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कविता

उसे देखा
लाल्टू


खिलने को जन्मा
दिन
मुर्झाता मैंने देखा
उसे देखा
दिन
खिलने को जन्मा

दिन जन्मा
एक बार फिर मैं जन्मा
उसे देखा
देखा चराचर
खिल रहे
अपने-अपने दुखों में बराबर
दिन खिलता
रोता मैंने देखा
दिन
खिलने को जन्मा.

कृति ओर(2009)


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हिंदी समय में लाल्टू की रचनाएँ