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कविता

रजतकरों की मृदुल तूलिका
महादेवी वर्मा


रजतकरों की मृदुल तूलिका
से ले तुहिन-बिंदु सुकुमार,
कलियों पर जब आँक रहा था
करुण कथा अपनी संसार;

तरल हृदय की उच्छ्वास
जब भोले मेघ लुटा जाते,
अंधकार दिन की चोटों पर
अंजन बरसाने आते !

मधु की बूँदों में छ्लके जब
तारक लोकों के शुचि फूल,
विधुर हृदय की मृदु कंपन सा
सिहर उठा वह नीरव कूल;

मूक प्रणय से, मधुर व्यथा से
स्वप्न लोक के से आह्वान,
वे आए चुपचाप सुनाने
तब मधुमय मुरली की तान।

चल चितवन के दूत सुना
उनके, पल में रहस्य की बात,
मेरे निर्निमेष पलकों में
मचा गए क्या क्या उत्पात !

जीवन है उन्माद तभी से
निधियाँ प्राणों के छाले,
माँग रहा है विपुल वेदना
के मन प्याले पर प्याले !

पीड़ा का साम्राज्य बस गया
उस दिन दूर क्षितिज के पार,
मिटना था निर्वाण जहाँ
नीरव रोदन था पहरेदार !

कैसे कहती हो सपना है
अलि ! उस मूक मिलन की बात ?
भरे हुए अब तक फूलों में
मेरे आँसू उनके हास !
  
(नीहार से)
 


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