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कविता

प्रिय-पथ के यह शूल मुझे अति प्यारे ही हैं !
महादेवी वर्मा


प्रिय-पथ के यह मुझे अति प्यारे ही हैं !

हीरक सी वह याद
बनेगा जीवन सोना,
जल जल तप तप किंतु
खरा इसको है होना !
चल ज्वाला के देश जहाँ अंगारे ही हैं !

तम-तमाल ने फूल
गिरा दिन पलकें खोलीं
मैंने दुख में प्रथम
तभी सुख-मिश्री घोली !
ठहरें पल भर देव अश्रु यह खारे ही हैं !

ओढे मेरी छाँह
राज देती उजियाला,
रजकण मृदु-पद चूम
हुए मुकुलों की माला !
मेरा चिर इतिहास चमकते तारे ही हैं !

आकुलता ही आज
हो गई तन्मय राधा,
विरह बना आराध्य
द्वैत क्या कैसी बाधा !
खोना पाना हुआ जीत वे हारे ही हैं !

(सांध्य गीत से)
 


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