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कविता

रे पपीहे पी कहाँ ?
महादेवी वर्मा


रे पपीहे पी कहाँ ?

खोजता तू इस क्षितिज से उस क्षितिज तक शून्य अंबर,
लघु परों से नाप सागर;
नाप पाता प्राण मेरे
प्रिय समा कर भी कहाँ ?

हँस डुबा देगा युगों की प्यास का संसार भर तू,
कंठगत लघु बिंदु कर तू !
प्यास ही जीवन, सकूँगी
तृप्ति में मैं जी कहाँ ?

चपल बन बन कर मिटेगी झूम तेरी मेघवाला !
मैं स्वयं जल और ज्वाला !
दीप सी जलती न तो यह
सजलता रहती कहाँ ?

साथ गति के भर रही हूँ विरति या आसक्ति के स्वर,
मैं बनी प्रिय-चरण-नूपुर !
प्रिय बसा उर में सुभग !
सुधि खोज की बसती कहाँ ?

(सांध्य गीत से)
 


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