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कविता

पुलक पुलक उर, सिहर सिहर तन
महादेवी वर्मा


पुलक पुलक उर, सिहर सिहर तन,
आज नयन आते क्यों भर-भर !

सकुच सलज खिलती शेफाली,
अलस मौलश्री डाली डाली;
बुनते नव प्रवाल कुंजों में,
रजत श्याम तारों से जाली;
शिथिल मधु-पवन गिन-गिन मधु-कण,
हरसिंगार झरते हैं झर झर !
आज नयन आते क्यों भर भर ?

पिक की मधुमय वंशी बोली,
नाच उठी सुन अलिनी भोली;
अरुण सजल पाटल बरसाता
तम पर मृदु पराग की रोली;
मृदुल अंक धर, दर्पण सा सर,
आज रही निशि दृग-इंदीवर !
आज नयन आते क्यों भर भर ?

आँसू बन बन तारक आते,
सुमन हृदय में सेज बिछाते;
कंपित वानीरों के बन भी,
रह हर करुण विहाग सुनाते,
निद्रा उन्मन, कर कर विचरण,
लौट रही सपने संचित कर !
आज नयन आते क्यों भर भर ?

जीवन-जल-कण से निर्मित सा,
चाह-इंद्रधनु से चित्रित सा,
सजल मेघ सा धूमिल है जग,
चिर नूतन सकरुण पुलकित सा;
तुम विद्युत बन, आओ पाहुन !
मेरी पलकों में पग धर धर !
आज नयन आते क्यों भर भर ?

(नीरजा से)
 


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