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कविता

धीरे धीरे उतर क्षितिज से
महादेवी वर्मा


धीरे धीरे उतर क्षितिज से
आ वसंत-रजनी!

तारकमय नव वेणीबंधन
शीश-फूल कर शशि का नूतन,
रश्मि-वलय सित घन-अवगुंठन,

मुक्ताहल अभिराम बिछा दे
चितवन से अपनी !
पुलकती आ वसंत-रजनी !

मर्मर की सुमधुर नूपुर-ध्वनि,
अलि-गुंजित पद्मों की किंकिणि,
भर पद-गति में अलस तरंगिणि,

तरल रजत की धार बहा दे
मृदु स्मित से सजनी !
विहँसती आ वसंत-रजनी !

पुलकित स्वप्नों की रोमावलि,
कर में हो स्मृतियों की अंजलि,
मलयानिल का चल दुकूल अलि !

चिर छाया-सी श्याम, विश्व को
आ अभिसार बनी !
सकुचती आ वसंत-रजनी !

सिहर सिहर उठता सरिता-उर,
खुल खुल पड़ते सुमन सुधा-भर,
मचल मचल आते पल फिर फिर,

सुन प्रिय की पद-चाप हो गई
पुलकित यह अवनी !
सिहरती आ वसंत-रजनी !

(नीरजा से)
 


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