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कविता

नन्हे हाथ तुम्हारे
यश मालवीय


हिलते रहे हरे पत्तों से
नन्हे हाथ तुम्हारे
दफ्तर जाना ही था
पापा क्या करते बेचारे

दफ्तर जो अपने सपनों की
खातिर बहुत जरूरी
खाली जेब कहाँ से होंगी
जिदें तुम्हारी पूरी
उड़ जाएँगे आसमान में
गैस भरे गुब्बारे

तुम्हें चूमना चाहा भी तो
घड़ी सामने आई
कल की खुली अधूरी फाइल
पड़ी, सामने आई
बेटे! मुझे माफ कर देना
मिलना बाँह पसारे

बजते रहे कान रस्ते भर
सुना तुम्हारा रोना
और पास ही रहा बोलता
चाभी भरा खिलौना
राह धूप में दिखी अँधेरी
ओ घर के उजियारे!

शाम पहुँच कर दफ्तर से घर
तुमको बहला लूँगा
गर्म चुंबनों से गुलाब सा
चेहरा नहला दूँगा
किलकारी में खो जाएँगे
सारे आँसू खारे

बेटे माँ को भी समझाना
उससे भी मिलना था
समय निगोड़ा आड़े आया
फूलों सा खिलना था
समय ढेर सा भर झोली में
आऊँगा मैं प्यारे!


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