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कविता

शून्य मंदिर में बनूँगी
महादेवी वर्मा


शून्य मंदिर में बनूँगी आज मैं प्रतिमा तुम्हारी !

अर्चना हों शूल भोले,
क्षार दृग-जल अर्घ्य हो ले,
आज करुणा-स्नात उजला
दुख  हो  मेरा  पुजारी !

नूपुरों का मूक छूना,
सरद कर दे विश्व सूना,
यह अगम आकाश उतरे
कंपनों का हो भिखारी !

लोल तारक भी अचंचल,
चल न मेरी एक कुंतल,
अचल रोमों में समाई
मुग्ध हो गति आज सारी !

राग मद की दूर लाली,
साध भी इसमें न पाली,
शून्य चितवन में बसेगी
मूक हो गाथा तुम्हारी !

(सांध्य गीत से)
 


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