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कविता

इक दफा अवचेतन में
यश मालवीय


इक दफा अवचेतन में कोई
हौले हल्के से आया था
अब सबकुछ उसका अपना
ये चेतन भी अवचेतन भी

इक दफा एक खुशबू के
झोंके ने सहसा पथ रोका था
इक बहुत हठीले बादल ने
यूँ सूरज का रथ रोका था

इस दफा गगन पर मानस के
कोई तरुवर-सा छाया था
अब सबकुछ उसका अपना
हठ भी, सर्वस्व समर्पण भी

इक दफा नाव ने लहरों से
कुछ पाठ पढ़ा था सूने में
निःशब्द किसी की स्वरलहरी
थी हरसिंगार के चूने में

इक दफा चाँदनी में कोई
नीला टुकड़ा गहराया था
अब सबकुछ उसका अपना है
ये जीवन भी, वो जीवन भी

हर आहट पे आहट देता
इक गीत सँवरने को ही था
छाया से धूप बतियाता-सा
इक धूप का दरपन टोही था

वो मोही था, निर्मोही था
घर आँगन में लहराया
अब सबकुछ उसका अपना है
सौगंधें, टूटा-सा प्रण भी

इक दफा रात ढलते-ढलते
रुक गया अकेला तारा था
तारे में झिलमिल करता-सा
कोई अपना मन हारा

इक दफा राग भैरवी
सुबह के संशय ने भी गाया था
अब सबकुछ उसका अपना है
ये क्यारी भी, वो उपवन भी


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