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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 2
संपूर्ण कविताएँ - 2

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम कविताएँ (ऐसा कोई घर आपने देखा है - 1986) पीछे     आगे

               कौन खोले द्वार

सचमुच के आये को
कौन खोले द्वार!
हाथ अवश
नैन मुँदे
हिये दिये
पाँवड़े पसार!
कौन खोले द्वार!
तुम्हीं लो सहास खोल
तुम्हारे दो अनबोल बोल
गूँज उठे थर थर अन्तर में
सहमे साँस
लुटे सब, घाट-बाट,
देह-गेह
चौखटे-किवार!
मीरा सौ बार बिकी है
गिरधर! बेमोल!
सचमुच के आये को
कौन खोले द्वार!

                 जहाँ सुख है

जहाँ सुख है
वहीं हम चटक कर
टूट जाते हैं बारम्बार
जहाँ दुख है
वहाँ पर एक सुलगन
पिघला कर हमें
फिर जोड़ देती है।
                 
                   कुछ चीज़ें होती हैं जो

कुछ चीज़ें होती हैं जो
जहाँ तक जाती हैं वहीं तक जाती हैं।
उनसे
आगे कोई द्वार नहीं खुलते।
कुछ चीजें
होती हैं जो कहीं नहीं जातीं
न कहीं ले जाती हैं
पर जिन से द्वार
खुलते हैं
और खुलते जाते हैं
और हम उनके पार
होते जाते हैं।
इतनी दूर कि कभी सहम कर
लौटने को भी हो आते हैं
पर वहाँ से जो होता है लौटना नहीं होता :
नयी यात्रा होती है
मुड़ कर, थम कर
बिलम कर, रम कर।

                 तुम मत बोलना

मालती की गन्ध
बोलेगी तुम अभी मत बोलना
कह गया है जो पपीहा
उस व्यथा की परत तुम मत खोलना
सुना जो वही तो यह उमगता है
नहीं कहते-कह न पाते!-वही भीतर सुलगता है
कसमसाती उमस यह-तुम भी इसी में
उमड़ता अनल-रस घोलना
उठेगी उस में लहर फिर
तुम उसी पर दोलना-
मत बोलना! मत बोलना!

                 कभी कभी

दिन जो रोज़ डूबते हैं
बीतते हैं
कभी कभी
घड़े जो रोज़ छलकते, रीतते हैं
भरते हैं

                कभी कभी

नियति जो बारती है लाखों घड़ी-घड़ी
देती है दमड़ी भर दान
कभी कभी
मैं जो मानता हूँ कि अपने को ख़ूब जानता हूँ
पाता हूँ अपनी ही पहचान
कभी कभी
मैं ने लिखा बहुत तुम्हारे लिए
पर सचाई की तड़प में किया याद
कभी कभी
पागल तो हूँ, सदा रहा तुम्हारे लिए
पाया पर वासना से परे का उन्माद
कभी कभी।

               गलायी

चाहता हूँ कि मुझे मैं
एक दूसरे साँचे में ढालूँ।
पर भट्ठी तो तुम्हारी है।
इस पुरानी मूर्ति को
गला दोगे?
गलाई क्या लोगे?
-मूर्ति!

               वन-तुलसी की गन्ध

आह! यह वन-तुलसी की गन्ध! आह!
एक उमस
मन को भीतर ही भीतर कर गयी अन्ध!

                घटा झुक आयी

घटा, झुक आयी
अचानक तुम यहाँ तक-
इन भवों को भी लोगी चूम?
न जाने!
मगर मन तो ललक से
अभी आया झूम!
मुँद गयी है पलक! अब
अधबीच से ही
तुम न जाना घूम!
ओ घटा लो!
इधर भी आया उमड़ घन
थोड़ा झुको : लो चूम!

               उमड़ मेघ

उमड़, फट पड़ मेघ
आशिष राशि राशि बरसे!
विरहिनी के, कृषक के,
मेरे नयन क्यों तरसें?
भिगो दे! मोर, पिक, कवि के
सभी के हिये हरसें
धूसर धरा सरसे!
उमड़, फट पड़ मेघ...

               परस तो गये

आये तो तुम
थोड़ा बरस तो गये!
तरसे इन नयनों को
आह! बड़े हौले
परस तो गये।
प्राणों के तन्तु
कली बन खिले तो नहीं
पर तनिक सिहर
हरस तो गये।
घुटन कुछ गली
गाँठ मन की
कुछ सरकी
खुली नहीं, पर ढिली,
भाव थरथराये,
डर दरका भीतर के पंछी ने
पर तौले उद्ग्रीव हुआ,
उड़ा तो नहीं, पर क्षितिज पर
उसे तुम परस तो गये।
आये तो तुम, थोड़ बरस तो गये।

               बौछार

इतनी तेज़ी से आयी थी
रुक ही न सकी
वह उसी झोंक में चली गयी
धीमे आती सहलाती
हम कहते यह बौछार प्यार की है
रहते निःस्तब्ध। छुअन से बँधे।
किन्तु वह रुकी नहीं
हम सहमे, थमे,
उफ़न-उमड़न मन की पर
एक उमस में छली गयी
वह आयी आँचल लहराती
तृषा और लहराती
तृषा और गहराती
भरमाती, सिहराती, चली गयी।

               यह कविता मैं ने उस दिन

यह कविता मैं ने उस दिन
वहाँ आपको सुनायी थी
किस दिन, कहाँ, 
यह मुझे स्वयं भी याद नहीं।
पर ‘उस दिन वहाँ’,
यह कर कर मैं आपसे नाता जोड़ता हूँ
नाते का विश्वास
और विश्वास का नाता
उसी में फिर सुनाता हूँ
अपने को गलाता हुआ आपकी ओर बह कर।

               गान्धारी

कितने प्रसन्न रहते आये हैं।
युग युग के धृतराष्ट्र, सोच कर
गान्धारी ने पट्टी बाँधी थी
होने को सहभागिन
उनके अभाग की।
आह! देख पाते वे-
मगर यही तो था उनका असली अन्धापन!-
गान्धारी ने लगातार उनके अन्याय सहे जाने से
अत्याचारों के प्रति उनके
उदासीन स्वीकार भाव के
लगातार साक्षी होने से
अच्छा समझा था अन्धे हो जाना।
वह अन्धापन नहीं वंशवद
पुरुष मात्र के अन्ध अहं का
उसका तिरस्कार है :
नारी की नकार मुद्रा ज्वाला ढँकी हुई
यों अनबुझ।

                वे तो फिर आएँगे

लेकिन वे तो फिर आएँगे
फिर रौंदे जाएँगे खेत
ऊसरों में फिर झूमेंगे
बिस खोपड़े, सँपोले
स्मृतियाँ बनी हुई हैं, हाँ,
पर भोगी थी यातना जिन्होंने
वे तो चले गये हैं।
स्मृति भी है यातना-या कि हो सकती है-पर
जिनके पास रह गयी उनको
सिवा हाँकने, दुहने
या कि बलि दे कर खाने के
और कुछ नहीं आता
बकरी, बछड़े, मृगछौने हों
या-मनुष्य हों यन्त्रों से वे
खा सकते हैं नगर।
वे फिर आएँगे : सुन्दर होंगे
सुन्दर यानों पर सवार दीखेंगे
दस हाथ उनके संवेदन भरी उँगलियों से
कर सकते होंगे सौ सौ करतब
पर जबड़ों से उनके टपक रहा होगा
जो सर्प-रक्त वह जहाँ गिरेगा
मट्टी हो जाएँगी मानव कृतियाँ
कुकुरमुत्ते के भीतर भरी
भुरभुरी राख सरीखी साँस घोंटती
एक लपट उठ
बन जाएगी एक प्रेत की चीख़
गुँजाती नीरव शत संसृतियों के गलियारे।
वे फिर आएँगे वे, तो...
राह हमीं ने खोली है, पाँवड़े बिछाये हैं
यह मान कि जो आएगा
अवतारी होगा : एक नया
कृतयुग लाएगा फिर आएँगे
लेकिन वे तो फिर आएँगे..

                हम ज़रूर जीतेंगे

जी हम ज़रूर जीतेंगे
अगर हम हार न गये
हम अपने दुश्मनों को मारेंगे
अगर वे ही पहले हमें मार न गये
अनन्त है काल-अनन्त-
पर कहाँ है समय हमारे पास
और मृत्यु है
और हम जी रहे हैं इस समय
इस समय इस समय..
कहाँ कहाँ
नहीं जमा हैं वे बम
जिनसे एक क्षण में
मिट जा सकते हैं हम
खो जा सकते हैं एक काली घुटन में
जो पृथ्वी को घेर लेगी-
मिट जा सकते हैं हम-
किस नये अर्थ में
मानव है निर्माता अपनी नियति का
हाँ, हम जीतेंगे ज़रूर
अगर हम (पहले ही और व्यर्थ में)
हार न गये
हम अपने दुश्मनों को मारेंगे
अगर वे ही पहले हमें मार न गये...

               रक्तबीज

रक्तबीज का रक्त
जहाँ जहाँ गिरता था
एक और रक्तबीज उठ खड़ा होता था।
राक्षस था रक्तबीज
राक्षसी शक्ति
धरा के स्पर्श से
और पनपती है
धरा की भूख ही तो उसके भीतर की आग है
धरा से वह आग खींचती है
केवल आग प्राण नहीं :
प्राणलेवा आग।
रक्तबीच प्राण फूँकता नहीं, प्राण लेता है
पर उसका रक्त जहाँ जहाँ गिरा
धरती झुलस गयी :
आग था वह।
वहाँ अब कुछ नहीं पनपेगा जब तक
स्वेच्छित मानव रक्त से
उस स्थल का अभिसिंचन नहीं होगा।
रक्त से सींचो
फिर हरी होगी वह फलेगी।
ख़ून के दाग़ कपड़े पर हों तो पानी से धुल जाते होंगे
पर धरती पर हों तो रक्त से ही धुलते हैं
और उपाय नहीं।
उसका रक्त धुल जाएग तो
धरती हरी हो जाएगी
उसे हम भूल जाएँगे, पर
धरती हरी हो जाएगी।
तुम्हें चाहिए क्या?
उसे याद रखने के लिए
धरती झुलसाये रखना
या उसे भुला देना और
धरती का हरियाना?

               देवासुर

               (1)

ऋषियों की अस्थियों से भी
सुरगण केवल अस्त्र ही बना पाये
क्यों नहीं उनसे खाद बनी
जो अकाल अनावृष्टि में
रसा वसुन्धरा को फलवती बनाये-
लोक-जन के काम आये?

               (2)

असुर सदैव बली रहेंगे
क्यों कि सुर तो केवल
किसी के भरोसे हैं-
ऋत पर ही सही-निर्भर हैं।
और असुर-दुरभि सन्धि में लगे सही-
निरन्तर कर्म-तत्पर हैं।

               (3)

जिस ठंडे सीलन भरे घेरे में
लोग ठिठुरते-मरते हैं
वह मन्दिर की गीली छाँह का है
देवता के घर के कारण
देवता की धूप उन्हें कभी नहीं मिलती।

               मैत्रेय

               (1)

तरु और नदी के बीच
ऊर्ध्वमुख गति :
और असीमोन्मुख प्रवाह के बीच
उसे सम्बोधि प्राप्त हुई।
यही तो है सम्बोधि
मुक्त ऊर्ध्व-विस्तार
असीम क्षितिजोन्मुख विस्तार के बीच
जीवन क्षण की पहचान।

               (2)

हर बुद्ध
क्षण का आविष्कर्ता और सर्जक होता है
वह क्षण जीवी है
काल ऐसे क्षणों की
अनन्त स्रोतस्विनी है :
समस्या उन क्षणों को
पकड़ते चलने की है।

               (3)

अब नदी दूर चली गयी है
अन्तःसलिल हो गयी है
तरु बदल गया है
झंडियों से बँधा है
और क्षण का अन्वेषी
मन्दिर से घिर गया है
सोने से मढ़ गया है
लाखों उस प्रतिमा को
प्रणाम करने आते हैं।
उस एक ज्वलन्त क्षण का
आविष्कर्ता
अब फिर कब आएगा?

               फिर गुज़रा वह

फिर गुज़रा वह
घिसटे पैरों से
गली की गच को सुख-माँजता
मलते हाथ रुकते
लटक जाती हैं बाँहें
उमस में खप जाती
मन-मसोस आहें
कंचे से न कुछ देखते, न दिखाते
आँखों के झरोखे ढोता है वह
न घटते भार के पछताहट के धोखे।

               चौरा

सीढ़ियाँ। द्वार। देहरी पर दिया।
आँगन। चौरा। धुकधुक हिया।

               प्रणाम

भोर
नील के पटल पर एक नाम
ओस में खिल आते हैं सूर्य
प्रकाश! प्रणाम।

                जड़ें

पेड़ के तने में घाव करके
उसमें खपच्ची लगा गये हैं वे
कि बूँद बूँद
रिसता रहे घाव
उन्हें चाहिए लीसा।
और मेरी छाती के घाव में भी
लगी हैं खपच्चियाँ
नीचे बँधा है
उनका कसोरा।
पेड़ की, मगर,
जड़ें हैं गहरी
वह मिट्टी से रस खींचता है।
और मेरी जड़ों को पोषण की अपेक्षा है
उन्हीं से जिन्हें अपने कसोरे में
मेरा लहू चाहिए।

                आँख को आँख

ओ हँसते हुए फूल!
इधर तो देख
फूल की आँख तुझे देखती रही अनझिप
तेरी आँखों में अब
समा जाने दे उसे
ओस की बूँदों से घुली हैं उसकी आँखें
अरे, आँखों से ही तो दीप्ति पाता है प्रकाश
जिसमें रूप लेती है दुनिया!
आँख से मिलने दो आँख
आँख को आँख
देखने दो!

               ओ साँइयाँ

झील पर अनखिली
लम्बी हो गयीं परछाइयाँ
गहन तल में कँपी यादों की सुलगती झाँइयाँ
आह! ये अविराम अनेक रूप विदाइयाँ
इस व्यथा से ओट दे ओ साँइयाँ!

                लेडा का हंस

ले लो फूल टटका
देव-खग 4की चोंच से :
अब भले झुलस
मुरझा जाए
थरथराती छातियों के बीच
दे दो समुद अपना आपअतिथि तेजोपुंज में हो जाए
अन्तर्धान। हर आनन्द
चिता की लकड़ियाँ भी
स्वयं काँधे बाँध लाता है
इसी से वह मृत्यु से भी
मुक्त निज अस्तित्व पाता है
बनाता है एकान्त निज पहचान।

               स्वयं जब बोली चिड़िया

चिड़िया को जितने भी नाम दिये थे
सब झूठे पड़ गये
स्वयं जब बोली चिड़िया
नहीं कहा कुछ मैं ने :
ताका किया उसे चुप
चिड़िया ने भी नहीं कहा चिड़िया
केवल बोली रही अप्रतिम
गुणातीत आप्लवनकारी।
बोलो, बोलो, बोलो, चिड़िया
भरो जगत् को
एक बार फिर डूब चलूँ मैं
डूब चलूँ पर डूबूँ नहीं रहूँ सुनता
सुनने में रहूँ अनश्वर बोलो चिड़िया
बोलो, बोलो, बोलो।

               प्रतीक्षा

एक द्वार या झरोखा एक नारी
एक नसेनी और एक प्रतीक्षा
सदैव एक प्रतीक्षा किसकी प्रतीक्षा?
नारी की नसेनी की
द्वार-देहरी की।

               आर्फ़ेउस

               (1)

तुम्हें कौन ले गया? तुम ही चली गयीं
और नहीं रहीं? पर तुम रहीं
तुम कहीं हो। तुम्हें कोई ले भी नहीं गया।
तुम केवल ओट हो। और उस ओट को
भेद सकता है मेरा गीत। किस बाध्यता से
मैं गाता हूँ! गाता हूँ! गाता हूँ!
गीत में नहीं है मुक्ति
न मुक्ति से उपजा है गान न व्यथा से।
मुझे गाना है क्यों कि मुझे प्राण फूँकने हैं।
क्यों है यह बाध्यता कि तुम्हें जीना है
और इस लिए मुझे गाना है?
क्या मुझे नहीं जीना है?
पर यही मेरा जीना है कि मेरा गाना
तुम में प्राण फूँकता है
और तुम्हें उबार लाता है वहाँ से
जहाँ तुम चली गयीं :
तुम्हें कौन ले गया?

               (2)

मैं पीछे मुड़ कर देखूँगा और तुम्हारे प्राण
चुक जाएँगे। मेरा गायन (और मेरा जीवन)
इस में है कि तुम हो, पर तुम्हारे प्राण
इस में हैं कि मैं गाता रहूँ और बढ़ता जाऊँ
और मुड़ कर न देखूँ। कि यह विश्वास
मेरा बना रहे कि तुम पीछे पीछे आ रही हो
कि मेरा गीत तुम्हें मृत्यु के पाश से मुक्त करता हुआ
प्रकाश में ला रहा है।
प्रकाश! तुम में नहीं है प्रकाश
प्रकाश! मुझ में भी नहीं है
प्रकाश गीत में है। पर नहीं
प्रकाश गीत में भी नहीं है; वह इस विश्वास में है
कि गीत से प्राण मिलते हैं। कि गीत
प्राण फूँकता है। कि गीत है तो प्राणवत्ता है
और वह है जो प्राणवान् है।
क्यों कि सब कुछ तो उसका है जो प्राणवान् है
वह नहीं है तो क्या है?

              (3)

यहाँ पर तुम गाओ। तुम
क्यों कि आसन्न है मेरी मृत्यु
क्या मुझे भी कोई बुला लाएगा वहाँ से
अपने गीत के बल पर
जहाँ से लौटना नहीं होता?
गीत ही वहाँ से लौटा कर लाता है
गीत जो प्राण फूँकता है।
पर क्या गीत प्राण फूँकता है या यह विश्वास
कि गीत से फूँके गये प्राण के बल पर
तुम आ रही हो सतत अनुगामिनी?
गीत ही वह विश्वास देता है।
विश्वास! विश्वास! विश्वास!
गीत में श्रद्धा, या श्रद्धा में गीत?
मुड़ कर मत देखो उसे पाना है, उसे लाना है
तो उसे देखो मत!
अदृश्य, अदृष्ट ही वह आएगी
गाओ कि गीत से वह प्राण पाएगी
गीत ही है वह डोर जो उसे बाँधे है तुमसे
बुनते चलो तार!

               (4)

गा गया वह गीत खिल गया
वसन्त नीलिम, शुभ्र, वासन्ती।
वह कौन?
पाना मुझे है! मेरी तड़प है आग
जिसमें वह ढली!
मेरी साँस के बल
चली वह आ रही है।
नहीं, मुड़ कर नहीं देखूँगा।
क्योंकर खिले होते फूल
(नीलिम, शुभ्र, वासन्ती)
यदि मैं ही न गाता
और सुर की डोर से ही बँधी
पीछे वह न आती?

              (5)

पशु, पंछी, तितलियाँ
सुरों के जुगनूँ उनके बीच
चली आती वह अभी अवगुंठित। मौन। अकेली।
रँभाएँगे पशु। चहकेंगी चिड़ियाँ।
प्रकाश में वह जागेगी। आएगी। लौट।
गा! गा! गा!
गान सहारा है कितने प्राणों का!

               (6)

तुम भी मरोगे आर्फ़ेउस, तुम भी मरोगे।
पत्थर हो जाओगे।
केवल संगीत बचेगा बच सकता है।
तुम नहीं रहोगे
तो कौन पीछे मुड़ कर देखेगा
(या नहीं देखेगा) और श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ जाएगा
तुम्हें अनुगामी मान कर?
संगीत। केवल संगीत
वही बचा रहेगा।
कोई अनुगामी नहीं।
कोई पीछे मुड़ कर देखने वाला भी नहीं।
वह संगीत क्या तुम्हारा है?
वह संगीत क्या मेरे भीतर गूँजा है?

              (7)

पर क्या जो अनुगामी है-होगा-वह भी
वह संगीत नहीं है?
और क्या है जो तुम्हारे पीछे आएगा-
तुम्हारे इशारे से बँधा?
तुम मुड़ कर देखोगे
और वह पत्थर हो जाएगा-
संगीत। पत्थर संगीत।
तुम रुक नहीं सकते, मुड़ कर देख नहीं सकते
क्यों कि पत्थर हो जाएगा संगीत।
वह नहीं है जो पीछे आएगी-
है केवल संगीत वह नहीं है
जो उसे पीछे खींच ला रहा है
है केवल संगीत संगीत को पीछे खींच कर ला रहा है
संगीत वही एक अमरत्व है।
मरोगे, आर्फ़ेउस, डरोगे नहीं!

              (8)

वृक-शावक था पला हुआ
वह चला गया अब रो कर
क्या होगा, पुरुरवा?
जाने वाले जाते हैं।
वह गीत कौन-सा था जो
वृक-शावक को ले आया था
माँ के स्तन से खींच?
उर्वशी को कल्पद्रुम की छाँहों से?
वही स्वर जब साधता है

तब सध जाता है।
वही लाता है
अवश उर्वशी को
स्वर-वलित वशी बाँहों में।
चुका गीत :
सुन पड़ी उधर
वन-जननी के स्तन की पुकार
उर्वशी लौट गयी।
गीत! गीत! वह गीत!
आद्य धरा-सा
वन-जननी-सा दुर्निवार!

              (9)

जानना कि हम भूल रहे हैं
कि वह प्रिय मुखड़ा
धीरे-धीरे धुँधला पड़ता जाता है-
यही तो उसका पीछे छूट जाना है
यही तो मुड़ कर देखना है।
और मुड़ कर देखना नहीं है तो
कौन जानता है कि वह
साथ आती है?
क्या मेरा गान
मुझको ही भुलाने को नहीं है?
गाता जा और जा! जा!

               (10)

मरूँ! मरूँ! मरूँ!
संगीत जिये
वह जागे शुभ्र-केशिनी
आलोक-लोक में आये!

               (11)

जिस डोर से खिंची चली तुम आती हो
वह क्या मेरे संगीत की है
या तुम्हारे भीतर की
किसी न चुकने वाली गूँज की?
किसका गीत किसे बाँधे है
किसकी प्रतीति किसे खींचती है
जीवन देती है?
संगीत प्रकाश का एक घेरा
जो बाँधता है
जो मुक्त करता है-
एक अभिमन्त्रित परिमंडल!
क्या मैं उसे केवल आहूत कर सकता हूँ
उसमें प्रवेश नहीं कर सकता?
क्या तुम उसे केवल ढो सकती हो
उसके बाहर नहीं आ सकती?
बाहर! जहाँ फूल हैं। तितलियाँ हैं।
पीली। चमकीली।
डोलती हवाएँ हैं। नाचती प्रकाश-किरणें।
लहरें। स्मृति। मुक्तिप्रदा स्मृति।
और यह प्रभामंडल
जिसमें संगीत गूँजा है
और स्मृति केवल एक कारागार!
कौन तुम्हें खींच कर ला रहा है, प्रिया मेरी,
तुम्हारी स्मृति या मेरी विस्मृति-
कहाँ से उपजती है यह तड़पन
जो मेरा संगीत है?
मेरा संगीत?

               (12)

पत्थर! पत्थर! पत्थर!
प्रस्तर-प्रतिमाओं के उद्यान!
कितने हैं जो पीछे छूट गये
कितने रहे होंगे
जिन्होंने संगीत रचा था!
क्या कोई रहा होगा
जिसने मुड़ कर नहीं देखा
जिससे पीछे नहीं छूटी
कोई आलोक-प्रतिमा पत्थर हो कर?
जो ले गया प्रीति
और पीछे छोड़ गया एक प्रतीति
एक संगीत?
कोई रहा होगा तो चला गया।
पर यह जो हमें मिलता है संगीत
या प्रतीति है-या सन्देह?
प्रस्तर-प्रतिमाओं के उद्यान!
पत्थर! पत्थर! पत्थर!

               (13)

जो पत्थर हो जाएगा
वह मारा जाएगा
पर जो पत्थर नहीं होगा
जो साथ लाएगा
उस संगीत-मढ़ी, आलोक-खची प्रतिमा को
वह भी मारा जाएगा!
कौन सह सकता है इतना आलोक
इतनी प्रतीति इतनी प्रीति!

               (14)

मैं यही गाऊँ। गाता रहूँ।
तुम वहीं आओ। आती रहो।
धूप की थिगलियाँ। तितलियाँ। वसन्त।
एक पाले का परदा। शिलित अन्धकार।
अँधेरा संगीत। संगीत में आलोक की तड़पन। प्रतीति।
उधर पग-पग टटोलता
काँपता प्रकाश। ललक। प्रीति।
ऐसा ही होता आया है।
ऐसा ही है।

                (15)

स्मृति
अनुस्मृति संगीत
स्मृति ही संगीत है
स्मृति ही समस्या है
मेरी प्रीति समस्या है
कि मेरा संगीत कि मेरी स्मृति समस्या है
जो सभी आलोक हैं
जिस आलोक में मुझे
तुम्हें लाना है।
क्या वह आलोक-लोक भी समस्या है?
स्मृति के बाहर भी
आलोक-लोक हैं :
वहाँ समस्या नहीं है-
क्यों कि वहाँ सत्ता नहीं है
वहाँ वह संगीत भी नहीं है
जिसे सत्ता की स्मृति से
स्मृति की सत्ता बनाती है!
वह संगीत जो छाया को लाँघ कर
तुम्हें ला सके आलोक-लोक में!

               (16)

क्या विश्वास
प्रीति को बुलाता है?
हाँ तो, जैसे शिशु
माँ को।
तब कौन पहले है
कौन हेतु, कौन कर्ता?
संगीत! केवल संगीत!
न कर्ता न कर्म
केवल कारक, केवल संगीत!

               (17)

नहीं
अन्धकार वहाँ नहीं है
जहाँ वह गयी वहाँ अन्धकार क्योंकर है?
अन्धकार यहाँ भी नहीं है
जहाँ संगीत है वहाँ अन्धकार कैसे है?
बीच का द्वार ही अँधेरा है जहाँ लय टूटती है।
उसी देहरी पर
मेरी संगीत टूटता है।
मुझे
उसे लाना नहीं है :
मुझे उस तक पहुँचना है
अपने संगीत की भुजा फैला कर।
वह आये तो उसी भुजा में बँधी आएगी
मेरे पीछे उसका आना नहीं होगा।
संगीत ही भर दे वह अन्धकार द्वार
देहरी को दीप्त कर दे! 
प्रकाश, प्रकाश,
देहरी पर, देहरी के पार प्रकाश
और प्रकाश में वह भुज-बद्ध!

               (18)

मैं यहाँ हूँ :
मेरा संगीत
यहाँ नहीं है।
वह देहरी है : मुक्ति की देहरी है
प्रकाशमान।
और मेरा संगीत प्रकाश है
जो तुम्हें अभिषिक्त करता है
तुम में प्राण डालता है
वहीं जहाँ तुम हो :
मेरा संगीत मैं यह जो
यहाँ हूँ।
मृत्यु को
मृत्यु का आलोक जीवन को
जीवन का ओ जीवन! ओ मरण! ओ वृन्द-वाद्य!
हम गाते हैं
जहाँ हैं! साथ दो!

                कवि का भाग

कवि का है भाग यही
आग से आग तक
जलना गलना
गलाना मन्दिर जिसका भी हो
प्रतिमा बनाना-बैठाना नहीं-
प्रतिमा के प्राणों को सुलगाना।

               द्वा सुपर्णा

जो खाता था
वह रहा डाल पर
जो देख रहा था 
उड़ गया अचानक
-फल भी ले कर।

               घर

               (1)

मेरा घर
दो दरवाज़ों को जोड़ता
एक घेरा है
मेरा घर
दो दरवाज़ों के बीच है
उसमें किधर से भी झाँको
तुम दरवाज़े से बाहर देख रहे होगे
तुम्हें पार का दृश्य दीख जाएगा
घर नहीं दीखेगा।
मैं ही मेरा घर हूँ।
मेरे घर में कोई नहीं रहता
मैं भी क्या मेरे घर में रहता हूँ
मेरे घर में जिधर से भी झाँको...

               (2)

तुम्हारा घर वहाँ है
जहाँ सड़क समाप्त होती है
पर मुझे जब सड़क पर चलते ही जाना है
तब वह समाप्त कहाँ होती है?
तुम्हारा घर...

                 (3)

दूसरों के घर
भीतर की ओर खुलते हैं
रहस्यों की ओर
जिन रहस्यों को वे खोलते नहीं।
शहरों में होते हैं
दूसरों के घर
दूसरों के घरों में
दूसरों के घर
दूसरों के घर हैं।

               (4)

घर
है कहाँ जिनकी हम बात करते हैं
घर की बातें
सबकी अपनी हैं
घर की बातें
कोई किसी से नहीं करता
जिनकी बातें होती हैं
वे घर नहीं हैं।

                (5)

घर
मेरा कोई है नहीं,
घर मुझे चाहिए :
घर के भीतर प्रकाश हो
इसकी भी मुझे चिन्ता नहीं है;
प्रकाश के घेरे के भीतर मेरा घर हो-
इसी की मुझे तलाश है।
ऐसा कोई घर आपने देखा है?
देखा हो
तो मुझे भी उसका पता दें
न देखा हो
तो मैं आपको भी
सहानुभूति तो दे ही सकता हूँ
मानव हो कर भी हम-आप
अब ऐसे घरों में नहीं रह सकते
जो प्रकाश के घेरे में हैं
पर हम बेघरों की परस्पर हमदर्दी के
घेरे में तो रह ही सकते हैं।

               इस भीड़ में खोजता हूँ

इस भीड़ में व्याकुल भाव से खोजता हूँ उन्हें
मेरे माता-पिता, मेरे परिवार-जन,
मेरे बच्चे मेरे बच्चों की माँ।
एक एक चेहरे में झाँकता हूँ मैं
और देखता हूँ
केवल आँखों के कोटरों में भरा हुआ दुःख
बेकली, तड़पन, छटपटाती खोज
खोजता हूँ अपनों को : पाता हूँ
अपने ही प्रतिरूप।
जब तक नहीं पा लूँगा अपने से इतर अपने को
कैसे होगी मुझे अपनी भी पहचान?

               देहरी पर दिया

देहरी पर दिया
बाँट गया प्रकाश
कुछ भीतर, कुछ बाहर :
बँट गया हिया-
कुछ गेही, कुछ यायावर।
हवा का हलका झोंका
कुछ सिमट, कुछ बिखर गया
लौ काँप कर फिर थिर हुई :
मैं सिहर गया।

                नहीं, युलिसीज़

नहीं, युलिसीज़
न तुम्हें कभी मिलेगी इथाका
न मुझे कभी द्वारका।
वापसी में यों भी
कोई नगर नहीं मिलते :
प्रवासी लौटते तो हैं
पर उनकी घर-वापसी नहीं होती
जहाँ वापसी होती है वहाँ उनके घर नहीं होते :
उन्हें कोई नहीं पहचानता।
सागर ही उनका घर है
जो एक दिन उन नगरों को भी लील लेगा-
तुम्हारी इथाका को, युलिसीज़,
और मेरी द्वारका को।
सागर ही है
जो अपनी पहचान कभी नहीं खोता।

               फिर आऊँगा मैं भी

लेकिन फिर आऊँगा मैं भी
लिये झोली में अग्निबीज
धारेगी जिसको धरा 
ताप से होगी रत्नप्रसू।
कवि गाता है :
अनुभव नहीं न ही आशा-आकांक्षा :
गाता है वह अनघ
सनातन जयी।

               साँझ के सारस

घिर रही है साँझ
हो रहा अब समय
घर कर ले उदासी।
तौल अपने पंख, सारस दूर के
इस देश में तू है प्रवासी।
रात! तारे हों न हों
रवहीनता को सघनतर कर दे अँधेरा
तू अदीन, लिये हिये में
चित्र ज्योति-प्रकाश का
करना जहाँ तुझको सवेरा।
थिर गयी जो लहर, वह सो जाए
तीर-तरु का बिम्ब भी अव्यक्त में खो जाए
मेघ, मरु, मारुत, मरुण अब आये जो सो आये।
कर नमन बीते दिवस को, धीर!
दे उसी को सौंप
यह अवसाद का लघु पल
निकल चल! सारस अकेले!

                गुफाओं में

बोधिसत्त्व की गुफाओं में
सदियों का सन्नाटा
टूट गया इतिहासों की गूँज
सुनी क्या तुमने महाबुद्ध?

               चीनी चाय पीते हुए

चाय पीते हुए
मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।
आपने कभी
चाय पीते हुए
पिता के बारे में सोचा है?
अच्छी बात नहीं है
पिताओं के बारे में सोचना।
अपनी कलई खुल जाती है।
हम कुछ दूसरे हो सकते थे।
पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है
कि हम कुछ दूसरे हुए होते
तो पिता के अधिक निकट हुए होते
अधिक उन जैसे हुए होते।
कितनी दूर जाना होता है पिता से
पिता जैसा होने के लिए!
पिता भी सवेरे चाय पीते थे।
क्या वह भी पिता के बारे में सोचते थे-
निकट या दूर?

               गूँगे

(निकिता स्तानेस्कू की स्मृति में)
सभी तो गूँगे हैं, पर एक
निकलता है जो अपने गूँगेपन को पहचानता है
उसका दर्द बोलता है और उस में
सब अपनी वाणी पहचानते हैं।
वह अपने दर्द पर हँसता है।
हम सहम जाते हैं कि कहीं वह हँसी भी
हमारी पहचानी हुई तो नहीं है?
पहचान से सहमना-
सहमने की पहचान से झिझकना
हमारा गूँगापन है
नहीं तो हम
उसकी हँसी से क्यों सहमते?

               सुनो मैं ने कहीं हवाओं को

सुनो मैं ने कहीं हवाओं को बाँध कर
एक घर बनाया है
फूलों की गन्ध से उस की दीवारों पर
मैं तुम्हारा नाम लिखता हूँ
हर वसन्त में
पतझर के पत्तों की रंगीन झरन
उसे मिटा जाती है एक खड़खड़ाहट के साथ
पर जाड़ों की निहोरती धूप
तुम्हें घर में खड़ा कर जाती है
प्रत्यक्ष : उस भरे घर से
हर बहती हवा के साथ
मैं स्वयं बह जाता हूँ
दूर कहीं जहाँ भी तुम हो
मेरी स्मृति को फिर गुँजाते कि मैं फिर सुनूँ
और लिखूँ हवाओं पर तुम्हारा नाम!

                छन्द

मैं सभी ओर से खुला हूँ
वन-सा, वन-सा अपने में बन्द हूँ
शब्द में मेरी समाई नहीं होगी
मैं सन्नाटे का छन्द हूँ।


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