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रचनावली

अज्ञेय रचनावली
खंड : 2
संपूर्ण कविताएँ - 2

अज्ञेय
संपादन - कृष्णदत्त पालीवाल

अनुक्रम परिशिष्ट पीछे    

1

शीर्षकों की सूची

[यहाँ रचनाओं का वर्ष भी दे दिया गया है; साथ ही उन संकलनों के नाम भी जिन में रचना पहले प्रकाशित हुई थी। जो इससे पूर्व प्रकाशित नहीं हुई, या संग्रहों में नहीं आयी, उन का भी संकेत कर दिया गया है।

संकेत : अप्र.-अप्रकाशित; जो संग्रहों में नहीं ली गयी; इन्द्र.-इन्द्र धनु रौंदे हुए ये; अरी.-अरी ओ करुणा प्रभामय; आँगन-आँगन के पार द्वार; कित.-कितनी नावों में कितनी बार; क्योंकि.-क्योंकि मैं उसे जानता हूँ; सा.मु.-सागर मुद्रा; पह.स.-पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ; म.वृ.-महावृक्ष के नीचे-नदी की बाँक पर छाया; मरु.-मरुथल]

 

पृष्ठ

1957

बिकाऊ 24.4

हे अमिताभ 
धरा-व्योम 
नदी-तट : एक चित्र 
दीप पत्थर का 
एक चित्र 
अँगूर बेल 
क्या हमीं रहे 
प्यार : अव्यक्त 
सोन मछली 
खिड़की एकाएक खुली 
प्यार : व्यक्त 12.9
मैं देख रहा हूँ 15.9
साधना का सत्य 15.9
वह क्या लक्ष्य 15.9
द्वारहीन द्वार 15.9
घाट-घाट का पानी 16.9
आँखें-1 17.9
आँखें-2 17.9
घनी धुन्ध से छाया 17.9
पूनो ही साँझ सितम्बर
रात में गाँव 18.9
पहाड़ी यात्रा सितम्बर
सागर में ऊब-डूब 22.9
सम्राज्ञी का नैवेद्य-दान 25.9
दाता और भिखारी 27.9
एक हवा-सी बार-बार 27.9
चुप-चाप 10.10
रात कटी अरी. 1.11
पहेली अरी. 2.11
अपलक रूप निहारूँ अरी. 2.11
रात-भर आते रहे सपने अरी. 14.11
कवि-कर्म अरी. 14.11(अ.प्र)
रूप-केकी अरी. 16.11
रात और दिन अरी. 18.12
औद्योगिक बस्ती अरी. 17.12
लौटे यात्री का वक्तव्य अरी. 18.12
सान्ध्य तारा अरी. 21.12
सागर पर भोर अरी. 21.12
मैं ने कहा, पेड़ अरी. 24.12

1958

सागर पर साँझ अरी. 5.1
मानव अकेला अरी. जनवरी
सागर-तट : सान्ध्य तारा अरी. 19.1
हवाई हड्डे पर विदा अरी. 25.1
मैं ने देखा, एक बूँद अरी. 5.3
जन्म-दिवस अरी. 7.3
प्राप्ति अरी. 1958
चिड़िया की कहानी अरी. 1958
वसन्त अरी. मई
धूप अरी. 5.6
न दो प्यार अरी. 5.6
पगडंडी अरी. जून
यह मुकुर अरी. 10.7
सागर-चित्र अरी. 25.8
नया कवि : आत्म-स्वीकार अरी. 3.9
नये कवि से अरी. 3.9
यह कली अरी. 18.9
रोपयित्री अरी. 20.9
बड़ी लम्बी राह अरी. 22.9
इशारे ज़िन्दगी के अरी. 23.11
नये कवि : आत्मोपदेश अरी. 26.11
बाँगर और खादर अरी. 1.12
वहाँ पर बच जाय जो अरी. 17.12
जीवन-छाया अरी. 19.12
मछलियाँ अरी. 19.12
उन्मत्त अरी. 20.12
जब-जब अरी. 20.12

1959

हिरोशिमा अरी. 10.12 जनवरी
रश्मि-बाण अरी. 15.2
अन्तःसलिला आँगन 20.2
अन्धकार में दीप आँगन 21.2
टेर रहा सागर अरी. 10.3
चिड़िया ने ही कहा अरी. 18.8
सरस्वती-पुत्र अरी. 19.8
पास और दूर अरी. 24.8
झील का किनारा अरी. 29.11
अन्तरंग चेहरा अरी. 29.11
पाठक के प्रति कवि अ.प्र. मार्च
एक उदास साँझ आँगन 19.4
भीतर जागा दाता आँगन 29.4
परायी राहें आँगन 15.5
चक्रान्त शिला-15 आँगन 25.5
चक्रान्त शिला-19 आँगन 25.5
चक्रान्त शिला-2 आँगन 27.5
चक्रान्त शिला-12 आँगन 27.5
चक्रान्त शिला-10 आँगन 28.5
चक्रान्त शिला-11 आँगन 28.5
चक्रान्त शिला-3 आँगन 29.5
चक्रान्त शिला-1 आँगन 29.15
चक्रान्त शिला-22 आँगन 29.3
चक्रान्त शिला-14 आँगन 29.5
चक्रान्त शिला-23 आँगन मई
चक्रान्त शिला-12 आँगन 27.5
चक्रान्त शिला-13 आँगन 30.5
बना दे चितेरे आँगन 30.5
चक्रान्त शिला-4 आँगन 1.6
झर गये तुम्हारे पात अ.प्र. 3.6
चक्रान्त शिला-5 आँगन 12.6
चक्रान्त शिला-6 आँगन 15.6
चक्रान्त शिला-9 आँगन 15.6
चक्रान्त शिला-20 आँगन 28.6
पहचान आँगन 4.9
चक्रान्त शिला-24 आँगन अक्टूबर
सूनी-सी साँझ एक आँगन दिसम्बर
सब के लिए-मेरे लिए आँगन 11.12
चक्रान्त शिला-7 आँगन 8.12
चक्रान्त शिला-21 आँगन 18.12

1961

बाहर-भीतर अ.प्र. 12.1
चक्रान्त शिला-16 आँगन 8.1
चक्रान्त शिला-17 आँगन 8.1
चक्रान्त शिला-18 आँगन 1.2
अनुभव-परिपक्व आँगन 6.3
एक प्रश्न आँगन 10.3
चक्रान्त शिला-8 आँगन 26.3
अँधेरे अकेले घर में आँगन 29.5
असाध्य वीणा आँगन 18-20.6
साँस का पुतला आँगन 24.6
चक्रान्त शिला-25 आँगन 27.6
चक्रान्त शिला-26 आँगन 7.7
पलकों का कँपना आँगन 25.7
होने का सागर कित. 12.8
उधार कित. 13.8

1962

चक्रान्त शिला- आँगन . 0

निरस्त्र कित. अक्टूबर

जैसे जब तारा देखा कित. 0.

गृहस्थ कित. .

जीवन कित. .

समय क्षण-भर थमा आँगन .

सुनी हैं साँसें आँगन

उलाहना आँगन .

सन्ध्या-संकल्प आँगन .

प्रातःसंकल्प आँगन . 0

एक दिन चुक जाएगी ही बात आँगन .

ओ निःसंग ममेतर कित. जनवरी

महानगर : कोहरा कित. मार्च 

बेला वसन्त की .

पंचमुख गुड़हल कित. .

नृत्य-स्मृति कित. .

ओ एक ही कली की कित. .

गुल-लालः कित. .

उत्तर-वासन्ती दिन कित. .

धड़कन-धड़कन कित. अगस्त

सम्पराय कित. नवम्बर

कि हम नहीं रहेंगे कित. .

नाता-रिश्ता कित. जनवरी

जो रचा नहीं कित. जनवरी

अंगार कित. मार्च

युद्ध-विराम कित. .

पक्षधर कित. सितम्बर 

अन्धकार में जागने वाले कित. .

तुम्हें नहीं तो किसे और कित. .

पेरियार कित. 

हम नदी के साथ-साथ कित. 

स्वप्न कित. .

यात्री कित. .

फोकिस में ओदिपौस कित. .

प्रस्थान से पहले कित. .

विदा के चौराहे पर : अनुचिन्तन कित. .

कालेमेग्दान कित. .

ज्योतिषी से (अ.प्र.) कित. 

कितनी नावों में कितनी बार कित. 

गति मनुष्य की कित. .

काँच के पीछे मछलियाँ कित. .

हेमन्त का गीत कित. जून

यह इतनी बड़ी अनजानी दुनिया कित. .

स्मारक कित. .

जिस में मैं तिरता हूँ कित. .

मन बहुत सोचता है कित. जुलाई

नशे में सपना सा.मु. मार्च

विदाई का गीत मार्च

आज़ादी के बीस बरस क्यों कि. .

देहरी पर क्यों कि. . 

कहीं राह चलते चलते क्यों कि. . 

कच्चा अनार, बच्चा बुलबुल क्यों कि. . 

ध्रुपद : शं क्यों कि. . 

कहाँ से उठे प्यार की बात क्यों कि. . 

बही जाती है क्यों कि. . 

रात : चौंध क्यों कि. . 

मोड़ पर का गीत क्यों कि. . 

जिस मन्दिर में मैं गया नहीं क्यों कि. . 

होते हैं क्षण क्यों कि. . 

दिया हुआ, न पाया हुआ क्यों कि. . 

आश्वस्ति क्यों कि. 

प्रार्थना का एक प्रकार क्यों कि. .

फिर भोर एकाएक क्यों कि ..

जो औचक कहा गया सा.मु. .

देना पाना सा.मु. .

अस्ति की नियति क्यों कि. .

चितवन क्यों कि. 

साँझ सवेरे क्यों कि. जून

अहं राष्ट्रीय संगमनी जनानाम् क्यों कि. जून

आवश्यक क्यों कि. जुलाई

एक दिन क्यों कि. जुलाई

जाना अजाना क्यों कि. .

घेरे क्यों कि. .

दास व्यापारी क्यों कि. जुलाई

दिति कन्या को क्यों कि. 

तुम्हें क्या क्यों कि .

वेध्य क्यों कि. .

प्यार क्यों कि. .

जनपथ-राजपथ क्यों कि. .

लौटते हैं जो वे प्रजापति हैं क्यों कि. . ..

भूत क्यों कि. .

पत्थर का घोड़ा क्यों कि. .

क्यों कि मैं क्यों कि. .

तू-फू को : बारह सौ वर्ष बाद क्यों कि .

सपना क्यों कि. .

मैत्री क्यों कि. .

उन्होंने घर बनाये क्यों कि. .

ड्योढ़ी पर तेल क्यों कि. .

पहली बार जब शराब क्यों कि. .

तं तु देशं न पश्यामि क्यों कि. अगस्त

तो क्या क्यों कि. .

केले का पेड़ क्यों कि. . ..

एक दिन क्यों कि . ..

देश की कहानी : दादी की ज़बानी क्यों कि. .

उँगलियाँ बुनती हैं क्यों कि. .

गूँजेगी आवाज़ क्यों कि. .

प्रेमोपनिषद् क्यों कि. सितम्बर

रात में क्यों कि. .

ओ तुम क्यों कि. 

कौन-सा सच है क्यों कि. 

औपन्यासिक क्यों कि. अक्टूबर

कुछ फूल : कुछ कलियाँ क्यों कि. अक्टूबर

कन्हाई ने प्यार किया सा.मु. अक्टूबर

फूल की स्मरण प्रतिभा सा.मु. नवम्बर

छिलके सा.मु. नवम्बर

काल की गदा सा.मु. नवम्बर

देहरी पर क्यों कि. .

हथौड़ा अभी रहने दो क्यों कि. .

देखा है कभी सा.मु. .

मरण के द्वार पर सा.मु. दिसम्बर

सपने में सा.मु. जनवरी

सपने में-जागते में सा.मु. .

दोनों सच हैं सा.मु. जनवरी

भले आये सा.मु. जनवरी

छातियों के बीच सा.मु. .

अभागे, गा! सा.मु. .

क्यों सा.मु. .

पाठभेद सा.मु. फरवरी

देर तक हवा में सा.मु. .

धार पर संतार दो सा.मु. .

घर छोड़े सा.मु. .

मैं ने ही पुकारा था सा.मु. .

याद सा.मु. .

गाड़ी चल पड़ी सा.मु. .

बालू घड़ी सा.मु. .

अलस सा.मु. .

मों मार्त्र सा.मु. . 

मन दुम्मट-सा सा.मु. अप्रैल

कैसा है यह ज़माना सा.मु. अप्रैल .

कौन-सी लाचारी सा.मु. मई

सागर मुद्रा-- सा.मु. - -

एक दिन यह राह सा.मु. जून

मुझे आज हँसना चाहिए सा.मु. अगस्त

रह गये सा.मु. अगस्त

जन्म-शती सा.मु. . 

कविता की बात सा.मु. सितम्बर

नदी का बहना सा.मु. सितम्बर

बेल-सी वह मेरे भीतर सा.मु .

देलोस से एक नाव सा.मु. अक्टूबर

कहाँ सा.मु. अक्टूबर

देखता-अगर देखता सा.मु. अक्टूबर

जो तू सागर से बनी थी सा.मु. अक्टूबर

मिरिना की ताँतिन सा.मु. अक्टूबर

समाधि-लेख सा.मु. अक्टूबर

नरक की समस्या सा.मु. अक्टूबर

जीवन-यात्रा सा.मु. अक्टूबर

कस्तालिया का झरना सा.मु. अक्टूबर

अरियोन सा.मु. अक्टूबर

प्रतिद्वन्द्वी कवि से सा.मु. अक्टूबर

विषय : प्यार सा.मु. अक्टूबर

अलस्योनी सा.मु. अक्टूबर 

शहतूत सा.मु. अक्टूबर

दो जोड़ी आँखें सा.मु. अक्टूबर

डगर पर सा.मु. अक्टूबर

सोया नींद में को, जागा सपने में सा.मु. अक्टूबर

जीवन-मर्म सा.मु. 27.10

फूल हर बार आते हैं सा.मु. 27.10

बड़े शहर का एक साक्षात्कार सा.मु. 29.10

नदी का पुल-1 सा.मु. 29.10

नदी का पुल-2 सा.मु. 30.10

काल स्थिति-1 सा.मु. 31.10

काल स्थिति-2 सा.मु. 31.10

गजर सा.मु. 31.10

कातिक की रात सा.मु. नवम्बर

काँपती है सा.मु. नवम्बर

लक्षण सा.मु. नवम्बर

ग्रीष्म की रात सा.मु. नवम्बर

कोहरे में भूज सा.मु. दिसम्बर

1970

एक सन्नाटा बुनता हूँ पह.स. 1970
नीमाड़ : चैत पह.स. 1970
तारे पह.स. 1970
खिसक गयी है धूप पह.स. 1970
खुले में खड़ा पेड़ पह.स. 4.10
तुम सोये पह.स. अप्रैल
मेज़ के आर-पार पह.स. अप्रैल
हाँ, दोस्त पह.स. जुलाई
कई नगर थे जो हमें पह.स. 4.10
कोई हैं जो पह.स. 8.10
प्राचीन-ग्रन्थागार में पह.स. अप्रैल
हम घूम आये शहर पह.स. अप्रैल
घर की याद पह.स. 24.10
शिशिर का भोर पह.स. 25.10
समाधि-लेख पह.स. 25.10
मृत्युर्धावति पंचमः पह.स. नवम्बर
देखिए न मेरी कारगुजारी पह.स. नवम्बर
दुःसाहसी हेमन्ती फूल पह.स. नवम्बर
हरा अन्धकार पह.स. नवम्बर
विदेश में कमरे पह.स. नवम्बर

1971

वह नकारता रहे पह.स. 1971
बलि पुरुष पह.स. 1971
कभी-अब पह.स. 1971
उनके घुड़सवार पह.स. 1971 ..
हीरो पह.स. 1971
जो पुल बनाएँगे पह.स. 1971
बाबू ने कहा पह.स. 1971

1972

नन्दा देवी 1-15 पह.स. 1972
वन-झरने की धार पह.स. 1972
दिन तेरा पह.स. 1972
धार पर पह.स. 1972

1975

जियो मेरे पह.स. 1975
चले चलो, ऊधो पह.स. मई
विदा का क्षण पह.स. 1975
वीणा पह.स. 1975
तुम्हारे गण पह.स. 1975
हँसती रहने देना पह.स. सितम्बर

1976

बर्फ़ की तहों के नीचे म.वृ. 30.1
मथो म.वृ. 31.1
उत्सव पिंगला म.वृ. 1.2
होमोहाइडेल वर्गेसिस म.वृ. 3.2
चुप-चाप नदी म.वृ. फरवरी
वसन्त आया तो है म.वृ. 1976
झाँकी म.वृ. 1976
सम्भावनाएँ म.वृ. 1976 ..
नाच म.वृ. मार्च
अब भी यही सच है म.वृ. मार्च
सीमान्त पर म.वृ. मार्च
क्लाइस्ट की समाधि पर म.वृ. अप्रैल
ना जाने कोई भेस म.वृ. अप्रैल
सड़क के किनारे गुलाब म.वृ. मई
महावृक्ष के नीचे (पहला वाचन) म.वृ. 15.5
महावृक्ष के नीचे (दूसरा वाचन) म.वृ. 15.5
वन-मिथक म.वृ. मई
शरद विलायती म.वृ. मई
तीसरा चरण म.वृ. मई
सभी से मैं ने विदा ले ली म.वृ. मई
जाड़ों में म.वृ. जून
साल दर साल म.वृ. सितम्बर
शरद तो आया म.वृ. 1976
नन्दा म.वृ. 1976
झर गयी दुनिया म.वृ. 1976
उस से म.वृ. 1976
धावे म.वृ. 1976
धूप सनी छाया म.वृ. 1976
देहरी म.वृ. 1976
तुम तक म.वृ. 1976
पिछले वसन्त में फूल म.वृ. 1976
हट जाओ म.वृ. 1976
आतंक म.वृ. 1976
क्या करोगे? म.वृ. 1976
बौद्धिक बुलाए गये म.वृ. सितम्बर
प्रतीक्षा गीत म.वृ. 1976
जरा व्याध म.वृ. 1976

1978

पेड़ों की क़तार के पार नदी. बाँक 1978 381
पत्ता एक झरा नदी. बाँक 1978 382
कहने की बातें नदी. बाँक 1979 382

1979

भैंस की पीठ पर नदी. बाँक 1979
उस के चेहरे पर इतिहास नदी. बाँक 1979
उस के पैरों में बिवाइयाँ नदी. बाँक 1979
मुलाक़ात नदी. बाँक 1979
परती का गीत नदी. बाँक 9.8
सागर के किनारे नदी. बाँक 10.8
खुल तो गया द्वार नदी. बाँक 22.10
कहो राम, कबीर नदी. बाँक अक्टूबर
नदी की बाँक पर छाया नदी. बाँक 8.11
डरौना नदी. बाँक 8.11
नृतत्त्व संग्रहालय में नदी. बाँक 8.11

1980

परती तोड़ने वालों का गीत नदी. बाँक 1.1
मेरे देश की आँखें नदी. बाँक 2.1
बाँहों में लो नदी. बाँक 1980
वसन्त : राजस्थानी शैली नदी. बाँक 1980
रात-भर नदी. बाँक 16.2
मैं ने जाना, यही हवा नदी. बाँक 18.2
पीली पत्ती : चौथी स्थिति नदी. बाँक 7.3
मैं ने पूछा क्या कर रही हो नदी. बाँक 1980
धूसर वसन्त नदी. बाँक 1980
हम जिये नदी. बाँक 6.4
पंडिज्जी नदी. बाँक 1980
कल दिखी आग नदी. बाँक 1980
भाषा-माध्यम नदी. बाँक 8.5
भाषा पहचान नदी. बाँक 1980
आज ऐसा हुआ है नदी. बाँक 8.5
आये नचनिये नदी. बाँक 11.5
न सही, याद नदी. बाँक 1980
ख़ून नदी. बाँक 1980
टप्पे नदी. बाँक 1980
प्यार के तरीके नदी. बाँक 1980
रात सावन की नदी. बाँक 1980
सहारे नदी. बाँक 1980
स्वर-शर नदी. बाँक 16.6
उमस नदी. बाँक 19.6
आज मैं ने नदी. बाँक 1980
धुँधली चाँदनी नदी. बाँक 1980
कदम्ब कालिन्दी (पहला वाचन) नदी. बाँक 1980
कदम्ब कालिन्दी (दूसरा वाचन) नदी. बाँक 1980
कुछ तो टूटे नदी. बाँक 1980
वासन्ती नदी. बाँक 6.10
हाथ गहा नदी. बाँक 14.11
इतिहास-बोध नदी. बाँक 14.11
प्यार अकेले हो जाने नदी. बाँक 1980
अलाव नदी. बाँक 1980
भोर : लाली नदी. बाँक 1980
वासुदेव प्याला नदी. बाँक 16.12
स्वरस विनाशी नदी. बाँक 1980

1981

कालोऽयं समागतः नदी. बाँक 1981
जा! नदी. बाँक 1981
मेघ एक भटका-सा नदी बाँक 19.6
जरा व्याध (मर्माहत) नदी. बाँक 11.6
जरा व्याध (क्या यही है) नदी. बाँक अगस्त

1986

(ऐसा कोई घर आपने देखा है)
कौन खोले द्वार
जहाँ सुख है
कुछ चीज़ें होती हैं जो
तुम मत बोलना
कभी कभी
गलायी
वन-तुलसी
घटा झुक आयी
उमड़ मेघ
परस तो गये
बौछार
प्रकाशन काल
यह कविता मैं ने उस दिन
गान्धारी
वे तो फिर आएँगे
हम ज़रूर जीतेंगे
रक्तबीज
देवासुर
मैत्रेय
फिर गुज़रा वह
चौरा
प्रणाम
जड़ें
आँख को आँख
ओ साँइयाँ
लेडा का हंस
स्वयं जब बोली चिड़िया
प्रतीक्षा
आर्फ़ेउस -
कवि का भाग
द्वा सुपर्णा
घर
इसी भीड़ में खोजता हूँ
देहरी पर दिया
नहीं, युलिसीज़
फिर आऊँगा मैं भी
साँझ के सारस
गुफ़ाओं में
चीनी चाय पीते हुए
गूँगे
सुनो मैं ने कहीं हवाओं को
छन्द
कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा मरु. 7.11
दन्त-कथा मरु. 1.11
मरुथल में चट्टान मरु. 1.4
मरुथल : रात मरु. -
मरुथल में मरु. 1.4
मरुथल में-4 मरु. -
मरुथल-5 मरु. -
मरुथल-6 मरु. -
मरुथल : बदली मरु -
मरुथल में लहर मरु 6.3.87
मरुथल मरु 6.3.87
मरुथल-10 मरु. -
मरुथल-11 मरु. -
मरुथल-12 मरु. -
वसीयत -

2

प्रथम पंक्तियों की अनुक्रमणिका

अंकुरित धरा से क्षमा/व्योम से झरी
अकेली और अकेली/प्रियतम धीर
अच्छा लगता है/यों तुम्हें पीछे छोड़ जाना
अँधेरे अकेले घर में/अँधेरी अकेली रात
अधर में लटका हुआ
अधोलोक में? चलो, वहीं जाना होगा तो
अनार कच्चा था/पर बुलबुल भी शायद बच्चा था
अन्धकार था/सब कुछ जाना
अन्धकार में चली गयी है काली रेखा
अपने सेईख के लिए पुकार मत कर, अलस्योनी
अपलक रूप निहारूँ/तन-मन कहाँ रह गये?
अब आप ही सोचिए
अब चले चलो, ऊधो
अब देखिए न मेरी कारगुज़ारी
अब भी यही सच है
अमराई महक उठी/हिय की गहराई में
अरी ओ आत्मा री
अरे भैया, पंडिज्जी ने पोथी बन्द कर दी है
अरे ये उपस्थित/घेरते, घूरते, टेरते
अलसी कालिन्दी-कि काँपी
आँखें मिली रहें/मुझे बाँहों में लो
आँगन के पार/द्वार खुले
आकाश/बदलाया/धूमायित
आ गये प्रियंवद/केशकम्बली/गुफा गेह
आज फिर एक बार
आज मैं ने पर्वत को नयी आँखों से देखा
आ, तू आ/हाँ, आ
आन-बान/मोर-पेंच
आया है शरद विलायती
आये तो तुम/थोड़ा बरस तो गये!
आह! यह वन-तुलसी की गन्ध! आह!
इतनी तेज़ी से आयी थी
इधर/परकोटे और भीतरी दीवार के बीच ..
इनसान है कि जनमता है
इन्हें अतीत भी दीखता है
इस भीड़ में व्याकुल भाव से खोजता हूँ उन्हें
इस लिए/कि मैं कोई नहीं हूँ
उँगलियाँ बुनती हैं लगातार
उड़ गया गरजता यन्त्र-गरुड़
उड़ गयी चिड़िया
उतना-सा प्रकाश/कि अँधेरा दीखने लगे
उधर उस काँच के पीछे पानी में
उधर से आये सेठ जी
उधार के समय में/खरीदे हुए प्यार पर
उन के घुड़सवार/हम ने घोड़ों पर से उतार लिये
उन्होंने/घर बनाये
उमड़, फट पड़ मेघ
उमसती साँझ/हिना की गन्ध
उलझती बाँह-सी/दुबली लता अंगूर की
उस के चेहरे पर/कई इतिहास लिखे थे
उस के दो लघु नयन-तारकों की झपकी ने
उस के पैरों में बिवाइयाँ थीं
उस ने वहाँ अपनी नाक गड़ाते हुए
उस बीहड़ काली एक शिला पर बैठा दत्तचित
उसी एकान्त में घर दो
उसे मरे/बरस हो गये हैं
ऊपर तुम, नन्दा!
ऊपर/साँय-साँयः/बाहर कुछ
ऋषियों की अस्थियों से भी
एक अहंकार है जिसमें मैं रहता हूँ
एक-एक कर झरते हैं फूल रुईंले
एक का अनकहा संकल्प था
एक चिकना मौन/जिस में मुखर तपती वासनाएँ
एक जगत् रूपायित प्रत्यक्ष
एक ढंग है जीने का
एक तनी हुई रस्सी है जिस पर मैं नाचता हूँ
एक द्वार या झरोखा
एक दिन/अजनबियों के बीच
एक दिन/और दिनों-सा
एक दिन मैं/राह के किनारे मरा पड़ा पाया जाऊँगा
एक दिन यह राह पकड़ूँगा
एक दिन रुक जाएगी जो लय
एक दिन सहसा/सूरज निकला
एक भिखारी ने/दूसरे भिखारी को सूचना दी
एक समुद्र, एक हवा, एक नाव
ऐसा क्यों हो/कि मेरे नीचे सदा खाई हो
ओ अधीर पथ-यात्री/क्यों तुम
ओ आस्था के अरुण!
ओ एक ही कली की
ओझल होती-सी/मुड़-भर कर
ओ तुम/सुन्दरतम रूप!-
ओ बीच की पीढ़ी के लोगो
ओ मूर्ति!/वासनाओं के विलय
ओ सागर/ओ मेरी धमनियों की आग
ओ हँसते हुए फूल/इधर तो देख
कई नगर थे/जो हमें देखने थे
कन्हाई ने प्यार किया कितनी गोपियों को कितनी बार
कमल/खिला/दो कुमुद
कभी ऐसा था/कि वे वहाँ
कल ये दूह इधर को थे
कवि का है भाग यही/आग से आग तक
कहाँ!/न झीलों से न सागर से
कहाँ से उठे प्यार की बात
कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा
कहीं मेरा स्वर/पहुँच जाए
कहीं राह चलते-चलते
काल की गदा/एक दिन/मुझ पर गिरेगी
काल की रेती पर/हमारे पैरों के छापे
कितनी-जल्दी/तुम उझकीं
कितनी दूरियों से कितनी बार
कितनी धुनें/मैं ने सुनी हैं
कितने पक्षियों की मिली-जुली चहचहाट में से
कितने प्रसन्न रहते आये हैं
कि तुम मेरा घर हो
किरण जब मुझ पर झरी
किसी का सत्य था/मैं ने सन्दर्भ में जोड़ दिया
किसी को भुला ले/तुम्हारी भंगिमा
किसी तरह रात कटी/पौ फटी
कुछ चीजें होती हैं जो
कुछ है/जिस में मैं तिरता हूँ
कुहरा उमड़ आया/हम उस में खो गये ..
कोहरा था, सागर पर सन्नाटा था
कोहरे में नम, सिहरा ..
कैसा है यह जमाना
कैसे बनठनिये/आये नचनिये
कोई हैं/जो अतीत में जीते हैं
कोयल ने टेरा : कुहू!
कौन-सी लाचारी से नाल पर
क्या डर ही बसा हुआ है सब में
क्या दिया था तुम्हारी एक चितवन ने उस एक रात
क्या दिया-लिया?
क्या यही है पुरुष की नियति
क्या हुआ अगर किसी को घर की याद आती है
क्यों कि मैं/यह नहीं कह सकता
क्यों यह मेरी जिन्दगी
क्षितिज जहाँ उद्भिज है
खिड़की एकाएक खुली/बुझ गया दीप झोंके से
खिड़की के आगे वह झुकी
खुल तो गया/द्वार
खून के धब्बों से/अँतराते हुए
खेतों में/मद और मूसलों की
खोयी आँखें लौटीं : धरी मिट्टी का लौंदा
खोली को तो, चलो
गजर/बजता है/और स्वर की समकेन्द्र लहरियाँ
गलियारे से जाते-जाते/उस दिन लख भंगिमा तुम्हारी
गाड़ी ठहराने के लिए/जगह खोजते-खोजते
गुरु ने छीन लिया हाथों से जाल
गूँजेगी आवाज/पर सुनाई नहीं देगी
घड़े/फूट जाते हैं
घटा, झुक आयी
घनी धुन्ध से छाया निकली
घनी रात के सपने/अपने से दुहराने को
घिर आयी थी घटा
घिर रही है साँझ
चट्टान से टकराकर
चला जा रहा था मैं
चलो खोल दो नाव
चलो, ठीक है कि आज़ादी के बीस बरस से
चाबुक खाये/भागा जाता
चाय पीते हुए/मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ
चाहता हूँ कि मुझे मैं
चिड़िया को/जितने भी नाम दिये थे
चिथड़े-चिथड़े/टँगा डरौना
चिनारों की ओट/से सुरसुराता सरकता
चुप-चाप चुप-चाप/झरने का स्वर
चुप-चाप सरकती है नदी
चेहरे हो गये हैं यन्त्र सभ्य
छिलके के/भीतर छिलके के
जंगल में खड़े हो?
जब आवे दिन/तब देह बुझे या टूटे
जहाँ सुख है
जब-जब कहता हूँ-/ओः, तुम कितने बदल गये हो
जब जब सागर में/मछली तड़पी
जब पुकारती थीं तब उन में
जहाँ पर धन/नहीं है राशि वह
जागता हूँ/तो जानता हूँ
जा!/ जाना है तो ऐसे जा
जितना कह देना आवश्यक था
जितनी स्फीति इयत्ता मेरी झलकती है
जिन आँखों को तुमने गहरा बतलाया था
जिन्दगी हर मोड़ पर करती रही हम को इशारे
जियो, मेरे आज़ाद देश की शानदार इमारतो
जिस अतीत को मैं भूल गया हूँ वह
जिस मन्दिर में मैं गया नहीं
जो हम ज़रूर जीतेंगे
जैसे अनाथ शिशु की अरथी को
जो कुछ सुन्दर था प्रेय, काम्य
जो खाता था/वह रहा/डाल पर
जो तू सागर से बनी थी
जो पास रहे/वे ही तो सब से दूर रहे
जो पुल बनाएँगे/वे अनिवार्यतः
जो बहुत तरसा-तरसा कर
ज्योति के/भीतर ज्योति के
झँझरे मटमैले प्रकाश के कन्थे
झर गये तुम्हारे पात
झर गयी है दुनिया
झरते-झरते/पिछले वसन्त के फूल
झरना : झरता पत्ता
झींगुरों की लोरियाँ/सुला गयी थीं गाँव को
झील का निर्जन किनारा
झील पर अनखिली/लम्बी हो गयीं परछाइयाँ
झुलसते आकाश के/बादलों को जला कर
टेर वंशी की/यमुना के पार
ठठाती हँसियों के दौर मैं ने जाने हैं
ठीक है, कभी तो कहीं तो चला जाऊँगा
ठीक है/मैं ने ही तेरा नाम ले कर पुकारा था
डाल पर कुछ फूल थे
ड्योढ़ी पर तेल चुआने के लिए
ढूह की ओट बैठे/बूढ़े से मैं ने कहा
तब-इतिहास नहीं था जब-
तरु और नदी के बीच
तीन आँखों से देखता है वह सारा विश्व
तारे, तू तारा देख
तुम/चलने से पहले
तुम/मेरी एक निजी घड़ी
तुम/वहाँ हो/मन्दिर तुम्हारा
तुम/वही थीं : किन्तु ढलती धूप का कुछ खेल था
तुम सतत/चिरन्तन छिने जाते हुए
तुम सोये/नींद में अधमुँदे हाथ
तुम्हारा घाम/नया अंकुर हरियाता है
तुम्हारी आँखों से/सपना देखा। वहाँ
तुम्हारी पलकों का कँपना
तुम्हारी पलकों के पीछे
तुम्हारे स्वर की गूँज/भरे रहे आकाश
तुम्हें/अपनी धनी हवेली में
तुम्हें क्या/अगर मैं दे देता हूँ अपना यह गीत
तुम्हें कौन ले गया? तुम ही चली गयीं
तुम्हें नहीं तो किसे और
तू तो/सपने में/झलक दिखा कर
तू नहीं कहेगा?/मैं फिर भी सुन ही लूँगा
थोड़ी और दूर :/ आकृतियाँ धुँधली हो कर सब
थोड़ी देर/खुली खुली/आँखें मिलीं
दाँतों में रह गयी कथा
दाड़िम की ओट हो जा, लड़की!
दिन के उजाले में/अनेकों नाम सब के समाज में
दिन छिपे/मलिना गये थे रूप
दिन जो रोज डूबते हैं
दिन तेरा/मैं दिन का
दिया सो दिया/उस का गर्व क्या
दीखने को तो/कल दिखी थी आग
दीप पत्थर का/लजीली किरण की
दूज का चाँद/मेरे छोटे घर-कुटीर का दिया
दूर सागर पार/पराये देश की अनजानी राहें
दूर से पास बुलातीं/पर समीप आतीं तो आँखें लातीं
देर तक देखा हम ने
देर तक हवा में
देवता अब भी/जलहरी को
देश-देश में बन्धु होंगे
देहरी पर दिया/बाँट गया प्रकाश
दो? हाँ, दो/बड़ा सुख है देना
द्वार के आगे/और द्वार!
धड़कन-धड़कन-धड़कन-
धुएँ का काला शोर
धुन्ध में ढँकी हुई/कितनी गहरी वापिका तुम्हारी
न कहीं से/न कहीं को
न कुछ में से वृत्त यह निकला कि जो फिर
न जाने मछलियाँ हैं भी या नहीं
नदी की बाँक/गोरी चमक बालू की
नदी की बाँक पर/छाया
नदी में/मछलियाँ उछलती हैं
न देखो लौट कर पीछे/वहाँ कुछ नहीं दीखेगा
न दो प्यार/खोलो न द्वार
नन्दा/बीस, तीस-पचास वर्षों में
नरक? खैर, और तो जो है सो है
नशे में सपना देखता मैं
न सही, याद न करो मुझे
नहीं, अभी कुछ नहीं बदला है
नहीं, नहीं, नहीं!
नहीं, मैं अपनी बात नहीं कहता
नहीं युलिसीज़/न तुम्हें कभी मिलेगी इथाका
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं
नहीं! विदा का क्षण
नागरों को नगरी में/देवताओं में होड़ होती होगी
निचले/हर शिखर पर
पग्गल/गलमुच्छे/आँखों में बर्छियाँ
पति-सेवारत साँझ
परिचितियाँ/घेरे-घेरे-घेरे
पहली बार/जब दिन-दोपहर में शराब पी थी
पहले उसने कहा देखो-देखो, आकाश वह प्रकाश का सागर
पहले/मैं तुम्हें बताऊँगा अपनी देह का
पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ
पहले यह देश बड़ा सुन्दर था
पहाड़ नहीं काँपता/न पेड़, न तराई
पहाड़ियों से घिरी हुई इस छोटी-सी घाटी में
पहाड़ी की ढाल पर/लाल फूल है
पार साल/बरसात में
पुआल के घेरदार घाघरे
पुराने कवि को/मुहरें मिलती थीं
पुल पर झुका खड़ा मैं देख रहा हूँ
पेड़ अपनी अपनी छाया को
पेड़ के तने में घाव करके
पेड़ों के तनों की कतार के पार
पैताने से धीरे-धीरे
पैर उठा और दबा
प्यार अकले हो जाने का एक नाम है
प्यार/एक यज्ञ का चरण
प्यार के तरीके तो और भी होते हैं
प्रबुद्ध ने कहा : मन्दिरों में न जा, न जा!
प्रेक्षागृह की मुँडेर पर बैठ मैं ने
फिर गुज़रा वह/घिसटे पैरों से
फूल खिलते रहे चुपचाप : मंजरी आयी
फूल से/पंखुड़ी तो झरेगी ही
फूल हर बार आते हैं
फूली डालों की चामर से सहलाये हुए
बकरी के बच्चे की मिमियाहट पर तिरता
बना दे, चितेरे,/मेरे लिए एक चित्र बना दे
बन्धु! तेजपात की दो डालें पाने के लिए
बर्फ को तहों के बहुत नीचे से सुना मैं ने
बहुत दिनों के बाद
बहुत देर तक हम चुपचाप
बहुत बड़ा है यह सागर का सूना
बाँगर में/राजाजी का बाग है
बात है : चुकती रहेगी
बाबू ने कहा : विदेश जाना
बालू के घरौंदे बनाये हैं
बाहर सब ओर तुम्हारी
बेमंजिल सड़क के किनारे
बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है
बोधिसत्त्व की गुफाओं में
बोलना सदा सब के लिए
ब्राह्म वेला में उठ/कर साध कर साँस
भई, आज हम बहुत उदास हैं
भर ली गयी हैं पुआलें खलिहानों में
भीड़ों में जब-जब जिस-जिस से
भीतर ही भीतर/तुम्हें पुकारता हूँ
भूल कर/सवेरे/देहात की सैर करने गया था
भैंस की पीठ पर/चार-पाँच बच्चे
भोर/अगर थोड़ा और अलसाया रहे
भोर/एक चुम्बन/लाल
भोर/नील के पटल पर एक नाम
मतियाया/सागर लहराया/तरंग की पंखयुक्त वीणा पर
मन/दुम्मट-सा गिरता है
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो/
मन्दिर के भीतर वे सब धुले-पुँछे उधड़े-अवलिप्त
मन्दिर तुम्हारा है/देवता हैं किस के?
मन्दिर में/मैं ने एक बिलौटा देखा
मरता है?/जिस का पता नहीं
मर्माहत ही मिले मुझे
महावन में/बिखरे हैं जाति धन
माँ, हम नहीं मानते/अगली दीवाली पर मेले से
माघ : कोहरे में अंगार की सुलगन
मालती की गन्ध
मिटता-मिटता भी मिटा नहीं आलोक
मिलना हो तो कुछ तो टूटे
मुड़ी डगर/मैं ठिठक गया\
मेघ में खोयी-छाया : पर्वत
मेज के आर-पार
मेरा घर/दो दरवाज़ों को जोड़ता
मेरी छाती/पर हवाएँ लिख जाती है
मेरी आँखों ने तुझे सहलाया है
मेरी पोर पोर/गहरी निद्रा में थी
मेरे घोड़े की टाप/चौखटा जड़ती जाती है
मेरे मत होओ/पर अपने को स्थगित करो
मैं कवि हूँ/द्रष्टा, उन्मेष्टा, सन्धाता
मैं जगा : जागते ही मुझे लगा
मैं देख रहा हूँ/झरी फूल से पँखुरी
मैं ने कहा : अपनी मनःस्थिति
मैं ने कहा/कि ‘चिड़िया’ : मैं देखता रहा
मैं ने कहा, पेड़, तुम इतने बड़े हो
मैं ने जो नहीं कहा/वह मेरा अपना रहा
मैं ने तब पूछा था/और रसों में क्या
मैं ने देखा/एक बूँद सहसा उछली
मैं ने देखी हैं झील में डोलती हुई
मैं ने पूछा,/यह क्या बना रही हो?
मैं पाप नहीं लाया/ढो कर
मैं बहुत ऊपर उठा था, पर गिरा
मैं मरा नहीं हूँ,/मैं नहीं मरूँगा
मैं सभी ओर से खुला हूँ
म्निमोसिनी, मुझे नींद दे!
यह अन्तर मन/यह बाहर मन
यह अप्रत्याशित उजला/दिपती धूप-भरा
यह इतनी बड़ी अनजानी दुनिया है
यह एक और घर/पीछे छूट गया
यह कली/झुटपुट अँधेरे में
यह कविता मैं ने
यह क्या पलास की लाल लहकती
यह गीत है जो मरेगा नहीं
यह जाने का छिन आया
यह जो दिया लिए तुम चले खोजने सत्य, बताओ
यह देने का अहंकार/छोड़ो
यह पगडंडी/चली लजीली
यह भी तो एक सुख है
यह महाशून्य का शिविर
यह मुकुर/दिया था तू ने
यह मेरा ताना/यह मेरा बाना
यह वासुदेव प्याला
यह सूरज का जपा-फूल
यहाँ जो खोपड़ी मिली थी
यहाँ/हेलास के द्वीपों में
यही वह गलियारा है
यही, हाँ, यही-/कि और कोई
याद : सिहरन : उड़ती सारसों की जोड़ी
याद है मुझे वह/खँडहर रंगशाला
यूथ से निकल कर
यों मत छोड़ दो मुझे, सागर
रक्तबीज का रक्त
रात उजलायी/अँधेरे से
रात/एकाएक टूटी मेरी नींद
रात की रौंदी हुई यह रेत
रात के घुप अँधेरे में जो एकाएक जागता है
रात बीतती है/घर के शान्त झुटपुटे कोने में
रात-भर आते रहे सपने/एक भी अच्छा नहीं था
रात-भर घेर-घेर/छाते आते रहे बादर
रात में जागा/अन्धकार की सिरकी के पीछे से
रात में/मेरे भीतर सागर उमड़ा
रात में/शहर की सूनी सड़कों पर
रात मोम-सी बेबस ढलती रही
रात सावन की/कोयल भी बोली
रातों-रात/निकल जाते रहे हैं वे
राम जी/भले आये
राष्ट्रीय राजमार्ग के बीचो-बीच बैठ
राही, चौराहों पर बचना!
रीता घर/सूना गलियारा
रूप-केकी नाचते हैं,/सार-घन! बरसो
रूप रूप रूप/हम पिघले
रूपाकार/सब अन्धकार में हैं
रेत का विस्तार/नदी जिस में खो गयी
रेती में/चार टूटी पर सँवारी हुई सीपियाँ
रोज सवेरे मैं थोड़ा-सा अतीत में जी लेता हूँ
ललछौंहें/पाँकड़ के नीचे
लहर पर लहर पर लहर पर लहर
लहरीला पिघला सोना/झरने पर तिपहर की धूप
लाल : के इस/भरे हुए दिल से पके लाल फूल को देखो
लेकिन/फिर आऊँगा मैं भी
लेकिन वे तो फिर आएँगे
लेकिन हम जिन की अपेक्षाएँ
ले लो फूल
लोग बहुत पास आ गये हैं
लोहे/और कंकरीट के जाल के बीच
लौटे/तो लौट चले
वन में एक झरना बहता है
वन में/महावृक्ष के नीचे खड़े
वसन्त आया तो है, पर बहुत दबे-पाँव
वसन्त आया है/पतियाया-सा
वह क्या लक्ष्य/जिसे पा कर फिर प्यास रह गयी शेष
वह जो पंछी/खाता नहीं ताकता है
वह दूर/शिखर/यह सम्मुख
वह धीरे-धीरे आया
वहाँ दूर शहर में/बड़ी भारी सरकार है
वहाँ/एक चट्टान है
वहाँ विदेशों में/कई बार कई कमरे मैं ने छोड़े हैं
वापी ने तूने/कुचले हुए शहतूत क्यों फेंके लड़की?
वासना को बाँधने को
वे कहते गये हाँ, हाँ
वे (क्षुप) लोक भी हो सकते है
वे तो फिर आएँगे
वे सब बातें/झूठ भी हो सकती थीं
व्यथा सब की,/निविडतम एकान्त
शक्ति का मत गर्व कर
शं/शायद कोई आएगा
शरद की धुन्ध बढ़ आयी है
शान्त/मेरे सँझाये कमरे
सचमुच के आये को/कौन खोले द्वार
सपने के भीतर/सपने में अपने
सपने में/अनजानी की
सब/अपनी-अपनी/कह गये
सब खेतों में/लीकें पड़ी हुई हैं
सभी जगह/जो उपजाता है अन्न, पालता है सब को
सभी तो गूँगे हैं, पर एक
सभी से मैं ने विदा ली
समय क्षण-भर : थमा सा
समस्या/बूढ़ी हड्डियों की नहीं
समागत है काल
सरसराती/पत्ती ने डाल से
सरसों फूली/पीली लीकें
सवेरे आये बाम्हन/जो जैसे ही जागे
सवेरे उठा तो धूप खिल कर छा गयी थी
साँझा बुझता क्षितिज
सागर, ओ आदिम रस
सागर और धरा मिलते थे जहाँ
सागर की लहरों के बीच से वह
सागर के किनारे
सागर जो गाता है
सागर पर/उदास
सारग में ऊब-डूब करती
सारे इस सुनहले चँदोवे से
सिर से कन्धों तक
सीढ़ियाँ। द्वार। देहरी पर दिया।
सीधी जाती डगर थी
सुनता हूँ गान के स्वर
सुनो/कुछ बातें ऐसी हैं
सुनो मैं ने कहीं हवाओं को बाँध कर
सूँघ ली है साँस भर-भर
सूनी-सी साँझ एक
सूने उदधि की लहर
सूने गलियारों की उदासी
सूप-सूप भर/धूप कनक
सोच की नावों पर
सोया था मैं/नींद में को
स्वयं पथ भटका हुआ
हथौड़ा अभी रहने दो
हम आये हैं
हम नदी के साथ-साथ
हम निहारते रूप कांच के पीछे
हम सदा जो नहीं सुनते
हम ने देवताओं की धरती को
हम ने शिखरों पर जो
हमें/कोई नहीं पहचानता था
हमेशा/प्रस्थान से पहले
हर किसी के भीतर/एक गीत सोता है
हवा कहीं से उठी, बही
हाँ, इसे मैं छू सकता हूँ
हाँ, तुम्हारा हाथ मैं ने गहा
हाँ, दोस्त/तुम ने पहाड़ की
हाँ, बहुत दिन हो गये
हाँ, भाई, वह राह मुझे मिली थी
हाँ, लेकिन तुम्हारा अविराम आन्दोलन
हाँ, शरद आया
हाँ, हूँ तो, मैं धार पर हूँ
हे अमिताभ!
हे महाबुद्ध/मैं मन्दिर में आयी हूँ
होते हैं क्षण
होने और न होने की सीम


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