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कविता

शृंगार कर ले री सजनि !
महादेवी वर्मा


शृंगार कर ले री सजनि !
नव क्षीरनिधि की उर्म्मियों से
रजत झीने मेघ सित,
मृदु फेनमय मुक्तावली से
तैरते तारक अमित;
सखि ! सिहर उठती रश्मियों का
पहिन अवगुंठन अवनि !

हिम-स्नात कलियों पर जलाए
जुगनुओं ने दीप से;
ले मधु-पराग समीर ने
वनपथ दिए हैं लीप से;
गाती कमल के कक्ष में
मधु-गीत मतवाली अलिनि !

तू स्वप्न-सुमनों से सजा तन
विरह का उपहार ले;
अगणित युगों की प्यास का
अब नयन अंजन सार ले?
अलि ! मिलन-गीत बने मनोरम
नूपुरों की मदिर ध्वनि!

इस पुलिन के अणु आज हैं
भूली हुई पहचान से;
आते चले जाते निमिष
मनुहार से, वरदान से;
अज्ञात पथ, है दूर प्रिय चल
भीगती मधु की रजनि !
शृंगार कर ले री सजनि ?

(नीरजा से)
 


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