रोजी-रोटी बुनते-बुनते
हम खुद गल्प हुए
सुख, राई-सा बौना
पर्वत जैसे कष्ट मिले
भूख मिटाने के साधन
सारे पथभ्रष्ट मिले
छल-छद्मों के हाथ
पराजित दृढ़ संकल्प हुए।
द्वार, बंद कर किस्मत के
जड़ दी सुख पर साँकल
इस सवर्णता ने सौंपे
प्रतिभाओं को दलदल
हंस, भिखारी किंतु
काग के कायाकल्प हुए।
बाल स्वप्न को घृणापूतना
जहर पिलाती है
कन्या भ्रूणों के कुरीतियाँ
गला दबाती हैं
सफल आज बर्बरताओं के
सभी विकल्प हुए।