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कविता

रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले !
महादेवी वर्मा


रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले !
लोचनों में क्या मदिर नव ?
देख जिसकी नीड़ की सुधि फूट निकली बन मधुर रव !

झूलते चितवन गुलाबी -
में चले घर खग हठीले !
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले !

छोड़ किस पाताल का पुर ?
राग से बेसुध, चपल सजीले नयन में भर,
रात नभ के फूल लाई,
आँसुओं से कर सजीले !
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले !

आज इन तंद्रिल पलों में !
उलझती अलकें सुनहली असित निशि के कुंतलों में !
सजनि नीलमरज भरे
रँग चूनरी के अरुण पीले !
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले !

रेख सी लघु तिमिर लहरी,
चरण छू तेरे हुई है सिंधु सीमाहीन गहरी !
गीत तेरे पार जाते
बादलों की मृदु तरी ले !
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले !

कौन छायालोक की स्मृति,
कर रही रंगीन प्रिय के द्रुत पदों की अंक-संसृति,
सिहरती पलकें किए -
देती विहँसते अधर गीले !
रागभीनी तू सजनि निश्वास भी तेरे रँगीले !

(सांध्य गीत से)
 


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