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कविता

पंकज-कली!
महादेवी वर्मा


क्या तिमिर कह जाता करुण ?
क्या मधुर दे जाती किरण ?
किस प्रेममय दुख से हृदय में
अश्रु में मिश्री घुली ?

किस मलय-सुरभित अंक रह -
आया विदेशी गंधवह ?
उन्मुक्त उर अस्तित्व खो
क्यों तू भुजभर मिली ?

रवि से झुलसते मौन दृग,
जल में सिहरते मृदुल पग;
किस व्रतव्रती तू तापसी
जाती न सुख दुख से छली ?

मधु से भरा विधुपात्र है,
मद से उनींदी रात है,
किस विरह में अवनतमुखी
लगती न उजियाली भली ?

यह देख ज्वाला में पुलक,
नभ के नयन उठते छलक !
तू अमर होने नभधरा के
वेदना-पय से पली !

पंकज-कली! पंकज-कली!

(सांध्य गीत से)
 


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