारियों और बन्दूकों में फर्क भूल गए हैं
कुछ सुना तुमने
स्नेह की भाषा यौवन पर है

स्नेह से सराबोर सब सकते में हैं
स्नेह का वेगवान प्रवाह
तोड़ चुका है छंदों के बंधन
सारे कवि स्तब्ध हैं सुख की अतिशयता से

बह चली है त्रिवेणी
काव्य की स्नेह की सुख की
कुछ सुना तुमने
अब मानव स्वर्ग का आकांक्षी नहीं

देवताओं में जन्म लेने की होड़ है
कुछ सुना तुमने
अब मैं युगदृष्टा हो गया हूँ
सामान्य जन नहीं, मसीहा हूँ प्रेम का ।



इक्कीसवीं सदी की रथयात्रा

भेड़िये
अब धम्मम् शरणम् गच्छामि
का जाप करते हुए
नगर के प्रवेशद्वार तक आ पहुँचे हैं

अनुरोध के अनुसार
पहला समागम
मेमनों के मोहल्ले में ही होगा
- अरे नहीं ! डर कैसा ?

देखते नहीं उनका पवित्र पीताम्बर शुभ्र यज्ञोपवीत
हवा की बेलौस चाल में
पताका-सी फहराती रामनामी
अमन का राग गाती स्निग्ध वाणी

कैसा दिव्य आलोक है
मुखमंडल पर
ओह ! कैसा तेजोमय रूप है
धन्य भाग ! धन्य भाग !

आचार्य श्री के
दिवराला-समागम में दिए गए
प्रवचन का ही तो पुण्य प्रताप है
कि दिल्ली से दमिश्क तक
दिवराला विख्यात है

यहाँ भी महिलाओं हेतु
पृथक व्यवस्था है
आचार्य जी को भान है कि
भारत एक गरीब मुल्क है

अत: घृत व समिधा की व्यवस्था
'पहले आओ - पहले पाओ'
के आधार पर निःशुल्क है
पूज्यपाद का उद्घोष है कि वे

' विशुद्ध आदिम धर्म को आस्था का केन्द्र बनायेंगे'
सम्राट की ओर से सूचना -
' इक्कीसवीं सदी के रथारोही अब वाया दिवराला जायेंगे ।'


वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि

मैं हाशिये का कवि हूँ
मेरी आत्मा के राग का आरोही स्वर
केन्द्र के कानों तक नहीं पहुँचता
पर पहुँच ही जाते हैं मुझ तक

केन्द्र की विकासमूलक कार्य-क्रीड़ाओं के अभिलेख
केन्द्र के अपने राजकीय कवि हैं
- प्यारे 'पोएट लॉरिएट'
केन्द्रीय मह्त्व के मुद्दों पर

पूरे आभिजात्य के साथ
सुविधाओं का अध्यात्म रचते
जनता के सुख-दुख की लोल लहरों से
यथासंभव मिलते-बचते

हाशिए के इस अनन्य राग के
विलंबित विस्तार में
मेरे संगतकार हैं
जीवन के पृष्ठ प्रदेश में

करघे पर कराहते बीमार बुनकर
राँपी टटोलते बुजुर्ग मोचीराम
गाड़ी हाँकते गाड़ीवान
खेत गोड़ते-निराते

और निःशब्द
उसी मिट्टी में
गलते जाते किसान
मेरी कविता के ताने-बाने में गुँथी है

उनकी दर्दआमेज दास्तान
दादरी से सिंगूर तक फैले किसानों का
विस्थापन रिसता है मेरी कविता से
उनके दुख से भीगी सड़क पर

मुझसे कैसे चल सकेगी
एक लाख रुपये की कार
निजीकरण और मॉलमैनिया के इस
मस्त-मस्त समय में

देरी दूरी और दहशत के बावजूद
सार्वजनिक वाहन के भरोसे बैठे
हाशिये के कवि को
अपने पैरों पर भरोसा
नहीं छोड़ना चाहिए ।

मेरा दुख

मैं सिंगूर पर दुखी नहीं हूँ
मैं दुखी हूँ
इस देश के शरीर पर
फोड़ों की तरह उगते सिंगूरों पर

मेरी चिंता का विषय है
इस कृषिप्रधान देश का सिंगूरीकरण
कटहल-कौहंड़े वाले इस देश का अंगूरीकरण
अब दुआ से नहीं बचेगा मरीज

पर यह भी तो नहीं मालूम
दवा से होगा कुछ लाभ
या शल्य चिकित्सा से ही
संभव हो सकेगा रोग का उपचार ।

 

जिसे तुम सपना कहती हो और मैं भविष्य

नहीं होगी पुरखों के
पसीने से नम
यह भूमि
उर्वरा माटी

की सोंधी गंध
बढ़ती ही जायेगी सागर की बेचैनी
छटपटाहट के ज्वार में
हो जायेगा निर्बंध

न कहीं कोई घाट होगा न तट
न कोई कुंज गली न वंशीवट
नदियाँ हो जाएँगी
खारे पानी की झील

दूर-दूर तक नहीं होगी
आश्वस्ति की किरण
एक छोटी-सी कंदील
ग्राम वधुओं के आर्त स्वर

टेर रहे होंगे
मीठे पानी की स्मृतियों
में ऊभचूभ होते करुण गीत
थमने-थमने को होगा

जीवन का संगीत
नहीं रहेंगे ये सदाबहार वन
दहाड़ते शेर चहचहाते पँखेरू
मगन मन नाचते मोर

औचक चले जाएँगे
थम जाएगा यह स्पंदनकारी शोर
मिट जाएँगे अनगिन
सुंदर जीवन-रूप पृथ्वी हो जाएगी और विपन्न

पहले से ज्यादा अकेली
पहले से ज्यादा कुरूप
जो जान नहीं जाए
सार्वभौम तापन की प्रक्रिया

जिन्होंने नहीं समझा
ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव
नहीं करेगी रियायत
उनके साथ भी

ओजोन की छीजती परत
लगातार क्रूर होता
मौसम का स्वभाव
सबसे पहले जाएँगे वे ही

सबसे कम देखी है जिन्होंने दुनिया
अभी-अभी ही खोली हैं आँखें
नहीं झेली हैं समय की
कड़वी सच्चाइयाँ

उड़ान के लिए
आकुल हैं जिनकी पाँखें
फॉसिल ईंधन की ही तरह
जल जाएँगे जीवन मूल्य

पलक झपकते राख
हो जाएगी सारी ऊर्जा

ग्लेशियर हो जाएगा मनुष्य
भविष्य के माथे पर लिखी होगी तेजाबी वर्षा

मृत्यु के खिलाफ कोई
स्थगन आदेश नहीं है अज्ञान
कोई बहाना नहीं स्वीकारेंगे
मृत्यु के लंबे सर्द हाथ
ज्ञानी और मूढ़ जाएँगे

एक ही रास्ते एक ही साथ
मैं कैसे कहूँ
सुलगते ज्वालामुखी के
दाँतों में फँसी है
हमारी यह दु्निया

जिसमें तुम हो मैं हूँ
वह नन्हा बिरवा है
जिसे तुम सपना कहती हो
और मैं भविष्य ।



कहता है गुरु ग्यानी

वे कहते हैं
कविता को प्रकाश-स्तंभ
की तरह होना चाहिए
एक सच्चे सार्वभौम

विचार को क्रांति का
बीज बोना चाहिए
कहाँ है सागर
किस ओर से आते हैं जहाज

उन्हें नहीं पता
किस दिशा में है शत्रु
वे नहीं बताते
वे जिनके कटोरदान
में बंद है
हमारी उपजाऊ धरती
जो हवा की बीमारी

के कारक हैं
अनापत्ति प्रमाणपत्र
लहराते हुए हाजिर हैं
एक बेहतरीन योजना

के साथ नदी के पाट को
चिकनी-चौड़ी सड़क में
कैसे बदला जाए
पैसे और प्रौद्योगिकी को

बहँगी में लादे फेरीवाले
गली-गली घूम रहे हैं
एक से एक कारगर योजनाएँ
वाजिब दाम पर उपलब्ध हैं


तमाम बुद्धिजीवी,
प्रौद्योगिकीजीवी, परजीवी इन बाजारचतुर
नवाचारियों की दक्षता पर मुग्ध हैं
दुलहिनें लगातार मंगलाचार गा रही हैं

खबर है
जब हिंद और
प्रशांत महासागर
कचरे से पट जाएँगे
बहुत कम लागत में

अमेरिका तक
सड़क यातायात संभव होगा
गर्म कोलतार में
पैसे की गंध सूँघते
लकड़सुँघवे लड़ रहे हैं

यह कारों की बंपर फसल
का ऐतिहासिक क्षण है ।
एक जादुई भाषा में
बाइबल की तर्ज पर

वायबल-वायबल
जैसा कोई मंत्र बुदबुदाते हुए
जब वे 'गरीबी की संस्कृति'
के खिलाफ कुछ बोलते हैं

'सांस्कृतिक गरीबी' के
कई पाठ खुलते हैं
सुविधाओं में सने संत उच्चार रहे हैं
पृथ्वी और नदी को
माँ कहना चाहिए

सरस्वती के स्मरण मात्र से
जैसे आह्लादित होता था
ऋग्वैदिक ऋषि कुछ
वैसी ही खुशी का

इजहार करना चाहिए
पल-पल बदलती
पटकथा वाले इस नाटक में
एक कवि की क्या भूमिका हो सकती है

साइक्लोप्स अनगिनत आँखों से
घूर रहा है अँधेरा बढ़ चला है
धुंध और धुएँ से भरे समय में
प्रत्यंचा-सी तनी है कविता ।



अटपटा छंद

भारतवर्ष उदय
भारतीयता अस्त
रोयाँ-रोयाँ कर्जजाल में
नेता-नागर मस्त

ब्रह्मज्ञानी बिरहमन
इश्क-दीवाना दरवेश
बाजार का बाना
साधू का वेश

जनेऊ से कमर का खुजाना
मोरछल से लोबान का उड़ाना
मोबाइल पर नए क्लाइंट से बतियाना
जगत सत्यं ब्रह्म मिथ्या

घृतम पिवेत ऋणम कृत्वा
उधार प्रेम का फेवीकोल
बीच बजरिया हल्ला बोल
द ग्रेट इंडियन शादी-बाज़ार

कन्या में डर
माथे पर प्राइस टैग
सजे-धजे वर
बनी की अंखियाँ सुरमेदानी

बनी का बाप कुबेर
थाम हाथ में स्वर्ण-पादुका
दूल्हे को ले घेर

नदिया गहरी
नाव पुरानी
बरसे पैसा
नाच मोरी रानी

बीच भँवर में बाड़ी
बाड़ी में बाजार
चौराहे पर चारपाई
आँगन में व्यापार

अपलम-चपलम गाड़ी
बैकसीट पर प्यार
माया ठगिनी रूप हजार
लंपट तेरी जयजयकार

आजा मेरे सप्पमपाट
मैं तनै चाटूँ तू मनै चाट
देवल चिने अजुध्या नगरी
मन का मंदिर सूना

घट-घट वासी राम के
अंतर को दुख दूना ।


 

कृतज्ञ हूँ मैं भी

कृतज्ञ हूँ मैं भी
जैसे आसमान की कृतज्ञ है पृथ्वी
जैसे पृथ्वी का कृतज्ञ है किसान
कृतज्ञ हूँ मैं भी
जैसे सागर का कृतज्ञ है बादल

जैसे नए जीवन के लिए
बादल का आभारी है नन्हा बिरवा
कृतज्ञ हूँ मैं भी
जिस तरह कृतज्ञ होता है

अपने में डूबा ध्रुपदिया
सात सुरों के प्रति
जैसे सात सुर कृतज्ञ हैं
सात हजार वर्षों की काल-यात्रा के

कृतज्ञ हूँ मैं भी
जैसे सभ्यताएँ कृतज्ञ हैं नदी के प्रति
जैसे मनुष्य कृतज्ञ है अपनी उस रचना के प्रति
जिसे उसने ईश्वर नाम दिया है।

 


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हिंदी समय में प्रियंकर पालीवाल की रचनाएँ