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कविता

महँगाई की मार
ओमप्रकाश सिंह


आज गरीबों के
चेहरों पर
महँगाई की मार।

खाली चूल्हा
खाली चकिया
खाली लोटा थाल
भूख निगोड़ी
काट रही है
सिकुड़े-सिकुड़े गाल
खैनी खाकर
मरी बुढ़ौती
रामदास के द्वार।

बौना घर
दालान न आँगन
झुकी कोठरी कच्ची
छप्पर के नीचे
अँसुआए
लूली-लंगड़ी बच्ची
अंधी-बहरी
सरकारों के
सिर पर भ्रष्टाचार।

अँधियारा आ
पाँव पसारे
न दीपक न बाती
कोहरा आकर
विष बो जाए
चढ़ा रात भर छाती
टूटी खाट
अलाव जलाएस
काँप रहा संसार।
 


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