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कविता

आओ जलाएँ
महेंद्र भटनागर


आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !

नये पूर्ण मानव  बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
     आओ जगाएँ
     भुवन-भाविनी भावनाएँ !

नहीं हो  परस्पर  विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता,
      आओ मिटाएँ
       दलन-दानवी-दासताएँ !

कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों  न नभ पर  प्रभंजन,
     आओ बहाएँ
     अधम आसुरी आपदाएँ !


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हिंदी समय में महेंद्र भटनागर की रचनाएँ