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कविता

ढुलकते आँसू सा सुकुमार
महादेवी वर्मा


ढुलकते आँसू सा सुकुमार
बिखरते सपनों सा अज्ञात,
चुरा कर अरुणा का सिंदूर
मुस्कराया जब मेरा प्रात,

छिपा कर लाली में चुपचाप
सुनहला प्याला लाया कौन ?

हँस उठे छूकर टूटे तार
प्राण में मँडराया उन्माद,
व्यथा मीठी ले प्यारी प्यास
सो गया बेसुध अंतर्नाद,

घूँट में थी साकी की साध
सुना फिर फिर जाता है कौन ?
  
(नीहार से)
 


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